<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss'><id>tag:blogger.com,1999:blog-4294876642043841838</id><updated>2009-11-02T08:37:41.755-08:00</updated><title type='text'>सरोकार</title><subtitle type='html'>छत्तीसगढ़ की संस्कारधानी से देश-दुनिया माटी और मीडिया की बातें...</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://sarokaar.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4294876642043841838/posts/default'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sarokaar.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>राजेश अग्रवाल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03166713468895085704</uri><email>agrrajesh@gmail.com</email></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>22</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>25</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4294876642043841838.post-845782526002215224</id><published>2009-09-09T09:05:00.000-07:00</published><updated>2009-09-09T09:27:02.117-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='नक्सल'/><title type='text'>नक्सल से निपटने फिजूल की पंचायत</title><content type='html'>आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों के लिए केन्द्रीय गृह मंत्री पी.चिदम्बरम् के नये पुनर्वास पैकेज से उत्साहित होने की कोई वजह नहीं दिखती. यह छत्तीसगढ़ सरकार की पिछले 10 साल से चल रही पुनर्वास नीति का ही विस्तार है, जो बुरी तरह से असफल रही है. भरोसे व सुरक्षा के अभाव में छत्तीसगढ़ में केवल गिनती के नक्सलियों ने हथियार डाले, जबकि इससे कई गुना ज्यादा नये लोग बीते सालों में संघम और दलम् में शामिल हो चुके हैं. केन्द्रीय गृह मंत्री से तो उम्मीद की जा रही थी कि राजनांदगांव के पुलिस अधीक्षक विनोद चौबे के मारे जाने के बाद बस्तर से नक्सलियों को खदेड़ने के लिए वे आर्थिक, राजनैतिक व रणनीतिक मोर्चे पर किसी ठोस रणनीति की घोषणा करते,  लेकिन ताज़ा घोषणा किसी पुरानी फाइल पर चढ़ाई गई एक नई नोटशीट से ज्यादा कुछ नहीं है.&lt;br /&gt;देश के नक्सल प्रभावित इलाकों में सबसे खतरनाक स्थिति छत्तीसगढ़ की है. बस्तर संभाग के जगदलपुर, नारायणपुर, कांकेर, दंतेवाड़ा, बीजापुर, बलरामपुर और इससे लगे जिलों राजनांदगांव, धमतरी&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/SqfStxfANAI/AAAAAAAAAgc/RbedWUe055w/s1600-h/rally.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 300px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/SqfStxfANAI/AAAAAAAAAgc/RbedWUe055w/s400/rally.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5379499963736667138" /&gt;&lt;/a&gt; में नक्सली तमाम मुठभेड़ों के बाद अचानक आ धमकते हैं. ये बारूदी सुरंग बिछाकर हमला करते हैं और अपना बिना कोई नुकसान उठाए एक साथ दर्जनों जवानों को मार गिराते हैं. बीते जुलाई माह में जब राजनांदगांव के पुलिस अधीक्षक विनोद चौबे समेत 30 से ज्यादा जवानों को 3 किलोमीटर लम्बा एम्बुस लगाकर नक्सलियों ने मार डाला, तो उनकी बढ़ी हुई ताकत ने देश के प्रधानमंत्री और गृह मंत्री तक को चिंता में डाल दिया. विपक्ष ने छत्तीसगढ़ सरकार की नाक में दम कर डाला. पूरे राज्य में शोक व सन्नाटा था. लग रहा था कि तीन दशक पुरानी इस समस्या से छुटकारा पाने जल्द ही कोई निर्णायक कार्रवाई शुरू होगी. लेकिन हुआ क्या? नक्सलियों ने अभी भी सुरक्षा बलों को चकमा देकर घेरना और पुलिस के मुख़बिरों तथा विशेष पुलिस अधिकारी बनाए गए आदिवासी युवकों को गोलियों से उड़ाना, उनका गला रेतना जारी रखा है. मदनवाड़ा मुठभेड़ में चौबे की मौत के बाद से केन्द्रीय बलों व राज्य पुलिस के बीच टकराव व मतभेद बढ़े हैं. इनके बीच सुलह कराने के लिए मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह को भी पंचायत बुलानी पड़ी. विषम परिस्थितियों के चलते जवानों ने मोर्चे पर जाने से इंकार किया, इनमें से 13 जवानों की मनाही को उनकी कायरता समझी गई और उन्हें नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया. दो बड़ी जन-अदालतें लगाकर नक्सलियों ने पुलिस के 4 मुखबिरों की गला रेतकर हत्या कर दी. पुलिस फोर्स उन गांवों तक मामले की जांच करने के लिए नहीं पहुंचने की हिम्मत नहीं जुटा पाई. खुद ग्रामीण उनकी लाशें लेकर थाने तक पहुंचे तब जांच की खानापूर्ति की गई. उस हर जगह पर नक्सली हमले कर रहे हैं जहां नये  टावर लगाए जा रहे हैं, नई सड़कें बनाई जा रही है, नई चौकियों के लिए ईंट पत्थर भेजे जा रहे हैं और उन लोगों की हत्या की जा रही है जो इन कामों में मजदूरी कर रहे हैं. जवानों को बस में बिठाने वाले चालकों को मार डालने की धमकी दी जा रही है. नक्सलियों ने पुलिस को घेरने के लिए एक ही परिवार के 7 लोगों को जिंदा जलाने की घटना होने की एक फर्जी सूचना भी थाने तक भेजी, लेकिन पुलिस अपनी सतर्कता से उनके जाल में फंसने से बच गई. ये सब वे घटनाएं हैं जो 13 जुलाई 2009 को मदनवाड़ा हमले के बाद राजधानी तक पहुंची. बहुत सी ख़बरें तो दण्डकारण्य के बीहड़ों से बाहर निकल भी नहीं पातीं.&lt;br /&gt; अब सर्चिंग आपरेशनों में काफी सतर्कता बरती जा रही है. सीआरपीएफ जवान तलाशी मानदंडों का कड़ाई से पालन कर रहे हैं. उन्होंने गश्त के लिए 4 किलोमीटर से ज्यादा दूर नहीं जाने का फैसला किया है. मतलब यह कि हालिया दिनों में नक्सली बस्तर के अंदरूनी इलाकों में अपना तेजी से अपना पैर पसारने में लगे हुए हैं. धमतरी और राजनांदगांव में बड़ी वारदातें कर उन्होंने नये क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति का सबूत तो दे ही दिया है. यह वह दौर है जब नक्सलियों के सफाये के लिए ठोस काम बस्तर में होने चाहिए थे, क्योंकि एक आला अफसर को जान से हाथ धोना पड़ा, और  मौके का फायदा उठाकर पूरे बस्तर में नक्सली अपनी दहशत कायम करने में सफल दिखाई दे रहे हैं.&lt;br /&gt;दरअसल, जब-जब नक्सली हमला नहीं होता, सरकार और सुरक्षा बलों को यह भ्रम हो जाता है कि वे  कमजोर पड़ गए हैं और ग्रामीण अब सरकार के पुनर्वास पैकेज की तरफ आकर्षित होकर सामने आएंगे. जबकि बड़ी वारदातें कर नक्सलियों का खामोश दिखना, दबाव बढ़ने पर वार्ता का प्रस्ताव रख देना, मुठभेड़ में मात खाने की आशंका होने पर पीछे हटना, यह सब उनकी रणनीति का हिस्सा है. बस्तर में हालात खराब है और जरूरत जमीनी कार्रवाई की है. साथ ही जरूरत है बस्तर के लोगों का भरोसा जीतने के लिए उनके बीच&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/SqfS5Kcu4oI/AAAAAAAAAgk/U4OeD-sxRDY/s1600-h/singur_farmers_protest.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 270px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/SqfS5Kcu4oI/AAAAAAAAAgk/U4OeD-sxRDY/s400/singur_farmers_protest.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5379500159416590978" /&gt;&lt;/a&gt; सरकार के पहुंचने का, उनका विश्वास जीतने का. इनके बगैर तो नक्सलियों के ख़िलाफ लड़ाई ही नहीं लड़ी जा सकेगी. लेकिन उल्टे दूरी बनाई जा रही है और केन्द्र सरकार को सूझ गया कि वह पुनर्वास योजना घोषित करे, जो न केवल  भ्रमित करने वाला है, ध्यान बंटाने वाला और वक्त बर्बाद करने वाला है बल्कि बस्तर में काम करने वाले चुनिंदा परिश्रमी अधिकारियों को इस धोखे में रखने वाला है कि नक्सलियों को अब पकड़ने की जरूरत नहीं वे खुद उनके पास आएंगे. राहत पैकेज लागू करना सरकार की उदारता का परिचय देता है, या फैसले को दिल्ली से ही बैठकर निपटाने का रास्ता दिखा रहा है? क्या पुनर्वास की गारंटी उन्हें मिल जाना मुख्य धारा में लौटने वाले लोगों को सुरक्षा की गारंटी भी दिलाएगा?&lt;br /&gt;अब जरा ध्यान दिया जाए कि केन्द्र सरकार के राहत पैकेज में क्या है. आत्मसमर्पण करने वाले हर नक्सली को व्यावसायिक प्रशिक्षण तथा तीन वर्ष तक प्रति माह दो हजार रूपये दिए जाएंगे. इसके अलावा नक्सली के आत्मसमर्पण करते ही डेढ लाख की राशि उसके नाम से बैंक में सावधि जमा खाते में रख दी जायेगी, जिसे वह तीन वर्ष बाद निकाल सकेगा. गृह मंत्रालय द्वारा जारी  दिशानिर्देशों के अनुसार यदि कोई नक्सली आत्मसमर्पण करते समय हथियार भी सौंपता है तो उसे अलग से प्रोत्साहन राशि दी जाएगी. जनरल परपज मशीनगन आरपीजीयूएमजी या स्निफर राइफल सौंपने पर 25 हजार रूपये तथा ए के श्रृंखला की किसी भी राइफल के लिए 15 हजार रू दिए जायेंगे. पिस्तौल या रिवाल्वर या बारूदी सुरंग के लिए 3 हजार रूपये दिये जायेंगे. जमीन से हवा पर मार करने वाली मिसाइलें सौंपने पर 20 हजार रू. तथा किसी भी तरह के कारतूस के लिए तीन रपये प्रति कारतूस दिये जायेंगे. एक सेटेलाइट फोन के लिए 10 हजार रू. तथा कम दूरी तक काम करने वाले वायरलेस सेट के लिए एक हजार रूपए और लंबी दूरी के सेट के लिए 5 हजार रू. दिये जायेंगे. कुछ अन्य हथियारों के लिए भी राशि तय की गई है.&lt;br /&gt;केन्द्र सरकार की ओर से घोषित यह पैकेज छत्तीसगढ़ में सन् 2000 से लागू पुनर्वास पैकेज का ही विस्तारित स्वरूप है. छत्तीसगढ़ में भी समर्पण करने वाले नक्सलियों के प्रति कम उदारता नहीं रही है. पहले ही छत्तीसगढ़ में समर्पण करने वाले नक्सलियों के अपराधिक मामले समाप्त कर दिये जाते हैं. एमएलजी जैसे घातक हथियार के साथ समर्पण करने वालों को 3 लाख रूपये दिए जाते हैं, एके 47 के साथ समर्पण करने वालों को दो लाख, एसएलआर के साथ समर्पण करने वालों को एक लाख, थ्री नाट थ्री लाने वालों को 75 हजार तथा बंदूक के साथ समर्पण करने वालों को 50 हजार रूपये नगद दिए जाते हैं. राज्य सरकार ने कृषि भूमि देने तथा सरकारी नौकरी में प्राथमिकता देने की व्यवस्था भी कर रखी है. केन्द्र सरकार की नीति में अतिरिक्त आकर्षण यह है कि इसमें नक्सलियों को व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया जाएगा और प्रतिमाह दो हजार रूपये भी दिए जाएंगे. इसके अलावा उनके नाम पर डेढ़ लाख रूपये की एफ डी कराई जाएगी, जिसे वे अच्छे चालचलन  के बाद बाद 3 साल के बाद निकाल सकेंगे.&lt;br /&gt;आशय यह है कि सरकार की ओर से आर्थिक प्रलोभन न तो अनोखा है, न ही ऐसा पहली बार किया गया है. यदि गृह मंत्रालय के अधिकारियों ने चिदम्बरम् को अंधेरे में रखा होगा कि इसका दूरगामी असर पड़ने वाला है तो वे जरा छत्तीसगढ़ में लागू पिछले 10 साल के पुनर्वास पैकेज का ही आंकड़ा देख लें. अब तक 140 शातिर नक्सलियों ने ही आत्मसमर्पण किया है. और करीब 2400 ऐसे आदिवासियों ने समर्पण किया है, जिन्हें नक्सली अपने साथ बहला- फुसलाकर ले गए थे और संघम-दलम इत्यादि में उन्हें शामिल कर लिया था. बस्तर में ही छोटे बड़े दलों और उनके समर्थकों की मानें तो इनकी संख्या 35 हजार के आसपास है. यह चम्बल के डाकुओं से समर्पण कराने जैसा मामला नहीं है, जिनकी संख्या दो चार सौ हो. ढाई हजार से ज्यादा लोगों के हथियार सौंपने के बाद भी छत्तीसगढ़ में नक्सली देश के सबसे ज्यादा ताकतवर उग्रवादी समूह हैं. बस्तर में आदिवासियों के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि उनको सरकार की तरफ से कोई भी अनुदान, कृपा, राशि, अनाज, स्वास्थ्य, शिक्षा की सुविधा ग्रहण करना मुश्किल है. ऐसा कर लेने पर वे नक्सलियों के निशाने पर आ जाते हैं. इन्हें किसी भी पुनर्वास पैकेज का लाभ दिलाने के पहले उन्हें नक्सलियों के प्रकोप से बचाना जरूरी है. सरकार बस्तर के युवकों को विशेष पुलिस अधिकारी बनाती है- लेकिन ये पुलिस अधिकारी गांव जाते हैं तो नक्सली इनके शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर लाश सड़क पर फेंक रहे हैं. यही हाल पुलिस के मुखबिरों का हो रहा है. जन-अदालतों में इनका गला रेता जा रहा है.ये सब किसी न किसी रूप में सरकारी मदद पाते रहे हैं पर ये सब नक्सलवाद खत्म करने में असफल रहे हैं. बस्तर में सबसे बड़ी समस्या सरकारी मशीनरी के पहुंचने और उसकी विश्वसनीयता कायम करने की है.&lt;br /&gt;मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह स्वीकार करते हैं कि नक्सली ठेकेदार और अफसरों से 300 करोड़ रूपये सालाना वसूली कर रहे हैं. जाहिर है कि 300 करोड़ वे नक्सलियों को देते हैं तो 600 करोड़ खुद भी अंदर कर रहे होंगे. मान लेना चाहिए कि इतना सब कुछ वे अपना घर बेचकर नहीं करते होंगे. सरकारी खजाने से इतना गोलमाल. फिर क्या अफसर और ठेकेदार इतनी  मनमानी करें और हमारे शरीफ राजनीतिज्ञ खामोश बैठे रहेंगे? इसका जवाब हमारे हारे हुए नेता जवाब दें और उनसे पहले वे नेता जवाब दें जो बार-बार नक्सलियों के गढ़ से चुनाव जीतकर आ जाते हैं.  नक्सलियों के खिलाफ लड़ाई में काफी पेंच हैं. &lt;br /&gt;इस ताजा पुनर्वास पैकेज से एक रास्ता और खुल गया है, कुछ नकली नक्सली तैयार होंगे. कुछ असली हथियार जमा होंगे और समस्या अपनी जगह पर बनी रहेगी. कुछ ईमानदार पुलिस अफसर जो नक्सलियों के ख़िलाफ मुहिम चला रहे होंगे इस पैकेज के बाद शायद अब जंगलों में भटकने के बजाय शांत होकर बैठ जाएं. इस उम्मीद के साथ कि अब कुछ बड़े-बड़े हथियार लेकर कुछ खूंखार नक्सली उनके थाने तक खुद ही पहुंच जाएंगे और उन्हें किसी दिन स्वतंत्रता दिवस समारोह में सम्मानित किया जाएगा.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4294876642043841838-845782526002215224?l=sarokaar.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sarokaar.blogspot.com/feeds/845782526002215224/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4294876642043841838&amp;postID=845782526002215224' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4294876642043841838/posts/default/845782526002215224'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4294876642043841838/posts/default/845782526002215224'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sarokaar.blogspot.com/2009/09/blog-post.html' title='नक्सल से निपटने फिजूल की पंचायत'/><author><name>राजेश अग्रवाल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03166713468895085704</uri><email>agrrajesh@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='08211776964587468572'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/SqfStxfANAI/AAAAAAAAAgc/RbedWUe055w/s72-c/rally.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4294876642043841838.post-3906589821517002447</id><published>2009-08-13T03:59:00.000-07:00</published><updated>2009-08-13T04:01:28.079-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लोक राग'/><title type='text'>फिर फांसी पर लटका बेकसूर चरणदास चोर</title><content type='html'>छत्तीसगढ़ी रंगमंच की अनमोल धरोहर- पद्मविभूषण हबीब तनवीर का चरणदास चोर इन दिनों कटघरे में है. बीते 5 दशकों से दुनिया भर में हजारों मंचनों के जरिये राज्य की लोककला, सामाजिक&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/SoPyYSsfcAI/AAAAAAAAAgU/VaqvHkbPrcU/s1600-h/Charandas+Chor.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 204px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/SoPyYSsfcAI/AAAAAAAAAgU/VaqvHkbPrcU/s400/Charandas+Chor.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5369401679904993282" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;स्थिति व संस्कृति को पहचान दिलाने वाली इस कालजयी कृति को जिस तरह सरकार और रंगकर्म के झंडाबरदारों ने मिलकर विवादों के घेरे में ला दिया है, उससे निकट भविष्य में इस नाटक को हबीब की कर्मभूमि छत्तीसगढ़ में निर्विध्न खेला जाना मुश्किल हो गया है.इस विवाद के बीच किसी ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि न तो छत्तीसगढ़ सरकार ने चरणदास चोर किताब को प्रतिबंधित किया है और न ही नाटक को. विरोध-प्रदर्शन और उस पर सरकार की चुप्पी ने मामले को अनावश्यक रुप से उलझा दिया है.&lt;br /&gt;बखेड़ा तब शुरू हुआ जब सतनामी समाज के एक धर्मगुरू बालदास ने मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह से मुलाकात कर वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित हबीब तनवीर की किताब चरणदास चोर पर प्रतिबंध लगाने की मांग की. स्कूली बच्चों में किताबों पर रूचि जगाने के लिए छत्तीसगढ़ में हर साल पुस्तक वाचन सप्ताह मनाया जाता है,  इनमें सामूहिक रूप से किताबें पढ़ी जाती हैं. वाणी प्रकाशन की यह किताब भी उन पढ़ी जाने वाली पुस्तकों की सूची में शामिल थी. गुरू बालदास ने शिकायत की थी कि इस किताब में बताया गया है कि सतनामी पंथ की स्थापना से पहले बाबा घासीदास डकैत थे. यह बात आधारहीन है और इससे गुरू घासीदास व समाज का अपमान हो रहा है. आनन-फानन में शिक्षा संचालनालय ने इस किताब को पुस्तक वाचन से हटाने का निर्देश दे दिया और यह भी चेतावनी दी कि यदि किसी स्कूल में किताब को पढ़ते हुए पाया गया तो जिम्मेदार शिक्षक पर कार्रवाई की जाएगी. &lt;br /&gt;राज्य में सतनामी समाज अनुसूचित जाति में शामिल है. अरसे से यह तबका सामाजिक शोषण का शिकार रहा है, लेकिन प्रदेश की राजनीति में इनका काफी महत्व है. दोनों प्रमुख राजनैतिक दल कांग्रेस और भाजपा इनके वोट अपने पास समेटने के लिए तमाम उपाय करते हैं. सतनामी समाज के नेताओं व गुरूओं को राजनेता साधने में लगे होते हैं. गुरू बालदास सतनामी का समाज में काफी प्रभाव है. वे तब खासे चर्चित हुए जब पिछले साल जुलाई माह में बिलासपुर जिले के बोड़सरा में एक निजी स्वामित्व की भूमि- बाजपेयी बाड़ा पर उन्होंने समाज का हक जताया और कहा कि यह उनके गुरू अघनदास की कर्मभूमि है. इसे हासिल करने के लिए सतनामी समाज के हजारों लोग एक मेले में इकट्ठे हुए. भीड़ के हिंसक हो जाने के बाद पुलिस ने गुरू बालदास समेत दर्जनों लोगों को गिरफ्तार किया. इसके बाद विधानसभा में इस मुद्दे पर लगातार हंगामा हुआ. कांग्रेस गुरू बालदास की रिहाई मांगती रही, जबकि सरकार अपने बचाव में लगी थी. कांग्रेस के सभी गुटों के नेता गुरू बालदास के पक्ष में हो गए. कुछ दिन बाद ही राज्य में चुनाव होने वाले थे.  सतनामी समाज की नाराज़गी भाजपा के लिए नुकसानदेह हो सकती है. राज्य सरकार ने घोषणा कि बोड़सरा बाड़ा को अधिग्रहित किया जाएगा और वहां एक स्मारक बनाया जाएगा. राजनैतिक विश्लेषकों ने माना कि सरकार ने यह फैसला अपनी पार्टी के संभावित नुकसान को ध्यान में रखते हुए लिया. बाद में राज्य सरकार के इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई और अधिग्रहण की घोषणा पर अभी तक आगे की कार्रवाई नहीं की जा सकी है. लेकिन इस मामले ने मीडिया और समाज में गुरू बालदास को चर्चित तो कर ही दिया.&lt;br /&gt;पुस्तक वाचन सप्ताह में किताब को पढ़ने से रोकने के लिए राज्य सरकार की तरफ से जारी आदेश में गुरू बालदास के इस प्रभाव का ही असर दिखाई दे रहा है. बोड़सरा आंदोलन में संयम का अभाव था, वहीं इस मुद्दे पर गुरू बालदास संयमित रहे. उन्होंने विरोध दर्ज कराने का शांतिपूर्ण व लोकतांत्रिक तरीका अपनाया, परन्तु राज्य सरकार ने फैसला घबराहट में ले लिया. सतनामी समाज में बाबा घासीदास पर आस्था व्यक्त करने के लिए पंथी नृत्य का चलन है. बाबा घासीदास सत्य के पुजारी थे. चरणदास चोर नाटक का नायक भी सत्य निष्ठा की शपथ लेता है. पंथी नृत्य तथा नर्तक दल के प्रमुख पद्मश्री स्व. देवदास बंजारे को चरणदास चोर में शामिल नृत्य से अन्तर्राष्ट्रीय पहचान मिली. हबीब तनवीर का प्रत्येक सृजन छत्तीसगढ़ के शोषितों, दलितों व आदिवासियों की विषमताओं का आईना और समृध्द लोक व शिल्प कलाओं का प्रतिबिम्ब है. उनका अपना जीवन, उनके कलाकार और उनका रंगकर्म सामाजिक सौहार्द्र को बढ़ाने और गरीबों, पिछड़ों को महत्व दिलाने के लिए समर्पित रहा. &lt;br /&gt;दरअसल, चरणदास चोर नाटक के किसी भी अंश में सतनामी समाज के ख़िलाफ कोई टिप्पणी ही नहीं है. विवाद वाणी प्रकाशन की किताब की भूमिका को लेकर है. भूमिका का एकाध वाक्य विवादास्पद कहा जा सकता हैं, जिस पर सतनामी समाज का विरोध भी जायज है. गुरू बालदास का दावा है कि उन्होंने सन् 2004 में ही वाणी प्रकाशन की किताब में शामिल भूमिका के उस अंश को लेकर आपत्ति दर्ज करा दी थी. संभवतः उस समय दर्ज कराए गये उनके विरोध को नौकरशाहों व सरकार ने महत्व इसलिए नहीं दिया कि वे गुरू बालदास के प्रभावों से परिचित नहीं थे, इसलिये उस समय उनका ज्ञापन किसी फाइल में धूल खाने के लिए छोड़ दिया गया होगा. वाणी प्रकाशन की भूमिका को या कम से कम उस अंश को हटा दिये जाने के बाद भी चरणदास चोर नाटक कहीं प्रभावित नहीं होता.  इस बार जब पुस्तक वाचन सप्ताह के लिए उसी किताब को फिर छपवा कर मंगा लिए गये. 2004 में जो हिस्सा छपा था, 2009 में भी वह यथावत आ गया है. मतलब यह कि जो किताबें पढ़ने के लिए बच्चों को दी जा रही है, उस पर खुद अफसर नज़र नहीं डालते. यदि यहां पर गलती हो भी गई तो उसे पुस्तक वाचन में प्रतिबंधित करने के दौरान फिर दोहरा दिया गया. शिक्षा विभाग किताब पर प्रतिबंध लगाने के बजाय विवादित वाक्य को न पढ़ने का आदेश जारी कर सकती थी. बच्चों को किताबें देने से पहले इसको विलोपित भी किया जा सकता था. पर पूरी की पूरी किताब को प्रतिबंधित करने और यह स्पष्ट नहीं करने से कि नाटक को लेकर किसी को कोई आपत्ति नहीं है, मामला उलझ गया. &lt;br /&gt;नतीजा यह निकला है कि सरकारी आदेश के बाद चरणदास चोर नाटक ही कटघरे में दिखाई देने लगा है. स्कूल शिक्षा मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने प्रतिबंध लगने वाले दिन ही बयान दिया था कि किताब से विवादित हिस्से को हटाया जाएगा उसके बाद पठन-पाठन के लिए भेजा जाएगा. लेकिन फोकस केवल यही बात हुई है कि सरकार ने चरणदास चोर पर पाबंदी लगा दी है. देशभर में बुध्दिजीवी, रंगकर्मी और साहित्यकार सरकार के फैसले की आलोचना इसी आधार पर कर रहे हैं. छत्तीसगढ़ में तो कुछ अति उत्साही कला प्रेमियों ने तख़्तियां लेकर संस्कृति विभाग के सामने प्रदर्शन भी कर डाला. &lt;br /&gt;अफसोसजनक है कि इन सब गतिविधियों से सरकार अभी तक आंख मूंदे बैठी हुई है. हबीब तनवीर की प्रतिष्ठा और उनकी कृति को इससे कितनी क्षति पहुंच रही है इसका वह अनुमान भी नहीं लगाना चाहती. यह रवैया पुस्तक को वाचन से हटाए जाने से भी ज्यादा खतरनाक है. राज्य सरकार के पास ऐसे संवेदनशील मामलों से निपटने के लिए अनुभवी अफसरों की कमी दिखाई दे रही है. राज्य को तत्काल साफ करना चाहिए कि नाटक में कोई आपत्तिजनक बात नहीं है और न ही उसने इसके प्रदर्शन पर कोई पाबंदी लगाई है. इस चुप्पी के चलते एक गुट नाटक के पक्ष में खडा़ हो रहा है जबकि दूसरे गुट में इस नाटक के ख़िलाफ भीतर ही भीतर आक्रोश पनपने का खतरा दिखाई दे रहा है.पूरे नाटक का कोई छोटा सा भी हिस्सा विवाद के घेरे में नहीं है फिर भी ताजा हालात यह है कि राजधानी से लेकर गांव-देहात तक जिस चरणदास चोर के मंचन ने कला के रसिकों को तृप्त किया है, उसका मंचन होने पर विरोध में झंडे-डंडे निकल सकते हैं और जिस सामाजिक मेल-मिलाप के लिए हबीब तनवीर और उनकी टीम ने अपना सर्वस्व होम किया, उसी को क्षति पहुंचेगी.  नाटक के पात्र चरणदास चोर ने अपने वचन और सच की लड़ाई लड़ी और फांसी पर चढ़ना मंजूर किया था. एक बार फिर यह बेकसूर नाटक उसी फंदे पर चढ़ता नज़र आ रहा है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4294876642043841838-3906589821517002447?l=sarokaar.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sarokaar.blogspot.com/feeds/3906589821517002447/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4294876642043841838&amp;postID=3906589821517002447' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4294876642043841838/posts/default/3906589821517002447'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4294876642043841838/posts/default/3906589821517002447'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sarokaar.blogspot.com/2009/08/blog-post.html' title='फिर फांसी पर लटका बेकसूर चरणदास चोर'/><author><name>राजेश अग्रवाल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03166713468895085704</uri><email>agrrajesh@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='08211776964587468572'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/SoPyYSsfcAI/AAAAAAAAAgU/VaqvHkbPrcU/s72-c/Charandas+Chor.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4294876642043841838.post-3764727781216553729</id><published>2009-06-27T23:45:00.000-07:00</published><updated>2009-06-28T19:01:35.897-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रश्न'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अपनी बात'/><title type='text'>आत्महत्याएं आईना नहीं किसानों की बदहाली का</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;तिल-तिल कर मरने वालों की सुध लेना ज़्यादा जरूरी&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;छत्तीसगढ़ में किसान आत्महत्याओं को केवल कर्ज़ नहीं चुका पाने का नतीजा मान लेना हमें एक ऐसे झूठ को आधार देना होगा, जो देर-सबेर धराशायी हो जाएगा और इसकी आड़ में वे नौकरशाह और राजनीतिज्ञ साफ बच निकलेंगे जो इनकी बदहाली के लिए जिम्मेदार हैं. &lt;br /&gt;पिछले दो सालों से केन्द्रीय अपराध अन्वेषण ब्यूरो का वह आंकड़ा काफी चर्चा में है, जिसमें किसानों की आत्महत्या की दर छत्तीसगढ़ में महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश और कर्नाटक की ही तरह बताई गई है. रिपोर्ट कहती है कि साल में छत्तीसगढ़ के करीब 1500 किसान खुदकुशी कर रहे हैं. यानि &lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/SkcUWm9gASI/AAAAAAAAAgE/dauwJL4iC60/s1600-h/Photo2+CG.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 270px; height: 202px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/SkcUWm9gASI/AAAAAAAAAgE/dauwJL4iC60/s400/Photo2+CG.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5352269060801298722" /&gt;&lt;/a&gt; औसतन हर दिन 4 से 5 किसान. ब्यूरो रिकार्ड के आधार पर कहा जा रहा है कि ये आत्महत्याएं किसान कर्ज नहीं चुका पाने के कारण करते हैं. कोई शक नहीं है कि ऐसे रिपोर्ट्स में छत्तीसगढ़ की विषमताओं पर चिंता है. लेकिन यदि हम यह स्थापित नहीं कर पाए कि किसानों की खुदकुशी कर्ज नहीं चुका पाने या खेती में जबरदस्त नुकसान होने के कारण हुई तो छत्तीसगढ़ की सरकार अपना पीठ थपथपाएगी कि देखो हमारे किसानों की हालत इतनी ख़राब नहीं है कि उन्हें मरना पड़े. छत्तीसगढ़ सरकार अपनी तारीफ में यह भी कहेगी कि हम देश भर में सबसे ज्यादा कीमत पर धान खरीदते हैं, किसानों को ब्याज मुक्त कर्ज़ दिलाते हैं, सिंचाई पम्पों को मुफ़्त बिजली देते हैं, एक-दो रूपये किलो में चावल देते हैं, किसान यहां आत्महत्या करेगा तो क्यों?&lt;br /&gt;इन मौतों को राज्य के 33.5 लाख किसान परिवारों की बदहाली का आईना मान लेना भूल होगी. जिस पुलिस जांच के आधार पर हम इतने किसानों की आत्महत्या की बात कर रहे हैं,  वही जांच यह भी कहती है कि ज्यादातर मौतें बीमारी से तंग आकर, पारिवारिक कलह, ख़राब दिमागी हालत, शराब की लत आदि से हुई. छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में एक जनवरी 2008 से 31 जुलाई 2008 के बीच 400 ऐसे लोगों ने खुदकुशी की, जिनका पेशा कृषि था. गांव में इंजीनियर, प्रोफेसर, साइंटिस्ट होते नहीं, किसान ही होते हैं. राज्य में खेती पर निर्भर लोगों की तादात 83 फीसदी है. इसलिये कोई स्वाभाविक मौत मरे या दुर्घटना में उनमें से ज्यादातर का पेशा किसानी ही दर्ज है. हरेक अपराध में खानापूर्ति करते वक्त मरने वाले का पेशा भी पुलिस लिखती है. गांव की साधारण जरूरतों को पूरा करने के लिए इनमें से कई लोग बैलगाड़ी किराये पर देने, किराना सामान की बिक्री करने, पंचर की दुकान चलाने, साप्ताहिक बाजार में जाकर सब्जियां बेचने, कपड़े सिलने, बिजली सुधारने, रेडियो ट्रांजिस्टर सुधारने जैसा काम भी करते हैं लेकिन उन्हें कहते किसान ही हैं. &lt;br /&gt;छत्तीसगढ़ में किसानों की आत्महत्या को मजबूती से स्थापित करने के पक्ष में कहा जा सकता है कि पारिवारिक कलह, दिमागी हालत का बिगड़ना, शराब का आदी हो जाना भी खेती में नुकसान की वजह से और कर्ज़ लेने के कारण है. लेकिन कलह, दिमागी हालत और लत का केवल गरीबी से रिश्ता है नहीं. यह शहरों में और अमीर परिवारों में होने वाले हादसों की तरह है. अपवादस्वरूप एक या दो मामले ही अभी तक सामने आए हैं जिनमें किसान का बीज ख़राब हुआ और कर्ज़ से लद गया, तब उसने खुदकुशी कर ली. आत्महत्या की परिस्थितियां बेरोजगारी, प्रेम प्रसंगों, खेती से मिली आय को फिजूलखर्ची में उड़ा देने के चलते भी हैं.    &lt;br /&gt;दरअसल, छत्तीसगढ़ के किसान अलग मिजाज के हैं. उन्हें महाराष्ट्र, पंजाब की तरह कपास, दलहन आदि की व्यावसायिक खेती करनी नहीं आती. तीन चौथाई किसान- लघु व सीमान्त श्रेणी के हैं, जिनके पास 4 एकड़ से कम खेत हैं. वे साल में केवल एक बार धान की फसल लेते हैं. फसल-चक्र परिवर्तन के लिए राज्य बनने के बाद ही सरकारों ने कोशिशें की लेकिन किसान समझदार निकले. उन्होंने प्रयोग करने के बजाय पारम्परिक खेती पर ही भरोसा किया. सरकारी योजनाओं में उलझने के बजाय इन्हें खुद के सामर्थ्य पर भरोसा है. भले मुनाफा कम मिले लेकिन वे कर्ज उतना ही लेंगे, जितना फसल बर्बाद होने पर भी मजदूरी करके चुका सकें. सोसाइटियों में बहुत से कर्ज़ हैं पर वे डिफाल्टर हो जाने पर भी परवाह नहीं करते,देर-सबेर चुका देने या सरकार से माफी मिल जाने की उम्मीद लेकर खेती या मजदूरी करते रहते हैं. हो सकता है इसके लिए वे कुछ साल या कुछ महीनों के लिए दूसरे प्रदेशों में कमाने-खाने चले जाएं, हालांकि यह विवशता और कलंक ही है. किसान धान की जगह किसी दूसरी फसल पर हाथ आजमाने के बारे में नहीं सोचते. 3 फीसदी ब्याज दर सहकारी बैंकों में चल रहा है, फिर भी पिछले साल केवल 600  करोड़ रूपये बांटे जा सके.  अब सरकार ने चुनावी घोषणा को पूरा करते हुए खेती के लिए बिना ब्याज कर्ज देने की योजना शुरू कर दी है, तब भी मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह की मानें तो यह आंकड़ा केवल 800 करोड़ तक पहुंच पाएगा. राज्य में करीब 48 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि है, जिनमें से सब्जी की खेती को भी जोड़ लिया जाए जिनमें गन्ना,फल आदि शामिल हैं, कुल रकबा 3 फीसदी से भी कम लगभग 1.5 लाख हेक्टेयर में दूसरी फसलें ली जाती हैं. धान जोखिम से परे खेती है. इसे बोने के लिए ज्यादातर खुद का श्रम किसान इस्तेमाल करते हैं. सामर्थ्य के अनुसार खाद बीज का इंतजाम कर लेता है. धान मुनाफा नहीं देता तो खास नुकसान भी नहीं होता. इन किसानों के पास ऐसे व्यवस्थित खेत नहीं है कि उन्नत बीज, असरकारी मंहगे खाद व सिंचाई सुविधा के साथ खेती करें. पारम्परिक खेती से उन्हें थोड़ा मिलता है, पर वह उन्हें फांसी पर लटकने की नौबत तक नहीं पहुंचना पड़ता. वे &lt;span style="font-style:italic;"&gt;न मरै न मौटावै&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; की स्थिति में हैं. यानि वह समृध्द भी नहीं है लेकिन मरने के कगार पर भी नहीं पहुंचा है.  समृध्द नहीं हुए तो सरकार की नीतियां जिम्मेदार हैं, उनके लिए सिंचाई, बीज, खेतों को सुधारने व मिट्टी के उपचार का प्रबंध नहीं किया गया और किसान मरने से बच रहे हैं तो अपने सीमित साधन से असीमित श्रम करते हुए. &lt;br /&gt;दरअसल, छत्तीसगढ़ के किसानों की दुर्दशा पर आत्महत्या के आंकड़ों को किनारे रखकर बात होनी चाहिए. जब तक ऐसा नहीं होगा उर्वरा व खनिज सम्पदा से भरपूर अमीर धरती के किसान गरीब क्यों हैं, इस सवाल का हल नहीं तलाशा जा सकेगा.  देश में कृषि भूमि का औसत सिंचित रकबा 42 फीसदी है, लेकिन छत्तीसगढ़ के सरकारी आंकड़ों में यह 30 प्रतिशत है. हालांकि वास्तविक सिंचित रकबा इससे भी कम 17 से 19 फीसदी ही है. कुल मिलाकर यहां सिंचित भूमि राष्ट्रीय औसत से काफी कम है. राष्ट्रीय औसत 24 क्विंटल प्रति हेक्टेयर के मुकाबले छत्तीसगढ़ में धान उत्पादन का औसत केवल 13 क्विंटल है. सरगुजा और बस्तर जैसे आदिवासी इलाकों में तो यह केवल 5-6 क्विंटल है. शायद यही वजह है कि राज्य के 42 फीसदी परिवार गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन करते हैं. उन्हें सरकार सस्ता चावल मुहैया करा रही है.  &lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;आत्महत्या, झगड़ों व दुर्घटनाओं की प्रमुख वजह शराब &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;आत्महत्याओं के मामले में समाज कल्याण मंत्री लता उसेंडी का वक्तव्य ज्यादा महत्वपूर्ण है. वे मानती हैं कि छत्तीसगढ़ के गांवों में अधिकांश कमाऊ परिवार के लोग नशे की आदत के कारण अपनी आमदनी का ज्यादातर हिस्सा नशे पर खर्च कर देते हैं इससे वे अपने परिवार को पौष्टिक भोजन नहीं दे पाते, जिसके चलते बच्चे कुपोषण का शिकार होते हैं. सुश्री उसेंडी की चिंता गलत नहीं है, देश में सर्वाधिक 54 फीसदी कुपोषित बच्चे छत्तीसगढ़ में ही है, यह केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय का आंकड़ा कहता है. छत्तीसगढ़ बेवरेज कार्पोरेशन की सालाना रिपोर्ट में पिछले साल मार्च में बताया गया है कि देश में शराब की खपत पंजाब और हरियाणा के बाद सबसे अधिक छत्तीसगढ़ में है. इन परिवारों में मुखिया की आत्महत्या को किसान की आत्महत्या मानना तो ठीक नहीं होगा. छत्तीसगढ़ के अखबारों में हर रोज दो चार ख़बरे होती हैं, जिनमें लोग शराब के नशे में अपने ही सगे सम्बन्धियों पर हमले कर देते हैं. सड़क दुर्घटनाओं के ज्यादातर मामले छत्तीसगढ़ में शराब पीकर गाड़ी चलाने के कारण हो रहे हैं. यदि पारिवारिक कलह और बीमारी से भी कोई आत्महत्या हो रही है तो उसके जड़ में शराबखोरी मिल जाएगी.&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;भविष्य में खेती के चलते फांसी पर चढ़ेंगे किसान&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;रायपुर जिले में इस बार पिछले साल के मुकाबले इस साल 20 हजार एकड़ कम जमीन पर खेती हो रही है. नई राजधानी की योजना, नये उद्योग व कालोनियों के कारण यह परिस्थिति बनी है. राज्य के किसानों ने अभी तक उन्नत खेती पर ध्यान न दिया हो, लेकिन अब खेती की जमीन घट रही है और अपनी जमीन छीने जाने पर सरकार के ख़िलाफ आवाज़ उठा रहे हैं, उससे साफ है कि वे भविष्य में कम जमीन में ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए उन्नत खेती की ओर बढ़ेंगे. फिर वे मजबूरन धान बोना छोड़ेगे और कम जमीन में पंजाब महाराष्ट्र की तरह ज्यादा मुनाफा पाने बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की बीज खरीदेंगे और फसल तैयार कर उन्हें बेचने के लिए बड़ा कर्ज लेंगे. छत्तीसगढ़ सरकार ने एक लाख करोड़ एमओयू कर रखा है. यहां जिन्दल, टाटा-एस्सार जैसी दर्जनों कम्पनियां मंडरा रही हैं जो किसानों को निगलने के लिए उतारू हैं. रायगढ़ से लेकर बस्तर तक किसानों की जमीन बलात् जन सुनवाई कर हड़पी जा रही है. उपजाऊ खेतों पर चिमनियां रोपी जा रही हैं. आसार दिखते हैं कि भविष्य में ये सब आत्महत्याओं, हत्याओं के कारण बनेंगे. मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह हाल ही में वित्त  आयोग के साथ हुई बैठक में छत्तीसगढ़ में ज्यादा जंगल होने को अभिशाप बता चुके हैं.&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/SkcUsEbrpoI/AAAAAAAAAgM/ALgkx7D_u6Y/s1600-h/Photo3CG.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 256px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/SkcUsEbrpoI/AAAAAAAAAgM/ALgkx7D_u6Y/s400/Photo3CG.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5352269429489772162" /&gt;&lt;/a&gt; उनका कहना है कि यहां के संसाधनों का इस्तेमाल कर गरीबों को बांटने में पर्यावरण व वन मंत्रालय रोड़ा लगा देता है क्योंकि यहां का 44 फीसदी हिस्सा जंगलों से घिरा है. मुखिया के इस बयान से अनुमान लगा सकते है कि भविष्य का छत्तीसगढ़ कैसा होगा. सरकार अभी तक नहीं बता पाई कि दर्जनों पावर प्लांट, स्पंज आयरन फैक्ट्रियों व खदानों के आवंटन से आम आदमी और बेरोजगार युवकों को क्या फायदा हुआ. उन्हीं की पार्टी के विधायक देवजी भाई पटेल राजधानी से लगे सिलतरा में स्पंज आयरन फैक्ट्रियों के चलते बढ़े प्रदूषण के खिलाफ हज़ारों किसानों के साथ आंदोलन चलाकर जरूर बता रहे हैं कि यहां के खेतों की मिट्टी और नदी तालाब का पानी कितना बर्बाद हो गया.&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;किसानों की भूमि से जुड़ी और समस्याएं&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;छत्तीसगढ़ में सर्वाधिक हत्याएं राजस्व मामलों को लेकर होती है, यह पुलिस के एक आला अधिकारी का कहना है. लेकिन अब आत्महत्याओं का दौर भी शुरू हो गया है. बीते 21 मई को बैंकुंठपुर थाने के छेलिया ग्राम में 10 साल के एक बच्चे की हत्या पत्थर मार-मार कर कर दी गई. 22 मई को इसी थाने में एक और बुजुर्ग की उसके ही रिश्तेदारों ने हत्या कर दी. उसके पिता के साथ आरोपी का जमीन विवाद चल रहा था. रायपुर के पास सिमगा में पुलिस ने माता, पिता और सगे भाई की हत्या के आरोप में बेटे समेत 22 लोगों को पुलिस ने अप्रैल माह में गिरफ्तार किया. जांजगीर जिले में दो परिवारों के बीच हुए विवाद में 4 लोगों की हत्या इसी साल हो गई. छत्तीसगढ़ के किसान जमीन के छोटे-छोटे टुकड़ों के लिए लड़ रहे हैं क्योंकि अब उनके बीच पुरखों की जमीन का बंटवारा होता जा रहा है और खेती से उनकी आय सीमित होती जा रही है. जांजगीर जिले के सरहर ग्राम में एक बुजुर्ग किसान फूलसाय की जमीन सरकार ने सड़क बनाने के लिए अधिग्रहित की थी, उसे मुआवजा सालों नहीं मिला. जगह-जगह फरियाद कर निराश हो जाने के बाद वह बीते 13 मई को आत्महत्या करने के इरादे से कलेक्टोरेट पहुंच गया. अफसरों ने उन्हें मनाया, आश्वासन दिया कि एक हफ्ते में मुआवजा मिल जायेगा. लेकिन पखवाड़े भर के इंतजार के बाद भी मुआवजा नहीं मिला. 30 मई को उस बुजुर्ग किसान के प्राण पखेरू उड़ गए. मुआवजा तो नहीं मिला-मौत मिल गई. दरअसल वह अपनी सांस की बीमारी का इलाज कराने के लिए मुआवजे की राशि हर हालत पाना चाहता था. हाल ही में राज्य में सुरेश यादव के मामले ने भी तूल पकड़ा. राजधानी से केवल 20 किलोमीटर दूर सिंगारभाठा ग्राम के सुरेश की आत्महत्या ने किसानों को लेकर सरकार की संवेदनहीनता और भ्रष्ट राजस्व अमले की करतूत को उजागर कर दिया. कांग्रेस ने इसे लेकर पैदल मार्च किया और भाजपा सरकार को कटघरे में खड़ा किया. दबाव में आई सरकार ने उसके परिवार को मुआवजा दिया. सुरेश की 9 साल पहले खरीदी गई जमीन तहसीलदार और पटवारियों ने रिश्वत लेने के बाद भी उसके नाम नहीं चढ़ाई. पूरे प्रदेश में राजस्व अमले का यही हाल है. ई-गवर्नेंस के लिए अपनी पीठ थपथपा रही सरकार का यह हाल है. कृषि मंत्री चंद्रशेखर साहू कहते हैं कि सरकार अब पूरे प्रदेश में राजस्व दस्तावेजों को सुधारने के लिए अभियान चलाएगी. आदिवासी इलाकों में स्थिति और बदतर है. रायपुर जिले में जहां सिंचाई का प्रतिशत 46 फीसदी है वहीं रायगढ़ जिले में केवल 7 फीसदी, सरगुजा और बस्तर के सारे जिले केवल 3 फीसदी सिंचित हैं. रायगढ़-जशपुर से टमाटर की खेती खत्म हो चुकी है, कभी यहां फूड प्रोसेसिंग प्लांट लगाने की बात की जाती थी लेकिन अब इसकी कोई गुंजाइश नहीं बची है. नक्सल प्रभावित बीजापुर जिले में माओवादी हिंसा व सलवा जुड़ूम अभियान से सबसे ज्यादा नुकसान खेती को हुआ. जिले के 738 गांवों के 28 हजार से ज्यादा किसान अपना घर बार खेत छोड़कर पलायन कर चुके हैं. वे या तो सरकारी कैम्पों में हैं अथवा सीमावर्ती राज्यों में चले गए हैं. नक्सली हिंसा के चलते 30 हजार हेक्टेयर से अधिक भूमि बंजर में तब्दील हो रही है. &lt;br /&gt;छत्तीसगढ़ के किसानों की दुर्दशा आत्महत्या करने वाले किसानों के घर में झांकने से जितना नहीं मिलेगा, उससे ज्यादा कहीं गांवों, खेतों. जंगलों और सरकारी फाइलों में भटकने से मिलने वाला है. अलग-अलग कारणों से की गई आत्महत्याओं को अलग रखें और जिंदा रहकर तिल तिल मर रहे किसानों की सुध लेने सरकार को मजबूर किया जाए.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4294876642043841838-3764727781216553729?l=sarokaar.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sarokaar.blogspot.com/feeds/3764727781216553729/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4294876642043841838&amp;postID=3764727781216553729' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4294876642043841838/posts/default/3764727781216553729'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4294876642043841838/posts/default/3764727781216553729'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sarokaar.blogspot.com/2009/06/blog-post_27.html' title='आत्महत्याएं आईना नहीं किसानों की बदहाली का'/><author><name>राजेश अग्रवाल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03166713468895085704</uri><email>agrrajesh@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='08211776964587468572'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/SkcUWm9gASI/AAAAAAAAAgE/dauwJL4iC60/s72-c/Photo2+CG.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4294876642043841838.post-1865807364722886805</id><published>2009-06-26T16:39:00.001-07:00</published><updated>2009-06-26T17:27:28.904-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='खास खबर'/><title type='text'>आदिवासी लड़कियों के साथ रोज एक शाइनी</title><content type='html'>मुम्बई पुलिस जब पिछले हफ़्ते छत्तीसगढ़ के जशपुर पहुंची तो यह ख़बर फैल गई कि फिल्म स्टार शाइनी आहूजा ने जिससे बलात्कार किया है वह इसी इलाके की एक लड़की है. हालांकि हड़बड़ाई स्थानीय पुलिस ने बाद में साफ किया कि जिस लड़की के सिलसिले में पुलिस यहां पहुंची थी वह शाइनी का शिकार तो नहीं थी पर वह भी शोषण की ही शिकार थी. वह मुम्बई के किसी दूसरे पाश कालोनी की कोठी में बंधक बनाकर रखी गई थी. &lt;br /&gt;छत्तीसगढ़ की नाबालिग लड़कियों को महानगरों में घरेलू नौकरानी का काम देने के झांसे से ले जाने के बाद उन्हें अंधेरी कोठरी में&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/SkVc8dFisuI/AAAAAAAAAf8/NlrI5c0jwhw/s1600-h/human-trafficking-shiny-ahuja.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 233px; height: 264px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/SkVc8dFisuI/AAAAAAAAAf8/NlrI5c0jwhw/s400/human-trafficking-shiny-ahuja.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5351785925869482722" /&gt;&lt;/a&gt; ढ़केल देने का खेल सालों से चल रहा है लेकिन शाइनी आहूजा प्रकरण के दौरान जशपुर में फैली दहशत से इस सवाल की ओर फिर सबका ध्यान चला गया है. अगर जशपुर, सरगुजा और कोरबा के गांवों में आप जाएं तो आपको इन इलाकों से गायब आदिवासी लड़कियों के साथ शाइनी के अनेक किस्से मिल जाएंगे. स्वयंसेवी संस्थाओं, पुलिस और सरकार की तमाम कोशिशों के बाद भी लड़कियों को बहला-फुसलाकर भगाए जाने का सिलसिला थम नहीं रहा है. इनमें से ज्यादातर नाबालिग हैं. इनको झांसे में लेने वाले कुछ तो पेशेवर दलाल हैं तो कुछ उनके अपने ही रिश्तेदार जो दिल्ली, मुम्बई की चंकाचौंध में रम गए हैं. &lt;br /&gt;इसे संयोग ही कहा जाएगा कि जिस समय शाइनी आहूजा प्रकरण चर्चा में था, उसी समय लड़कियों की मंडी के कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ के जशपुर में मुंबई पुलिस का एक दल बंधक बनाई गई लड़की को छोड़ने के लिए आया हुआ था. कुछ उत्साही पत्रकारों ने अपनी कल्पना शक्ति का सहारा लिया और छत्तीसगढ़ के अख़बारों में 19 जून को सुर्खियां रही कि मुम्बई के फिल्म स्टार शाइनी आहूजा ने जिस लड़की से बलात्कार किया, वह छत्तीसगढ के जशपुर जिसे के अंतर्गत आने वाले डूमरटोली गांव की रहने वाली है. जैसा कि जशपुर के पुलिस अधीक्षक अक़बर राम कोर्राम बताते हैं- “ शाइनी आहूजा प्रकरण के बाद मुम्बई से पुलिस की एक टीम यहां आई थी, लेकिन इसका शाइनी प्रकरण से कोई सम्बन्ध नहीं है. वह एक लड़की को मुम्बई से यहां छोड़ने पहुंची थी, जो पिछले 9 मार्च से गायब थी. इस लड़की का नाम गायत्री है और वह अपनी एक सहेली अनीमा के बहकावे में आकर मुम्बई चली गई थी.” अनीमा के कुछ परिचितों के ज़रिये गायत्री का पता चला और उसे डूमरटोली लाकर उनके परिजनों को सौंप दिया गया.&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;हज़ारों शिकार &lt;/span&gt;&lt;br /&gt; लड़कियों को ट्रैफेकिंग से बचाने और उन्हें सीमित साधनों के बीच दिल्ली, मुम्बई, गोवा जैसे महानगरों से छुड़ाकर लाने वाली जशपुर की सामाजिक कार्यकर्ता एस्थेर खेस का कहना है कि शाइनी प्रकरण के बीच मुम्बई की पुलिस का जशपुर पहुंचने से यह फिर साफ़ हो गया है कि वहां बड़ी तादात में घरेलू नौकरानियों के रूप में काम करने वाली लड़कियां छत्तीसगढ़ से गई हुई हैं. सुश्री खेस कहती हैं कि शाइनी ने जिस लड़की को शिकार बनाया वह गायत्री तो नहीं है, लेकिन हमारे पास दर्जनों ऐसे मामले हैं जिनमें जशपुर की लड़कियों को घरेलू काम कराने के बहाने से न केवल देश के भीतर बल्कि कुवैत और जापान तक ले जाए गए और लड़कियों का हर तरह से शोषण किया गया.दिल्ली और गोवा जा पहुंची कई लड़कियों का सालों से पता नहीं है और उनके मां-बाप दलालों के दिए फोन नम्बर और पतों पर सम्पर्क नहीं कर पा रहे हैं, क्योंकि इनमें से ज़्यादातर फर्ज़ी हैं. लड़कियों को ले जाने के बाद प्लेसमेंट एंजेंसियों के दफ्तरों में फिर कोठियों में इन लड़कियों को  चौबिसों घंटे क़ैद रखा जाता है. जब घर में पुरूष सदस्य अकेले होते है तब उनके साथ बलात्कार होता है. &lt;br /&gt;इनको ठीक से भोजन, कपड़ा तक नहीं मिलता, इन्हें कोई छुट्टी नहीं मिलती. इनका वेतन दलालों के पास जमा कराया जाता है. लड़कियों को अपने घर लौटने का रास्ता पता नहीं होता इसलिये वे सारा ज़ुल्म चुपचाप सहती हैं. सुश्री खेस का यह भी कहना है कि दिल्ली में 150 से ज्यादा प्लेसमेंट एजेंसियां काम कर रही हैं जो झारखंड, पश्चिम बंगाल और उत्तर छत्तीसगढ़ से लड़कियों को बुलाते हैं. इनके एजेंट का काम इन लड़कियों के वे रिश्तेदार करते हैं, जो कई साल पहले से ही इन महानगरों में काम कर रहे होते हैं. &lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;नया ट्रैफेकिंग कानून&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;छत्तीसगढ़ महिला आयोग की अध्यक्ष विभा राव, राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष गिरिजा व्यास के इस बयान से सहमत हैं कि गरीब नाबालिग लड़कियों को शोषण का शिकार होने से बचाया जाए. श्रीमती राव को उम्मीद है कि अब देशभर में घरेलू नौकरानियों की सुरक्षा को लेकर नई बहस छिड़ेगी. उनका कहना है कि इस समस्या से छत्तीसगढ़ सर्वाधिक प्रभावित राज्यों में से एक है, इसलिए वे चाहती हैं कि ट्रैफेकिंग को लेकर भी मौजूदा कानूनों की समीक्षा की जाए और इसे रोकने के लिए प्रावधान कड़े किए जाएं. श्रीमती राव ने शाइनी आहूजा प्रकरण में छ्त्तीसगढ़ की लड़की के शिकार होने की अफवाह के बाद जशपुर कलेक्टर और एस पी को पत्र लिखकर पूरे मामले का प्रतिवेदन देने के लिए भी कहा है. &lt;br /&gt;घरेलू नौकरानियों की सुरक्षा व ट्रैफेंकिंग रोकने के ख़िलाफ एक कानून पिछली सरकार में ही बन जाना था. तत्कालीन केन्द्रीय महिला बाल विकास मंत्री रेणुका चौधरी ने जून 2007 तक इस कानून का ख़ाका तैयार करने के लिए देशभर में सक्रिय महिला संगठनों से सुझाव मांगा था. लेकिन प्रस्ताव भेजने के बाद क्या हुआ यह किसी को नहीं मालूम. ट्रैफेंकिंग के ख़िलाफ ही काम कर रहीं कुनकुरी की अधिवक्ता सिस्टर सेवती पन्ना का कहना है कि नये कानून पर उनसे भी सुझाव मंगाए गए थे. प्रस्तावित कानून में महानगरों से छुड़ा कर लाई जाने वाली लड़कियों के पुनर्वास के लिए भी पुख़्ता उपाय सुझाए थे, क्योंकि देखा गया है कि महानगरों में रहकर लौटने वाली लड़कियां गांवों में व्यस्त न होने के चलते विचलित रहती हैं. वे यहां दुबारा घुल-मिल नहीं पाती और दुबारा महानगरों की तरफ भागने का रास्ता तलाश करती हैं.&lt;br /&gt;बहरहाल, शाइनी आहूजा प्रकरण ने  फिर छत्तीसगढ़, झारखंड, पश्चिम बंगाल से तस्करी कर महानगरों में ले जाई जा रही लड़कियों की दुर्दशा पर सोचने के लिए विवश किया है. शायद, गरीब व आदिवासी परिवारों के माथे पर लगे कलंक को धोने &lt;br /&gt;के लिए सरकार कोई ठोस प्रयास इसके बाद करे और उन लड़कियों की सुरक्षा तथा सम्मान के लिए कारगर पहल हो.&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.cgnet.in/E/Rajesh1"&gt;लड़कियों की मंडी बन गया पढ़ा लिखा कुनकुरी&lt;br /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://sarokaar.blogspot.com/2008/08/blog-post.html"&gt;इसी से जुड़ी एक ख़बर सरोकार पर &lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://raviwar.com/news/31_chhattisgarh-human-trafficking-geetashree.shtml"&gt; गीताश्री की एक रिपोर्ट&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://raviwar.com/news/170_mewat-women-trafficing-paro-geetashree.shtml"&gt;और जो हरियाणा में हो रहा है.&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4294876642043841838-1865807364722886805?l=sarokaar.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sarokaar.blogspot.com/feeds/1865807364722886805/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4294876642043841838&amp;postID=1865807364722886805' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4294876642043841838/posts/default/1865807364722886805'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4294876642043841838/posts/default/1865807364722886805'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sarokaar.blogspot.com/2009/06/blog-post_26.html' title='आदिवासी लड़कियों के साथ रोज एक शाइनी'/><author><name>राजेश अग्रवाल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03166713468895085704</uri><email>agrrajesh@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='08211776964587468572'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/SkVc8dFisuI/AAAAAAAAAf8/NlrI5c0jwhw/s72-c/human-trafficking-shiny-ahuja.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4294876642043841838.post-2615229178635620653</id><published>2009-06-09T19:51:00.000-07:00</published><updated>2009-06-10T17:20:24.485-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बस्तर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रश्न'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='नक्सल'/><title type='text'>अबूझमाड़ को बूझना इतना आसान भी नहीं</title><content type='html'>नक्सलियों से सीधी लड़ाई के लिए सरकार ने तीन दशक से बंद अबूझमाड़ का मोर्चा खोल दिया है. वस्त्रविहीन व कंदमूल खाकर जीने वाले आदिम गोंड़ जाति के बीच अब आम लोगों का सीधा सम्पर्क हो सकेगा. इससे उनकी जीवन शैली और संस्कृति पर ख़तरे तो दिखाई दे रहे हैं, लेकिन सरकार को अपने इस फैसले के पीछे नक्सली हिंसा की आग से झुलस रहे बस्तर में शांति की नई बयार बहने की उम्मीद भी दिखाई दे रही है. &lt;br /&gt;वैसे तो लोग&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/Si8gssCjGoI/AAAAAAAAAf0/o344jfhKr4M/s1600-h/TribalYouth1.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 230px; height: 316px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/Si8gssCjGoI/AAAAAAAAAf0/o344jfhKr4M/s400/TribalYouth1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5345527234820250242" /&gt;&lt;/a&gt;देश में कहीं भी आने-जाने के लिए आज़ाद हैं लेकिन बस्तर का अबूझमाड़ दुर्गम पहाड़ियों और घने जंगलों से घिरा एक ऐसा गलियारा है जहां पिछले 3 दशकों से आम लोगों को जाने की मनाही थी. अबूझमाड़ में आम लोगों के प्रवेश पर तत्कालीन मध्यप्रदेश सरकार ने रोक तब लगाई गई थी, जब 80 के दशक में बीबीसी के कुछ पत्रकारों ने यहां पहुंचकर गोंड़ महिलाओं की अर्धनग्न तस्वीरें खींचीं और उनके विदेशी अख़बारों में छप जाने से हंगामा मचा.  बस्तर संभाग के तीन जिलों दंतेवाड़ा, नारायणपुर व बीजापुर के 4000 वर्गकिलोमीटर के दायरे में फैले 237 गांवों के 26 हज़ार आदिवासी अपनी ही विशिष्ट आदिम संस्कृति में जीते हैं. वे जानवरों का शिकार करते हैं, कंदमूल खाते हैं और पेड़ों की छाल पहनते हैं. हालांकि बीते दो दशकों से वे हाट-बाज़ारों में जाकर बिना सिले हुए कपड़े भी पहनने लग गए हैं. जिलाधीश से अनुमति लेकर नारायणपुर स्थित रामकृष्ण मिशन ने यहां शिक्षा व स्वास्थ्य की दिशा में भी कुछ काम किया है. लेकिन अबूझमाड़ का ज्यादातर हिस्सा बीते 3 दशकों से अबूझ पहेली है. यहां के आदिवासी जंगल, नदी, पहाड़ के बीच ही जीवन बिताते हैं. ज्यादातर हिस्सों में सरकार की कोई योजना नहीं पहुंच पाई है. न इन्हें सरकारी राशन मिलता है न पेंशन. न इन गांवों में सड़कें है और न ही बिजली. अबूझमाड़ के सघन वनों के शुरूआती कुछ गांवों में तो समय-समय पर सरकार के नुमाइंदो व सुरक्षा बलों ने प्रवेश किया है पर अधिकतर हिस्से अभी भी रहस्यमयी बने हुए हैं. सन् 2001 में छत्तीसगढ़ राज्य का गठन होने के बाद अबूझमाड़ के सर्वेक्षण के लिए कई प्रयास हुए हैं. गांवों की संख्या तो सेटेलाइट के चित्रों से निर्धारित की गई है पर इन गांवों तक सरकार भी नहीं पहुंच पाई है. सन् 2005 में प्रदेश की भाजपा सरकार ने एक निजी संस्था को इस क्षेत्र के सर्वेक्षण की जिम्मेदारी दी थी लेकिन नक्सलियों ने उन्हें घुसने नहीं दिया. बस्तर के सांसद बलिराम कश्यप की अध्यक्षता में भी एक बार समिति बनाई गई लेकिन यह समिति भी अबूझमाड़ को बूझने में सफल नहीं हो पाई. परिणामस्वरूप यह अबूझ इलाका हिंसक नक्सलियों के लिए स्वर्ग बना हुआ है. पीडब्ल्यूजी की रीजनल इकाई ने तो 1980 में बकायदा इसे अपना मुख्यालय घोषित कर दिया था. नक्सली इन इलाकों में छिपकर अपनी योजनाएं तैयार करते हैं और यहां से निकलकर पूरे बस्तर में तांडव मचाते हैं. बीते कुछ सालों में नक्सलियों ने सुरक्षा बलों व नेताओं पर हमले तेज किए हैं. नक्सलियों की बढ़ती ताक़त को वैसे तो सरकार उनकी हताशा का नाम देती है, लेकिन सच्चाई यही है कि उनसे मुकाबला करने में सरकार के पसीने छूट रहे हैं. नक्सलियों के विरोध के लिए आदिवासियों के बीच चलाया जा रहा सलवा जुड़ूम आंदोलन भी कारगर साबित नहीं हो रहा है. भारी संख्या में सुरक्षा बलों की तैनाती भी उनको रोक पाने में कारगर नहीं है. हाल के दिनों में नक्सलियों ने धमतरी और राजनांदगांव जिले के नये इलाकों में सुरक्षा बल के जवानों व मतदान कर्मियों की सामूहिक हत्याएं की है. कई सलवा जुड़ूमियों व कांग्रेस-भाजपा नेताओं को उन्होंने मार डाला है. इन घटनाओं से सरकार की जबरदस्त किरकिरी हो रही है. छत्तीसगढ़ के गृह मंत्री ननकीराम कंवर को तो कहना पड़ा है कि यदि दो साल के भीतर नक्सली समस्या का अंत नहीं हुआ तो वे अपने पद से इस्तीफा दे देंगे. विरोधी दल कांग्रेस ने इस बयान पर कहा है कि यह बात मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह को कहनी चाहिए, क्योंकि प्रदेश के मुखिया होने के नाते पहली जवाबदारी उनकी ही बनती है. &lt;br /&gt;राजनैतिक दलों के अतिरिक्त सरकार पर औद्योगिक घरानों की ओर से भी दबाव है. टाटा और एस्सार जैसी बड़ी कम्पनियों को बस्तर के बहुमूल्य खनिजों के उत्खनन और इस्पात संयंत्र लगाने के लिए हजारों एकड़ जमीन दी गई है, लेकिन नक्सलियों के हमले उन्हें काम नहीं करने दे रहे हैं. मुख्यमंत्री कहते हैं कि पूरी दुनिया जब 21वीं सदी में पहुंच गई है तो नक्सली बस्तर के आदिवासियों को उनके मूलभूत अधिकारों से वंचित कर उन्हें 19वीं सदी में रखना चाहते हैं. नक्सली कहते हैं कि जंगल, पानी, जमीन सब उन आदिवासियों का है जो यहां रहते हैं. चंद पूंजीपतियों के फायदे के लिए आदिवासियों को उजाड़ने की साजिश वे नहीं चलने देंगे. नक्सलियों ने बस्तर में हस्तक्षेप के ख़िलाफ मुख्यमंत्री सहित यहां के कई मंत्री, नेताओं के नाम मौत का फरमान जारी कर रखा है. &lt;br /&gt;बस्तर विकास प्राधिकरण की इसी हफ़्ते मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह की अध्यक्षता में हुई बैठक में अबूझमाड़ को आम लोगों के लिए खोलने का निर्णय लिया गया. सरकार अब नक्सलियों को उनके सुरक्षित ठिकाने पर घुसकर घेरना चाहती है. अभी तक सरकार के नहीं पहुंचने के चलते शायद अबूझमाड़ के आदिवासी नक्सलियों को ही सरकार मानते रहे हों लेकिन अब उन्हें एक दूसरी सरकार का भी सामना करना पड़ेगा. अबूझमाड़ के दरवाजे खोल दिए जाने के बाद भी सरकारी अमले व सुरक्षा बलों को दुरूह भौगोलिक संरचना के चलते इसे भेद पाना आसान नहीं है. वैसे भी उनके लिए कभी इस इलाके में जाने के लिए मनाही तो रही नहीं है. कुछ सालों के बाद मालूम हो सकेगा कि अबूझमाड़िया जन-जीवन में बाकी दुनिया की दख़ल का क्या असर पड़ेगा, फिलहाल, सरकार ने नक्सलियों से निपटने के लिए एक और दांव खेल दिया है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4294876642043841838-2615229178635620653?l=sarokaar.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sarokaar.blogspot.com/feeds/2615229178635620653/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4294876642043841838&amp;postID=2615229178635620653' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4294876642043841838/posts/default/2615229178635620653'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4294876642043841838/posts/default/2615229178635620653'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sarokaar.blogspot.com/2009/06/blog-post_09.html' title='अबूझमाड़ को बूझना इतना आसान भी नहीं'/><author><name>राजेश अग्रवाल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03166713468895085704</uri><email>agrrajesh@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='08211776964587468572'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/Si8gssCjGoI/AAAAAAAAAf0/o344jfhKr4M/s72-c/TribalYouth1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4294876642043841838.post-539972256558003320</id><published>2009-06-09T00:01:00.000-07:00</published><updated>2009-06-09T05:49:18.236-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लोक राग'/><title type='text'>अब हबीब के प्रयोगों का पीछा करें</title><content type='html'>हबीब तनवीर के चले जाने के बाद यह सवाल बेचैन करने वाला है कि उनकी प्रयोगधर्मिता और छत्तीसगढ़ की लोक विधाओं को परिष्कृत कर राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर प्रतिष्ठित करने की गति में ठहराव तो नहीं आ जाएगा. &lt;br /&gt;तीजनबाई की पंडवानी की अनोखी भाव-भंगिमाएं, तम्बूरे का अस्त्र-शस्त्रों की तरह इस्तेमाल&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/Si5aLyuBzjI/AAAAAAAAAfs/5xxHkPcbjz0/s1600-h/HabibTanvir.