बुधवार, ९ सितम्बर २००९

नक्सल से निपटने फिजूल की पंचायत

आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों के लिए केन्द्रीय गृह मंत्री पी.चिदम्बरम् के नये पुनर्वास पैकेज से उत्साहित होने की कोई वजह नहीं दिखती. यह छत्तीसगढ़ सरकार की पिछले 10 साल से चल रही पुनर्वास नीति का ही विस्तार है, जो बुरी तरह से असफल रही है. भरोसे व सुरक्षा के अभाव में छत्तीसगढ़ में केवल गिनती के नक्सलियों ने हथियार डाले, जबकि इससे कई गुना ज्यादा नये लोग बीते सालों में संघम और दलम् में शामिल हो चुके हैं. केन्द्रीय गृह मंत्री से तो उम्मीद की जा रही थी कि राजनांदगांव के पुलिस अधीक्षक विनोद चौबे के मारे जाने के बाद बस्तर से नक्सलियों को खदेड़ने के लिए वे आर्थिक, राजनैतिक व रणनीतिक मोर्चे पर किसी ठोस रणनीति की घोषणा करते, लेकिन ताज़ा घोषणा किसी पुरानी फाइल पर चढ़ाई गई एक नई नोटशीट से ज्यादा कुछ नहीं है.
देश के नक्सल प्रभावित इलाकों में सबसे खतरनाक स्थिति छत्तीसगढ़ की है. बस्तर संभाग के जगदलपुर, नारायणपुर, कांकेर, दंतेवाड़ा, बीजापुर, बलरामपुर और इससे लगे जिलों राजनांदगांव, धमतरी में नक्सली तमाम मुठभेड़ों के बाद अचानक आ धमकते हैं. ये बारूदी सुरंग बिछाकर हमला करते हैं और अपना बिना कोई नुकसान उठाए एक साथ दर्जनों जवानों को मार गिराते हैं. बीते जुलाई माह में जब राजनांदगांव के पुलिस अधीक्षक विनोद चौबे समेत 30 से ज्यादा जवानों को 3 किलोमीटर लम्बा एम्बुस लगाकर नक्सलियों ने मार डाला, तो उनकी बढ़ी हुई ताकत ने देश के प्रधानमंत्री और गृह मंत्री तक को चिंता में डाल दिया. विपक्ष ने छत्तीसगढ़ सरकार की नाक में दम कर डाला. पूरे राज्य में शोक व सन्नाटा था. लग रहा था कि तीन दशक पुरानी इस समस्या से छुटकारा पाने जल्द ही कोई निर्णायक कार्रवाई शुरू होगी. लेकिन हुआ क्या? नक्सलियों ने अभी भी सुरक्षा बलों को चकमा देकर घेरना और पुलिस के मुख़बिरों तथा विशेष पुलिस अधिकारी बनाए गए आदिवासी युवकों को गोलियों से उड़ाना, उनका गला रेतना जारी रखा है. मदनवाड़ा मुठभेड़ में चौबे की मौत के बाद से केन्द्रीय बलों व राज्य पुलिस के बीच टकराव व मतभेद बढ़े हैं. इनके बीच सुलह कराने के लिए मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह को भी पंचायत बुलानी पड़ी. विषम परिस्थितियों के चलते जवानों ने मोर्चे पर जाने से इंकार किया, इनमें से 13 जवानों की मनाही को उनकी कायरता समझी गई और उन्हें नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया. दो बड़ी जन-अदालतें लगाकर नक्सलियों ने पुलिस के 4 मुखबिरों की गला रेतकर हत्या कर दी. पुलिस फोर्स उन गांवों तक मामले की जांच करने के लिए नहीं पहुंचने की हिम्मत नहीं जुटा पाई. खुद ग्रामीण उनकी लाशें लेकर थाने तक पहुंचे तब जांच की खानापूर्ति की गई. उस हर जगह पर नक्सली हमले कर रहे हैं जहां नये टावर लगाए जा रहे हैं, नई सड़कें बनाई जा रही है, नई चौकियों के लिए ईंट पत्थर भेजे जा रहे हैं और उन लोगों की हत्या की जा रही है जो इन कामों में मजदूरी कर रहे हैं. जवानों को बस में बिठाने वाले चालकों को मार डालने की धमकी दी जा रही है. नक्सलियों ने पुलिस को घेरने के लिए एक ही परिवार के 7 लोगों को जिंदा जलाने की घटना होने की एक फर्जी सूचना भी थाने तक भेजी, लेकिन पुलिस अपनी सतर्कता से उनके जाल में फंसने से बच गई. ये सब वे घटनाएं हैं जो 13 जुलाई 2009 को मदनवाड़ा हमले के बाद राजधानी तक पहुंची. बहुत सी ख़बरें तो दण्डकारण्य के बीहड़ों से बाहर निकल भी नहीं पातीं.