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 400px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/Si5aLyuBzjI/AAAAAAAAAfs/5xxHkPcbjz0/s400/HabibTanvir.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5345308966375247410" /&gt;&lt;/a&gt;करना हबीब तनवीर से सीखा. देवदास बंजारे की टीम ने चरणदास चोर नाटक में पंथी नृत्य को अद्भुत शारीरिक कौशल के साथ प्रदर्शित किया तो यह भी हबीब का ही तराशा प्रयोग था. हबीब तनवीर ने रविन्द्रनाथ टैगोर, शेक्सपियर के नाटकों का मंचन किया तो उन्हें छत्तीसगढ़ के लोक धुनों, गीतों में पिरोकर सामने लाया. इसके लिए कलाकार भी उन्होंने वहीं चुने जो आम लोगों के बीच से छत्तीसगढ़ी परिवेश में जीते रहे हैं. हबीब तनवीर ने उन्हें तराशा और हीरा बना दिया. गोविन्दराम निर्मलकर, रामचरण निर्मलकर, दीपक तिवारी आदि कितने ही कलाकार आज अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित हैं, जिन्हें हबीब तनवीर के सानिध्य में देश विदेश के मंचों पर छत्तीसगढ़ी कला, कथा, गीतों को प्रतिष्ठित करने का अवसर मिला. हबीब तनवीर पहले ऐसे समर्पित सम्पूर्ण नाटककार थे, जिन्होंने छत्तीसगढ़ की कला और कलाकारों की ताकत का परिचय न केवल छत्तीसगढ़ियों को कराया बल्कि दुनिया भर में इसका लोहा मनवाया. &lt;br /&gt;शेक्सपियर के रूपान्तरित नाटक कामदेव का अपना-वसंत ऋतु का सपना में पूरी कथा बांस गीत के जरिये आगे बढ़ती है. बांस गीत न हो तो इस नाटक की आत्मा ही न रहे. ऐसा प्रयोग सिर्फ हबीब तनवीर से ही संभव था. उनके रहते उम्मीद सी बंधी रहती थी कि गम्मत, नाचा, पंडवानी, ददरिया, सुआगीत, देवारगीत, बांसगीत आदि पर प्रयोग होते रहेंगे और नये कलाकार गढ़े जाते रहेंगे लेकिन अब उनके जाने से एक खालीपन आ गया है. छत्तीसगढ़ी लोक कला और कलाकारों के लिए काम करने वालों का एक वर्ग सांस्कृतिक आयोजनों में इस समय बुरी तरह से हावी है. इनका काम जत्था निकालना, महोत्सव कराना और सरकारी अनुदान हड़पना रह गया है. कुछ बिचौलिये किस्म के लोगों के पास छत्तीसगढ़ी कला के संरक्षण का भार सौंप दिया गया है.  दुर्भाग्य की बात है कि कुछ नेता और नौकरशाह ऐसे कार्यक्रमों में अपना अभिनंदन कराते हैं और इन्हें संरक्षण देते हैं. इन्हीं लोगों ने हबीब तनवीर की लोकप्रियता के शिखर को छूने के बाद उनके छत्तीसगढ़ के नये कलाकारों की तलाश करने और तराशने के काम में बाधा डाली. जब भी वे रायपुर या छत्तीसगढ़ में कोई प्रस्तुति देने आते थे यह आरोप उनके पीछे लग जाता था कि वे राज्य के कलाकारों की ग़रीबी का बेज़ा फायदा उठा रहे हैं और उनका शोषण कर रहे हैं. हबीब तनवीर के नया थियेटर में सारे कलाकार एक जैसे माहौल में रहते, खाते पीते सोते हैं और निरन्तर अभ्यास कर एक मंच पर चढ़ते हैं. हबीब ने तो दर्जनों कलाकारों की आजीविका चलाई और उन्हें प्रतिष्ठा भी दिलाई, लेकिन छत्तीसगढ़ में उनकी सक्रियता कम हो जाने के बाद भी आरोप लगाने वाले रत्ती भर भी उनकी खाली जगह नहीं भर पाए. इन दिनों छत्तीसगढ़ में गहरा सांस्कृतिक संकट छाया हुआ है. बाज़ार फूहड़ बोलों व धुनों से पटा हुआ है. छत्तीसगढ़ी नाटकों का मंचन बंद है. रहस लुप्तप्राय हो रहा है, इसके कलाकार आज भूखों मर रहे हैं. गम्मत की नई पीढ़ी तैयार नहीं हो रही है. &lt;br /&gt;हबीब तनवीर के काम का दायरा व्यापक रहा है. नाटकों में, लोककथाओं में, गीतों में, नृत्यों में, अभिनय में. उनके कामकाज का पीछा कर हम छत्तीसगढ़ की समृध्द संस्कृति को बचा सकते हैं. राज्य के कला प्रेमियों की जिम्मेदारी है कि हबीब तनवीर का युग ख़त्म न होने दें, अभी उनके प्रयोगों को जारी रखने की ज़रूरत है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4294876642043841838-539972256558003320?l=sarokaar.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sarokaar.blogspot.com/feeds/539972256558003320/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4294876642043841838&amp;postID=539972256558003320' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4294876642043841838/posts/default/539972256558003320'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4294876642043841838/posts/default/539972256558003320'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sarokaar.blogspot.com/2009/06/blog-post.html' title='अब हबीब के प्रयोगों का पीछा करें'/><author><name>राजेश अग्रवाल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03166713468895085704</uri><email>agrrajesh@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='08211776964587468572'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/Si5aLyuBzjI/AAAAAAAAAfs/5xxHkPcbjz0/s72-c/HabibTanvir.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4294876642043841838.post-3103138393480697978</id><published>2009-05-26T07:53:00.000-07:00</published><updated>2009-06-27T19:29:57.986-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रश्न'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='खास खबर'/><title type='text'>हिंसा व क्रूरता के खेल में बेजु़बान खिलौने ये आदिवासी बच्चे</title><content type='html'>&lt;strong&gt;बस्तर से लेकर सरगुजा तक छत्तीसगढ़ में आदिवासी बच्चों का बाज़ार लगा है. इस बाजार में लड़के भी हैं और लड़कियां भी. ये हथियार उठाकर मोर्चा लेने के लिए भी राज़ी हैं और भारी मशीनों में दबकर जान गंवाने के लिए भी. इन बच्चों की मांग नक्सलियों को भी है और पुलिस को भी. दिल्ली, पंजाब, हरियाणा में है और कर्नाटक, गोवा, तमिलनाडु में भी. ये आदिवासी उनके बच्चे हैं जो पीढ़ियों से अपने महुआ-तेंदू का जंगल और अपनी संस्कृति को बचाने के लिए अपने प्राणों की आहुति देता आ रहा है. उनकी लड़ाई मुगलों, मराठा शासकों से हुई, वे अंग्रेजों से भी लड़े, लेकिन अब शायद ये थक चुके हैं इनके बच्चे लड़ाई शुरू करने से पहले ही हार चुके हैं. दशकों से नहीं देखा गया आदिवासियों को अपना ठिकाना छोड़ते. जिस जंगल को वे स्वर्ग समझते रहे हैं, विकास की नई परिभाषा, उपद्रव व अतिक्रमण के नये तेवरों के चलते वह उन्हें डराने लगा है. बस थोड़ा बरगलाने, झांसा देने की जरूरत है फिर स्वभाव से साहसी और शरीर से मजबूत लेकिन मासूम और हताश इन आदिवासी लड़के-लड़कियों को कोई भी अपना शिकार बना लेता है. सभ्य समाज के खिलाड़ियों के लिए ये इतने खरे खिलौने हैं कि निर्ममता की सारी हदें पार करने के बाद भी वे चीखते-चिल्लाते नहीं. कभी इनकी पीड़ा में किसी कोने से आवाज उठती भी है तो वह अनसुनी कर दी जाती है.&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;आंध्रप्रदेश में बीते 6 अप्रैल को 14 साल के मुकेश की मौत उसके सिर पर बोरिंग मशीन की एक राड गिरने से हो गई. वह उन दर्जन भर बच्चों में शामिल था जो धनतुलसी गांव के नरेन्द्र और गंगदेव नाम के दलालों के साथ कांकेर के पीढा़पाल छात्रावास से अपने मां-बाप को.&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/ShwEal8FFRI/AAAAAAAAAfE/hYOptX76Kwg/s1600-h/Mukesh+Kanker-die+in+Tamilnadu+during+work+with+heavy+bore+machine.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 313px; height: 240px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/ShwEal8FFRI/AAAAAAAAAfE/hYOptX76Kwg/s400/Mukesh+Kanker-die+in+Tamilnadu+during+work+with+heavy+bore+machine.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5340148113061778706" /&gt;&lt;/a&gt; बताए बगैर 6 माह पहले अचानक भाग निकले थे. उन्हें अच्छी नौकरी व नियमित तनख्वाह का झांसा दिया गया, लेकिन वहां उन्हें बोर खुदाई करने वाले काम में झोंका. वहां दिन रात ट्रकों के साथ रहना पड़ता और लगातार कई-कई दिनों तक भारी भरकर औजारों से काम करना होता था. मुकेश की मौत से घबराकर साथ गया सन्तू भागकर किसी तरह पीढ़ापाल लौटा. उसके आने पर पता चला तुलतुली, मर्रापी आदि गांवों से लापता सारे बच्चे इन्हीं दलालों के साथ गये थे और वहां बोरिंग चलाने वाले एक ठेकेदार के चंगुल में हैं. कांकेर कलेक्टर शहला निगार ने अब बाकी बच्चों को लाने के लिए एक टीम तैयार की है और दोनों दलालों के ख़िलाफ रिपोर्ट दर्ज कर उनकी तलाश की जा रही है. &lt;br /&gt;सरगुजा जिले के प्रेमनगर के 5 नाबालिगों को लखनपुर का बशीर खान काम दिलाने नोएडा उत्तरप्रदेश ले गया और उन्हें एक गन्ना उत्पादक के पास बेचकर आ गया. इनमें से एक अशोक किसी तरह वहां से भागकर अपने गांव साल्ही पहुंचा. उसने बताया कि फार्म हाऊस का मालिक कहता था कि हमें बशीर ने एकमुश्त रकम लेकर उसके पास छोड़ा है. अशोक ने बताया कि उनसे दिन-रात काम कराया जा रहा था और भोजन भी समय पर नहीं मिलता था. मजदूरी की तो बात ही नहीं थी. प्रेमनगर पुलिस ने दलाल बशीर खान के ख़िलाफ अपराध कायम किया है. अशोक के साथ बाकी बच्चों को छुड़ाने के लिए एक टीम नोएडा रवाना की गई है. &lt;br /&gt;छत्तीसगढ़ का छत कहे जाने वाले मैनपाट की पहाड़ियों में बसे गांवों से भी नाबालिग लड़के उठाकर ले जाए जा रहे हैं. नर्मदापुर, सतानादर, पैगर आदि गांवों के बीसियों बच्चों का बीते कई सालों से पता नहीं. इनमें से कुछ घरेलू नौकर बना गये तो कुछ को उत्तर प्रदेश के कालीन उद्योग में खपाया गया है. 6 माह पहले भी 9 बच्चों को दलालों ने फांसकर मिर्जापुर के एक ईंट भट्ठे में पहुंचा दिया. नर्मदापुर पुलिस इनमें से 7 को वहां से छुड़ाकर ला चुकी है, लेकिन दो बच्चे गुड़्डू और चीतम वहां नहीं मिले. 10-12 साल के इन बच्चों के बारे में अब तक कुछ पता नहीं चला. ईंट भट्ठा मालिक ने साफ इंकार कर दिया कि ये दोनों वहां काम करते थे.&lt;br /&gt;23 सितम्बर 08 को रायपुर रेलवे स्टेशन पर दो दर्जन आदिवासी बच्चों को बहदवास हालत में देखकर वहीं मौजूद कुछ स्थानीय युवकों के कान खड़े हुए. मालूम हुआ कि सब अबूझमाड़ इलाके से यहां तक पहुंचे थे. सरकार और उसकी विकास योजनाएं तो वहां तक पहुंच नहीं पाई लेकिन दलाल पहुंच गये. दलाल सम्पतलाल स्टेशन पर ही दबोच लिया गया. इन बच्चों को चैन्नई के कपड़ा कारखाने में काम दिलाने झांसा दिया गया था. उन्हें सफर करते 12 घंटे बीत चुके थे और 24 घंटे का रास्ता बाकी था लेकिन दलाल ने उन्हें खाने-पीने को कुछ नहीं दिया. सम्पत के इस रवैये से भूखे-प्यासे कुछ बच्चों का माथा ठनका और वे धमतरी से ही दलाल का साथ छोड़कर वापस गांव भाग गये. दलाल वहां से 36 बच्चों को लेकर निकला था. एक दो को छोड़ बाकी सब की उम्र 16 साल से नीचे थी. बच्चों ने बताया कि उन्हें सम्पत ने एक कपड़ा फैक्ट्री में 2500 रूपये माह की नौकरी दिलाने का वादा किया है. बच्चे अगले दिन पुलिस व श्रम विभाग की मदद से गांव लौटा दिये गए.  &lt;br /&gt;बीते 17 मार्च को नक्सलियों ने एक 9वीं कक्षा के छात्र सूरज की गोलियों से भूनकर हत्या कर दी. कांकेर जिले के कोयलीबेड़ा का यह बालक परीक्षा देने के लिए घर से निकला कि रास्ते में नक्सलियों ने उन्हें घेरा. बच्चों से दुश्मनी! तथ्य यह है कि कुछ माह पहले सूरज के पिता की हत्या भी नक्सलियों ने पुलिस की मुखबिरी करने के संदेह में कर दी थी. क्या बच्चे भी पुलिस के लिए मुखबिरी कर रहे हैं? &lt;br /&gt;बीबीसी न्यूज चैनल के कुछ पत्रकार पिछले साल दिल्ली से बस्तर पहुंचे. दंतेवाड़ा के भांसी थाने में उन्हें जब 21 साल के दिलीप ने बताया कि वह पिछले 7 साल से नक्सलियों से लोहा ले रहा है, तो सुनकर वे दंग रह गये. 14 साल की उम्र में ही वह पुलिस में भर्ती कर लिया गया था. दिलीप कहता है कि जब वह 5वीं पढ़ता था तो नक्सली उसे उठाकर ले गए और वह उनके जन-जागरण जत्थे में नाचने गाने लगा. &lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/ShwEz75_ezI/AAAAAAAAAfM/KOe8op8t20Y/s1600-h/class+in+progress+in+bastar.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 300px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/ShwEz75_ezI/AAAAAAAAAfM/KOe8op8t20Y/s400/class+in+progress+in+bastar.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5340148548455332658" /&gt;&lt;/a&gt;बाद में उसने पाया कि नक्सली पैसे लेकर हत्याएं करते हैं और आदिवासी लड़कियों से बलात्कार करते हैं. उसे उनसे घृणा हो गई और खुद को पुलिस में सरेंडर कर दिया. पुलिस ने उसे बाल आरक्षक की नौकरी दे दी और 14 साल की उम्र से ही दिलीप देश के सबसे बड़े आंतरिक युध्द में एक सिपाही है. छत्तीसगढ़ पुलिस में बाल आरक्षक सिर्फ वे बनाए जाते हैं, जिनके अभिभावक की पुलिस विभाग में रहते हुए असमय मौत हो जाए, लेकिन पुलिस ने आत्मसमर्पण करने वाले बच्चे को ही हथियार थमा दिया.&lt;br /&gt;बस्तर में नक्सलियों और पुलिस फोर्स द्वारा बच्चों का हिंसक गतिविधियों के लिए हो रहे इस्तेमाल को लेकर ह्मूमन राइट्स वाच ने राजधानी रायपुर में बीते साल सितम्बर में 58 पृष्ठों की एक विस्तृत रिपोर्ट जारी की. इसमें बताया गया था कि बड़ी संख्या में नक्सलियों से निपटने के लिए पुलिस ने आदिवासी नाबालिगों को विशेष पुलिस अधिकारी (एसपीओ) बनाकर हथियार सौंपा है. पुलिस अधिकारियों ने इसके जवाब में कहा कि ऐसा जानबूझकर नहीं किया गया है. कुछ एक नाबालिग थे, पर इसकी वजह सिर्फ ये है कि उनकी जन्मतिथि से सम्बन्धित दस्तावेज हासिल नहीं हुए. जैसे ही पता चला, उन्हें हटा दिया गया. इनकी संख्या पुलिस के मुताबिक करीब 150 थी. लेकिन 'वाच' का दावा है कि अब भी बड़ी संख्या में एसपीओ के रूप में नाबालिग काम कर रहे हैं और सशस्त्र नक्सलियों से लोहा लेने के लिए उन्हें मोर्चे पर भेजा जा रहा है. सर्चिंग आपरेशनों में उन्हें सामने रखा जा रहा है. नाबालिग एसपीओ की सही संख्या को लेकर तो 'वाच' ने कोई दावा नहीं किया लेकिन यह बताया गया कि नक्सलियों के साथ मुठभेड़ में मारे गए अनेक एसपीओ नाबालिग थे, यह प्रत्यक्षदर्शियों ने स्वीकार किया है.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;बच्चे सीखते हैं बारूदी सुरंग बिछाना&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;दूसरी तरफ नक्सली भी हिंसा व जोखिम भरे काम में बच्चों को पिछले एक दशक से झोंक रहे हैं. इन्हें न केवल खुफिया जानकारी इकट्ठा करने के लिए तैनात करते हैं बल्कि भूमिगत सुरंग बिछाने और बारूद बनाने का प्रशिक्षण दिया जाता है. नक्सलियों ने बाल संघम का गठन भी कर रखा है, जिसमें 6 से लेकर 12 साल के बच्चे शामिल किये गये हैं. 12 साल से ज्यादा उम्र के बच्चों को राइफल चलाने की ट्रेनिंग दी जाती है. कई बच्चे नुक्कड़ नाटकों में रखे गए हैं, बाद में उन्हें हथियार थमा दिया जाता है. नक्सली बच्चों को अपने दस्ते में शामिल करने के लिए तमाम हथकंडों का इस्तेमाल करते हैं. पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी ने बीते साल 2 सितम्बर से 8 सितम्बर तक नक्सली सप्ताह मनाया. इस दौरान उन्होंने जगह-जगह बैठकें ली थी और परचे चस्पा किए . परचों में उन्होंने हर घर से एक सदस्य को जनवादी संघर्ष में शामिल होने की अपील की. जाहिर है यह अपील नये लड़कों के लिए ही थी. इसी साल 8 जनवरी को सिंगावरम मुठभेड़ में 17 लोगों की मौत हुई, जिनके बारे में पुलिस का कहना है कि ये नक्सली हैं. इनमें 3 की उम्र 16 साल से कम थी. इसी साल जनवरी में पत्रकारों से बात करते हुए छत्तीसगढ़ के डीजीपी विश्वरंजन ने कहा कि नक्सली बडी़ संख्या में बच्चों की भर्ती कर रहे हैं. इनमें लड़कियां भी हैं. उन्होंने बताया कि नक्सलियों की अलग-अलग शाखाओं में शामिल लोगों की संख्या 45 हजार है, जिनमें एक तिहाई लड़कियां हैं और ज्यादातर नाबालिग रहते ही दस्ते में शामिल किए गये.&lt;br /&gt;बस्तर में नक्सली हिंसा और उसके बाद शुरू हुए सलवा जुड़ूम आंदोलन के बाद करीब 500 गांव उजड़ चुके हैं. इसका सबसे बुरा प्रभाव आदिवासी बच्चों की शिक्षा पर पड़ा है. सलवा जुड़ूम के बाद बने कुछ कैम्पों में तो पढ़ाई हो रही है पर बड़ी संख्या में स्कूलों, छात्रावासों को नक्सलियों ने ढ़हा दिया है. सरकारी आंकड़े ही बताते हैं कि इन गांवों की आबादी लगभग 3 लाख थी. लेकिन कैम्पों में रहने वालों की संख्या 60 हजार से अधिक नहीं है. अनेक आंध्रप्रदेश के सीमावर्ती गांवों में चले गए. इनके बच्चों के लिए शिक्षा तो दूर की बात है, पेट भरने का साधन भी नहीं है. इन सबके चलते बच्चों का हिंसक और जोखिम से भरे कामों में इस्तेमाल आसान हो गया है.  &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;व्यथा सरगुजा-जशपुर की &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;दिल्ली, मुम्बई की पाश कालोनियों में जशपुर, बगीचा, कुनकुरी की लड़कियों को झाड़ू-पोछा लगाते देखा जा सकता है. अधिकांश उरांव आदिवासी हैं, जो इसाई धर्म अपना चुके हैं. राज्य महिला आयोग के अनुसार जशपुर व सरगुजा जिले से काम की तलाश में बाहर जाने वाली लड़कियों की संख्या 19000 है. रायपुर के एनजीओ 'फोरम फार फैक्ट फाइंडिंग डाक्यूमेन्टेशन एण्ड एडवोकेसी' के सुभाष महापात्र के अनुसार 7021 लड़कियां ऐसी हैं, जिन्हें छत्तीसगढ़ से बाहर ले जाकर या तो बेच दिया गया या वे बंधक बनाई ली गईं. कुनकुरी में ग्रामीण विकास केन्द्र की सिस्टर सेवती पन्ना, एस्थेर खेस इत्यादि ने कुनकुरी व आसपास के गांवों में घूमकर 3000 से अधिक बच्चों की सूची तैयार की है, जिन्हें दलाल बहला-फुसलाकर दिल्ली, गोवा, मुम्बई आदि ले गए. इनमें 90 फीसदी लड़कियों की उम्र 16 साल से कम है. कुछ तो स्कूल जाने के लिए घर से निकलीं और बस्ते को खेत में फेंक दिया, फिर दलालों के साथ दिल्ली निकल गईं. ये अमीरों की कोठियों में 24 घंटे रहती हैं और सुबह से देर रात तक काम करती हैं. इन्हें ठीक तरह से न कपड़े मिलते न खाना. इनसे मारपीट की जाती है और शारीरिक शोषण भी किया जाता है. कई लड़कियां यहां गर्भवती होकर लौटीं और अनेक आईं गंभीर बीमारियों को साथ लेकर. कुछ लड़कियों की दिल्ली में ही मौत हो गई और परिजनों को इसका पता ही नहीं चला. सिस्टर्स के पास जानकारी है कि इनमें से 12 लड़कियां विदेशों में भी भेज दी गई. दिल्ली में करीब 150 प्लेसमेन्ट एजेंसियां सक्रिय हैं, जिनके एजेंट अक्सर सरगुजा, कुनकुरी इलाकों में घूमते दिखाई देते हैं. दिल्ली ले जाकर इनके नाम बदल दिये जाते हैं ताकि जब मां-बाप या पुलिस उन्हें ढूंढने के लिए पहुंचे तो उनका पता-ठिकाना ही न मिले.  &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सभ्य समाज का नकारात्मक हस्तक्षेप&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;दक्षिण बस्तर से लेकर उत्तर सरगुजा तक के आदिवासी बच्चों के साथ क्रूरतापूर्ण बर्ताव के पीछे बनी परिस्थितियां अलग-अलग हैं लेकिन सब जगह वजह एक ही है कि जंगलों में अपनी खास जीवन शैली के आदी आदिवासियों के विकास के नाम पर सभ्य माने जाने वाले समाज ने उनकी मंशा के ख़िलाफ हस्तक्षेप किया है. छत्तीसगढ़ में पलायन दशकों से होता रहा है. जांजगीर, धमतरी, बिलासपुर जिलों के अनुसूचित जाति व पिछड़े वर्ग के लोग हर साल फसल काटने के बाद परिवार लेकर उत्तर भारत के विभिन्न राज्यों के ईंट भट्ठों में काम करने निकलते हैं और बारिश शुरू होते ही लौट आते हैं. शहरी वातावरण से ये घुले मिले हैं. वहां जाकर ये ज्यादा कमाते हैं और घर बनाने, बच्चों का ब्याह रचाने के लिए पैसे लाते हैं. इनका भी वहां शोषण होता है. तय मजदूरी से कम दी जाती है. काम के घंटे तय नहीं होते और रहने खाने का इंतजाम ख़राब होता है. महिलाएं हवस का शिकार होती हैं. पुरूषों को बंधक बना लिया जाता है. छत्तीसगढ़ के लिए यह कलंक ही है. राज्य सरकार सस्ते चावल की योजना को पलायन रोकने का एक जरिया मानती है. इस चुनाव में भाजपा ने छत्तीसगढ़ को पलायन मुक्त राज्य बनाने का वादा किया था. लेकिन हिंसा और क्रूरता के शिकार बच्चों के लिए सरकार की कोई चुनावी घोषणा नहीं है. शायद सरकार समझती है कि बस्तर, रायगढ़ और सरगुजा के आदिवासियों का भला यहां मौजूद खनिज सम्पदाओं व पानी के दोहन से ही होगा. नक्सल हिंसा इससे खत्म होगी, बेरोजगारी खत्म होगी तो बस्तर के बच्चे हथियार उठाने व राज्य से बाहर जाकर मशीनों के नीचे दबने के लिए विवश नहीं होंगे. नक्सली इसका विरोध करते हैं. दोनों ही पक्षों का दावा है कि उनकी सोच ही आदिवासियों का भला करेगी और इसके चलते बस्तर में हिंसक संघर्ष जारी है. इस संघर्ष में जो बच्चे शामिल हो रहे हैं वे बे-मौत मारे जा रहे हैं और जो बस्तर से भाग रहे हैं वे भी मर रहे हैं. प्रेमनगर, मैनपाट इलाकों से जोखिम का काम लेने के लिए जिन बच्चों को राज्य के बाहर बेचा जा रहा है, उन इलाकों में बाक्साइट का उत्खनन हो रहा है, नये पावर प्लांट लगाए जा रहे हैं. जशपुर-सरगुजा इलाके में मिशनरियों ने सेवा और शिक्षा के प्रसार के साथ इसाई धर्म का भी विस्तार किया. आदिवासियों ने इनसे रहन सहन का नया तरीका सीखा. दो दशक पहले कुनकुरी के उरांव आदिवासी खूब पढ़ाकू थे. यह देश का सबसे ज्यादा प्रशासनिक अधिकारी देने वाला इलाका था. लेकिन यहां बचे आदिवासी पढ़ लिख कर बेरोजगार हो गये हैं. खेती टुकड़ों में बंट गई है. उद्योग धंधे हैं नहीं. इसाई कल्चर अपनाने लेने के बाद अच्छा खाना और पहनावा चाहते हैं. उनके बीच भयंकर द्वन्द मचा है. इनमें से सैकड़ों लड़कियों ने जोखिम जान लेने के बाद भी महानगरों में जाकर काम तलाशना ठीक समझा. फिलहाल तो नाबालिग आदिवासियों के इस त्रासदी से निकल बचने की कोई सूरत दिखाई नहीं देती है. शायद आने वाले दिनों में सरकार व जागरूक समुदाय मिलकर कोई रास्ता निकाले.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4294876642043841838-3103138393480697978?l=sarokaar.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sarokaar.blogspot.com/feeds/3103138393480697978/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4294876642043841838&amp;postID=3103138393480697978' title='8 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4294876642043841838/posts/default/3103138393480697978'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4294876642043841838/posts/default/3103138393480697978'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sarokaar.blogspot.com/2009/05/blog-post.html' title='हिंसा व क्रूरता के खेल में बेजु़बान खिलौने ये आदिवासी बच्चे'/><author><name>राजेश अग्रवाल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03166713468895085704</uri><email>agrrajesh@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='08211776964587468572'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/ShwEal8FFRI/AAAAAAAAAfE/hYOptX76Kwg/s72-c/Mukesh+Kanker-die+in+Tamilnadu+during+work+with+heavy+bore+machine.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4294876642043841838.post-7683398316316529245</id><published>2009-03-07T03:31:00.000-08:00</published><updated>2009-05-26T09:07:31.054-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='साहित्य'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रश्न'/><title type='text'>छत्तीसगढ़िया क्यों नहीं बोलता छत्तीसगढ़ी?</title><content type='html'>&lt;strong&gt;विधानसभा के बीते सत्र में अध्यक्ष धरमलाल कौशिक ने विधायकों को छूट दी कि वे छत्तीसगढ़ी में सवाल करें, मंत्री उनका जवाब भी छत्तीसगढ़ी में देंगे. लेकिन हैरानी हुई कि तकरीबन 20 दिन चले इस सत्र में हजार से ज्यादा सवालों के बीच छत्तीसगढ़ी गायब थी. तीसरी विधानसभा के पहले सत्र में 90 में से केवल 10 विधायकों ने छत्तीसगढ़ी में शपथ ली. यह आईना है, छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़ी की हैसियत का. जिस तरह ज्यादा पढ़े-लिखे हिन्दी भाषाभाषी हिन्दी जानते हुए भी आपस में अंग्रेजी में बात करके खुद को ज्यादा सभ्य साबित करने की कोशिश करते हैं कमोबेश यही हाल छत्तीसगढ़ियों का है. छत्तीसगढ़ में इन दिनों नारा चल निकला है, छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया! लेकिन सबसे बढ़िया छत्तिसगढ़िया वे हैं, जो  हिन्दी या अंग्रेजी बोलते हैं.&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;विधानसभा चुनाव से ठीक पहले बीते साल विधानसभा ने सर्वसम्मति से इसे हिन्दी के साथ राजभाषा के रूप में स्वीकार किया. राज्य बनने के बाद यह सुविधा है कि स्थानीय महत्व के मुद्दों पर हमें अधिक संघर्ष की जरूरत नहीं पड़ रही. छत्तीसगढ़ी से प्रेम रखने वालों का यह सौभाग्य है कि इसे राजभाषा का दर्जा दिलाने के लिए सड़क पर उतरकर लाठी गोलियां नहीं खानी पड़ी. सरकार ने छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग का भी गठन किया, जो इस समय छत्तीसगढ़ी का एक मान्य व्याकरण, शब्दकोष इत्यादि तैयार कर रहा है.&lt;br /&gt;बीते 21 फरवरी को यूनेस्को ने अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाया. इस मौके पर जारी एक रिपोर्ट में आशंका जाहिर की गई कि &lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/SbSu-Cxr2oI/AAAAAAAAAec/xqjAYe9yeRk/s1600-h/School.bmp"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 316px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/SbSu-Cxr2oI/AAAAAAAAAec/xqjAYe9yeRk/s320/School.bmp" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5311062241497045634" /&gt;&lt;/a&gt;सन् 2050 के आते-आते दुनिया से 90 फीसदी भाषाएं खत्म हो जाएंगी. विश्व की 6000 भाषाओं में से 3000 का अस्तित्व खतरे में है. पिछली 3 पीढ़ियों में 200 भाषाएं खत्म हो चुकीं, 538 खत्म होने के कगार पर हैं, 632 असुरक्षित हैं और 607 भाषाएं जल्द असुरक्षित हो जाएंगी. हमें आशा है कि 41 साल बाद खत्म भाषाओं की सूची में छत्तीसगढ़ी नहीं होगी. रिपोर्ट कहती है कि युवा अपनी स्थानीय मूल भाषा सीखें और उसे व्यवहार में लाएं. पर देखा गया है कि वे अपने कैरियर को ध्यान में रखते हुए शक्तिशाली भाषाओं को सीखना चाहते हैं. रिपोर्ट कहती है कि अधिक से अधिक भाषाएं जानना हमेशा अच्छा है, लेकिन हम पर अपनी भाषा को संरक्षित करने का दायित्व है. भाषाओं के साथ उसकी परम्पराएं और सभ्यताएं पनपती और फलती-फूलती है, जिसे बचाना बड़ी चुनौती है.&lt;br /&gt;राजभाषा के लिए संघर्ष करने वालों की सदैव चिंता रही है कि बोलचाल में छत्तीसगढ़ी इस्तेमाल की जाए, लेकिन यह नहीं हो पा रहा है. पिछले दिनों हिन्दी और आंचलिक बोलियों के आपसी सम्बन्धों पर रायपुर में एक सेमिनार था. छत्तीसगढ़ के विद्वानों के अलावा राहुल देव, विश्वनाथ सचदेव, प्रो. अमरनाथ आदि यहां पहुंचे. उनके विचारों में भिन्नताओं के बावजूद एक स्वर उभरा कि भाषाएं वे ही पनप सकती हैं, जो उन्हें रोजगार के मौके दें. जरा सोचें, छत्तीसगढ़ी को हम इस मापदण्ड पर कहां खड़ा  हैं? सड़क, बिल्डिंग का ठेकेदार छत्तीसगढ़ चाहे थोड़े दिन पहले ही आया हो, घर में अपने प्रदेश की बोली बोलता हो, पर जब मजदूर, गरीब, खेतिहर से काम लेता है तो छत्तीसगढ़ी सीखता है. वही ठेकेदार जब अफसरों के पास बिल ले जाएगा तो छत्तीसगढ़ी बोलने पर उसे उपेक्षित होने का भय बना रहेगा.&lt;br /&gt;राजभाषा पर छत्तीसगढ़ विधानसभा में बिल पेश किया गया तो मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने कहा कि छत्तीसगढ़ी बहुत मीठी बोली है और राज्य के लोगों के आपसी संवाद का सर्वश्रेष्ठ माध्यम है. पर सरकार नहीं बता पायेगी कि विधानसभा में अनुवादकों की व्यवस्था करने के बाद भी इस मीठी बोली में सवाल क्यों नहीं किए. विपक्ष से रविन्द्र चौबे ने बिल पेश करने के दौरान सवाल उठाया कि छत्तीसगढ़ी को अकेले अधिकारिक भाषा के रूप में क्यों नहीं रखा जा रहा है, इसे हिन्दी के साथ क्यों जोड़ा गया. कुछ नेता ज़मीनी सच्चाई जानते हुए भी ऐसा कह देते हैं. जाने अनजाने उन्होंने राष्ट्रभाषा हिन्दी की ख़िलाफत कर दी. छत्तीसगढ़ी के साथ छत्तीसगढ़ियों का भावनात्मक लगाव है, भले इसे वे बोलचाल से गायब कर रहे हों. राजनेता यह बात जानते हैं. चुनाव के वक्त जहां निर्णायक गरीब मतदाताओं की भीड़ हो, सभी दल छत्तीसगढ़ी में बात करते दिखेंगे. मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह में भी छत्तीसगढ़ी बोलकर भीड़ को लुभा लेने की क्षमता विकसित हुई है. पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी, पूर्व सांसद पवन दीवान आदि पारंगत हैं ही. &lt;br /&gt;पता नहीं क्यों छत्तीसगढ़ी बोला जाना छत्तीसगढ़ियों के लिए ही कौतूहल बना हुआ है. हमारे कंठ पर तो इसे सदैव सहज बसना चाहिए. इसके कुछ कारण दिखते हैं. एक नवंबर 2000 के पहले तक छत्तीसगढ़ मध्यप्रदेश का हिस्सा रहा, जहां छत्तीसगढ़ी के अलावा बुंदेलखंडी, मालवी, बघेली और अवधी भी बोली जाती थी. प्रशासनिक कामकाज हिन्दी में होते थे. मध्यप्रदेश का हिस्सा होने के कारण राजनैतिक, प्रशासनिक सामंजस्य व पाठ्य पुस्तकों को एकरूप हिन्दी के माध्यम से ही बनाया जा सका. अवसरों में भागीदारी के लिए छत्तीसगढ़ियों को जरूरी था कि वे मध्यप्रदेश के निवासी के रूप में जाने जाएं. छत्तीसगढ़ बनने के 8 साल बाद अब छत्तीसगढ़ी को राजभाषा का दर्जा मिला है. इस बीच पूरी दुनिया में बहुत तेजी से अनेक परिवर्तन हुए हैं. पिछले कुछ दशकों के भीतर समाज में बाजार का प्रभाव बढ़ा है, सांस्कृतिक मूल्यों को बचाने की चिंता करने वाले लोग घटे हैं. तकनीकी शिक्षा, जिसके प्रति युवा पीढ़ी का रूझान है वे ज्यादातर अंग्रेजी अथवा हिन्दी में हैं. राज्य में औद्योगिक, व्यापारिक गतिविधियां बढ़ी हैं, जिनमें निवेश करने वाले लोग देश-विदेश के विभिन्न हिस्सों से पहुंचे हैं. हाल के मंदी के असर को छोड़ दें तो लोगों का उपभोक्ता वस्तुओं की तरफ लगाव बढ़ा है. सार्वजनिक मंचों, विद्यालयों में राज्य की संस्कृति से सम्बन्धित गतिविधियों को केबल टीवी के कार्यक्रमों ने दबोच रखा है. शासकीय संरक्षण में होने वाले सांस्कृतिक आयोजन जिनसे राज्य की विशेषताओं को उभारने का अवसर मिल सकता है, सीमित हैं तथा आम लोगों की पहुंच से दूर हैं.नई पीढ़ी, जिनके हाथों में कल का छत्तीसगढ़ है &lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/SbSvTAqZRuI/AAAAAAAAAek/gouwgnXeYic/s1600-h/Teejan.bmp"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 258px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/SbSvTAqZRuI/AAAAAAAAAek/gouwgnXeYic/s320/Teejan.bmp" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5311062601706850018" /&gt;&lt;/a&gt;गिल्ली डंडा या कबड्डी पसंद नहीं करते, उसे क्रिकेट पसंद है. अमरसा या ठेठरी खुरमी उसे नहीं भाता, वे चाऊमिन और नूडल्स के शौकीन हैं. वे चंदैनी, पंडवानी, ददरिया, गम्मत से दूर हैं, अब गांव-गांव, डिस्को पाप राक डांस काम्पीटिशन हो रहे हैं. उन्हें लगता है कि ऐसा करके वे दूसरों से बराबरी कर पाएंगे. ऐसे में अपनी बोली के प्रति भी उनमें मोह नहीं जागा. अमीर धरती के गरीब लोगों के इस छत्तीसगढ़ में यह धारणा बनी कि जो निर्धन है, छत्तीसगढ़ी भाषा, कलाएं, सभ्यता उसकी है.&lt;br /&gt;छत्तीसगढ़ के मैदानी इलाकों में इस परिवर्तन की बयार तेजी से फैली. बस्तर, सरगुजा, जशपुर इलाकों में औद्योगिक व अधोसंरचनाओं का विकास धीमा रहा है. इसलिये छत्तीसगढ़ी पर संकट राज्य की दूसरी भाषाओं, बोलियों के मुकाबले ज्यादा है. छत्तीसगढ़ी को राजभाषा बनाने के बाद जरूरी होगा कि इसे प्राथमिक स्कूलों के पाठ्यक्रमों में शामिल करें. वरना कुछ दिनों के बाद जो बच्चे स्कूल पहुंचेंगे वे चिरई, रद्दा, कुरथा, कुरिया जैसे सरल शब्दों का मतलब भी नहीं जानेंगे. छत्तीसगढ़ी में ज्यादा से ज्यादा प्रशासनिक कामकाज हों, इसकी पहल राजनेताओं को करनी होगी फिर अफसर इसे खुद-ब-खुद अपने पर लागू कर लेंगे. छत्तीसगढ़ी साहित्य और अन्य लोक विधाओं में निरन्तरता होनी चाहिए. नई पीढ़ी का रूझान बढ़ाने के लिए इसमें नये प्रयोग किए जायें और सृजन की गुणवत्ता पर ध्यान तो देना ही होगा. लगता है कि राजभाषा का दर्जा देने के लिए जितना जूझना पड़ा, वह संघर्ष का एक पड़ाव ही था. लक्ष्य अभी हासिल करना है, जिसमें सरकार के साथ समाज को भी जवाबदेह होना होगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;दूसरी बोलियों का क्या होगा?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;राज्य बनने के 8 साल बाद छत्तीसगढ़ी को राजभाषा का दर्जा दिलाने की पहल हुई. पर यहां की दूसरी भाषाओं के संरक्षण की जिम्मेदारी कौन निभाए? अक्सर कहा जाता है कि छत्तीसगढ़ी दो करोड़ लोगों की भाषा है. कुछ इतिहासकार कहते हैं कि दूसरे राज्यों से प्रभावित मिश्रित छत्तीसगढ़ी बोलने वालों को मिलाकर भी इसे बोलने वालों की संख्या 1 करोड़ 15 लाख के आसपास है. तब हमें चिंता करनी चाहिए उन लोगों की जिनकी बोली 2 करोड़ 8 लाख की आबादी वाले छत्तीसगढ़ में रहते हुए भी छत्तीसगढ़ी नहीं है. ये हिन्दी भी ठीक तरह से नहीं समझ पाते.  छत्तीसगढ़ी बोली के विकास पर सरकारी पहल अन्य बोलियों की कीमत पर नहीं होनी चाहिए. अकेले गोंडी बोलने वालों की संख्या 20 लाख से अधिक है. उत्तर व दक्षिण बस्तर की गोंड बोलियों में काफी फर्क भी है. यहां भतरी, हलबी, पारजी, दोरली आदि अनेक बोलियां हैं. इसी तरह सरगुजा और जशपुर में मैदानी हिस्से तो छत्तीसगढी से वाकिफ हैं पर कुड़ुक, सादरी, सरगुजिहा, जशपुरिहा आदि बोलने वालों की तादात भी लाखों में हैं. अपनी भाषा, सभ्यता और संस्कृति को अपने पारम्परिक तौर तरीकों से संभाले हुए ये लोग ज्यादा कठिनाई में हैं. प्रशासन इन तक पहुंचता नहीं. वे प्रशासन की भाषा से ही नहीं उसके रवैये से भी अनजान हैं. सिंचाई, सड़क, शिक्षा की सुविधाएं यहां काफी कम है. इन इलाकों में फसल छत्तीसगढ़ के दूसरे हिस्सों से एक तिहाई है और मजदूरी आधी. शोषण-कुपोषण यहां सबसे ज्यादा है. नाबालिग लड़कियों के खरीद फरोख्त हो रही है. ये दुर्गम पहाड़ी इलाके हैं, जहां सरकार पहुंचना भी नहीं चाहती, जबकि राज्य के निर्माण के बाद इनको भी रायपुर, बिलासपुर संभागों की तरह सहूलियतें मिलनी चाहिए थी. विकास व सेवाओं का असंतुलन दूर करने के लिए बजट तो दिए जाते हैं पर निगरानी का अभाव है और यहां के लोगों की राय पर काम नहीं होते. ऐसी स्थिति में राजभाषाओं की सूची में इन बोलियों को चाहे तो न भी जोड़ें, लेकिन प्रशासन इतना सक्षम तो हो कि उनकी भावनाओं में, उन्हीं की बोलियों में उनकी जरूरतों को समझे और उनकी समस्याएं दूर करे.&lt;br /&gt;बस्तर में पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी ने बीते साल 2 दिसम्बर से एक हफ्ते तक अपने संगठन की स्थापना की वर्षगांठ मनाई. इस दौरान उन्होंने जगह-जगह अपनी मांगों के परचे चिपकाए. इनमें छत्तीसगढ़ी को राजभाषा का दर्जा दिए जाने का विरोध भी शामिल था. सन् 2001 में मुख्यमंत्री रहते हुए अजीत जोगी ने जब छत्तीसगढ़ी को राजभाषा का दर्जा देने की घोषणा की तो बस्तर के अख़बारों में नक्सलियों ने बयान भेजकर ऐसा फैसला नहीं लेने की चेतावनी दी. बस्तर के आदिवासियों का भरोसा जीतने व बाकी छत्तीसगढ़ियों से उन्हें अलग बताने के लिए नक्सलियों के पास एक मुद्दा यह भी है. समझा जा सकता है कि भाषा का मामला कितना संवेदनशील है. सब मानते हैं कि नक्सल केवल कानून-व्यवस्था का मसला नहीं है. हम जब बस्तर में शांति की स्थापना व वहां के विकास की बात करते हैं, तो पहले हमें उनकी भाषा को साफ समझने वाला महकमा तैनात करना होगा. तब शायद बराक ओबामा जिन्हें छत्तीसगढ़ी जानने वालों की जरूरत है और यूनेस्को जो भाषाओं के खत्म होने पर चिंतित है, के सामने हम अपने राज्य की बेहतर तस्वीर पेश कर सकेंगे.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4294876642043841838-7683398316316529245?l=sarokaar.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sarokaar.blogspot.com/feeds/7683398316316529245/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4294876642043841838&amp;postID=7683398316316529245' title='6 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4294876642043841838/posts/default/7683398316316529245'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4294876642043841838/posts/default/7683398316316529245'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sarokaar.blogspot.com/2009/03/blog-post.html' title='छत्तीसगढ़िया क्यों नहीं बोलता छत्तीसगढ़ी?'/><author><name>राजेश अग्रवाल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03166713468895085704</uri><email>agrrajesh@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='08211776964587468572'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/SbSu-Cxr2oI/AAAAAAAAAec/xqjAYe9yeRk/s72-c/School.bmp' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4294876642043841838.post-3362341571302932645</id><published>2009-02-22T19:12:00.000-08:00</published><updated>2009-02-22T22:32:54.144-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लोक राग'/><title type='text'>महकने दीजिए गेंदा फूल ही बनकर</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/SaIaAmvn9zI/AAAAAAAAAds/OGeFnAzyjRE/s1600-h/Genda+Phool.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 221px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/SaIaAmvn9zI/AAAAAAAAAds/OGeFnAzyjRE/s400/Genda+Phool.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5305831908698486578" /&gt;&lt;/a&gt;छत्तीसगढ़ इन दिनों अपने दशकों पुराने एक गीत को नये कलेवर में पाकर झूम रहा है. हाल में प्रदर्शित दिल्ली-6 का गेंदा फूल हाट-बाजारों से लेकर ड्राइंग रूम में गूंज रहा है. देश-दुनिया के लोगों को राज्य के समृध्द लोक संगीत की मिठास, शब्दों में सहजता, सरलता व अपनापे का नया अनुभव लेना हो तो यह गीत उसकी एक झलक दिखाएगा. गांवों के मेले-ठेले व आकाशवाणी केन्द्रों में कुछ बरस तक ऐसे न जाने कितने मधुर गीत बजते रहते थे, लेकिन राज्य बनने के बाद छत्तीसगढ़ के हर संसाधन को बाजारू बनाने जो कोशिश की गई, उनमें कला व संगीत से जुड़ा क्षेत्र भी शामिल हो गया. पिछले कुछ सालों से छत्तीसगढ़ का संगीत बाज़ार फिल्मी गीतों के बेसुरे नकल, फूहड़ तुकबंदी और अश्लील भाव भंगिमाओं से भरे गीतों से पट गया है. रोज थोक के भाव में वीडियो सीडी निकल रहे हैं, जिनमें कल्पनाशीलता गुम है, रस-माधुर्य खो चुका है और टीन कनस्तर पीट-पीटकर बताया यह जा रहा है कि यही छत्तीसगढ़ की &lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/SaIVBT7s6RI/AAAAAAAAAdM/9tGdGgL4PCw/s1600-h/merigold.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 316px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/SaIVBT7s6RI/AAAAAAAAAdM/9tGdGgL4PCw/s320/merigold.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5305826423270598930" /&gt;&lt;/a&gt;पहचान है. इनको पोसने से आकाशवाणी केन्द्र तो अभी तक बचे हुए हैं पर दूरदर्शन अपने क्षेत्रीय प्रसारण में ऐसे गीतों को जगह देने लगा है. ऐसे में ए आर रहमान और प्रसून जोशी ने &lt;strong&gt;&lt;em&gt;सास गारी देथे, ननंद मुंह लेथे&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt; गाने पर प्रयोग कर नई पीढ़ी को फिर से बताया है कि छत्तीसगढ़ी लोक-संगीत में कालजयी विशेषताएं हैं.&lt;br /&gt;फिल्म रिलीज होने के कुछ दिन पहले से लगातार इलेक्ट्रानिक मीडिया व प्रमुख अख़बारों में यह ख़बर चली कि गीत को सुनकर तो लोग आल्हादित हैं पर गीतकार व संगीतकार ने छत्तीसगढ़ का कहीं पर जिक्र नहीं किया. लोगों की बड़ी संख्या में प्रतिक्रियाएं ली गई और उन्हें कोसने की मुहिम चलाई गई. लोगों से उगलवाया गया कि यह भोले-भाले छत्तीसगढ़िया लोगों के साथ धोखाधड़ी है, अन्याय है. असली गीतकार व गायकों को इसका श्रेय नहीं दिया. गीत से छेड़छाड़ की गई, गोंदा फूल को गेंदा फूल कर दिया गया.मामले ने यहां तक तूल पकड़ा कि छत्तीसगढ़ विधानसभा में भी मुद्दा उठ गया.ख़बरें तलाशने और जल्द से जल्द छाप देने की होड़ ने इसे पहले पन्ने का पहला समाचार तो बना दिया लेकिन अधूरा. उन व्यक्तियों का पक्ष समाचार से गायब है, जो आरोपी हैं. जब कोई घटना पहले पन्ने की पहली ख़बर बने तो पत्रकारिता की जिम्मेदारी कहती है कि उस व्यक्ति का पक्ष भी जाना जाए, जिसे कटघरे पर खड़ा किया गया है. लेकिन इन समाचारों में इसकी जरूरत महसूस नहीं की गई.&lt;br /&gt;अब जरा फिल्म दिल्ली-6 के गीतकार प्रसून जोशी का कहना सुन लिया जाए. संयोग से इंटरनेट पर उनकी ई-मेल आईडी मिल गई. जल्दी ही जवाब आ गया. मोटे तौर पर उन्होंने जो कहा, वे इस तरह से हैं-&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/SaIWTz4xuQI/AAAAAAAAAdc/ujDiFWWK4wQ/s1600-h/prasoon_joshi.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 184px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/SaIWTz4xuQI/AAAAAAAAAdc/ujDiFWWK4wQ/s320/prasoon_joshi.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5305827840597539074" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;एक-&lt;/strong&gt; &lt;em&gt;पारम्परिक लोक गीतों पर किसी को अनुचित श्रेय लेने की कोशिश नहीं करनी चाहिए. &lt;strong&gt;&lt;em&gt;गेंदा फूल &lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;गीत पारम्परिक है और इसका स्पष्ट उल्लेख सीडी कवर पर किया गया है.&lt;/em&gt; &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;दो-&lt;/strong&gt;&lt;em&gt;गीतकार के रूप में मुझे अपना नाम डालने में कोई गलत बात नहीं दिखती क्योंकि अखिल भारतीय स्तर पर बोधगम्य बनाने के लिए मूल गीत में कई फेरबदल करने पड़े.&lt;/em&gt; &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;तीन-&lt;/strong&gt; &lt;em&gt;गीत में रायपुर का जिक्र आया है, छत्तीसगढ़ को गीत से छिपाने की कोई मंशा नहीं रही है.&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;चार- &lt;/strong&gt;&lt;em&gt;संगीतकार के रूप में रजत ढोलकिया और ए आर रहमान ने इसमें मौलिक जादुई असर डाले हैं, ताकि देश के हर कोने के संगीत प्रेमियों को सहज ही भाए.&lt;/em&gt; &lt;br /&gt;प्रसून जोशी बताते हैं कि पहली बार उन्होंने रघुबीर यादव से यह गीत सुना. उन्हें यह गीत फिल्म दिल्ली-6 के लिए उपयुक्त लगा और उन्होंने इसे ले लिया. श्री जोशी का यह भी मानना है कि छत्तीसगढ़ हो, पंजाब या फिर कुमाऊं, जहां से वे खुद आते हैं, में लोकगीतों का ख़जाना भरा पड़ा है. व्यावसायिक सिनेमा इसकी मिठास को ही ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाकर इसे समृध्द करने का ही काम करते हैं.समय और जरूरत के अनुसार कुछ नई चमक लाते हुए पीढ़ी दर पीढ़ी इसे सहेजने काम चलना चाहिए.&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/SaIWstBoEKI/AAAAAAAAAdk/zrGu1FnoJvw/s1600-h/ar+rahman.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 275px; height: 320px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/SaIWstBoEKI/AAAAAAAAAdk/zrGu1FnoJvw/s320/ar+rahman.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5305828268252336290" /&gt;&lt;/a&gt; श्री जोशी से असहमति की कोई वजह नहीं दिखती. हम, &lt;em&gt;पिंजरे वाली मैना&lt;/em&gt; से लेकर &lt;em&gt;कजरारे-कजरारे&lt;/em&gt; तक कितने ही लोक गीतों पर थिरकते आ रहे हैं, क्या किसी ने कापीराइट का मामला बनाया? पंजाब, असम, राजस्थान, गुजरात, हिमालय की तराई के पारम्परिक गीतों का हर दूसरी फिल्म में प्रयोग होता देख रहे हैं. इन सबके बीच छत्तीसगढ़ कहां है? क्या छत्तीसगढ़ में लोक विविधताओं, विशेषताओं का अकाल है? हरगिज़ नहीं. गेंदा फूल जैसे सैकड़ों गीत हैं, जिन पर दुनिया भर के संगीत प्रेमी थिरक सकते हैं. आकाशवाणी रायपुर के पास बेशुमार गीत हैं. तपत गुरू भई तपत गुरू, मोर संग चलव रे, झिमिर-झिमिर बरसे पानी...ददरिया, करमा, सुआ, पंडवानी, बिहाव गीत, कितनी ही विधाओं के गीत. न तो आकाशवाणी उन्हें खुद नये प्रयोगों के साथ नई पीढ़ी के लिए सामने ला रहा है न ही किसी जिम्मेदार हाथों में सौंप रहा है. छत्तीसगढ़ के लोक गीतों पर छत्तीसगढ़ियों ने ही प्रयोग किए हैं और वे श्रव्य बन सके हैं. इसी गेंदा फूल गीत को अलग-अलग बोलों में तथा बदले हुए धुन में सालों से गाया जा रहा है. लोक गीतों में खूबी यही है कि उस माटी में पलने-बढ़ने वाला हर कोई उसमें नये अंतरे और आयाम जोड़ सकता है.पर अब शायद हम अपनी तिजोरी पर ताला लगाकर चाबी समन्दर में फेंक चुके हैं. छत्तीसगढ़ी गीतों से प्रेम करने वाले लोग आज उन गीतों को सुनने के लिए तरस रहे हैं. बाजार में टिक गए हैं वे लोग जिनके गीतों को सुनने में शर्म आती है. छत्तीसगढ़ के लोग इन गीतों को पसंद नहीं करते. ये सीडी बाजार से लोग कुछ नया पाने की उम्मीद में खरीदते हैं, पर निराशा हाथ लगती है. ऐसे सीडी दुकानों में भरे पड़े हैं, जिन्हें कोई खरीदार नहीं मिल रहा. इसीलिए जब छत्तीसगढ़ का &lt;strong&gt;&lt;em&gt;गोंदा फूल&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt; नये कलेवर में गेंदा फूल बनकर सामने आया है तो उसे हाथों हाथ उठाया जा रहा है. उम्मीद है, छत्तीसगढ़ लोक संगीत की खूबियों को अब ज्यादा लोग पहचानेंगे और गेंदा फूल की ही तरह अनेक प्रयोगों का सिलसिला शुरू होगा. संगीत के व्यवसाय से जुड़े स्थानीय लोग भी संभवतः इसे प्रेरणा के रूप में लें और कुछ सकारात्मक करें. प्रसून, रहमान, जय हो!&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4294876642043841838-3362341571302932645?l=sarokaar.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sarokaar.blogspot.com/feeds/3362341571302932645/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4294876642043841838&amp;postID=3362341571302932645' title='11 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4294876642043841838/posts/default/3362341571302932645'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4294876642043841838/posts/default/3362341571302932645'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sarokaar.blogspot.com/2009/02/blog-post_22.html' title='महकने दीजिए गेंदा फूल ही बनकर'/><author><name>राजेश अग्रवाल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03166713468895085704</uri><email>agrrajesh@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='08211776964587468572'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/SaIaAmvn9zI/AAAAAAAAAds/OGeFnAzyjRE/s72-c/Genda+Phool.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>11</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4294876642043841838.post-7097593277099169965</id><published>2009-02-19T14:55:00.000-08:00</published><updated>2009-02-20T04:24:42.235-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='खास खबर'/><title type='text'>नक्सलियों के नाम पर निर्दोषों का संहार</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/SZ3kVflppgI/AAAAAAAAAdE/4RFbJLH8NJ8/s1600-h/killer+cops.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 247px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/SZ3kVflppgI/AAAAAAAAAdE/4RFbJLH8NJ8/s320/killer+cops.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5304646994020115970" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;बीते 8 जनवरी को छत्तीसगढ़ के अख़बारों व इलेक्ट्रानिक मीडिया में बस्तर पुलिस की जबरदस्त कामयाबी की एक ख़बर पहुंची. वह ये कि राजधानी रायपुर से तकरीबन 450 किलोमीटर दूर बस्तर के दंतेवाड़ा जिले के सिंगावरम गांव में पुलिस मुठभेड़ में 17 नक्सली मारे गए हैं. इनमें 6 महिलाएं भी हैं. उस दिन क्षेत्रीय समाचार चैनल इसी ख़बर से पट गए, जाहिर है अगले दिन छत्तीसगढ़ के सभी अख़बारों में यह प्रमुखता से छपा. पुलिस ने बताया कि सर्चिग पर निकले एसपीओ व जिला पुलिस बल के जवानों पर नक्सलियों ने घात लगाकर हमला किया. पुलिस ने जवाबी कार्रवाई की, जिसमें ये नक्सली ढेर हो गए. पुलिस के अनुसार वह मारे गए नक्सलियों का शव उठाकर इसलिए नहीं ला पाई क्योंकि मुठभेड़ के बाद अंधेरा हो चुका था और वहां रात भर ठहरना खतरे से खाली नहीं था. सबको लगा कि बस्तर में नक्सलवाद के खात्मे का संकल्प लेने वाली भाजपा, जिसे बस्तर की 12 में से 11 विधानसभा सीटों पर हाल के चुनावों में जीत मिली है, ने दुबारा सत्ता में पहुंचने के बाद पुलिस का मनोबल ऊंचा उठाया है और प्रधानमंत्री के शब्दों में 'देश की सबसे बड़ी आंतरिक समस्या' के खात्मे के लिए दुगने जोश से काम कर रही है. उस बस्तर के लिए तो यह सफलता खासी अहमियत की है,  जहां कश्मीर व पूर्वोत्तर राज्यों से भी ज्यादा लोग उग्रवाद के कारण मारे जाते हैं. मगर अफसोस! यह सब सच नहीं था. धुंधलका जैसे ही छटा सिंगावरम मामले ने सरकार व पुलिस की कलई खोल दी और यह संवेदनहीनता और क्रूरता का एक बड़ा नमूना बनकर सामने आया.&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;आंध्रप्रदेश की सीमा से लगे इस दुर्गम व अभावग्रस्त गांव में दो दिन बाद जब वहां पत्रकारों का दल इस घटना की रिपोर्टिंग के लिए पहुंचा तो मुठभेड़ की हकीकत सामने आई. सिंगावरम के ज्यादातर ग्रामीण भय से गांव छोड़कर भाग चुके थे. कुछ रक्तरंजित मैदान में इधर उधर बिखरे शवों के सामने बिलख रहे थे. ग्रामीणों ने बताया कि पुलिस ने सिंगावरम व पास के 2 और गांवों के लोगों को सामान उठाने में मदद करने के लिए बुलाया. नक्सलियों के बारे में पूछताछ करने के बाद जवानों ने उन्हें एक कतार पर खड़ा किया और अंधाधुंध गोलियां बरसा दीं. लोग अपनी जान बचाकर भागे. लेकिन 17  उनके निशाने से नहीं बच सके. (कुछ ख़बरों में मृतकों की संख्या 19 बताई गई है) इसके बाद पुलिस ने इस जनसंहार को जायज ठहराने के लिए जरूरी इंतजाम किया.  कुछ ग्रामीणों को नक्सलियों की वर्दी पहनाई गई. घटनास्थल से 5 भरमार बंदूकों की बरामदगी दिखाई गई.  आंध्र के अख़बारों में रिपोर्टिंग के बाद बस्तर से भी पत्रकारों का दल पहुंचा, उन्हें भी नक्सली मुठभेड़ की परिस्थितियां नहीं दिखीं. राज्य के विपक्षी दल कांग्रेस के कान भी खड़े हुए. बस्तर के एकमात्र कांग्रेस विधायक कवासी लखमा ने घटनास्थल का दौरा किया. पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने श्री लखमा, मीडिया और अपने कुछ प्रतिनिधियों से रिपोर्ट मंगाने के बाद इस मुठभेड़ को लेकर सवाल उठाए. उन्होंने इसे जनसंहार बताया और मामले की जांच सीबीआई से या विधायकों की समिति से कराने की मांग की. श्री लखमा ने तो यहां तक कहा कि मारे गए लोगों में उनके रिश्तेदार भी शामिल हैं, जिनका नक्सली गतिविधियों से दूर-दूर तक कोई सरोकार नहीं है. बस्तर के पूर्व विधायक आदिवासी महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष मनीष कुंजाम व आदिवासी चेतना आश्रम दंतेवाड़ा के प्रतिनिधि घटनास्थल गए. लौटने के बाद कुंजाम ने कहा कि क्या 5 भरमार बंदूकों से 17 नक्सली फोर्स से मुकाबला करने के लिए आएंगे, मारे गए लोगों को ऊपर से नक्सलियों के कपड़े पहनाए गये हैं, कई नाबालिग हैं.&lt;br /&gt;विधानसभा सत्र शुरू होने के बाद 3 फरवरी को पहले सिंगावरम का मामला ही उठा. विपक्ष ने  हंगामा किया और आसंदी तक जा पहुंचे. 32 विधायक सदन से निलम्बित कर दिए गए. लेकिन सरकार सीबीआई या विधायकों से मामले की जांच के लिए राजी नहीं हुई. दंतेवाड़ा जिलाधीश ने एक एसडीएम को जांच अधिकारी बनाया . वे क्या जांच करेंगे और क्या रिपोर्ट देंगे, लगभग तय है. प्रतिपक्ष के नेता रविन्द्र चौबे कहते हैं कि यह अजीब मामला है कि 17 नक्सलियों को मारने वाले जिन अधिकारियों व जवानों को पुरस्कृत किया जाना चाहिए उनका नाम भी उजागर करने से सरकार डर रही है और जब यह सरकार की उपलब्धि ही है तो किसी भी स्तर की जांच से घबराने की क्या जरूरत? इस कथित मुठभेड़ में 3 एसपीओ घायल हुए, ऐसा पुलिस का कहना है पर वे सामने नहीं लाए गए.&lt;br /&gt;इसी दिन बस्तर में आदिवासियों के बीच सक्रिय कुछ संगठनों की मदद से मृतकों के परिजन 500 किलोमीटर दूर हाईकोर्ट बिलासपुर पहुंच गए. उन्होंने याचिका लगाई जिसमें यह भी बताया गया कि हत्या करने के पहले महिलाओं से दुष्कर्म भी किया गया. परिजनों के लिए 25-25 लाख रूपए मुआवजे तथा घटना में शामिल पुलिस कर्मियों के ख़िलाफ मुकदमा दर्ज करने की मांग की गई. हाईकोर्ट में इस मामले की सुनवाई चल रही है. हाईकोर्ट के निर्देश पर आदिवासियों के दफनाए गए 8 शवों को निकालकर पोस्टमार्टम किया गया. इसकी रिपोर्ट न्यायालय में सौंपी जाएगी. हाईकोर्ट ने राज्य के गृह सचिव, दंतेवाड़ा पुलिस अधीक्षक तथा घटना में शामिल 16 विशेष पुलिस अधिकारियों (एसपीओ) को जवाब देने के लिए कहा है. सरकार की तरफ से कोई जवाब नहीं आया है. अब 25 फरवरी को इस मामले में सरकार को विस्तार से हलफनामा देने का निर्देश दिया गया है. 17 फरवरी को विधानसभा में एक बार फिर यह मामला उठा. उस समय विपक्ष ने फिर सवाल उठाया. सिंगावरम में मारे गए कथित नक्सलियों के नाम-पते तो सरकार की तरफ से बता दिए गये लेकिन यह नहीं बताया गया कि उनके ख़िलाफ क्या मामले दर्ज थे. जब विपक्ष ने पूछा कि पुलिस कैसे तय करती है कि कोई नक्सली है या नहीं. तब संसदीय सचिव विजय बघेल ने कहा कि जो भी व्यक्ति बस्तर में हथियार लेकर पुलिस की तरफ आएगा, वे उसे नक्सली मानते हैं. &lt;br /&gt; नक्सलियों ने अब तक दर्जनों बार विस्फोट और कई सामूहिक हत्याएं की हैं. नक्सलियों की वजह से बस्तर के आदिवासी सड़क,पानी, बिजली जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं. हर साल दर्जनों जवान नक्सली हमलों में मारे जा रहे हैं. उन्होंने 1 लाख 35 हजार वर्ग किलोमीटर में फैले बस्तर के आम-आदमी का जनजीवन खतरे में डाल रखा है. विषम परिस्थितियों में नक्सलियों से जूझ रहे जवानों के साहस का भी कोई जवाब नहीं. नक्सलियों को बस्तर के आदिवासियों की बेहतरी से सरोकार नहीं. वे हर कीमत पर इस इलाके में अपना साम्राज्य बनाए रखना चाहते हैं. जब रमन सरकार कहती है कि वे इस कार्यकाल में बस्तर से नक्सलियों का सफाया करके रहेंगे, तब पुलिस नक्सलियों की क्रूरता का जवाब यदि उन्हीं की भाषा में देना चाहती हो तो अचरज क्यों हो. लेकिन सिंगावरम जनसंहार से लगता है कि सरकार के लक्ष्य को पूरा करने के लिए पुलिस अधिकारी नक्सली मौंतों का आंकड़ा बढ़ाने में लगे हैं और फर्जी मुठभेड़ों में बेकसूर ग्रामीणों को निशाना बनाया जा रहा है. शायद सरकार यह भी समझती है कि ग्रामीणों को मारने से नक्सलियों में प्रतिक्रिया होगी और वे दहशत में आएंगे. सच कहा जाए तो सिंगावरम घटना सवाल यह करता है कि प्रचुर संसाधनों से भरे और दुनिया भर के उद्यमियों की निगाह में गड़े बस्तर से सरकार नक्सलियों का सफाया करना चाहती है या आदिवासियों का?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4294876642043841838-7097593277099169965?l=sarokaar.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sarokaar.blogspot.com/feeds/7097593277099169965/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4294876642043841838&amp;postID=7097593277099169965' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4294876642043841838/posts/default/7097593277099169965'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4294876642043841838/posts/default/7097593277099169965'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sarokaar.blogspot.com/2009/02/blog-post.html' title='नक्सलियों के नाम पर निर्दोषों का संहार'/><author><name>राजेश अग्रवाल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03166713468895085704</uri><email>agrrajesh@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='08211776964587468572'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/SZ3kVflppgI/AAAAAAAAAdE/4RFbJLH8NJ8/s72-c/killer+cops.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4294876642043841838.post-6138734756390231054</id><published>2008-10-29T11:23:00.000-07:00</published><updated>2008-10-29T11:27:10.631-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रश्न'/><title type='text'>तटस्थ रहने का अपराध न करे कांग्रेस</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/SQiq4kaQAKI/AAAAAAAAAUI/rib_tpYLiw8/s1600-h/salwa.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 251px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/SQiq4kaQAKI/AAAAAAAAAUI/rib_tpYLiw8/s320/salwa.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5262644053405597858" /&gt;&lt;/a&gt;घोषणा पत्र सामने आने से पहले ही कांग्रेस ने यह साफ किया है कि सलवा जुड़ूम पर उनकी पार्टी ख़ामोश रहेगी. दो बडे़ नेता महेन्द्र कर्मा और अजीत जोगी इस आंदोलन पर अलग-अलग राय रखते हैं. जोगी मानते हैं कि सलवा जुड़ूम के पीछे भावना तो सही है पर निहत्थे अथवा केवल तीर-कमान लेकर चलने वाले आदिवासियों को घातक बम और एके-47 रखने वालों से मुक़ाबले के लिये आगे नहीं किया जा सकता. दूसरी तरफ श्री कर्मा कहते हैं कि इस आंदोलन को वे इतनी दूर तक साथ दे चुके हैं कि उनका पीछे हटना मुमकिन नहीं है.