अब सर्चिंग आपरेशनों में काफी सतर्कता बरती जा रही है. सीआरपीएफ जवान तलाशी मानदंडों का कड़ाई से पालन कर रहे हैं. उन्होंने गश्त के लिए 4 किलोमीटर से ज्यादा दूर नहीं जाने का फैसला किया है. मतलब यह कि हालिया दिनों में नक्सली बस्तर के अंदरूनी इलाकों में अपना तेजी से अपना पैर पसारने में लगे हुए हैं. धमतरी और राजनांदगांव में बड़ी वारदातें कर उन्होंने नये क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति का सबूत तो दे ही दिया है. यह वह दौर है जब नक्सलियों के सफाये के लिए ठोस काम बस्तर में होने चाहिए थे, क्योंकि एक आला अफसर को जान से हाथ धोना पड़ा, और मौके का फायदा उठाकर पूरे बस्तर में नक्सली अपनी दहशत कायम करने में सफल दिखाई दे रहे हैं.
दरअसल, जब-जब नक्सली हमला नहीं होता, सरकार और सुरक्षा बलों को यह भ्रम हो जाता है कि वे कमजोर पड़ गए हैं और ग्रामीण अब सरकार के पुनर्वास पैकेज की तरफ आकर्षित होकर सामने आएंगे. जबकि बड़ी वारदातें कर नक्सलियों का खामोश दिखना, दबाव बढ़ने पर वार्ता का प्रस्ताव रख देना, मुठभेड़ में मात खाने की आशंका होने पर पीछे हटना, यह सब उनकी रणनीति का हिस्सा है. बस्तर में हालात खराब है और जरूरत जमीनी कार्रवाई की है. साथ ही जरूरत है बस्तर के लोगों का भरोसा जीतने के लिए उनके बीच सरकार के पहुंचने का, उनका विश्वास जीतने का. इनके बगैर तो नक्सलियों के ख़िलाफ लड़ाई ही नहीं लड़ी जा सकेगी. लेकिन उल्टे दूरी बनाई जा रही है और केन्द्र सरकार को सूझ गया कि वह पुनर्वास योजना घोषित करे, जो न केवल भ्रमित करने वाला है, ध्यान बंटाने वाला और वक्त बर्बाद करने वाला है बल्कि बस्तर में काम करने वाले चुनिंदा परिश्रमी अधिकारियों को इस धोखे में रखने वाला है कि नक्सलियों को अब पकड़ने की जरूरत नहीं वे खुद उनके पास आएंगे. राहत पैकेज लागू करना सरकार की उदारता का परिचय देता है, या फैसले को दिल्ली से ही बैठकर निपटाने का रास्ता दिखा रहा है? क्या पुनर्वास की गारंटी उन्हें मिल जाना मुख्य धारा में लौटने वाले लोगों को सुरक्षा की गारंटी भी दिलाएगा?