&lt;br /&gt;दोनों नेताओं की एक बैठक राजधानी में हुई थी, उनमें एक राय नहीं बन सकी. राज्य की कांग्रेस इकाई ने भी मान लिया कि सलवा जुड़ूम पर पार्टी की कोई सर्वसम्मत राय नहीं है. लेकिन प्रमुख विपक्षी दल होने के नाते क्या कांग्रेस की चुप्पी ठीक है? सलवा जुड़ूम और नक्सल समस्या एक दूसरे से गुंथे हुए हैं. भाजपा के प्रमुख राजनैतिक दल व सत्ता में होने की वजह से तथा कांग्रेस के प्रभावशाली नेता महेन्द्र कर्मा के आदिवासियों के एक बड़े वर्ग में असर होने के नाते सलवा जुड़ूम से पड़े नकारात्मक-सकारात्मक प्रभावों का कोई राय जाहिर तो करनी ही होगी. नक्सली हिंसा में मौतें बीते 4 सालों के भीतर 4 गुना बढ़ी. सुरक्षा बलों व स्थानीय आदिवासियों पर हमलों का तेज हुए हैं. खनिज व रेल संसाधनों को क्षति पहुंचाना, 50-60 हजार लोगों का अपने गांवों से बेदख़ल हो जाना और शिविरों में रहना, विशेष जन सुरक्षा अधिनियम के तहत गिरफ्तारियां होना, सैकड़ों आदिवासी परिवारों का आंध्रप्रदेश व दूसरे राज्यों की सीमाओं में शरण लेना, हजारों बच्चों का वहां शिक्षा से वंचित होना, कुपोषण से पीड़ित होना, सुरक्षा बलों व नक्सलियों के ख़िलाफ खड़े लोगों पर अत्याचार के आरोप लगना, उद्योगों के लिये भूमि देने का विरोध और समर्थन, बेदखली के लिये उत्पीड़न जैसे दर्जनों प्रश्न हैं. क्या इनके नेपथ्य में सलवा जुड़ूम क्या कहीं भी नहीं है? आखिरकार, नक्सल समस्या ने पूरे छत्तीसगढ़ पर असर डाला है. वे साधारण मतदाता भी, जो कभी बस्तर नहीं गये इसे लेकर चिंतित हैं और जल्द से जल्द बस्तर, सरगुजा के इलाकों को हिंसा से मुक्त देखना चाहते हैं, भोले-भाले आदिवासियों के लिये अपनी परम्परा, प्रकृति तथा मिट्टी के बीच सहज जीवन-यापन चाहते हैं. ऐसे महत्व के विषय पर कांग्रेस या कोई राजनैतिक दल मौन रहकर मतदाताओं के बीच कैसे जा सकती है? क्या कांग्रेस अपने घोषणा पत्र में नक्सल समस्या पर भी कुछ नहीं बोलेगी? या फिर केवल भाजपा की निंदा करेगी. पर इससे तो कोई बात नहीं बनेगी. आखिर यह तो राज्य की प्रतिष्ठा और छबि का भी प्रश्न बनता है.&lt;br /&gt; सभी दल और नक्सल समस्या से चिंतित लोग मान चुके हैं कि यह मसला केवल कानून का नहीं है बल्कि सामाजिक-आर्थिक भी है. प्रायः सभी राजनैतिक दल मानते हैं कि नक्सल किसी एक राज्य की नहीं बल्कि देश की समस्या है. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इसे देश की सबसे बड़ी आंतरिक चुनौती बता चुके हैं. देश-विदेश के अनेक मानवाधिकार संगठन सलवा जुड़ुम की बंद करने की मांग कर चुके हैं, जन सुरक्षा कानून के तहत गिरफ्तारियों की निंदा कर चुके हैं और उनकी रिहाई के लिये आंदोलन भी कर रहे हैं.  यदि उनकी बात ठीक हैं तो कांग्रेस साफ कहे,, नहीं है तो कहे. &lt;br /&gt;दो जिम्मेदार नेताओं में घोर असहमति के कारण  राज्य के सबसे जलते सवाल को किनारे कर देने से काम कैसे चलेगा. उन लाखों मतदाताओं का क्या होगा, जो केवल इसी बात पर कांग्रेस को वोट देने या नहीं देने का फैसला करने वाले हैं. राज्य की पार्टी इकाई यदि दोनों नेताओं के बीच सुलह नहीं करा सकती तो केन्द्रीय नेता सोचें और पहल करें. कांग्रेस एक राजनैतिक दल है. दल की एक विचारधारा होती है. कांग्रेस को विचार तो व्यक्त करना ही होगा. क्या सलवा जुड़ूम खत्म कर दिया जाये? या उसके स्वरूप में बदलाव किया जाये या उसका पूरी तरह समर्थन किया जाये, किसी एक लाइन पर तो उसे चलना ही होगा. यह लाइन नक्सल पीड़ितों की आवाज़ पहचानने पर टिकी हुई है, क्या सौ साल पुरानी कांग्रेस जिसने हमेशा आदिवासियों के बीच काम करने का दावा किया है, उनका मन टटोलने में असफल है या उससे मुंह मोड़ना चाहती है. क्या उनका सारा तर्क-वितर्क केवल दो नेताओं के विचार तक सीमित है. किसी के रूठ जाने के डर से, उनके समर्थकों के वोटों का नुकसान उठाने के डर से एक प्रमुख राष्ट्रीय राजनैतिक दल को तटस्थ रहने का अपराध नहीं करना चाहिये.  भूख-भय, शोषण, हिंसा के ख़िलाफ बस्तर में लड़ाई अभी जारी है. नक्सल और इससे जुड़े तमाम सवालों पर राजनैतिक दलों की भी भूमिका इतिहास के पन्नों में चुपचाप दर्ज़ होते जा रहे हैं. इसलिये सबको अपनी राय स्पष्ट करनी होगी. आखिर सजग मतदाता भी किसी पार्टी के विचारों को ही ध्यान में रखकर ही अपना मत बनाता है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4294876642043841838-6138734756390231054?l=sarokaar.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sarokaar.blogspot.com/feeds/6138734756390231054/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4294876642043841838&amp;postID=6138734756390231054' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4294876642043841838/posts/default/6138734756390231054'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4294876642043841838/posts/default/6138734756390231054'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sarokaar.blogspot.com/2008/10/blog-post.html' title='तटस्थ रहने का अपराध न करे कांग्रेस'/><author><name>राजेश अग्रवाल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03166713468895085704</uri><email>agrrajesh@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='08211776964587468572'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/SQiq4kaQAKI/AAAAAAAAAUI/rib_tpYLiw8/s72-c/salwa.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4294876642043841838.post-4427705564159370591</id><published>2008-09-05T04:06:00.000-07:00</published><updated>2008-09-05T20:32:39.208-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लोक राग'/><title type='text'>चल रे मन वृंदावन की ओर</title><content type='html'>&lt;strong&gt;-राजेश अग्रवाल &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/SMEYF8fe2nI/AAAAAAAAAS0/gFxlj9D2FSA/s1600-h/RatanpurGammat2.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://1.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/SMEYF8fe2nI/AAAAAAAAAS0/gFxlj9D2FSA/s400/RatanpurGammat2.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5242497931652553330" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;लोक में रचा-बसा गणेशोत्सव पर होने वाला एक अलौकिक गम्मत &lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह गम्मत वह नहीं है जिसमें नचकहर और जोक्कर पब्लिक को हंसा-हंसा कर लोटपोट कर देते हैं. न ही यह नाचा में दिखाई देने वाला टुकड़े-टुकड़े में गूंथने के बाद भी बिखरे-उलझे छत्तीसगढ़ी और हिन्दीफिल्मी गीतों का ताना-बाना है. यह तो हर साल गणेश पूजा पर होने वाला अलौकिक गम्मत है, जिसका हर पात्र संगीत व नृत्य के माध्यम से ईश्वर तक पहुंचने का प्रयास करता है. क्योंकि इसमें है श्रीमद्भगवतगीता के दशम अध्याय का वर्णन. हैरत की बात यह भी है कि इस गम्मत में छत्तीसगढ़ी का भी कहीं समावेश नहीं,फिर भी रतनपुर की लोक-संस्कृति में अगर कुछ रचा-बसा है तो वह केवल यह गम्मत है. &lt;br /&gt;महामाया शक्तिपीठ रतनपुर की पवित्र धार्मिक विरासत है. कलचुरी, मराठा शासकों के इतिहास के बिम्ब भग्न किले छत्तीसगढ़ की इस प्राचीन राजधानी  ऐतिहासिक राजसी वैभव के प्रतीक हैं और 350 साल पुराना बाबू रेवाराम श्रीवास्तव का गम्मत हमें रतनपुर के सांस्कृतिक-साहित्यिक गौरव से पहचान कराता है. रतनपुरिहा गम्मत भक्तिकालीन कवियों की चुनी हुई रचनाओं का अद्भुत संग्रह है. सूरदास, कबीर, मीराबाई, रसखान जैसे अमर रचनाकारों के छंद तो इसमें लिये ही गये हैं. चंद्रसखी जैसे अनेक भक्तिकालीन कवि जिनके दस्तावेज और कहीं अब शायद ही कहीं मिल सकें, वे बाबू रेवाराम के गुटके में मिलता है. कृष्ण के जीवन के विभिन्न प्रसंगों को बाबू रेवाराम ने इन कृतियों से बीनकर कुछ इस तरह पिरोया है कि पूरी कृष्ण लीला ने एक मौलिक व सम्पूर्ण आकार ले लिया है. रचनाओं का चयन करते समय बाबू रेवाराम ने इस बात का ध्यान रखा कि किस कवि की रचना का कौन सा भाग आम लोगों को कृष्ण की लीला को सरलता से समझा देता है. अनूठी बात यह है कि जब कथानक के किसी हिस्से को आगे बढ़ाने के लिये उन्हें कोई रचना ठीक नहीं लगी तो उन्होंने वहां खुद दोहे लिखकर जोड़ दिये.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;बाबू रेवाराम की कृतियां नष्ट &lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;बाबू रेवाराम छत्तीसगढ़ के उन रचनाकारों में हैं, जिनकी विद्वता से हजारी प्रसाद द्विवेदी भी प्रभावित थे, लेकिन उनकी रचनाओं को सहेजा नहीं जा सका. बिलासपुर जिले के अधिकांश देवी मंदिरों में गाये जाने वाले जसगीतों के रचनाकार बाबू रेवाराम ही हैं.  कुछ इतिहास के जानकार तो यह आरोप लगाते हैं कि उनकी जाति उनकी कृतियों को प्रकाश में लाने में आड़े आई. यह तब की बात है जब विद्वता और पांडित्य में केवल ब्राम्हणों का वर्चस्व था. यह बात पता नहीं कितना सच है लेकिन रतनपुर के लोगों से बातचीत करने में दो बातें गौर करने लायक सुनने को मिलती है. एक तो यह&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/SMEXemtaXAI/AAAAAAAAASs/1tg3JM3vbls/s1600-h/RatanpurGammat3.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://4.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/SMEXemtaXAI/AAAAAAAAASs/1tg3JM3vbls/s400/RatanpurGammat3.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5242497255790500866" /&gt;&lt;/a&gt; कि उनकी रचनाओं को महामाया मंदिर में ही सहेज कर रखा गया था. लेकिन अब से सौ-सवा सौ साल पहले किसी विध्नसंतोषी ने उन पांडुलिपियों को फाड़-फाड़ कर प्रसाद बांट दिया और बहुमूल्य कृतियां नष्ट हो गईं. रतनपुर को लहुरी-काशी भी कहा जाता था, क्योंकि काशी से संत-विद्वान जगन्नाथ पुरी की यात्रा के लिये निकलते थे तब यहां विश्राम करते थे. दूसरी बात कही जाती है कि बाबू रेवाराम भी विद्वान थे लेकिन उन्हें इन संतों विद्वानों से शास्त्रार्थ करने के लिये उनके बराबर नहीं बैठ सकते थे. एक बटुक के माध्यम से वे वाद-विवाद करते थे. बाबू रेवाराम के जिस गुटके के आधार पर रतनपुरिहा गम्मत का मंचन होता है, उसका भी अधिकारिक प्रकाशन अब तक नहीं हो सका है. स्थानीय स्तर पर रेवाराम साहित्य समिति ने उनके गुटके का प्रकाशन कराया है, जो अधूरा ही है. &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;इस बार भी गम्मत एकादशी से &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;गणेश चतुर्थी के बाद आने वाली भादो एकादशी से यह गम्मत शुरू होकर पांच दिन चलता है. इसलिये इसे भादो गम्मत भी कहा जाता है. पहले दिन गुटका की पूजा व मंगल आरती होती है. दूसरे दिन कृष्ण जन्म और पूतना वध, तीसरे दिन से रास लीला के विभिन्न प्रसंगों का गायन-वादन होता है. तब यह गम्मत से कहीं ज्यादा रहस के करीब लगता है. रात 9-10 बजे से तीसरे पहर तक चलने वाले इस गम्मत के आखिरी दिन सुबह हो जाती है. इस दिन भगवान अतर्धान होते हैं. सखियों के विलाप के प्रसंग में जैसे दर्शक अपने आपको खुद भी शामिल कर लेता है. पर अंत सुखद होता है, क्योंकि उधो सखियों को शरीर की नश्वरता और आत्मा से परमात्मा तक पहुंचने का संदेश कृष्ण की ओर से सुनाते हैं. &lt;br /&gt; आयोजन में खर्च यूं तो ज्यादा नहीं होता लेकिन सबकी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिये गम्मत दल घरों घर निमंत्रण देने जाता है और उनसे चंदा भी लिया जाता है. रतनपुरिहा गम्मत की प्रस्तुति के साथ कोई व्याख्या नहीं की जाती. इसमें संवादों की जगह ही नहीं है. चूंकि अलग-अलग कवियों के दोहों का छंद विन्यास भिन्न-भिन्न है अतएव इनकी संगीत संरचना भी विविधता से भरपूर है. कहीं तीव्र कहीं मध्यम, कहीं पर सुगम तो कहीं शास्त्रीय. श्रोता इसका भरपूर आनंद लेते हैं. कुछ तो इतने कठिन रागों में निबध्द है कि गायकों की टोली कई-कई साल तक ठीक तरह से गाने का प्रयास करते देखे जा सकते हैं और कुछ इतने सरल कि यदि कोई अपनी गायकी को आजमाना चाहे तो वह दर्शक दीर्घा से उठकर मंच पर भी बैठ जाता है. पांच दिनों की पूरी प्रस्तुति बाबू रेवाराम के उपलब्ध गुटके से ही  होती है. इस गम्मत में भी परियां होती है, जोकर होते हैं. चूंकि भक्ति का कार्य है तो आजकल तो गांव की बेटियां भी निःसंकोच गोपियां व राधा बनकर मंच पर आने लग गई हैं.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;रतनपुर की रगों में दौड़ता है गुटका &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;रतनपुरिहा गम्मत की नई पीढ़ी बहुत धीमे गति से तैयार हो रही है. हाल के दिनों में कोई नई टोली नहीं बनी है. यह आसान भी नहीं है. इतना वक्त नई पीढ़ी के पास नहीं कि वे कई-कई दिन रियाज कर गम्मत गायन में पारंगत हो सके. फिर भी इस समय रतनपुर के करैया पारा, बाजार पारा, भेड़ी मुड़ा और महामाया पारा में रतनपुरिहा गम्मत की सशक्त टोलियां हैं. पहले रानीगांव, मटियारी और आसपास के कई गांवों में युवकों के दल थे. एक टोली में गायक और साजिंदों को मिलाकर 20 से 25 लोग होते हैं. लेकिन नये गायकों के अभाव में कई बार इससे कम लोगों में भी काम चलाया जाता है. यह गम्मत जीविकोपार्जन का जरिया नहीं है, लोग इसे आपस में सुनते-दिखाते हैं.  85 साल के भंगीलाल तिवारी अब ऊंचे स्वर में आलाप नहीं ले पाते लेकिन उनके बगैर महामाया पारा का गम्मत अधूरा लगता है. इनके अलावा बल्देव प्रसाद शर्मा, किशन तम्बोली, राजेन्द्र गिरी गोस्वामी, नरेन्द्र शर्मा, लक्ष्मी तम्बोली, शिवकुमार तम्बोली और नई पीढ़ी के गायकों में सोमेश्वर गोस्वामी भादो गम्मत के समर्पित कलाकारों में शामिल हैं. &lt;br /&gt;रतनपुर की इस विशिष्ट पहचान को रतनपुर से बाहर तक ले जाने की कोशिश भी की गई है. अब से 4 साल पहले रेवाराम साहित्य समिति और काव्य भारती बिलासपुर के प्रयास से आसपास के गांवों से करीब 100 युवकों को रतनपुरिहा गम्मत की कार्यशाला में प्रशिक्षण दिया गया था. इसके बाद रतनपुर के नजदीकी गांवों, बिलासपुर तथा रायपुर में इसका मंचन भी हुआ, लेकिन अब इन युवकों की टीम बिखर चुकी है. दरअसल रतनपुरिहा गम्मत मौलिक रूप से आजीविका से जुड़ा मंचन रहा ही नहीं. लेकिन अब यदि इसका विस्तार करना है और नई पीढ़ी को इससे जोड़ना है तो इसे पारिश्रामिक के साथ भी जोड़ना होगा.  संस्कृति विभाग को भी सोचना होगा कि इस कीमती विधा को नष्ट न होने दे. &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;धार्मिक नहीं सामाजिक उत्सव &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;रतनपुर का गम्मत धार्मिक न होकर एक सामाजिक मेलमिलाप का उत्सव है.  किसी रतनपुरिहा में किस हद तक इसका जुनून सवार है यह समझाने के लिये आज से 50 साल पुरानी एक घटना रतनपुर के गम्मतिहा बताने से नहीं चूकते. रतनपुर गम्मत के एक तबला वादक थे, छोटे खान. जब वे मृत्युशैय्या पर चले गये तो उन्होंने अपने गम्मतिहा साथियों से मिलने की इच्छा जाहिर की. जब वे पास पहुंचे तो छोटे खान ने कहा- जाओ तुम लोग सब साज भी लेकर आओ, मुझे गम्मत के दोहे सुनाओ.एक दो साथी भागते हुए गये और तबला हारमोनियम के साथ शुरू हो गये.अद्भुत दृश्य था. ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे भगवान और खुदा दोनों ही एक सह्रदय जीव को अपने साथ ले जाने के लिये आतुर हैं. जब छोटे खान अंतिम सांसे ले रहे थे तो एक तरफ कुरान का पाठ हो रहा था, दूसरी ओर से आलाप लेकर उनकी मित्र मंडली गा रही थी-चल रे मन वृंदावन की ओर.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4294876642043841838-4427705564159370591?l=sarokaar.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sarokaar.blogspot.com/feeds/4427705564159370591/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4294876642043841838&amp;postID=4427705564159370591' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4294876642043841838/posts/default/4427705564159370591'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4294876642043841838/posts/default/4427705564159370591'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sarokaar.blogspot.com/2008/09/blog-post.html' title='चल रे मन वृंदावन की ओर'/><author><name>राजेश अग्रवाल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03166713468895085704</uri><email>agrrajesh@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='08211776964587468572'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/SMEYF8fe2nI/AAAAAAAAAS0/gFxlj9D2FSA/s72-c/RatanpurGammat2.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4294876642043841838.post-6892606452743803791</id><published>2008-08-04T09:52:00.000-07:00</published><updated>2008-08-04T09:56:04.699-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रश्न'/><title type='text'>जशपुर का अपजश</title><content type='html'>&lt;em&gt;&lt;strong&gt;जशपुर की सैकड़ों बेटियां न जाने किस नर्क में होंगी. एक बार बहकावे में निर्जन के अपने झोपड़े से संसार सागर में उतरी तो देह की किस मंडी में चली गयीं कुछ पता नहीं.&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://bp1.blogger.com/_kAbQECGcYOM/SJc0UHcEXBI/AAAAAAAAASk/fCkJGKbq784/s1600-h/jashpur_788050541.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp1.blogger.com/_kAbQECGcYOM/SJc0UHcEXBI/AAAAAAAAASk/fCkJGKbq784/s400/jashpur_788050541.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5230707012412922898" /&gt;&lt;/a&gt;जशपुर जिले का लुड़ेग बीते कुछ दशकों में टमाटर की खूब फसल के कारण प्रसिध्द था. मिट्टी और मौसम अनुकूल होने के कारण यहां के आदिवासियों ने इसे खूब उगाया. कई बार तो ऐसी नौबत आई कि टमाटर खेतों में ही सड़ने के लिए छोड़ दिया जाता था, क्योंकि बाजार तक लेकर जाने में परिवहन का खर्च भी निकल नहीं पाता था. यहां कई बार मांग हुई कि टमाटर पर आधारित उद्योग लगा दिये जाएं जिससे आदिवासी किसानों का जीवन स्तर ऊपर उठ जाएगा. लेकिन इस पिछड़े इलाके के लिए कुछ नहीं सोचा गया.&lt;br /&gt;पिछले कुछ वर्षों से जशपुर और सरगुजा जिले में एक नई तरह की फसल तैयार हो रही है. उसे बाजार भी खूब मिल रहा है. ये फसल हैं इस इलाके के निर्धन आदिवासी उरांव परिवारों की नाबालिग लड़कियां और बाजार बने हुए हैं दिल्ली गोवा जैसे देश के महानगर. इस फसल को खाद-बीज दे रहे हैं उनके अपने निकट सम्बन्धी और बिचौलिये का काम कर रही हैं, दिल्ली में काम कर रही 200 से ज्यादा प्लेसमेन्ट एजेंसियां. लड़कियां टमाटर तो होती नहीं. उनकी धमनियों में रक्त का संचार होता है. मन है, जो पंख लगाकर आकाश में उड़ना चाहता हैं. ह्रदय है जिसमें सुख-दुख मान,अपमान, स्वाभिवान कष्ट और प्रसन्नता महसूस कर सकती हैं. पर सरगुजा और जशपुर इलाके के गांवों में 3 दिन भटकने के बाद महसूस हुआ कि इन सब भावनाओं को व्यक्त करने का अधिकार केवल उनको है, जिनके पेट भरे हों. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इनकी आंखों में आंसू भी आते हैं तो रोककर रखना होगा, बाप को बेटी से बिछुड़ने और बेटी को घर की याद आने पर भी दोनों विवश हैं. पुलिस व प्रशासन की मदद नहीं मिलने की आशंका से अभिभावकों के पैरों में बेड़ियां लग गई हैं और बेटियां तो पता नहीं कहां नजरबंद हैं या घुटन भरी कोठियों में बीमार पड़ गई या मार डाली गई. कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए ऐसी लड़कियों की संख्या सैकड़ों में है, जो एक बार निर्जन जंगल में बनी अपनी झोपड़ी से महानगरों की भूल-भुलैया में अपना भविष्य संवारने का सपना लिए निकल पड़ी और फिर उनका कुछ पता नहीं चला. सीतापुर ब्लाक के बेलगांव की ललिता एक्का पिछले सात साल से दिल्ली के एक मीडिया हाऊस में झाड़ू पोछे का काम कर रही है. 6ठवीं तक पढ़ी 19 साल की ललिता से जब हम मिले तो वह संकोच झिझक उसकी आंखों व हाव-भाव व पहनावे में नहीं थे, जो अक्सर इस गांव की लड़कियों में दिखाई देती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जशपुर जिले के दुलदुला थाना के अंतर्गत आने वाले चटकपुर गांव की शशिकांता किण्डो को जुलाई 2006 में गांव की ही अनिता और विमला अच्छी नौकरी दिलाने का आश्वासन देकर ले गये थे. वहां पहुंचने के बाद चिराग, दिल्ली के एक प्लेसमेंट एजेंट राजू अगाथा ने हिमांशु बख्शी के यहां नौकरी दिलाई. वहां मालकिन नमिता ने कुछ दिनों तक तो ठीक रखा पर बाद में उसे घर से निकलने भी नहीं दिया जाता था. जब भी शशिकांता गांव वापस लौटने की जिद करती थी, उसे जल्द ही छोड़ देने का भरोसा दिलाया जाता था. इधर गांव में शशि की मां प्रमिला और पिता विन्सेन्ट लकड़ा परेशान हो रहे थे. जब भी वे अपनी बेटी से फोन पर बात करने की कोशिश करते थे, मकान मालकिन उन्हें बात कराने से कोई न कोई बहाना बना देती थी. परेशान होकर उन्होंने दुलदुला थाने में शिकायत कर दी. मालकिन ने तब शशिकांता को धमकाया और उसकी शादी जबरदस्ती उसी अपार्टमेन्ट में वाचमैन का काम करने वाले रविन्द्र कुमार यादव से करा दी. रविन्द्र उसे अपने कमरे में लेकर रहने लगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इधर मालकिन से जब शशिकांता से बात कराने कहा जाता था तो उन्होंने कह दिया कि लड़की शादी कर चुकी है और अब उसके पास नहीं है. बहदवास मां अपनी भाई की पत्नी थेलमा के साथ दिल्ली पहुंची. थेलमा 10 साल से दिल्ली में ही रहती थी. रविन्द्र से शशिकांता के बारे में बात की जाती थी तो वह धमकियां देता था, झूठ बोलता था. बाद में उसने यह भी सफाई दी कि वह शशिकांता से शादी करना नहीं चाहता था, उसकी शादी तो पहले ही हो चुकी है और उत्तरप्रदेश के गांव में बीवी बच्चे रहते हैं. यह सब तो शशि की मालकिन के दबाव में उसे करना पड़ा. शशि अपनी जान बचाकर गांव लौट गई है. उनके मां-बाप कहते हैं कि अब किसी सूरत में इसे दिल्ली या और कहीं नहीं भेजेंगे. इकलौती बेटी की शादी यहीं किसी अच्छे लड़के से कर देंगे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हैरत की बात है कि कई बार छोटी उम्र की लड़कियां मां-बाप या भाईयों से नाराज होकर भी घर छोड़कर भागती हैं तो बहुत दूर निकल जाती हैं और कई साल तक घरों की ओर दुबारा नहीं झांकती. पर जब लगातार प्रता़ड़ित हो जाती हैं और कैद होकर रह जाती हैं तो हर तरह का जोखिम उठाकर गांव वापस भाग आती हैं. लुड़ेग के पास घुरूआम्बा की रमिला टोप्पो के साथ ऐसा ही हुआ. गांव वालों ने बताया कि इस लड़की को गुजरात में किसी घर में नजरबंद कर लिया गया था. उसे घर से निकलने नहीं दिया जाता था और उसके हाथ में कोई पैसा नहीं दिया जाता था. किसी तरह एक सहेली से उसने टिकट के पैसे का प्रबंध किया और जिस कपड़े को पहने हुए थी, उसी में भाग निकली. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दो दिन बाद कुनकुरी पहुंची और 11 किलोमीटर पैदल चलकर रात के 9 बजे घर पहुंची. 6 साल बाद अपनी बेटी को घर पर बहदवास, बीमार हालत में देखकर अनपढ़ मां-बाप की आंखों में आंसू आ गए. वे अपनी बेटी के वापस मिलने की उम्मीद ही खो चुके थे. दूसरी तरफ रमिला जो कहानी बताती है उसके अनुसार वह अपने भाई ने मारपीट की तो नाराज होकर वह भाग गई. गांव से वह सीधे रायगढ़ में मदर टेरेसा अनाथ आश्रम में चली गई और वहां से इंदौर के एक अनाथाश्रम में भेज दिया गया. फिर वहां से सूरत के एक मिशनरी संचालित अनाथाश्रम में रख दिया गया. लगातार वहीं रह रही थी. रमिला की मानें तो इन अनाथाश्रमों में उसे कोई तकलीफ नहीं थी. खाने और कपड़े दिये जाते थे और पढ़ाई कराई जा रही थी. वह अपनी कहानी बताते वक्त कई बार ठिठकती रही तथा बीच-बीच में अपनी ही कई बातों को झुठला रही थी. जब वहां कोई तकलीफ नहीं थी तो भागकर क्यों आना पड़ा, पूछने पर वह कहने लगी कि घर की याद आ रही थी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतने सालों तक सम्पर्क क्यों नहीं किया? वह कहती है कि चूंकि उसने सभी जगहों पर खुद को अनाथ बताया था इसलिये किसी से कहते नहीं बना कि वह घर के लोगों को चिट्ठी लिखना चाहती है या उनसे फोन पर बात करना चाहती है. रमिला जब घर से अकेले निकली तो उसकी उम्र 9 साल के करीब थी. 6 साल बाद लौटने के बाद वह जसपुरिया बोली लगभग भूल गई है और अंग्रेजी मिश्रित हिन्दी में बात कर रही है. वह कम्प्यूटर सीखने और पढ़ाई करने की इच्छा रखती है, इसके लिये रायगढ़ या रांची के किसी बड़े स्कूल में दाखिला लेना चाहती है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;जो लौट के घर न आए&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब उनके गरीब मां-बाप इतने साल बाद मिले अपनी बच्ची को बाहर नहीं भेजना चाहते. साथ ही गरीबी के कारण बहुत बड़े स्कूल में बाहर पढ़ाने की हिम्मत भी नहीं जुटा पा रहे हैं. लेकिन रमिला ने उन्हें साफ कह दिया है कि वह गांव में नहीं रहना चाहती. दिल्ली से गये मीडिया के कुछ लोगों ने रमिला को टटोला तो वह तुरंत उनके साथ दिल्ली निकल चलने के लिए तैयार हो गई.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरगुजा जिले के बतौली गांव की 14 साल की तारिणी घर से तो निकली थी, पड़ोस में सरसों की भाजी छोड़ने के लिये, लेकिन वह निकल गई दिल्ली. पिता भण्डारी और मां मुनारो किन्डो कुछ दिन बाद यह जानकर कुछ राहत महसूस कर सके कि वह अपने मामा की लड़की प्रमिला के साथ निकली है, जो पहले से ही दिल्ली आती जाती रहती है. बतौली ब्लाक मुख्यालय और उसके आसपास के गांवों से प्रमिला की तरह ही कई नजदीकी रिश्तेदारों ने लड़कियों को घरेलू नौकरानी के लिए काम पर पहुंचाया है, जिनमें से तारिणी समेत कम से कम 7 लड़कियों का आज पता नहीं है कि वे कहां हैं.&lt;br /&gt;तारिणी जैसी लड़कियों को बचाने के लिए असल में जब लोगों का जीवन स्तर ऊपर उठेगा तो ही इलाके में कैंसर की तरह फैल चुके मानव-व्यापार पर रोक लगाने में मदद मिलेगी. अभी तो उरांव आदिवासी परिवारों के भाई, पिता के हाथ खाली हैं, बेटियों को पढ़ाई और शादी करने के दिनों में बाहर भेज देना, उन्हें बिल्कुल नहीं भाता, पर असहाय हैं. इनके हाथ में काम हो, कुछ आय बढ़े तो हिम्मत के साथ वे इन लड़कियों को भी रोकेंगे और लड़कियों का भी भरोसा अपने परिवार व समाज पर बढ़ेगा.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4294876642043841838-6892606452743803791?l=sarokaar.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sarokaar.blogspot.com/feeds/6892606452743803791/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4294876642043841838&amp;postID=6892606452743803791' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4294876642043841838/posts/default/6892606452743803791'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4294876642043841838/posts/default/6892606452743803791'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sarokaar.blogspot.com/2008/08/blog-post.html' title='जशपुर का अपजश'/><author><name>राजेश अग्रवाल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03166713468895085704</uri><email>agrrajesh@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='08211776964587468572'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://bp1.blogger.com/_kAbQECGcYOM/SJc0UHcEXBI/AAAAAAAAASk/fCkJGKbq784/s72-c/jashpur_788050541.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4294876642043841838.post-2480132580066344352</id><published>2008-07-30T16:23:00.000-07:00</published><updated>2008-07-30T16:28:32.973-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रश्न'/><title type='text'>सांसद वापस बुलाने का अधिकार क्यों नहीं हो?</title><content type='html'>&lt;strong&gt;-राजेश अग्रवाल&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;छत्तीसगढ़ में 45 साल पुराना एक कानून बोतल से जिन्न की तरह बाहर निकल कर आ गया है, जो लोकतंत्र पर भरोसा करने वाले हर मतदाता के लिये तो सुखद है पर एक बार चुन लिये जाने के बाद पद का दुरूपयोग करने वाले जनप्रतिनिधियों के लिये खतरे की घंटी है. संसद में विश्वास मत हासिल करने की प्रक्रिया के दौरान पता नहीं कितने ही सांसद अपने मतदाताओं का भरोसा खो बैठे हैं पर उन्हें वापस बुलाने का अधिकार मतदाताओं को नहीं है. इधर छत्तीसगढ़ में 3  नगर पंचायत अध्यक्षों को नाराज जनता ने नहीं बख्शा और नगरपालिक अधिनियम 1961 की धारा 47 का इस्तेमाल करते हुए उन्हें कुर्सी से अलग कर दिया. इस कानून ने ऐसी जागरूकता लाई है कि अब एक चौथे नगर पंचायत अध्यक्ष पर भी शामत आ गई है, उन्हें भी जनता का विश्वास हासिल करना होगा.&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt; &lt;br /&gt;दरअसल अविभाजित मध्यप्रदेश में स्थानीय निकायों के लिये बना कानून अलग राज्य बनने के बाद छत्तीसगढ़ में भी उसी तरह लागू हो गया था. इस अधिकार के तहत सबसे पहले धमतरी के नगर पंचायत अध्यक्ष विमल चोपड़ा के खिलाफ लाया गया था, लेकिन वे इसकी कुछ प्रक्रियाओं पर आपत्ति लगाते हुए हाईकोर्ट चले गये थे. उनका मामला अभी लम्बित है. गुण्डरदेही की अध्यक्ष भारती सोनकर भी हाईकोर्ट गई थी. उनके मामले में फैसला आ गया और आवेदन खारिज हो गया. पिछले 15 जून को भारती सोनकर समेत दो अन्य अध्यक्षों कोरेन खलखो, राजपुर और सीताराम गनेकर नवागढ़ के खिलाफ मतदाताओं ने वोट दिया और उन्हें अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ी. सिलसिला चल चुका है और लग रहा है कि वायदाखिलाफी करने वाले, भ्रष्टाचार में लिप्त रहने या अपनी जवाबदेही भूल जाने वाले जनप्रतिनिधियों को ढ़ोते रहने के लिये मतदाता लाचार नहीं रह गये हैं. अब एक और नगर पंचायत कुसमी के अध्यक्ष को अपनी विश्वसनीयता साबित करने के लिये मतदाताओं के बीच जाना होगा. इसके लिये मतदान 26 अगस्त को होगा और मतों की गिनती 28 अगस्त को होगी. इन्हीं दिनों में गुण्डरदेही, राजपुर और नवागढ़ में भी नये अध्यक्षों के लिये चुनाव हो रहे हैं.&lt;br /&gt;&lt;a href="http://bp2.blogger.com/_kAbQECGcYOM/SJD4vx_xzII/AAAAAAAAASc/hlDGAfnUfDM/s1600-h/cec_chattishgargh.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp2.blogger.com/_kAbQECGcYOM/SJD4vx_xzII/AAAAAAAAASc/hlDGAfnUfDM/s320/cec_chattishgargh.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5228952667135528066" /&gt;&lt;/a&gt;छत्तीसगढ़ में प्रत्यक्ष मतदान के जरिये इन अध्यक्षों का चुनाव हुआ था. इसलिये सामान्य सभा में बहुमत खोने के बाद भी इन्हें नहीं हटाया जा सकता. प्रक्रिया के तहत तीन चौथाई पार्षदों ने कलेक्टर के समक्ष अविश्वास प्रस्ताव का आवेदन दिया. इसके बाद 15 जून को मतदान कराया गया. मतपत्र में प्रत्याशियों के नाम नहीं थे, बल्कि एक खाली व दूसरी भरी हुई कुर्सी के चित्र थे. श्रीमती सोनकर के पक्ष में 1389 मत पड़े जबकि खिलाफ में 1977 वोट, श्री गनेकर के पक्ष में 805 वोट पड़े और खिलाफ में 1146, कोरेन खलखो के खिलाफ 813 मतदाता थे, जबकि उनके पक्ष में 740 वोट पड़े.&lt;br /&gt;हालांकि छत्तीसगढ़ में इस कानून का इस्तेमाल पहली बार हुआ है, लेकिन मध्यप्रदेश में सन् 2002 में इसी एक्ट का इस्तेमाल कर अनूपपुर की नगर पालिका अध्यक्ष पावलिका पटेल को हटाया जा चुका है. महाराष्ट्र में भी स्थानीय निकायों के लिये इसी तरह का कानून है पर वहां पर अभी तक कोई उदाहरण इसके इस्तेमाल करने को लेकर मिला नहीं है.&lt;br /&gt;1992 में जब राजीव गांधी सरकार ने 73 वें संविधान संशोधन के जरिये पंचायती राज अधिनियम संसद से पारित कराया तो कई राज्यों ने इसे लागू करने में ना-नुकर की. इसके बाद 1996 में महिलाओं, अनुसूचित जाति जनजाति व पिछड़े वर्ग को अवसर देने के लिए इस अधिनियम में कई बिन्दु और जोड़े गये. अनेक राज्यों ने इसमें संशोधन करके अधिनियम लागू किया. छत्तीसगढ़ ने लगभग सभी महत्वपूर्ण प्रावधान लागू किये. दो से अधिक बच्चे होने पर या घर में शौचालय न होने पर चुनाव लड़ने का अधिकार खो देना, निर्वाचित होने के बाद तीसरा बच्चा पैदा होने पर पद खो देना आदि कुछ कठोर प्रावधान भी इसमें शामिल हैं. नगर निकायों के अध्यक्षों के मुकाबले सरपंचों को मतदाताओं के प्रति ज्यादा जवाबदेह बनाया गया है. पंचों के तीन चौथाई बहुमत के जरिये भी वे हटाये जा सकते हैं और ग्राम सभाओं के माध्यम से भी. मध्यप्रदेश पंचायती राज अधिनियम में 1999 व 2001 में किये गये संशोधनों के अनुसार सरपंचों को ग्राम सभाओं की अनुमति से ही किसी भी प्रकार का व्यय, निर्माण कार्य, चाहे वह पंचायत की बैठक में पारित कोई प्रस्ताव हो या न हो, गरीबी रेखा की सूची, निराश्रितों का पेंशन, आवासहीनों को जमीन का पट्टा सब कुछ तय होगा,  जबकि नगर निकायों में पार्षदों की मौजदूगी में होने वाली सामान्य सभा में ही इसका फैसला लिया जा सकता है. ग्राम सभाओं को अपने सरपंच को सीधे बर्खास्त करने का भी अधिकार है. लेकिन इसमें ग्राम सभा के कुल सदस्यों का पांचवा हिस्सा मौजूद रहना चाहिये तथा इनमें भी कम से कम एक तिहाई महिलाएं हों.&lt;br /&gt;छत्तीसगढ़ सरकार ने हाल ही में एक और संशोधन करके आरक्षित सीटों का क्रम जो पहले हर बार बदल जाता है, उसे 10 सालों के लिये स्थायी कर दिया है, इसके चलते अब एक बार चुना गया पंचायत प्रतिनिधि दूसरी बार भी अपनी सीट से लड़ सकेगा. पहले आरक्षण के कारण हर बार स्थिति बदल जाती थी और इस वजह से पंच, सरपंच मतदाताओं की परवाह ही नहीं करते थे. एक और महत्वपूर्ण संशोधन के तहत पंचायतों में 33 की जगह 50 फीसदी सीटें महिलाओं के लिये आरक्षित कर दी गई है.&lt;br /&gt;लब्बोलुआब यह कि नगर निकाय और पंचायतों में जो प्रतिनिधि चुनकर आते हैं वे अपने मतदाताओं के प्रति ज्यादा जवाबदेह हैं. सांसद और विधायकों के लिये इतनी पाबंदी और जवाबदेही नहीं है. नगर निकायों में सीमित इस कानून को संसद और विधानसभा में चुने जाने वाले प्रतिनिधियों पर भी लागू क्या नहीं किया जाना चाहिये? हम संसद में लाये गये विश्वास मत के पक्ष में खड़े हों या विपक्ष में, लेकिन सांसदों के आचरण पर सवाल तो उठे हैं. क्या मतदाताओं को यह अधिकार नहीं मिलना चाहिये कि वे तय कर सकें कि उन्हें अपने सांसद का काम पसंद नहीं आया तो वापस बुला लें. &lt;br /&gt;नगर निकायों व पंचायतों में मतदाताओं को सौंपे गये अधिकार दरअसल कई अर्थों में इन संस्थाओं को नौकरशाहों के कब्जे में रखने का षड़यंत्र है. ज्यादातर पंच-सरपंच पढ़े लिखे नहीं है, अनुसचित जाति जनजाति व महिला वर्ग से आये जनप्रतिनिधियों को  पंचायत एक्ट का ही पता नहीं है. केन्द्र से आने वाली राशि का दुरूपयोग जनपदों के सीईओ, पंचायतों के सचिव व पढ़े लिखे उप-सरपंच और उपाध्यक्ष तथा ठेकेदार करते हैं पर कलम इन प्रतिनिधियों की फंसी रह जाती है. ऐसे मामलों में प्रशासनिक अधिकारी इन प्रतिनिधियों को सीधे बर्खास्त करने और उन्हें जेल भिजवा देने का अधिकार भी रखते हैं. जब से आईएएस अधिकारियों को जिला पंचायतों का सचिव बनाया गया है अध्यक्षों की बिल्कुल नहीं सुनी जाती, सदस्यों को तो अपने इलाके में काम मंजूर करने के लिये गिड़गिड़ाना पड़ता है. नगर पंचायतों व नगर पालिकाओं में भी कमोबेश यही स्थिति है. पार्षद अक्सर आयुक्त व सीएमओ के पास नाली बनवाने, मच्छर भगाने व पेयजल उपलब्ध कराने के लिये गुहार लगाते हैं पर ये अधिकारी  मंत्री-विधायकों को साध कर रखते हैं और इनकी बात नहीं सुनते. हाल ही में छत्तीसगढ़ के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और कांग्रेस विधायक धनेन्द्र साहू ने आरोप लगाया कि जनप्रतिनिधियों को भाजपा सरकार नौकरशाहों के जरिये धमका रही है. आरंग की महिला सरपंच लता चंद्राकर को हाईकोर्ट से स्थगन मिल गया था, इसके बाद भी उसे बर्खास्त कर दिया गया. बयान राजनैतिक भी हो सकता है लेकिन ऐसे अनेक उदाहरण मिल जायेंगे.&lt;br /&gt; मतदाताओं के फैसले पर कोई ऊंगली नहीं उठा सकता, तीन नगर पंचायतों के अध्यक्ष पार्षदों के बहुमत से खिलाफत करने व मतदाताओं के वोट डालने के बाद पदच्युत किये गये हैं, किन्तु क्या यह संयोग नहीं है कि भारती सोनकर, सीताराम गनेकर और कोरेन खलखो महिला अथवा अनुसूचित जाति से हैं. शायद वे उन तिकड़मों को नहीं जानते थे जिसका राजनैतिक दल इस्तेमाल कर जनता का सामना करने से बचे रह जाते हैं. एक शहर या एक गांव की कमान संभालने वाले जनप्रतिनिधियों के लिये तो कानून कड़े कर दिये गये हैं, पर संसद और विधानसभा में पहुंच कर देश और प्रदेश के लिये नीतियां बनाने वाले सदस्य पांच साल के भीतर एक बार भी मतदाताओं का सामना करने का साहस नहीं जुटा पाते हैं. कोई ऐसा कानून क्यों नहीं बनाया जाता कि सांसद, विधायक भी री-काल के दायरे में लाये जाएं. ऐसा कोई प्रावधान होता तो शायद मध्यप्रदेश के सांसद चन्द्रभान के घर में तोड़फोड़ की नौबत नहीं आती. मतदाता उन्हें वापस बुला लेते. दुनिया के कई देशों में मतदाताओं को यह अधिकार दिया गया है. सोवियत संघ के भीतर आने वाले 36 राज्यों में से 18 में यह कानून सन 1917 से लागू है. जर्मनी में राज्य स्तर तक के निर्वाचित प्रतिनिधि वापस बुलाए जा सकते हैं. कुछ साल पहले केलिफोर्निया में गवर्नर को जनता ने वापस बुला लिया था. लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने पिछले दिनों तिरूअनंतपुरम् की एक सभा में भाषण देते हुए कहा था कि वे जनप्रतिनिधियों को वापस बुलाने के अधिकार के हिमायती हैं. फिर भी लगता नहीं कि पंचायतों को आदर्श बनाने में लगे हमारे देश के नीति नियंता इन उदाहरणों को खुद पर लागू करेंगे. &lt;br /&gt;(यह आलेख http://www.visfot.com/jan_jeevan/democracy_ch_1.html पर भी उपलब्ध है.)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4294876642043841838-2480132580066344352?l=sarokaar.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sarokaar.blogspot.com/feeds/2480132580066344352/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4294876642043841838&amp;postID=2480132580066344352' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4294876642043841838/posts/default/2480132580066344352'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4294876642043841838/posts/default/2480132580066344352'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sarokaar.blogspot.com/2008/07/blog-post_30.html' title='सांसद वापस बुलाने का अधिकार क्यों नहीं हो?'/><author><name>राजेश अग्रवाल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03166713468895085704</uri><email>agrrajesh@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='08211776964587468572'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://bp2.blogger.com/_kAbQECGcYOM/SJD4vx_xzII/AAAAAAAAASc/hlDGAfnUfDM/s72-c/cec_chattishgargh.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4294876642043841838.post-4858046223140258853</id><published>2008-07-18T23:37:00.001-07:00</published><updated>2008-07-19T00:31:24.498-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लोक राग'/><title type='text'>झुरमुट में गुम बांस गीत की मिठास</title><content type='html'>&lt;em&gt;(दैनिक भास्कर रायपुर में 25 जून 2008 को प्रकाशित)&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;-राजेश अग्रवाल&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;निर्धनता के थपेडों से सूख चुके 70 साल के छेड़ूराम को आज की शाम भी चौकीदारी पर जाने के लिए देर हो रही थी. अपने पोपले मुंह से बार-बार उखड़ती सांसों पर जोर देते हुए उसने तकरीबन एक घंटे तक सुरीली तान छेड़ी फिर पूरे आदरभाव के साथ बांस को भितिया पर लटका दिया. अब ये कई-कई दिनों तक इसी तरह टंगा रहेगा. &lt;br /&gt;छैड़ूराम को याद नहीं कि पिछली बार बांस उसने कब बजाया. छेड़ूराम कहते हैं-' अब कौन पूछता है इसे. क्या मैं उम्मीद करूं कि मेरे नाती पोते इसे साध &lt;a href="http://bp2.blogger.com/_kAbQECGcYOM/SIGM3bWuq6I/AAAAAAAAASU/QUvNorjrHhI/s1600-h/Baans+Geet2.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp2.blogger.com/_kAbQECGcYOM/SIGM3bWuq6I/AAAAAAAAASU/QUvNorjrHhI/s320/Baans+Geet2.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5224611926590270370" /&gt;&lt;/a&gt;पाएंगे. पूरी रात खत्म नहीं होगी, अगर मैं एक राजा महरी का ही किस्सा लेकर बैठ जाऊं. अब तो वह कोलाहल है कि मेरे बांस बजाने का पड़ोसी को भी पता न चले, पहले गांवों की रात इतनी शांत होती थी कि चार कोस दूर तक लोगों को मन में झुनझुनी भर देता था. दूर किसी पगडंडी में चलने वाला राहगीर भी ठहर कर कानों पर बल देकर बांस सुनने के लिए ठहर जाता था. छठी, बरही, गौना सब में बांस गीत गाने-बजाने वालों को बुलाया जाता था. राऊतों का तो कोई शुभ प्रसंग बांस गीत की बैठकी के बगैर अधूरा ही होता था.&lt;br /&gt;अब इंस्टेन्ट जमाना हैं. टेस्ट मैच की जगह ट्वेन्टी-20  पसंद किये जाते हैं. बांस गीत की मिठास को पूरी रात पहर-पहर भर धीरज के साथ सुनकर ही महसूस किया जा सकता है. इसके सुर बहुत धीमे-धीमे रगों में उतरते हैं, आरोह- अवरोह, पंचम, द्रुत सब इसमें मिलेंगे. जब स्वर तेज हो जाते हैं तो मन-मष्तिष्क का कोना-कोना झनकने लगता है.  रात में जब भोजन-पानी के बाद बांसगीत की सभा चबूतरे पर बैठती है तो बांस कहार, गीत कहार, ठेही देने वाले रागी और हुंकारू भरने वाले के बीच सुरों का संगत बिठाई जाती हैं. इसके बाद मां शारदा की वंदना होती है फिर शुरू होता है किसी एक कथानक का बखान. यह सरवन की महिमा हो सकती है, गोवर्धन पूजा, कन्हाई, राजा जंगी ठेठवार या लेढ़वा राऊत का किस्सा हो सकता है.  गांव के बाल-बच्चों से लेकर बड़े बूढ़े बारदाना, चारपाई, पैरा, चटाई लाकर बैठ जाते हैं और रात के आखिरी पहर तक रमे रहते हैं. &lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;'अहो बन मं गरजथे बनस्पतिया जइसे, डिलवा मं गरजथे नाग हो&lt;br /&gt;मड़वा में गरजथे मोर सातों सुवासिन गंगा, सभा में गरजथे बांस हो'&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;. &lt;br /&gt;राऊत जब जंगलों की ओर गायों को लेकर गए होंगे तब बांस की झुरमुट से उन्हें हवाओं के टकराने से निकलते संगीत का आभास हुआ होगा. इसे कालान्तर में उन्होंने वाद्य यंत्र के रूप में परिष्कृत कर लिया. इसी का उन्नत स्वरूप बांसुरी के रूप में सामने आया. बांसुरी अपने आकार और वादन में बांस के अनुपात में ज्यादा सुविधाजनक होने के कारण सभी समुदायों में लोकप्रिय हो गया. बांस, जंगल-झाड़ी और पशुओं के साथ जन्म से मृत्यु तक का नाता रखने वाले यादवों ने बांस गीत को पोषित पल्लवित किया.&lt;br /&gt;छत्तीसगढ़ की जिन लोक विधाओं पर आज संकट मंडरा रहा है, बांस गीत उनमें से एक है. रंगकर्मी हबीब तनवीर ने छत्तीसगढ़ की बोली और लोक विधाओं को छत्तीसगढ़ के बाहर देश-विदेश के मंचों पर रखा. उन्होंने शेक्सपियर के नाटक 'मिड समर नाइट स्ट्रीम' का हिन्दी रूपान्तर 'कामदेव का अपना वसंत ऋतु का सपना' तैयार किया, इसका मंचन अब तक केवल विदेशों में हो सका है. जानकर हैरत हो सकती है कि नाटक का पूरा कथानक बांस गीतों के जरिए ही आगे बढ़ता है, बांस न हो तो इस नाटक का दृश्य परिवर्तन अधूरा लगेगा. &lt;br /&gt; राजनांदगांव के विक्रम यादव ने बांस की धुनों से पूरे नाटक में जादुई माहौल पैदा किया है.  विक्रम ने बनारस के घाट पर हुए सन् 2007 के संगीत नाटक अकादमी के वार्षिक समारोह में भी प्रस्तुति दी.  सार्क फेस्टिवल 2007 के विज्ञापनों और निमंत्रण पत्रों में बांस गीत गायक खैरागढ़ के नकुल यादव की तस्वीर को ही उभारा गया था.&lt;br /&gt; आकाशवाणी रायपुर में बांस गीतों के लिए हर सोमवार का एक समय निर्धारित था. यदा-कदा कला महोत्सवों में भी बांस गीत के कलाकारों को शामिल किया जाता है.&lt;br /&gt; छत्तीसगढ़ के हर उस गांव में जहां यादव हैं, बांस गीत जरूर होता रहा है. यह बस्तर तक भी फैला हुआ है. बस्तर के दूरस्थ कोंडागांव में खेड़ी खेपड़ा गांव में यादवों का एक समूह बांस गीत को बड़ी रूचि से बजाते हैं.&lt;br /&gt; बांसुरी से लम्बी किन्तु बांस से पतली और छोटी, मुरली भी बजाने की परम्परा यादवों में रही है. मुरली बजाने वाला एक परिवार बिलासपुर के समीप सीपत में मिल जाएगा. यादव दो मुंह वाला अलगोजना और नगडेवना भी बजाते रहे हैं, जो काफी कुछ सपेरों के बीन से मिलता जुलता वाद्य यंत्र है, यह खोज-बीन का मसला है कि कहां कहां बांस या उससे मिलते जुलते वाद्य यंत्र अब बजाये जा रहे हैं. &lt;br /&gt;बांस गीतों का सिमटते जाने के कुछ कारणों को समझा जा सकता है. बांस गीत में वाद्य बांस ही प्रमुख है. गीत-संगीत की अन्य लोक विधाओं की तरह इसके साजों में बदलाव नहीं किया जा सकता. यादवों के अलावा भी कुछ अन्य लोगों ने बांस गीत सीखा पर इसके अधिकांश कथानक यादवों के शौर्य पर ही आधारित हैं. सभी कथा-प्रसंग लम्बे हैं, जिसके श्रोता अब कम मिलते हैं. पंडवानी, भरथरी में कथा प्रसंगों के एक अंश की प्रस्तुति कर उसे छोटा किया जा सकता है, पर बांस गीत में इसके लिए गुंजाइश कम ही है. हिन्दी फिल्मों की फूहड़ नकल से साथ फिल्मांकन कर छत्तीसगढ़ी लोक गीतों का सर्वनाश करने वालों को बांस गीतों में कोई प्रयोग करने का कोई रास्ता नहीं दिखाई देता.  &lt;br /&gt;अब तेजी से जंगल खत्म हो रहे हैं, गांवों में बड़ी मुश्किल से चराई के लिए दैहान मिल पाता है. ऐसे में कच्चे बांस के जंगल कहां मिलेंगे. वे पेड़ नहीं मिलते, गाय चराते हुए जिस पर टिककर बांस या बांसुरी बजाई जा सके. यादवों के एक बड़े वर्ग से उनका गाय चराने का परम्परागत व्यवसाय छिन चुका है. छैड़ूराम, नकुल या विक्रम में से किसी का भी परिवार अब गाय नहीं चराता है. बांस गीत से इनका लगाव अपनी परम्परा और संगीत बचाये रखने की ललक की वजह से ही है.&lt;br /&gt;रंगकर्मी अनूप रंजन पाण्डेय पिछले कई सालों से छत्तीसगढ़ की लुप्त होती लोक विधाओं और वाद्य यंत्रों को सहेजने के लिए काम कर रहे हैं. उनका मामना है कि लोक विधाओं को संरक्षण देने के नाम पर सरकार या तो कलाकारों को खुद या सांस्कृतिक संगठनों के माध्यम से बढ़ावा देती है, लेकिन बांस गीत जैसी लोक विधाओं की बात अलग है. इसे 15-20 मिनट के लिए मंच देकर बचाया नहीं जा सकता, बांस गीत तब तक नहीं बचेगा,जब तक इसे सीखने वालों की नई पीढ़ी तैयार न की जाए. बांस गीत जैसी विधाओं के लिए कार्यशालाओं का आयोजन किया जाना चाहिये, जिनमें गुरू शिष्य परम्परा को ध्यान में रखा जाए और दोनों को मानदेय मिले.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4294876642043841838-4858046223140258853?l=sarokaar.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sarokaar.blogspot.com/feeds/4858046223140258853/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4294876642043841838&amp;postID=4858046223140258853' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4294876642043841838/posts/default/4858046223140258853'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4294876642043841838/posts/default/4858046223140258853'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sarokaar.blogspot.com/2008/07/blog-post.html' title='झुरमुट में गुम बांस गीत की मिठास'/><author><name>राजेश अग्रवाल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03166713468895085704</uri><email>agrrajesh@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='08211776964587468572'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://bp2.blogger.com/_kAbQECGcYOM/SIGM3bWuq6I/AAAAAAAAASU/QUvNorjrHhI/s72-c/Baans+Geet2.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4294876642043841838.post-3292217816447955867</id><published>2008-06-17T00:26:00.000-07:00</published><updated>2008-06-18T01:28:18.354-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='साहित्य'/><title type='text'>यह है हिन्दी की पहली प्रकाशित कहानी</title><content type='html'>&lt;blockquote&gt;मुद्रित कहानियों के इतिहास में भी छत्तीसगढ़ की उपस्थिति कम-से-कम एक शताब्दी पुरानी है.पं. माधवराव सप्रे की कहानी ‘एक टोकरी भर मिट्टी’ सन् 1901 में ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ में प्रकाशित हुई थी.देवी प्रसाद वर्मा (बच्चू जाँजगीरी) ने ‘एक टोकरी भर मिट्टी’ को अनेक प्रमाणों और तर्कों के आधार पर हिंदी की प्रथम प्रकाशित कहानी करार दिया था.कमलेश्वरजी सहित अनेक साहित्यकारों ने श्री वर्मा के दावे का समर्थन किया.कमलेश्वरजी तो यहाँ तक कहते हैं कि आज हिंदी में जिसे द्विवेदी युग के नाम से जाना जाता है, उसे सप्रे युग कहा जा सकता है&lt;strong&gt;.(प्रख्यात पत्रकार रमेश नैयर की किताब कथा-यात्रा से साभार)&lt;/strong&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;अविभाजित मध्यप्रदेश जिसमें छत्तीसगढ़ भी शामिल था, से सबसे पहला अख़बार तब के एक छोटे से गांव पेन्ड्रारोड से माधव राव सप्रे ने शुरू किया, जिसका नाम था-&lt;strong&gt;छत्तीसगढ़ मित्र&lt;/strong&gt;. यह छत्तीसगढ़ के लिये गर्व की बात है कि उनकी जांजगीर जिले के झलमला में लिखी गई इस कहानी को साहित्यकारों की बिरादरी में हिन्दी की पहली कहानी के रूप में स्वीकार किया गया है.&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;एक टोकरी भर मिट्टी&lt;br /&gt;-माधवराव सप्रे&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;किसी श्रीमान जमींदार के महल के पास एक गरीब अनाथ विधवा की झोंपड़ी थी.जमींदार साहब को अपने महल का हाता उस झोंपड़ी तक बढ़ाने की इच्छा हुई.विधवा ने बहुतेरा कहा कि अपनी झोंपड़ी हटा ले.पर वह तो कई जमाने से वहीं बसी थी.उसका पति और इकलौता पुत्र भी उसी झोंपड़ी में मर गया था.पतोहू भी एक पाँच बरस की कन्या को छोड़कर चल बसी थी.अब उसकी यही पोती इस वृद्धाकाल में एकमात्र आधार थी.जब कभी उसे अपनी पूर्वस्थिति की याद आ जाती तो मारे दु:ख के फूट-फूटकर रोने लगती थी.और जब से उसने अपने श्रीमान पड़ोसी की इच्छा का हाल सुना तब से वह मृतप्राय हो गई थी.उस झोंपड़ी में उसका मन लग गया था कि बिना मरे वहाँ से वह निकलना ही नहीं चाहती थी.श्रीमान के सब प्रयत्न निष्फल हुए.तब वे जमींदारी चाल चलने लगे.बाल की खाल निकालनेवाले वकीलों की थैली गरम कर उन्होंने अदालत से झोंपड़ी पर अपना कब्जा कर लिया और विधवा को वहाँ से निकाल दिया.बिचारी अनाथ तो थी ही.पास-पड़ोस में कहीं जाकर रहने लगी.&lt;br /&gt;एक दिन श्रीमान उस झोंपड़ी के आस-पास टहल रहे थे और लोगों को काम बतला रहे थे.इतने में वह विधवा हाथ में एक टोकरी लेकर वहाँ पहुँची.श्रीमान ने उसको देखते ही अपने नौकरों से कहा कि उसे यहाँ से हटा दो.पर वह गिड़गिड़ाकर बोली, ‘‘महाराज, अब तो यह झोंपड़ी तुम्हारी हो गई है.मैं उसे लेने नहीं आई हूँ.महाराज, क्षमा करें तो एक विनती है.’’ जमींदार साहब के सिर हिलाने पर उसने कहा, ‘‘जब से यह झोंपड़ी छूटी है तब से मेरी पोती ने खाना-पीना छोड़ दिया है.मैंने बहुत समझाया, पर वह एक नहीं मानती.यही कहा करती है कि अपने घर चल ! टोकरी भर मिट्टी लेकर उसका चूल्हा बनाकर रोटी पकाऊँगी.इससे भरोसा है कि वह रोटी खाने लगेगी.महाराज, कृपा करके आज्ञा दीजिए तो इस टोकरी में मिट्टी ले जाऊँ.’’ श्रीमान ने आज्ञा दे दी.&lt;br /&gt;विधवा झोंपड़ी के भीतर गई.वहाँ जाते ही उसे पुरानी बातों का स्मरण हुआ और उसकी आँखों में आसूँ की धारा बहने लगी.अपने आंतरिक दु:ख को किसी तरह सँभालकर उसने अपनी टोकरी मिट्टी से भर ली और हाथ से उठाकर बाहर ले आई.फिर हाथ जोड़कर श्रीमान से प्रार्थना करने लगी कि ‘महाराज’ कृपा करके इस टोकरी को जरा हाथ लगाइए, जिससे मैं इसे अपने सिर पर धर लूँ.जमींदार साहब पहले तो बहुत नाराज हुए, पर जब वह बार-बार हाथ जोड़ने लगी और पैरों पर गिरने लगी तो उनके भी मन में कुछ दया आ गई.किसी नौकर से न कहकर आप ही स्वयं टोकरी उठाने को आगे बढ़े.ज्यों ही टोकरी को हाथ लगाकर ऊपर उठाने लगे त्यों ही देखा कि यह काम उनकी शक्ति से बाहर है.फिर तो उन्होंने अपनी सब ताकत लगाकर टोकरी को उठाना चाहा, पर जिस स्थान पर टोकरी रखी थी वहाँ से वह एक हाथ भी ऊँची न हुई.वह लज्जित होकर कहने लगे, ‘‘नहीं, यह टोकरी हमसे न उठाई जावेगी.’’&lt;br /&gt;यह सुनकर विधवा ने कहा, ‘‘महाराज, नाराज न हों, आपसे तो एक टोकरी भर मिट्टी नहीं उठाई जाती और इस झोंपड़ी में तो हजारों टोकरियाँ मिट्टी पड़ी है.उसका भार आप जन्म भर क्यों कर उठा सकेंगे ? आप ही इस बात पर विचार कीजिए.’’&lt;br /&gt;जमींदार साहब धन-मद से गर्वित हो अपना कर्तव्य भूल गए थे, पर विधवा के उपर्युक्त वचन सुनते ही उनकी आँखें खुल गई.कृतकर्म का पश्चाताप कर उन्होंने विधवा से क्षमा माँगी और उसकी झोंपड़ी उसको वापस दे दी.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;झलमला&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;(वर्तमान जांजगीर जिले के अंतर्गत छत्तीसगढ़ का एक गांव)&lt;/em&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4294876642043841838-3292217816447955867?l=sarokaar.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sarokaar.blogspot.com/feeds/3292217816447955867/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4294876642043841838&amp;postID=3292217816447955867' title='6 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4294876642043841838/posts/default/3292217816447955867'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4294876642043841838/posts/default/3292217816447955867'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sarokaar.blogspot.com/2008/06/blog-post_17.html' title='यह है हिन्दी की पहली प्रकाशित कहानी'/><author><name>राजेश अग्रवाल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03166713468895085704</uri><email>agrrajesh@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='08211776964587468572'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4294876642043841838.post-1095165644499259526</id><published>2008-06-16T18:32:00.000-07:00</published><updated>2008-06-16T19:06:58.923-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रश्न'/><title type='text'>खाली होता धान का कटोरा</title><content type='html'>&lt;blockquote&gt;छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहा जाता है लेकिन यहां के किसान शहरों में आकर रिक्शा चला रहे हैं, ईंटा-गारा की मजूरी रहे हैं और किसी तरह दो वक्त की रोटी का प्रबंध कर पा रहे हैं. &lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;हट्टा कट्टा महेन्द्र भी हमारे शहर में रिक्शा खींचता है. लेकिन महेन्द्र का इतिहास मैं जानता हूं इसलिए उसको इस हालत में देखकर मुझे बहुत दुख हुआ. महेन्द्र के पिता ने 5 बच्चे पैदा किये. सब सुबह से उठकर खेत पर चले जाते और कड़ी मेहनत करते थे. कुछ सालों के भीतर उनके पास दुगनी खेती हो गई. कभी वे खुद किसी से उधार या किराये पर बैल जोड़ी मांग कर खेती करते थे, लेकिन देखते ही देखते उन्होंने 4 जोड़ी बैल खरीद लिए. नदी के किनारे एक भुसभुसी जमीन पर उसने ईंट भट्ठा लगाया और अपने खेतों से बबूल तोड़कर दरवाजे खिड़कियां तैयार की. उनके बेटों ने ही बड़ा सा पक्का मकान खुद के श्रम से तैयार किया. परिवार में ही इतने लोग थे कि किसी बाहरी मजदूर की जरूरत ही नहीं पड़ी. बच्चों की शादी हुई. उनके भी बच्चे बड़े होने लगे. खर्च बढ़ता गया. &lt;br /&gt;तय किया गया कि एक ट्रैक्टर संयुक्त खाते से खरीद लिया जाये. समय चक्र कुछ ऐसे फिरा कि ट्रैक्टर में नुकसान हो गया. बैंक की किश्त और ब्याज पटाने में दिक्कत आने लगी. तब भाईयों ने एक दूसरे पर फिजूलखर्ची, लापरवाही और शराब पीने का आरोप लगाया. पिता खिन्न हुए, पहले एक खेत को बेचकर ट्रैक्टर के कर्ज से मुक्ति पाई फिर ट्रैक्टर भी औने-पौने दाम पर बिक गया. बंटवारा &lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/SFcU_g7dS5I/AAAAAAAAARQ/UBMCHAC81GY/s1600-h/DhaanKaKatora.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://1.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/SFcU_g7dS5I/AAAAAAAAARQ/UBMCHAC81GY/s320/DhaanKaKatora.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5212658175108270994" /&gt;&lt;/a&gt;हुआ तो पिता, महेन्द्र और बाकी भाईयों को इतनी कम जमीन मिल पाई कि वे सब मध्यम किसान के दर्जे से बाहर आकर सीमान्त किसान रह गये. उनके बड़े घर के भीतर भी सबकी अलग-अलग सीमा तय हो गई. महेन्द्र ने छोटे टुकड़े पर अकेले खेती कर के देखा, लेकिन रोजमर्रा के अनाज, दवा और कपड़ों पर खर्च के बाद खेतों में डालने के लिये बीज, खाद और दूसरी व्यवस्थाओं के लिये परेशान रहने लगा. खेत से आमदनी इतनी कम थी कि दो बच्चों वाले छोटे परिवार का गुजारा कठिन था. कुछ दिन उसने गांव में मजदूरी की, अपनी पत्नी को भी उसने काम पर भेजा, लेकिन अपने परिवार के अतीत को देखकर गांव में यह काम करने में उसे शर्मिंदगी होती थी. ऐसे में उसकी बच्ची को छाती की तकलीफ हुई. पैसों की जरूरत पड़ी. अपने ही समाज के एक सम्पन्न किसान जो साहूकारी का काम भी करता था, से कर्ज लिया. विश्वास दिलाया कि फसल आने पर रकम वापस हो जायेगी. पर फसल इतनी नहीं हुई कि ब्याज और मूलधन चुकाया जा सके. हारकर उसने अपना खेत बेच दिया.कर्ज से मुक्ति पाई. अपने कमरे की चाबी पिता के हाथ में सौंप दी.अब तो गांव में रहने का कोई जरिया और जरूरत ही नहीं रह गई थी. उसने बचे हुए पैसों से शहर के एक पिछड़ी बस्ती में एक झोपड़ी खरीदी और रिक्शा लिया. अब उसके हाथ में 90 से 120 रूपये रोज आ जाते हैं. कभी घर की मालकिन रही उसकी पत्नी अब स्कूलों में दाई का काम करके वह भी कुछ कमा ही लेती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शहर में नये तरह का विकास हो रहा है इसलिए बड़ी तादात में चल रहे बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन के काम में कुली और रेजा की बहुत जरूरत पड़ती है ऐसे में गांव से भागकर आये किसानों को मेहनत मजूरी काम मिल ही जाता है. लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में न केवल हमारे देश का उत्पादक समाज शहर के दोयम दर्जे का अशिक्षित मजदूर होता जा रहा है बल्कि देश के जानकार किसानों की ज्ञानपरंपरा की मौत भी हो रही है. &lt;br /&gt;75 फीसदी किसान घाटे में &lt;br /&gt;छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहा जाता है, यह इसलिये कि सिंचाई का रकबा सिर्फ 20 प्रतिशत होने के बावजूद यहां धान की भरपूर पैदावार होती है. राज्य की 83 प्रतिशत आबादी खेती पर ही निर्भर है. लेकिन यहां के कुल 33.5 लाख किसानों में 75 प्रतिशत ऐसे हैं, जिनके पास 5 एकड़ से कम खेती है. दिनों-दिन इनको अपना पुरखों का व्यवसाय बचाने में कठिनाई आ रही है. खाद-बीज और ईंधन के दामों में बढ़ोतरी के कारण खेती की लागत लगातार बढ़ती जा रही है, पर उनका मुनाफा घटता जा रहा है. इन पंक्तियों को लिखते लिखते ही खबर आई है कि केन्द्र सरकार ने इस साल धान का समर्थन मूल्य 850 रूपये करने का निर्णय लिया है. यह फैसला राज्य सरकारों की ओर से बनाये गये दबावों का नतीजा बताया गया है. इस बात पर खुशी हो सकती है कि समर्थन मूल्य हर बार 20 से 50 रूपये तक ही बढ़ाया जाता था इस बार सीधे 100 रूपये बढ़ा दिये गये हैं. पर इसी बीच मंहगाई भी तेजी से बढ़ी है, जिसका शिकार गांवों के गरीब ज्यादा हुए हैं. कृषि विशेषज्ञ डा. संकेत ठाकुर ने आंकलन किया है कि किसानों को एक क्विंटल धान पैदा करने में 1350 रूपये खर्च आता है. यदि उन्हें 6 माह की मेहनत का 25 फीसदी मुनाफा भी देना है तो धान का समर्थन मूल्य कम से कम 1900 रूपये होना चाहिये. अक्सर किसान खेतों में की गई अपनी मेहनत को रोज की मजदूरी के दर से नहीं जोड़ता है इसके अलावा समय पर अच्छे बीज और खाद की व्यवस्था भी नहीं हो पाती है. इसलिये वे मजबूरन धान को उसकी वास्तविक कीमत से कम पर बेच देते हैं. किसानों को एक कृषि-सत्र के दौरान फसल पकने से पहले कोई आमदनी भी नहीं होती, ऊपर से निंदाई गुड़ाई बोनी और खाद बीज का खर्च भी उएाना पड़ता है. इसलिये वे फसल आते ही आनन-फानन में इसे बेच देते हैं. उन्हें पता है कि यही अनाज कुछ दिनों के बाद बाजार में ड्योढ़े या दुगने दाम पर बिकेगा, लेकिन उन्हें कर्ज लौटाने, घर सुधारने, बच्चों की शादी करने जैसे बड़े खर्च की भरपाई करनी होती है. पिछले कुछ दशकों में जितने लोग गांवों से शहर आये उनमें मध्यम वर्ग के किसान भी शामिल हैं, क्योंकि वे खेत में खुद मजदूरी करने नहीं जा पाते और इसके विकल्प के रूप में या तो उन्होंने अपनी जमीन टुकड़ों में बेच दी या फिर हर साल अनुबंध पर लघु कृषक या भूमिहीनों को सौंप देते हैं. ऐसे में खेत जोतने वाले पर ज्यादा दबाव होता है, क्योंकि उसे उपज का आधा-आधा बंटवारा करने के बाद उसे कुछ आमदनी हासिल करनी होती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;खेत निगलते कांक्रीट के जंगल &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;छत्तीसगढ़ राज्य को बने 7 साल से ज्यादा हो गए. प्रदेश सरकार के राजस्व और अनुदान में बीते सालों में काफी वृध्दि हुई है. नौकरीपेशा और व्यवसायियों, कांट्रेक्टर्स की आय बहुत बढ़ी है. कंस्ट्रक्शन के व्यवसाय ने हर तरफ रफ्तार पकड़ी है. शहरों का हर छोर पर विस्तार हो रहा है. नई कालोनियां बस रही हैं, विशाल कैंपस में निजी विश्वविद्यालय और रेसिडेंसियल स्कूल अभिजात्य वर्ग के लिये खुल रहे हैं और ये सब लगातार खेतों को निगल रहे हैं. राजधानी रायपुर से दुर्ग-भिलाई की तरफ जाने वाली सड़क पर कोई खेत तो बचा ही नहीं यदि है तो उसे कोई अरबपति ही खरीद सकता है. दूसरे मार्गों पर भी लोग खेतों का मुंहमांगा दाम देने के लिये तैयार हैं. किसान तो अवाक रह गये हैं. उन्हें लगता है कि इन खेतों में धान बोकर सात पुरखे भी जितना नहीं कमा सकते उतना तो एक दलाल आज सामने रूपये लेकर खड़ा है. बिलासपुर से लगे मंगला और उसलापुर में कई बड़े किसान कुछ साल पहले तक गर्व से बताते थे कि वे उन्नत पध्दति से धान व साग सब्जी बोते हैं, और उन्हें नौकरी या व्यवसाय करने की जरूरत नहीं है. लेकिन अब उनके सारे खेत कांक्रीट के जंगल में तब्दील हो रहे हैं. खाली खेत भी धान बोने के काम नहीं आ रहा है, क्योंकि इसका दाम करोड़ों में है और वहां देर-सबेर शापिंग माल या कालोनी तैयार हो जायेगी. बिलासपुर के सर्वश्रेष्ए किसानों में चमन लाल चड्डा का नाम लिया जाता है. खेती से कैसे समृध्दि हासिल की जा सकती है उन्होंने रास्ता दिखाया और हजारों किसानों ने उनसे प्रेरणा ली. उनके नाम पर आज भी एक सालाना समारोह होता है जिसमें श्रेष्ठ कृषक अपने उत्पादों के साथ पहुंचते हैं और सम्मानित होते हैं. विडम्बना है कि आज उनके पोतों ने सारे खेत साफ कर दिये हैं और वहां पर वे कम से कम 5 नई कालोनियां बना रहे हैं. आसपास के खेतों को भी बिल्डर्स लगातार खरीदते ही जा रहे हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मेहनती लोगों को आश्रित बनाने की साजिश&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;ऐसा नहीं है कि खेती और किसानों को बचाने के लिये सरकार कोशिश नहीं कर रही है, पर मर्ज कहीं और है इलाज कहीं और किया जा रहा है. इसे छत्तीसगढ़ का दुर्भाग्य ही माना जाये कि धान के लिये पहचान बनाने वाले इस राज्य में 34 लाख गरीब परिवारों के पास दो जून का अनाज ले पाने की क्षमता नहीं है. ध्यान देना होगा कि 75 फीसदी राज्य के किसान भी लघु या सीमान्त किसानों की श्रेणी में है, जिनकी संख्या भी 35 लाख के आसपास ही है. तभी तो इनके लिये राज्य सरकार 3 रुपये किलो में हर माह 35 किलो चावल उपलब्ध करा रही है. प्रदेश के सभी 16 जिलों में ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम के तहत काम उपलब्ध कराये जा रहे हैं. राज्य के लगभग 24 लाख परिवारों को जाब कार्ड बांटे गये है. इन योजनाओं में भ्रष्टाचार की बड़ी शिकायतें हैं. किसानों को 35 किलो चावल न देकर मुफ्त में 15-20 किलो चावल दे दिये जा रहे हैं और कहा जा रहा है कि बाकी चावल के बारे में सवाल मत करो. रोजगार गारंटी योजना में तो कांकेर जिले में घोटाले की अलग मिसाल बन गई, जहां 6 करोड़ रूपये के फर्नीचर, स्टेशनरी, एसी खरीद लिये गये. इस मामले में एक आईएएस अधिकारी समेत एक दर्जन अधिकारी कर्मचारियों पर कार्रवाई हुई. इस योजना की 60 फीसदी राशि मजदूरी पर खर्च की जानी है, पर कई स्थानों पर मशीनों से काम करा लिया जाता है और कुछ रकम देकर मजदूरों से जाब कार्ड में मजदूरी पाने का हस्ताक्षर करा लिया जाता है. एनआरईजीए में प्रावधान है कि 60 प्रतिशत कार्य जल संवर्धन की छोटी योजनाओं और पर्यावरण सुधार में खर्च किया जाये पर अधिकारियों व पंचायत पदाधिकारियों की रूचि सड़क और भवन बनाने में ज्यादा है, क्योंकि इसमें कमीशन की गुंजाइश अधिक होती है और भुगतान जल्दी मिल जाता है. सरगुजा जिले में जल संरक्षण के नाम पर ऐसे स्थानों पर तालाब खोद दिये गये जहां न तो पानी इकट्ठा हो सकता और न ही खेतों तक उसका रास्ता है. हरियाली के नाम पर रतनजोत के पौधे करोड़ों की तादात में रोप दिये गये, पर्यावरण विशेषज्ञ इसके खिलाफ हैं और गांव तथा खेत के लिये नुकसानदायक मानते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;रोज मर रहा है किसान &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;किसानों को सीधे चावल और नगदी देकर अकर्मण्य बनाया जा रहा है. दोनों ही योजनाओं से बिचौलिये ज्यादा फायदे में हैं. छत्तीसगढ़ में धान की औसत उपज प्रति हेक्टेयर 13 क्विंटल है, जो राष्ट्रीय औसत 24 क्विंटल के आधे से कुछ ही ज्यादा है और पंजाब जैसे राज्य जहां का औसत 35 क्विंटल है, से बहुत कम. राज्य के सरगुजा और बस्तर जिले देश के सर्वाधिक पिछड़े जिलों में ऐसे ही नहीं गिने जाते. यहां औसत उपज 5 से 6 क्विंटल ही है जो शायद देश में सबसे कम उत्पादन वाला इलाका है. चावल और रोजगार गारंटी योजना ने किसानों को खेती की ओर आकर्षित करने के बजाय विमुख ही किया है. राज्य के मेहनती किसानों को अच्छी उपज कम लागत में कैसे मिल सके इस पर विचार नहीं हो रहा है. बस्तर में खेती की उपेक्षा तो इसलिये भी हो रही है क्योंकि वहां नक्सलियों का प्रभाव है. यह और कोई नहीं संसद की कृषि स्थायी समिति के सदस्यों ने माना है, जिन्होंने बीते अप्रेल माह में छत्तीसगढ़ का दौरा किया था. समिति का मानना था कि 1400 मिलीलीटर औसत बारिश वाले इलाके में कृषि की दशा उचित प्रबंधन के जरिये सुधारी जा सकती है, जिसकी तरफ सरकार को ध्यान देना चाहिये. राज्य का 40 फीसदी हिस्सा वनों से आच्छादित माना जाता है, पर यहां जंगल लगातार घट रहे हैं. आदिवासी बाक्साइट और कोयला खदानों को जमीन बांट दिये जाने के कारण विस्थापित किये जा रहे हैं. वनों से जीविका चला लेने वालों का जीवन-यापन दिनों दिन कष्टप्रद होता जा रहा है. अनाज के लिये पहचान बनाने वाले इस राज्य में कुपोषित बच्चों की संख्या नेशनल न्यूट्रीशियन ब्यूरो के मुताबिक 50 प्रतिशत से ज्यादा है. राष्ट्रीय अपराध अन्वेषण ब्यूरो के मुताबिक महाराष्ट्र की तरह छत्तीसगढ़ में भी आतुमहत्या करने वाले किसानों की संख्या बहुत है. मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के साझा आंकड़े में यह संख्या सन् 2006 में 2800 है. हालांकि इसकी पुष्टि छत्तीसगढ़ में न पुलिस ने न कृषि विभाग ने न ही सरकार के किसी दूसरे विभाग ने की है. मीडिया भी इस ब्यूरो के इस आंकड़े को सच नहीं मान रहा है पर किसानों की दशा कुछ ऐसी है कि वह हर रोज मर रहा है.&lt;br /&gt;(इस आलेख को आप &lt;strong&gt;विस्फोट डाट काम &lt;/strong&gt;पर भी देख सकते हैं)&lt;blockquote&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4294876642043841838-1095165644499259526?l=sarokaar.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sarokaar.blogspot.com/feeds/1095165644499259526/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4294876642043841838&amp;postID=1095165644499259526' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4294876642043841838/posts/default/1095165644499259526'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4294876642043841838/posts/default/1095165644499259526'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sarokaar.blogspot.com/2008/06/blog-post.html' title='खाली होता धान का कटोरा'/><author><name>राजेश अग्रवाल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03166713468895085704</uri><email>agrrajesh@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='08211776964587468572'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/SFcU_g7dS5I/AAAAAAAAARQ/UBMCHAC81GY/s72-c/DhaanKaKatora.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4294876642043841838.post-2590272699718332475</id><published>2008-04-08T11:55:00.000-07:00</published><updated>2008-08-04T09:47:31.734-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लोक राग'/><title type='text'>सुरूज के सुर का सानी नहीं</title><content type='html'>&lt;strong&gt;0 राजेश अग्रवाल&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;(&lt;em&gt;&lt;strong&gt;दैनिक भास्कर रायपुर में दिनांक 27 मार्च 2008 को प्रकाशित&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भरथरी गायिकी में उनकी कोई सानी नहीं. जब वह ' घोड़ा रोवय घोड़सार मां'  पंक्तियों से गाना शुरू करती हैं तो हजारों की भीड़ में आखिरी छोर पर बैठा श्रोता तक सुध-बुध खो बैठता है. आज 57 साल की उम्र में भी यदि सुरूजबाई खाण्डे की बुलंद आवाज बरकरार है&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/R_vAyJaG-OI/AAAAAAAAAOQ/RvRsjWnB5DA/s1600-h/Surujbai.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://4.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/R_vAyJaG-OI/AAAAAAAAAOQ/RvRsjWnB5DA/s320/Surujbai.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5186951363598678242" /&gt;&lt;/a&gt; तो इसलिए कि वह छत्तीसगढ़ में पसीना बहाने वाले कर्मठ मजदूर के घर से है, उसका पालन-पोषण किसी ऐसे परिवेश में नहीं हुआ जहां गायिकी के हुनर को सिर माथे पर लेकर रियाज़ करने के लिए कोई सहूलियत दी जाए. 7-8 की उम्र में ही वे हाड़-तोड़ मेहनत करना सीख गईं. मां-बाप जब दूसरे के खेतों और ईंट-भट्ठों में मजदूरी के लिए जाते तो उसे भी अपने साथ ले जाते थे ताकि बड़ी हो और ससुराल जाए तो दो जून रोटी के लिए ताने न सुनना पड़े. दादा मोहरदास किसानों की फसल कटने के बाद चिकारा लेकर गांवों में निकलते थे, घूम-घूमकर लोगों को भरथरी सुनाते थे. चबूतरों, बैठकों में भी गाते थे, फिर जो मिलता, वह मजदूरी के अलावा होती थी. नन्हीं सुरूजबाई दादा के साथ शाम को ढिबरी की रोशनी में बैठी सुर मिलाने लगती थी, यही उनका स्कूल था. दादा सुरूजबाई को भी अपने साथ घुमाने लगे और साथ में वह भी गाने लगी. &lt;br /&gt;10-11 साल की उम्र में शादी के बाद वह पौंसरी-सरगांव से ससुराल कछार-रतनपुर आ गई. 4 बच्चे हुए, दवा-पानी के अभाव में सब असमय परलोक सिधार गए.  रोजी मजदूरी की तलाश में पति लखन के साथ बिलासपुर पहुंच गई.  यह अच्छी बात थी कि पति भी गाने-बजाने का शौक रखते थे, लेकिन दोनों के पास इसे पूरा करने का मौका नहीं था. दोनों रोज माल-धक्का जाते, बड़ी-बड़ी नमक और गेंहूं की बोरियां, तेल के पीपे उठाते और ठेले खींचते थे. शाम अपने घर पहुंचकर जब थकावट दूर करने का मन होता तो पूरे आलाप में सुरूजबाई गाना शुरू कर देती- घोड़ा रोवय...,&lt;br /&gt;मोहल्ले के लोग परेशान थे, लोग उसे 'पगली' कहने लगे. बिलासपुर में कुदुदण्ड, घसियापारा (राजेन्द्र नगर) ने कई जाने माने गायक पैदा किये हैं. इनमें से जवाहर बघेल उस वक्त रेडियो पर बजने वाले - दामाद बाबू दुलरू, बेन्दरा के मारे नई बांचय कोला बारी आदि गीतों से खासे चर्चित हो चुके थे, उन्होंने माना यह पगली नहीं है, बल्कि इसके भीतर गायकी कूट-कूट कर भरी है जिसे वह किसी भी तरीके से बिखेरना चाहती है. वे मंचों में सुरूजबाई को मौका देने लगे. इक्का दुक्का लोक कलाकार ही अपनी हुनर को आजीविका बना पाते हैं. सुरूजबाई की भी मूलभूत जरूरतें गाने से पूरी नहीं होनी थी, नहीं हो रही थी. जब गाने का मौका मिलता चली जाती, बाकी दिन माल-धक्के में ही धक्के खाते गुजरते थे. &lt;br /&gt;सन् 1985 का विधानसभा चुनाव आया. नेताओं में लोक कलाकारों का प्रचार के इस्तेमाल करने का प्रयोग चल रहा था. सुरूजबाई कहती है-  यादव भैया (पूर्व मंत्री बीआर यादव) ने उन्हें कांग्रेस के प्रचार के लिए कहा. सौदा अच्छा लगा- उसे माह भर तक गाने के लिए पैसा मिलेगा और माल-धक्का में बोरियां नहीं उठानी पडे़गी. गफ्फार भाई ने नई साड़ियां खरीद कर दी. पति-पत्नी अपने एक दो साजिंदों के साथ रिक्शे पर घूम-घूम कर कांग्रेस का प्रचार करने लगे, जबरदस्त क्रेज रहा. उसे आसपास के इलाकों में भी प्रचार के लिए बुलाया गया. कैसेट भी तैयार हो गया. बीआर यादव चुनाव जीत गए. वादे के मुताबिक उन्होंने सिफारिश की और कलाकारों के कोटे से सुरूजबाई को एसईसीएल में नौकरी मिल गई. अनपढ़ थी, सो भृत्य की नौकरी मिली और वहां लोगों को पानी पिलाने का काम सौंपा गया. एक अनूठी आवाज की मालकिन, यहां नौकरानी का काम करने लगी, क्योंकि यह पहले से बेहतर था. अफसर, बाबू और आगंतुकों में ज्यादातर लोग उन्हें नहीं पहचानते थे, जो जानते थे उनमें से कुछ गदगद हो जाते -कुछ क्षोभ से भर जाते. लेकिन सुरूजबाई ने इससे भी मुश्किल दिन देखे थे, इसलिये उसे मलाल नहीं था. &lt;br /&gt;तब से लेकर आज तक वह यहां पानी पिलाने का ही काम कर रही है. 2 साल पहले एक फर्क आया कि एसईसीएल ने उसके पदनाम के आगे भृत्य शब्द हटा दिया और उसे सांस्कृतिक सलाहकार पद से नवाज दिया गया. उसे टूटी-फूटी ही सही- एक टेबल कुर्सी दे दी गई. लेकिन अभी भी कोई उसे आवाज लगाकर कह देता है- सुरूज बाई, चल पानी पिला.., तो वह ना नहीं कह पाती. मौजूदा सीएमडी बीके सिन्हा और एमडी आरएस सिंह को वे 'कला-प्रेमी'  बताते हुए कहती हैं कि कम से कम अब सांस्कृतिक कार्यक्रमों की तैयारी पर होने वाली बैठकों में उसे बुलाया जाता है और राय मांगी जाती है, पहले इतनी भी पूछ नहीं थी. &lt;br /&gt;अब जब रिटायरमेन्ट में 2-3 साल बचे हैं, सुरूजबाई बहुत रूआंसी नजर आती है. उसे शिकायतें खूब है, पर वह जानती है कि वह लाचार है, पढ़ी-लिखी नहीं है कुछ नहीं कर पाएगी. उसके सबसे यादगार क्षण हैं जब उसने रूस में भारत महोत्सव के कार्यक्रम दिए. लेकिन वहां से आने के बाद जैसे आसमान से लाकर फिर धरती पर ही पटक दिया गया, फिर वहीं पानी पिलाने के लिए तैनात. सुरूजबाई के साथ रूस गए दूसरे कई कलाकार आज ठोकरें खा रहे हैं. कोई रिक्शा चला रहा है, कोई सब्जी बेच रहा है. सुरूजबाई कहती है कि इन सब साथियों के बीच मेरी स्थिति कुछ अच्छी है क्योंकि मैं गुजर-बसर के लायक नौकरी पा गई. ताकत होती तो आज इन कलाकारों को लेकर भरथरी के अलावा भी अपने आल्हा, सुआगीत, भड़ौनी और बिहाव गीत को लेकर नई पीढ़ी तैयार करती. लेकिन यहां मुझे ऐसा कोई काम ही नहीं दिया जाता. कहीं भरथरी सुनाने जाना हो तो भी छुट्टी मिल नहीं पाती. &lt;br /&gt;सुरूजबाई कहती है कि-" कई बड़े नेता भी तो मेरी तरह अनपढ़ होते हैं, उनकी मदद के लिए तो लोग पीए देते हैं, अब मुझे यहां अंग्रेजी में सर्कुलर भेजकर बताया जाता है कि बैठक है- उस बैठक में मैं अपनी क्या बात रखूं और मेरी क्या सुनी जाएगी. इस बीच मैं थोड़ा हिन्दी समझने लगी और अपना दस्तखत भी करने लगी हूं, राजभाषा हफ्ता मनाने के बावजूद मेरे पास कोई चिट्ठी हिन्दी में नहीं आती. बूढ़ी हो रही हूं, सब मुझे कलाकार मानते हैं. इतना बड़ा दफ्तर है, सब्जियां लाने तक के लिए अफसरों के घर गाड़ियां दौड़ती हैं पर मुझे पैदल ही घर से आफिस तक आना पड़ता है." &lt;br /&gt;सुरूजबाई, क्या आपको नहीं लगता कि छत्तीसगढ़ के अनेक कलाकारों को बड़े-बड़े अवार्ड मिले, आपको नहीं मिलना चाहिए? पूछे जाने पर वह हाल में मिले देवी मध्यप्रदेश सरकार के देवी अहिल्या अवार्ड सहित अनेक सम्मानों के बारे में अपने तरीके से बताने लगती हैं. &lt;br /&gt;पद्मश्री भी तो एक सम्मान है, जिसका आप जैसे बड़े कलाकारों को दिया ही जाना चाहिए?&lt;br /&gt;सुरूजबाई फिर से उदास हो जाती हैं. कहती हैं- "अब मेरी सिफारिश कौन करे. बिलासपुर में मैं अकेले पड़ जाती हूं. रायपुर, भिलाई में कलाकारों के बीच एकता है वे एक दूसरे के हित का बराबर ख्याल रखते हैं. बीएसपी और एसईसीएल में बड़ा फर्क है. मेरी सिफारिश कैसे की जानी है, कौन करेगा मुझे नहीं मालूम, पर अफसरों को तो पता है. मुझे कलाकार कोटे से नौकरी मिली है तो कला से जुड़ा कोई काम क्यों नहीं सौंपा जाता." &lt;br /&gt;सुरूजबाई को शिकायत है कि कुछ कलाकार मंचों में वाहवाही लेने के लिए भरथरी के मूल स्वरूप से छेड़छाड़ कर रहे हैं. शराब पीकर मंच पर चढ़ जाते हैं और कला को बदनाम कर रहे हैं. फिर भी उन्हें भरोसा है कि उसके भीतर भरथरी सालों जिंदा रहेगा, एसईसीएल से रिटायर हो जाने के बाद भी. नए कलाकारों में भी बड़ा लगन है. वह भिलाई के पास एक गांव से अपने पास आने वाली वंदना की तारीफ भी करती हैं.&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;भरथरी और सुरूजबाई&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;छत्तीसगढ़ के पारम्परिक लोकगीतों में भरथरी और सुरूजबाई एक दूसरे की पहचान हैं. सुरूजबाई की विशिष्ट शैली को पकड़ पाना या उसकी नकल कर पाना किसी दूसरे कलाकार के वश में नहीं है. उन्होंने भरथरी, चंदैनी और ढोला-मारू के किस्से को अपनी गायिकी में ढ़ालकर देश-विदेश में ख्याति दिलाई. &lt;br /&gt;भरथरी बुंदेलखण्ड की पृष्ठभूमि पर आधारित एक ऐतिहासिक लोक कथा है, जिसे पूरे उत्तरभारत में अलग-अलग तरीके से गाया जाता है.  सार यह है कि उज्जैन के राजा भृतहरि एक बार शिकार करने जंगल गए. वहां उन्होंने एक काले हिरण का शिकार किया. मान्यता थी कि एक काला हिरण 6 आगर, 6 कोरी यानि 126 हिरणियों का पति होता है. मरते वक्त हिरण ने राजा को श्राप दिया कि जाओ जैसा बर्ताव तुमने मेरे साथ किया है वैसा ही तुम्हारे साथ भी होगा. राजा भरथरी ऋषि गोरखनाथ के शिष्य बने. गोरखनाथ ने उन्हें एक फल खाने को दिया और कहा कि इससे उनका यौवन चिर-स्थायी होगा. राजा अपनी एक रानी पिंगला के प्रेम में पागल थे. उन्होंने फल खुद खाने के बजाय रानी को दे दिया. लेकिन रानी को एक सैनिक से प्रेम था. उसने फल सैनिक को खाने के लिए दे दिया. सैनिक को एक वेश्या से प्रेम था, उसने भी फल खुद न खाकर उसे दे दिया. वेश्या को फल मिला, तब उसने सोचा कि मैं तो पापिन हूं, मेरी आयु लम्बी हो, इससे क्या फायदा, वह सोचती है इस राज्य की रक्षा करने वाले राजा की आयु लम्बी होनी चाहिए. वह फल लेकर राजा भरथरी के पास पहुंच जाती है. राजा यह देखकर चकित रह जाता है. जब उसे पूरी बात मालूम होती है तो उसका मन विषाद से भर उठता है. राज-पाट से उसका मोहभंग हो गया और सबकुछ छोड़कर गोदरिया बनकर जंगलों की ओर निकल पड़ा.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4294876642043841838-2590272699718332475?l=sarokaar.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sarokaar.blogspot.com/feeds/2590272699718332475/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4294876642043841838&amp;postID=2590272699718332475' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4294876642043841838/posts/default/2590272699718332475'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4294876642043841838/posts/default/2590272699718332475'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sarokaar.blogspot.com/2008/04/blog-post_08.html' title='सुरूज के सुर का सानी नहीं'/><author><name>राजेश अग्रवाल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03166713468895085704</uri><email>agrrajesh@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='08211776964587468572'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/R_vAyJaG-OI/AAAAAAAAAOQ/RvRsjWnB5DA/s72-c/Surujbai.jpg' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4294876642043841838.post-7997891769476084553</id><published>2008-04-08T11:49:00.001-07:00</published><updated>2008-04-09T10:56:24.485-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='खास खबर'/><title type='text'>संगीत से सेहत का राग मिलाने की अनूठी पहल</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/R_0CgsC2I8I/AAAAAAAAAO4/rw1mfH30oIg/s1600-h/DSCN0096.JPG"&gt;&lt;img style="cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://4.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/R_0CgsC2I8I/AAAAAAAAAO4/rw1mfH30oIg/s400/DSCN0096.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5187305106402845634" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;संस्कारधानी कहे जाने वाले बिलासपुर से हाल ही में संगीत और सेहत की जुगलबंदी शुरू की गई है. यह पहल पुलिस महानिरीक्षक राजीव श्रीवास्तव ने की. अब यहां अनेकसंगीत विशेषज्ञों और संगीत से अनुराग रखने वालों की एक टीम तैयार हो गई है, जो पूरे छत्तीसगढ़ में काम करेगी. समिति के गठन के ही दिन विश्व के शीर्षस्थ गिटार वादकों में से एक येल यूनिवर्सिटी से संगीत के स्नातक जेफरी क्रिंगर की अनूठी प्रस्तुति ने श्रोताओं को रसविभोर कर दिया. &lt;br /&gt;संगीत अथवा ध्वनि के माध्यम से उपचार की पध्दति नई नहीं है. संगीत की शक्ति से हर भारतीय परिचित है. सुर सम्राट तानसेन ने जब सम्राट अकबर के दरबार में दीपक राग सुनाया तो संगीत के संप्रेषण से दीयों से लौ जल उठे. उनके राग मेघ मल्हार से वर्षा हो जाती थी. बाद में तानसेन अस्वस्थ हुए, तब भी उनकी बहनों ने राग मल्हार सुनाकर ही उन्हें ठीक किया. आधुनिक शोधों के बाद अब यह मान्यता बन चुकी है कि म्यूजिक थेरैपी आत्म विकास और आत्मावलोकन का उत्कृष्ट साधन है. यह न केवल शारीरिक विकारों को नियंत्रित करता है बल्कि व्यक्ति की सामाजिक गतिविधियों को सही दिशा दे सकता है. संगीत का प्रयोग कर किसी भी व्यक्ति की कार्यदक्षता और क्षमता बढ़ाई जा सकती है&lt;br /&gt;एलोपैथी चिकित्सक डा. अनिल पाटिल पिछले 15 सालों से मुम्बई के समीप दादर में म्यजिक थेरैपी से मरीजों का उपचार कर रहे हैं. वे भारत के पहले म्यूजिक थेरैपिस्ट होने का &lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/R_z-psC2I6I/AAAAAAAAAOo/dNpp28B7ACA/s1600-h/DSCN0094.JPG"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://3.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/R_z-psC2I6I/AAAAAAAAAOo/dNpp28B7ACA/s320/DSCN0094.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5187300862975157154" /&gt;&lt;/a&gt;दावा भी करते हैं. रोगियों की जरूरत के अनुसार वे खुद संगीत संयोजन करते हैं, गीतों की रचना करते हैं और अलग-अलग रोगियों की प्रवृति और आवश्यकता के अनुसार उन पर प्रयोग करते हैं. डा. पाटिल का कहना है कि अम्लता, मधुमेह, रक्तचाप और ह्रदय के मरीजों में म्यूजिक थेरैपी से बेहतर परिणाम सामने आए हैं. बच्चों के बेहतर विकास के लिए यह काफी कारगर है. यहां तक कि प्रसव के दौरान होने वाली पीड़ा भी म्यूजिक थेरैपी से कम की जा सकती है. डा. पाटिल ने उपचार की इस पध्दति की सफलता से उत्साहित होकर मुम्बई के समीप ही लोनावाला में एक आश्रम भी बना लिया है, जहां मरीजों का बेहतर सुविधाओं के साथ इलाज किया जाता है. &lt;br /&gt;पर यह संगीत उपचार के लिए किस तरह काम करता है?&lt;br /&gt;बिलासपुर में गठित छत्तीसगढ़ म्यूजिक थेरैपी एसोसिएशन के अध्यक्ष मनीष दत्त का कहना है कि पृथ्वी समेत सृष्टि की प्रत्येक संरचना में किसी न किसी प्रकार का &lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/R_0A1sC2I7I/AAAAAAAAAOw/Dg3n8MADRQc/s1600-h/DSCN0086.JPG"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://4.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/R_0A1sC2I7I/AAAAAAAAAOw/Dg3n8MADRQc/s320/DSCN0086.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5187303268156842930" /&gt;&lt;/a&gt;कम्पन है. वस्तुओं के भार, प्रकृति व गुरूत्वाकर्षण के प्रभाव से कम्पन की यह गति भिन्न हो सकती है. मष्तिष्क, नेत्र, ह्रदय, नाड़ी ही नहीं चलते बल्कि  हमारे शरीर की संरचना कुछ ऐसी है कि इसके प्रत्येक भाग में अलग-अलग आवृत्ति और तीव्रता के कम्पन होते हैं. निरोगी काया में इन कम्पनों की गति कम या अधिक हो जाती है, म्यूजिक थेरैपी के जरिए रोगियों के इन कम्पनों को नियंत्रित किया जाता है तथा निश्चित गति दे दी जाती है. थेरैपिस्ट, रोगियों के लिए अनुकूल संगीत की रचना करते हैं अथवा रचे गए उपयुक्त संगीत की खुराक उन्हें ठीक दवाओं की तरह ही देते हैं. संगीत का कानों से होकर मष्तिष्क, नेत्र और ह्रदय पर पड़ने वाले प्रभाव हम देखते और महसूस करते हैं. इसी तरह शरीर के बाकी अंगों पर भी इसका प्रभाव पड़ता है, वह भले ही हमें प्रत्यक्ष तौर पर महसूस न होता हो. व्याधि से मुक्त करने के लिए इसी सिध्दांत से काम किया जाता है. &lt;br /&gt;महर्षि महेश योगी ने अपने हालैंड स्थित विश्वविद्यालय तथा उसकी दिल्ली शाखा में म्यूजिक थेरेपी पर शोध कराया और यहां प्रयोग करके दिखाया कि एक विशेष प्रकार का संगीत सुनने के दौरान गायें ज्यादा दूध देने लगती हैं. जर्मनी के तानाशाह एडोल्फ हिटलर (1889-1945), 6 माह से सो नहीं पा रहे थे, उन्हें नींद में लाने के लिए तमाम दवाओं का इस्तेमाल किया गया, लाभ नहीं हुआ. तब उस वक्त के प्रख्यात भारतीय संगीतज्ञ ओंकार नाथ ठाकुर की मदद ली गई. उन्होंने अपने संगीत का जादू इस तरह चलाया कि हिटलर को नींद आ गई. &lt;br /&gt;हालांकि श्री दत्त का मानना है कि म्यूजिक थेरैपी इतनी सरल उपचार पध्दति नहीं है. चिकित्सा के क्षेत्र में काम करने वाले दूसरे प्रवीण लोगों की तरह ही इसके चिकित्सकों को पर्याप्त समर्पण भाव व गंभीरता से काम करने से ही रोगियों के उपचार में सफलता मिल सकती है. एक ही तरह का संगीत दो समान विकार वाले रोगियों के लिए कारगर हो यह भी जरूरी नहीं है. प्रत्येक रोगी के लिए उसके शरीर, मष्तिष्क और उसके मनोभावों के अनुसार ही संगीत का चयन करना आवश्यक है. &lt;br /&gt;बहरहाल, अंग्रेजी दवाओं व खर्चीले प्रचलित उपचार पध्दतियों के बीच म्यूजिक थेरैपी रोगियों के लिए आशा की किरण है, जिसने छत्तीसगढ़ में भी दस्तक दे दी है.छत्तीसगढ़ म्यूजिक थेरैपी एसोसिएशन के मुख्य संगीत प्रशिक्षक उस्ताद आरिफ तनवीर का कहना है कि आधुनिक भारत के इतिहास में पांचवे दशक में प्रख्यात संगीत साधक कटनी के घनश्याम दास की किताब संगीत विज्ञान म्यूजिक थेरैपी पर ही केन्द्रित है. हालांकि संगीत के कोर्स में विश्वविद्यालयों ने इसे नहीं लिया है पर अनेक संगीत शिक्षण संस्थानों में यह किताब उपलब्ध है. &lt;br /&gt; बिलासपुर में बनाई गई छत्तीसगढ़ स्तरीय समिति के संस्थापक पुलिस महानिरीक्षक श्री श्रीवास्तव हैं. जिन्हें खेल, संगीत के अलावा अनेक सामाजिक गतिविधियों में हमेशा आगे देखा जाता है. इसके अध्यक्ष संगीत के क्षेत्र में पिछले 50 सालों से सक्रिय मनीष दत्त हैं. मुख्य संगीत प्रशिक्षक आरिफ तनवीर हैं. समिति में राम प्रताप सिंह विमल, डा. योगेश जैन, डा. अलका रहालकर, विवेक जोगलेकर आदि भी शामिल किये गए हैं जो अपने-अपने क्षेत्रों में खासी महारत रखते हैं. छत्तीसगढ़ के हर जिले में इसकी इकाईयां गठित करने की योजना बनाई गई है. एसोसियेशन ने संगीत चिकित्सा के माध्यम से आम लोगों के अलावा पुलिस और सुरक्षा के काम में लगे जवानों का भी उपचार करने की योजना बनाई है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4294876642043841838-7997891769476084553?l=sarokaar.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sarokaar.blogspot.com/feeds/7997891769476084553/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4294876642043841838&amp;postID=7997891769476084553' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4294876642043841838/posts/default/7997891769476084553'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4294876642043841838/posts/default/7997891769476084553'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sarokaar.blogspot.com/2008/04/blog-post.html' title='संगीत से सेहत का राग मिलाने की अनूठी पहल'/><author><name>राजेश अग्रवाल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03166713468895085704</uri><email>agrrajesh@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='08211776964587468572'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/R_0CgsC2I8I/AAAAAAAAAO4/rw1mfH30oIg/s72-c/DSCN0096.JPG' height='72' width='72'/><thr:total 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अन्नपूर्णा गायों, बैलों को भी खूब सजाते हैं, इस सजावट में उनके गले में बांधा जाने वाला पट्टा- सुहई महत्वपूर्ण है, जो एक रंगीन धागे से बनी चौड़ी पट्टी होती है। उन्हें घंटी भी बांधी जाती है, सिर को भी सजाया जाता है।&lt;br /&gt; संभवतः राऊत नाच का उद्गगम धान की फसल आने से ही जुड़ा हुआ है।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/R1yR1NL-UxI/AAAAAAAAACo/k52JwKGAU6g/s1600-h/DSCN9058.JPG"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://1.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/R1yR1NL-UxI/AAAAAAAAACo/k52JwKGAU6g/s320/DSCN9058.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5142145217809240850" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt; धान की कोठियों को धान भरने के पहले गोबर से लीपा-पोता जाता है। कोठियों की सजावट तब तक अधूरी मानी जाती है, जब तक पूर्णिमा की रात्रि में आकर तेज स्वर में समृध्दि की कामना करने वाला लोकगीत गाते हुए यादव गोबर और धान के मिश्रण वाला थाप उस कोठी पर नहीं लगा जाता। इस थाप को सुखधना कहते हैं। गाय-बैलों ने परिश्रम कर भरपूर फसल उगाकर किसान को समृध्द किया और इन गाय-बैलों की देखभाल राऊत ने की, फिर इस राऊत का थाप पड़े बगैर कोठी फलेगी-फूलेगी कैसे और धान भरने का शुभ कार्य कैसे पूरा होगा?&lt;br /&gt;राऊत देखता है कि किसान साल भर की मेहनत से उगे फसल को लेकर आनंदित है। चारों ओर व्यस्तता होती है। खेत में धान की कटाई चल रही होती है। किसान माई-पिल्ला (बाल-बच्चों के साथ) धान समेटने में लगा होता है। छोटे बच्चों के लिए भी काम बंटा हुआ है। वे सीला बीनते हैं- सीला यानि धान की जो बालियां (करपा)  बटोरते हुए बोझा बांधने के दौरान छूट जाती हैं। एक-एक बाली बच्चे बीनते हैं, या तो उसे घर लाकर इकट्ठा करेंगे या फिर तुरंत ही मींज कर रख लेंगे। यह हिस्सा बच्चे का ही होता है। वे चाहें तो इसे बेचकर अपनी पसंद की चीजें खाई, खिलौने आदि तुरंत खरीद लेते हैं या फिर ज्यादा पसंद की चीज खरीदने के लिए साप्ताहिक बाजार का इंतजार करते हैं।  &lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/R1yKxdL-UwI/AAAAAAAAACg/ZpW2WMhK354/s1600-h/DSCF4618.JPG"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://2.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/R1yKxdL-UwI/AAAAAAAAACg/ZpW2WMhK354/s400/DSCF4618.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5142137456803336962" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;  देवउठनी एकादशी के बाद पड़ने वाले साप्ताहिक बाजार के लिए राऊत तैयारी करते हैं। वे खूब सजते धजते हैं। सिर पर पागा (पगड़ी) पहनते हैं, जो एक पूरी रंगीन अथवा सफेद धोती होती है, जिसे बांधकर उसके ऊपर रंगीन कागज लपेटा जाता है। रंगीन कागज नहीं है तो गेंदे की माला भी चलेगी। पसंद और उपलब्धता की बात है। पूरा चेहरा अभ्रक जैसी चीज से पुता होता है। यह वास्तव में होता है- रामरस। नाम राम पर है लेकिन है यह कृष्ण की कर्मभूमि वृंदावन की मिट्टी, वे कृष्ण जो यादवों के ईष्टदेव हैं। दुकानों में इसे खासतौर पर राऊतों की जरूरत को देखते हुए मंगाया जाता है। माथा बिंदिया या फिर तिलक से सजाया जाता है। इसके बाद कमीज, प्रायः यह पूरे बांह की होती है। चटक रंग की होनी चाहिए। उसके ऊपर जैकेट जैसी चीज, जिसे सुरखा कहा जाता है। गले में कौड़ियों से बनी माला, कलाई में भी इसी तरह की माला और कमर में भी कौड़ियों की ही पेटी। नीचे चुस्त पहनी गई धोती, जूते मोजे और घुंघरू।  एक हाथ में सजी हुई मजबूत लाठी, दूसरे हाथ में ढाल, छत्तीसगढ़ी में लाठी को लऊठी और ढाल को फरी कहते हैं। लाठी आक्रमण के लिए और ढाल बचाव के लिए, क्योंकि नृत्य के दौरान लाठियों का बड़ा महत्व है। फिर यादव लाठियों के बगैर घर से निकलते ही नहीं। यह इनका शस्त्र है। शस्त्र चालन का अद्भुत शौर्य प्रदर्शन नृत्य समारोह के दौरान दिखाई देता है। कई बार सिर भी फूट जाते हैं।  पूरा घर यादव बच्चे बूढ़ों के श्रृंगार का सामान जुटाने और उन्हें संवारने में मशगूल होता है क्योंकि ये बाज़ार बिहाने के लिये यानि बाज़ार को जीतने के लिए निकलने वाले हैं। &lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/R1ySgdL-UyI/AAAAAAAAACw/4TigpstWtng/s1600-h/DSCN9077.JPG"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://2.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/R1ySgdL-UyI/AAAAAAAAACw/4TigpstWtng/s320/DSCN9077.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5142145960838583074" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;राऊत केवल मवेशियों की रखवाली नहीं करते बल्कि उन्हें पूरे गांव का रखवाला माना जाता है। जब कभी किसी घर में कोई विपत्ति आती है, तो परिवार के सदस्यों की तरह, चाहे दिन हो या रात-यादव सबसे पहले पहुंचते हैं, अपनी लाठी लेकर। &lt;br /&gt;ऐसे में छत्तीसगढ़ के दूसरे सबसे बड़े शहर संस्कारधानी और राजधानी नहीं बन पाने के बाद से न्यायधानी के नाम से जाना जाने वाला बिलासपुर देवउठनी एकादशी के बाद पड़ने वाले शनिवार को छोड़कर उसके बाद आने वाले शनिवार को राऊत नाच के हंगामे से गूंज उठता है। सड़कों पर लाठियों की ठक-ठक और घुंघरूओं की छम-छम जिस दिशा से गुजरें बरबस लोगों का ध्यान खींच लेती है। इन टोलियों के साथ होता है बजगरियों का समूह, वाद्यकार, जो छत्तीसगढ़ के पिछड़े समाज में हैं कई सालों से अनुसूचित जाति में शामिल किए जाने की मांग कर रहे हैं, उनका यह परम्परागत व्यवसाय है। कुछ गड़वा अच्छी सरकारी नौकरियों में आ गए हैं पर ज्यादातर की माली हालत दयनीय है। वे आज भी समृध्द समुदाय के आश्रित होते हैं। &lt;br /&gt;शादी ब्याह में बैंड बाजों और डीजे का चलन बढ़ने के बाद परी और गड़वा बाजा बजाने वालों के धंधे पर असर पड़ा है, पर ये गांव के किसी भी उल्लास में अपनी भागीदारी निभाने के लिये पहुंच जाते हैं। इनकी पूछ परख सिर्फ इनके पीछे किए जाने वाले खर्चों की वजह से नहीं की जाती है, वरना ये आज भी उत्सव और शादी ब्याह में उल्लास का असल मजा देते हैं जब इनका ओंगन (वेस्टेज इंजन आयल)  से पुता हुआ चमड़े का नगाड़ा जैसा वाद्य गुदड़ुम गुदड़ुम का स्वर निकालता है। इसमें चार चांद लगा देती हैं परियां। ये परियां खूबसूरती में कल की हेमामालिनी और आज की ऐश्वर्या से कम नहीं। ये बहुत गाढ़ा मेकअप करके, बहुत चटकीली सलवार सूट या घाघरा चोली पहनकर गड़वा बाजा की टोली के साथ ही निकलती हैं। ये बहुत अच्छा गाती भी हैं। लेकिन राज़ की बात यह है कि ये युवतियां नहीं युवक हैं। जी हां, महिलाओं का स्वांग धरकर, लिपस्टिक, बिंदिया, पाउडर पोतकर जब निकलते हैं तो लोग भ्रम में पड़ जाते हैं। और इस बात का पता होने के बाद भी केवल मज़ा लेने के लिये युवक इनपर फिकरे कसते हैं, सीटियां बजाते हैं।&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/R1yU-tL-U0I/AAAAAAAAADA/ykMg_nh8bWg/s1600-h/SSA40490.JPG"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://3.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/R1yU-tL-U0I/AAAAAAAAADA/ykMg_nh8bWg/s400/SSA40490.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5142148679552881474" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;br /&gt;आजकल ये बजगरिये कुछ मंहगे हैं। इसलिए नहीं कि इनका मार्केट रेट बढ़ गया है, बल्कि इसलिए कि मंहगाई बढ़ गई है। एक टोली में होते हैं कम से कम दस से पन्द्रह लोग और उनको घूमना है दस बारह दिन तक बाजार बिहाने के लिए, आंगन में हांका के लिए यादव बंधुओं की टोली के साथ। इतने लोगों का रोज का चांवल-दाल और फिर सब उत्साह में भरे हैं, किसान भी, यादव भी, बजगरियों के लिए भी तो यह सीजन है, उनका भी हक बनता है। कुछ बचे तो आने वाले एक दो महीने की रोटी नसीब हो। कई बजगरियों की टोली 20 से 25 हजार तक में तय होती है। बिलासपुर राऊत नाच महोत्सव से पहले, शहर के सबसे पुराने बाजार शनिचरी में इनका जमघट लग जाता है। ठीक अरपा नदी के रपटे के ऊपर। राऊतों के लीडर आते हैं, सौदा पक्का करके उनको उठा ले जाते हैं। ये सब उस शनिवार की दोपहर बाद से शनिचरी बाजार के पास ही स्थित लगभग 100 साल पुराने लाल बहादुर शास्त्री स्कूल के मैदान मे इकट्ठे होने लगते हैं। टोलियों की संख्या एक सौ से उपर होती है। एक टोली में 50 से 200 यादव और हर टोली के पीछे दर्जन भर बजगरिये। शहनाई, गड़वा बाजा, तुरही, बेन्जो और तमाम पारम्परिक और जो उपलब्ध है उन आधुनिक वाद्य यंत्रों के साथ। मजे की बात है कि गड़वा बाजा को नेपथ्य में होना चाहिए मगर यहां ऐसा नहीं होता। गड़वा बाजा ही धुन की लम्बाई तय करता है। गड़वा बाजा थमते ही सारे वाद्य थम जाते हैं। परियां इन धुनों पर थिरकती हैं, और गला खोल के गाती हैं। उनके गायन में रामचरित मानस के दोहे, गीत, जगजीत सिंह की गज़लें और डिस्को कुछ भी हो सकते हैं।&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/R1yT5dL-UzI/AAAAAAAAAC4/6gtMDSaTTUU/s1600-h/DSCN9093.JPG"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://2.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/R1yT5dL-UzI/AAAAAAAAAC4/6gtMDSaTTUU/s400/DSCN9093.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5142147489846940466" /&gt;&lt;/a&gt;आनंद भरपूर आता है। लेकिन इससे भी महत्व का है राऊतों का नाच और उनके दोहे। लाठियां लहराते, उछालते और शौर्य प्रदर्शन करते हुए जब वे निकलते हैं और जब वे जीवन- दर्शन से जुड़े दोहों को हुंकार लगाकर आकाश हिलाने की कोशिश करते हैं तो फिर जबरदस्त माहौल बन जाता है। इन दोहों में भी ज्यादातर लोक जीवन की पीड़ा, सामाजिक समरसता के संदेश और जीवन के गूढ़ रहस्यों पर टिप्पणियां होती है। कबीर, गुरूनानक, तुलसीदास के दोहे और उनके उध्दरणों से तैयार की गई रचनाएं दो पंक्तियों की होती है-एक लाईन जैसे ही मुख्य स्वर की ओर से पूरा होता है-दूसरा यादव लाठियां लहराकर दूसरी लाईन पूरी कर देता है। दूसरी लाइन पूरी होते ही शुरू हो जाता परियों, राऊतों का नाच और गड़वा बाजा टीम का धुन। &lt;br /&gt;इस बार भी आई टोलियों की संख्या 70 से अधिक थी। कोई बस में चढ़कर पहुंचे तो कोई स्पेशल मेटाडोर करके आए, आसपास की कई टीमें तो पैदल ही पहुंच गईं। शाम से लेकर रात दो बजे तक इनका प्रदर्शन होता रहा। भाग लेने वालों की संख्या कभी घट जाती है कभी बढ़ जाती है। लेकिन परम्परा जिंदा है अपनी भरपूर ताकत से। बिना किसी सरकारी सहायता के। &lt;br /&gt;राऊत नाच तो एक ऐसा नृत्य़ है, जिसमें पात्र तो यादव हैं पर इसका आनन्द हर आंगन में उठाया जाता है। यादव आंगन-आंगन पहुंचते हैं। गांव का हर घर इंतजार करता है कि यादव उनके यहां कब आएंगे और गड़वा की  धमक के साथ समृध्दि की कामना वाले गीत गाएंगे।&lt;br /&gt;30 साल पुराने हो चुके राऊत नाच महोत्सव के मौजूदा स्वरूप को आकार देने वाले शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र से जुड़े डा. कालीचरण यादव ने बताया कि राऊत नाच तो लोकपर्व है। इसे केवल आयोजकों ने व्यवस्थित करने और उसे गौरव प्रदान करने का प्रयास किया है। कोई भी लोक-नृत्य थमे हुए तालाब का पानी नहीं बल्कि बहता हुआ झरना होता है। राऊत नाच में जो बदलाव आए हैं समय के साथ स्वाभाविक रूप से आता गया है। आयोजकों ने केवल उन्हें एकजुट करने के लिए कोशिश की है और इस नाच की महत्ता के अनुसार उसे मंच दिया है। अब इस महोत्सव में एक लाख रूपयों से अधिक के इनाम हर साल दिये जाते हैं। हर साल दर्जनों शील्ड बांटे जाते हैं। अब पिछले कुछ सालों से प्रतिभावान बच्चों को भी पुरस्कृत किया जाने लगा है। &lt;br /&gt;जब आसपास के गांवों से शनिचरी का बाजार बिहाने के लिए यादवों की टोली आती थी तो रास्ते उबड़ खाबड़ होते थे। कईयों को चोट लग जाती खी। त्योहार के उल्लास में और लाठी संचालन के दौरान इतनी लड़ाई उनके बीच हो जाती थी, कि हर महोत्सव के बाद कहीं न कहीं हत्या आदि की वारदात सुनाई देती थी। यह लड़ाई दो परिवारों के रंजिश में भी बदल जाती थी और तब एक परिवार को मुखिया खोना पड़ता था, तो दूसरे परिवार जेल में होता था। पिछले 15-20 सालों से कम से कम बिलासपुर जिले में इस तरह की कोई घटना नहीं हुई है। &lt;br /&gt;राऊत नाच महोत्सव ने जो दिशा दी, उसके चलते छत्तीसगढ़ के कई अन्य गांवों में भी इस तरह के महोत्सव आयोजित किये जाने लगे हैं। डा. कालीचरण बताते हैं कि देश के जिस भाग में भी दूध का व्यवसाय है राऊत नाच या इससे मिलता जुलता लोक पर्व मनाया जाता है। उत्तर भारत के अनेक राज्यों में यह मनाया जाता है। पर जैसा समृध्द छत्तीसगढ़ का राऊत नाच है, वैसा कोई नहीं। &lt;br /&gt;एक तरफ अनेक लोकनृत्यों पर्वों को छत्तीसगढ़ में ही राजाश्रय दिए जाने के बाद भी बचाया नहीं जा सका है, वहीं राऊत नाच बिना किसी सरकारी मदद के इसे मनाने वाले लोगों के जुनून पर फल-फूल रहा है। अब तो राऊतनाच महोत्सव एक पहचान बन गया है बिलासपुर का। हजारों लोगों की भीड़ इस बार भी लालबहादुर शास्त्री स्कूल प्रांगण में उमड़ी। यह एक ऐसा कार्यक्रम है जहां राजनेता मुख्य अतिथि बनने के लिए लालायित होते हैं। आयोजक कुछ-कुछ इस बात का ख्याल भी रखते हैं। हर साल अतिथि बदलते रहते हैं पर कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हैं पूर्व मंत्री बीआर यादव। वे शुरू से इस आयोजन की रीढ़ रहे हैं।&lt;br /&gt;All photographs are contributed by Aslam, reporter Daily Deshbandhu, Bilaspur.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4294876642043841838-6477141914796264087?l=sarokaar.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sarokaar.blogspot.com/feeds/6477141914796264087/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4294876642043841838&amp;postID=6477141914796264087' title='6 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4294876642043841838/posts/default/6477141914796264087'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4294876642043841838/posts/default/6477141914796264087'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sarokaar.blogspot.com/2007/12/blog-post.html' title='छत्तीसगढ के हर आंगन का लोकपर्व राऊतनाच'/><author><name>राजेश अग्रवाल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03166713468895085704</uri><email>agrrajesh@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='08211776964587468572'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/R1yR1NL-UxI/AAAAAAAAACo/k52JwKGAU6g/s72-c/DSCN9058.JPG' height='72' width='72'/><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-4294876642043841838.post-3582636938930741456</id><published>2007-11-29T00:08:00.000-08:00</published><updated>2007-12-01T22:48:01.780-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='खास खबर'/><title type='text'>एक प्रेस रिपोर्टर का भगीरथ प्रयास, मासूम को आखिर नई जिन्दगी मिली</title><content type='html'>&lt;em&gt;&lt;strong&gt;देश की एक अरब की आबादी में अब तक केवल 57 ऐसे लोगों की पहचान हो पाई जिनका ब्लड ग्रुप-बाम्बे ब्लड ग्रुप है। ऐसे में एक मासूम बालक के दिल में सुराख का आपरेशन कराने के लिए 3 यूनिट बाम्बे ब्लड की जरूरत पड़ी। गरीब मां बाप अरविन्द के जीने की आशा छोड़ चुके थे। रिपोर्टर असलम ने मीडिया की पहुंच का इस्तेमाल किया और अरविन्द का सफल आपरेशन हो सका। &lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;ऐसी हर खबर जो सनसनी फैलाए, पाठकों की संवेदनाओं को झकझोर दे, किसी भी अखबारनवीस के लिए बड़े काम की होती है। प्रेस रिपोर्टर और प्रेस छायाकार हर दिन किसी अनूठी खबर की तलाश सुबह से शुरू करते देर रात तक तैयार कर लेते हैं। &lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/R08ENgjhBaI/AAAAAAAAAA8/SHg-Ayk7mfU/s1600-h/DSCN4542.JPG"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://1.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/R08ENgjhBaI/AAAAAAAAAA8/SHg-Ayk7mfU/s200/DSCN4542.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5138330329976735138" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt; छप जाने के बाद अगली सुबह फिर किसी नई खबर की खोज शुरू हो जाती है। दैनिक अखबारों में काम करने वाले रिपोर्टरों के पास अपने कोटे की खबरें तैयार कर एक तय समय पर देने का दबाव होता है और वह अपने नाते-रिश्तेदारों के सुख-दुख के लिए भी बहुत कम समय निकाल पाता है। ऊपर से कस्बों में काम करने वाले पत्रकारों की पगार इतनी कम होती है कि अपने परिवार के लिए रोजमर्रा का इंतजाम कर लेने में ही सुख की अनुभूति कर लेता है। उनके भीतर आमतौर पर समाज का पहरेदार होने का भाव अहंकार भी पैदा कर देता है, जो किसी की भलाई करने से उन्हें रोकता है। &lt;br /&gt;ऐसी हालत में अगर कोई रिपोर्टर किसी दलित, गरीब गंभीर ह्रदय रोग से पीड़ित बच्चे के निराश हो चुके माता-पिता के दुख में खुद को शामिल कर लेता है और देशभर में मदद की गुहार लगाकर बालक का जीवन बचाने में सफल हो जाता है तो सुखद अनुभूति होती है। &lt;br /&gt;इस मार्मिक घटना का अंत बहुत सुखद है और जिसके चलते एक 90रूपए की रोजी कमाने वाला बढ़ई अपने गरीब बच्चे के पीछे दो लाख रूपए का इंतजाम कर दुर्लभ आपरेशन करा सका है। सवाल केवल रुपए का नहीं, यहां पर उससे भी बड़ा पहाड़ था बाम्बे ब्लड ग्रुप का प्रबंध करना। इस ग्रुप का खून न केवल हिन्दुस्तान में बल्कि पूरी दुनिया में बहुत कम लोगों में पाया जाता है। हिन्दुस्तान की एक अरब से अधिक की आबादी में अब तक केवल 57 लोगों की पहचान हो पाई है, जिनका ब्लड बाम्बे ग्रुप का है। &lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/R0538wjhBYI/AAAAAAAAAAY/h5w3oz9UIwc/s1600-h/DSCN0600.JPG"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://1.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/R0538wjhBYI/AAAAAAAAAAY/h5w3oz9UIwc/s320/DSCN0600.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5138176110586037634" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;बिलासपुर छत्तीसगढ़ के स्लम एरिया में रहने वाले बढ़ई अश्वनी कुमार बघेल के 6 साल के बेटे के बारे में यहां के एक दैनिक अखबार में काम करने वाले रिपोर्टर छायाकार असलम को तब मालूम हुआ जब वह किसी खबर के लिए यहां के अपोलो हास्पीटल में पहुंचा। वहां किसी से बातचीत के दौरान ही पता चला कि एक बालक यहां कल तक भर्ती था, जिसके ह्रदय में सुराख था। डाक्टरों ने उसे इस लिए डिस्चार्ज कर दिया क्योंकि उस बालक का ब्लड ग्रुप बाम्बे है, जो अत्यन्त सीमित है। इस बालक के लिए राज्य सरकार ने संजीवनी राहत कोष से राशि मंजूर की थी, जिसे अपोलो प्रबंधन ने दो दिन का खर्च काटकर वापस भेज दिया, अपनी रिपोर्ट में बिना इस बात का जिक्र किए कि अरविन्द का इलाज नहीं हो पाया है। असलम को लगा कि यह खबर बनती है। उसने बताए पते पर जाकर अरविन्द और उसके माता-पिता की तलाश शुरू की। पहले पन्ने की खबर बनी। छपने के बाद बहुत से पाठकों को मालूम हुआ कि कोई ऐसा ब्लड ग्रुप है, जिसकी उपलब्धता अत्यन्त दुर्लभ है। छपने के बाद असलम इस खबर से अलग नहीं हो पाया। मासूम अरविन्द अपनी बीमारी की गंभीरता से अनजान था, और मोहक मुस्कान लिए खेलता था पर थोड़ी ही देर में हांफने लगता था। गरीब, दलित और मामूली पढ़े लिखे मां-बाप अपने बेटे के बचने की उम्मीद पूरी तरह छोड़ चुके थे। उनकी लाचारी-बेबसी असलम को परेशान कर रही थी। &lt;br /&gt;इस बीच शहर के सारे अखबारों में मासूम अरविन्द की खबर आई। &lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/R08FXwjhBbI/AAAAAAAAABE/sGYKGobE9wE/s1600-h/PA100135.JPG"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://2.bp.blogspot.com/_kAbQECGcYOM/R08FXwjhBbI/AAAAAAAAABE/sGYKGobE9wE/s320/PA100135.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5138331605582022066" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;अपोलो हास्पीटल के डाक्टर भी इसके बाद फिर सक्रिय हुए। असलम के सम्पर्क करने पर उन्होंने कहा कि 4 यूनिट बाम्बे ब्लड यदि उन्हें मिल जाता है तो वे अरविन्द का आपरेशन कर देंगे। असलम ने अरविन्द के लिए रक्त जुटाने के काम को एक मिशन की तरह लिया। उसने खबर छापने के बाद इंटरनेट का सहारा लिया। दर्जनों वेबसाइट्स में उसने तलाश की क्या बाम्बे ब्लड ग्रुप का कोई दानदाता मिलेगा? असलम को इससे खास मदद नहीं मिली। अपोलो हास्पीटल प्रबंधन ने कुछ गंभीर होकर बाम्बे ग्रुप के ब्लड की तलाश की, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। यहां के प्रबंधकों ने बताया कि उन्होंने देशभर के नामी ब्लड बैंकों में पता लगा लिया है, कहीं पर भी इसकी उपलब्धता नहीं है। असलम ने न्यूयार्क में दुनिया के सबसे बड़े माने जाने वाले ब्लड बैंक, न्यूयार्क ब्लड बैंक को भी मेल किया और अरविन्द के लिए बाम्बे ब्लड की मांग की। वहां से जवाब आया कि बेहतर होगा, आप हिन्दुस्तान में ही तलाश करें। &lt;br /&gt;असलम इस पर भी निराश नहीं हुआ। तलाश के दौरान कोरबा के एक युवक का पता चला, जिसका रक्त बाम्बे ग्रुप का था। भगीरथ यादव नाम का यह युवक जन्म से ही दोनों पैरों से अशक्त है। अरविन्द की पीड़ा सुनकर वह तत्काल खून देने के लिए तैयार हो गया। इस तरह एक शुरूआत हो गई। लेकिन अभी भी 3 यूनिट और खून की जरूरत थी। मीडिया से जुड़े असलम ने अपनी ताकत इस तरफ भी लगाई। याहू ग्रुप के अलावा देश भर में रक्तदाताओं के लिए काम करने वालों का वेबसाइट्स में पता लगाना शुरू किया। अनेक लोगों से मेल पर जानकारी शेयर की गई और मेसेन्जर पर चर्चा हुई। इसके चलते जल्द ही अरविन्द का मामला तमाम राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं और इलेक्ट्रानिक मीडिया के माध्यम से देश-विदेश में पहुंच गया। जी न्यूज, सहारा न्यूज, ईटीवी, बीबीसी हिन्दी डाटकाम, इंडिया टुडे आदि में अरविन्द की हालत पर समाचार बने। स्टार न्यूज ने इस पर 3 मई 2007 को लाइव विशेष रिपोर्ट प्रसारित किया। आईबीएन7 ने इस पर 30 मिनट तक अरविन्द की दास्तां दिखाई। जिसका शीर्षक दिया- अंकल मुझे बचा लो। देश भर के लोगों के इन दफ्तरों में फोन आए और लोगों ने असलम तथा अरविन्द के पिता अश्वनी से सम्पर्क शुरू कर दिया।&lt;br /&gt;अपोलो ने हाथ खींचा&lt;br /&gt;भगीरथ यादव ने सबसे पहले एक यूनिट खून दिया। इसके बाद राऊरकेला के एक भले आदमी ने आकर अपोलो में अपना ब्लड दिया और अरविन्द से मिले बगैर ही वापस चला गया। मुम्बई के डोम्बीवेली से एक अपरिचित एमआर ने अपने खर्च पर वहां के किसी ब्लड बैंक से एक यूनिट ब्लड खरीदा और उसे सुरक्षित अपोलो छोड़ गया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस तरह से इस विशाल देश में चिन्हित बाम्बे ब्लड ग्रुप के 57 लोगों में से ऐसे 3 लोगों की तलाश हो गई जिन्होंने अपना रक्त अरविन्द के लिए दिया । अपोलो के चिकित्सक डा. संजय जैन 3 यूनिट पर भी अरविन्द का आपरेशन करने के लिए तैयार हो गए। लेकिन आपरेशन की तय तिथि के ठीक एक दिन पहले वे अपना हौसला खो बैठे और यहां की सुविधाओं में कमी का हवाला देते हुए आपरेशन स्थगित कर चैन्नई अपोलो रिफर कर दिया। अरविन्द का पिता निराश हुआ लेकिन उम्मीद तो छोड़ी नहीं जा सकती थी। वह अरविन्द को लेकर चैन्नई गया। वहां के डाक्टरों ने और भी हताश कर दिया। उन्होंने कह दिया कि 3 यूनिट ब्लड से तो कुछ नहीं हो पाएगा, कम से कम 6 यूनिट की जरूरत पडे़गी। यह भी कहा गया कि जो खून अपोलो बिलासपुर के ब्लड बैंक में जमा है, वह अरविन्द के किसी काम नहीं आएगा और उन्हें फ्रेश खून की जरूरत पड़ेगी।&lt;br /&gt;इसके बाद लगातार प्रयास जारी रहे। अनेक लोगों के फोन आते रहे और अपनी ओर से मदद करने की कोशिश करते रहे।&lt;br /&gt;रायगढ़ के सतीश सिंह ठाकुर और टाटानगर, जमशेदपुर के अमिताभ कुमार सिंह ने ब्लड देने की इच्छा जताई और कहा कि वे जहां उनकी जरूरत हो पहुंचने के लिए तैयार हैं। एक टेलीकाम इंडस्ट्री के चीफ मैनेजर बी एस श्रीधर, जो बैंगलोर से ही हैं, अपना रक्त देने के लिए तैयार हो गए। इस बीच अपोलो बिलासपुर में जमा कराया गया दुर्लभ रक्त खराब हो चुका था। &lt;br /&gt;इसी बीच असलम को उसके एक मित्र ने बैंगलोर के एक अस्पताल नारायण ह्रदयालय बैंगलोर का पता दिया और कहा कि वहां पर कम खर्च में अच्छी सुविधाओं के साथ अरविन्द का आपरेशन हो सकता है। उस हास्पीटल ने अच्छा सहयोग दिया। यहां असलम ने अस्पताल के चेयरमैन डा. देवी शेट्ठी से सम्पर्क किया। डाक्टर ने कहा कि वे कम से कम खर्च पर अरविन्द का इलाज करेंगे और बाकी ब्लड की भी व्यवस्था करेंगे। नारायण ह्रदयालय बैंगलोर, वही हास्पीटल है, जहां पाकिस्तानी बच्ची नूर के ह्रदय का आपरेशन हुआ था, जिसकी देशभर में चर्चा थी। &lt;br /&gt;इसके बाद आपरेशन की तय तारीख के 15 दिन पहले 7 अक्टूबर को अरविन्द और उसके परिजन बैंगलोर पहुंच गए। बाद में असलम और दोनों रक्तदाता अमिताभ और सतीश भी वहां पहुंचे। 24 अक्टूबर को डा. सी रेड्डी और डा. संदीप के साथ 4 डाक्टरों की टीम ने अरविन्द का 4 घंटे में सफल ओपन हार्ट सर्जरी की। &lt;br /&gt;अब अरविन्द अपने घर लौट चुका है और हाल ही में उसने अपना आठवां जन्मदिन मनाया। &lt;br /&gt;अरविन्द के साथ सबको हमदर्दी रही। जाने कितने लोगों ने अपनी अपनी भूमिका निभाई। बलौदा कालेज में पढ़ाने वाली शिवकुमारी कुर्रे, नोविनो बैटरी के अधिकारी ए के पौराणिक, राकेश बाटवे, सुनील मित्तल, प्रमोद अग्रवाल, निखिल उपाध्याय, अफजल हुसैन, मीना लुसानी- कुवैत आदि ने अपनी अपनी तरफ से मदद दी। अरविन्द के मामले में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह और राजस्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने विशेष रूचि लेकर संजीवनी कोष से राशि स्वीकृत की, इसके बावजूद की राज्य के अनुमोदित अस्पतालों में नारायण ह्रदयालय का नाम नहीं था। एसईसीएल बिलासपुर ने भी जरूरत के अनुसार आर्थिक सहायता दी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अरविन्द के मामले में असलम ने दुर्लभ बाम्बे ब्लड समूह की खोज के लिए अब बाम्बे ब्लड हेल्पलाइन रक्तदाताओं के सहयोग से बनाया है और इसमें ज्यादा से ज्यादा लोगों को जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। असलम की संस्था से वह हर कोई जुड़ सकता है। संस्था का उद्देश्य है कि लोगों के रक्त समूह की पहचान के लिए देश भर में अभियान चले और इसमें से खासतौर पर बाम्बे ब्लड ग्रुप वालों की पहचान की जाए।  आप अब्दुल असलम से सम्पर्क करना चाहते हैं तो उनका ई-मेल आईडी है bombayblood.bsp@rediffmail.com और aslamimage@rediffmail.com.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/4294876642043841838-3582636938930741456?l=sarokaar.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sarokaar.blogspot.com/feeds/3582636938930741456/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=4294876642043841838&amp;postID=3582636938930741456' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4294876642043841838/posts/default/3582636938930741456'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/4294876642043841838/posts/default/3582636938930741456'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sarokaar.blogspot.com/2007/11/blog-post_29.html' title='एक प्रेस रिपोर्टर का भगीरथ प्रयास, मासूम को आखिर नई जिन्दगी मिली'/><author><name>राजेश अग्रवाल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03166713468895085704</uri><email>agrrajesh@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' 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अग्रवाल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03166713468895085704</uri><email>agrrajesh@gmail.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='08211776964587468572'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>1</thr:total></entry></feed>