अब जरा ध्यान दिया जाए कि केन्द्र सरकार के राहत पैकेज में क्या है. आत्मसमर्पण करने वाले हर नक्सली को व्यावसायिक प्रशिक्षण तथा तीन वर्ष तक प्रति माह दो हजार रूपये दिए जाएंगे. इसके अलावा नक्सली के आत्मसमर्पण करते ही डेढ लाख की राशि उसके नाम से बैंक में सावधि जमा खाते में रख दी जायेगी, जिसे वह तीन वर्ष बाद निकाल सकेगा. गृह मंत्रालय द्वारा जारी दिशानिर्देशों के अनुसार यदि कोई नक्सली आत्मसमर्पण करते समय हथियार भी सौंपता है तो उसे अलग से प्रोत्साहन राशि दी जाएगी. जनरल परपज मशीनगन आरपीजीयूएमजी या स्निफर राइफल सौंपने पर 25 हजार रूपये तथा ए के श्रृंखला की किसी भी राइफल के लिए 15 हजार रू दिए जायेंगे. पिस्तौल या रिवाल्वर या बारूदी सुरंग के लिए 3 हजार रूपये दिये जायेंगे. जमीन से हवा पर मार करने वाली मिसाइलें सौंपने पर 20 हजार रू. तथा किसी भी तरह के कारतूस के लिए तीन रपये प्रति कारतूस दिये जायेंगे. एक सेटेलाइट फोन के लिए 10 हजार रू. तथा कम दूरी तक काम करने वाले वायरलेस सेट के लिए एक हजार रूपए और लंबी दूरी के सेट के लिए 5 हजार रू. दिये जायेंगे. कुछ अन्य हथियारों के लिए भी राशि तय की गई है.
केन्द्र सरकार की ओर से घोषित यह पैकेज छत्तीसगढ़ में सन् 2000 से लागू पुनर्वास पैकेज का ही विस्तारित स्वरूप है. छत्तीसगढ़ में भी समर्पण करने वाले नक्सलियों के प्रति कम उदारता नहीं रही है. पहले ही छत्तीसगढ़ में समर्पण करने वाले नक्सलियों के अपराधिक मामले समाप्त कर दिये जाते हैं. एमएलजी जैसे घातक हथियार के साथ समर्पण करने वालों को 3 लाख रूपये दिए जाते हैं, एके 47 के साथ समर्पण करने वालों को दो लाख, एसएलआर के साथ समर्पण करने वालों को एक लाख, थ्री नाट थ्री लाने वालों को 75 हजार तथा बंदूक के साथ समर्पण करने वालों को 50 हजार रूपये नगद दिए जाते हैं. राज्य सरकार ने कृषि भूमि देने तथा सरकारी नौकरी में प्राथमिकता देने की व्यवस्था भी कर रखी है. केन्द्र सरकार की नीति में अतिरिक्त आकर्षण यह है कि इसमें नक्सलियों को व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया जाएगा और प्रतिमाह दो हजार रूपये भी दिए जाएंगे. इसके अलावा उनके नाम पर डेढ़ लाख रूपये की एफ डी कराई जाएगी, जिसे वे अच्छे चालचलन के बाद बाद 3 साल के बाद निकाल सकेंगे.
आशय यह है कि सरकार की ओर से आर्थिक प्रलोभन न तो अनोखा है, न ही ऐसा पहली बार किया गया है. यदि गृह मंत्रालय के अधिकारियों ने चिदम्बरम् को अंधेरे में रखा होगा कि इसका दूरगामी असर पड़ने वाला है तो वे जरा छत्तीसगढ़ में लागू पिछले 10 साल के पुनर्वास पैकेज का ही आंकड़ा देख लें. अब तक 140 शातिर नक्सलियों ने ही आत्मसमर्पण किया है. और करीब 2400 ऐसे आदिवासियों ने समर्पण किया है, जिन्हें नक्सली अपने साथ बहला- फुसलाकर ले गए थे और संघम-दलम इत्यादि में उन्हें शामिल कर लिया था. बस्तर में ही छोटे बड़े दलों और उनके समर्थकों की मानें तो इनकी संख्या 35 हजार के आसपास है. यह चम्बल के डाकुओं से समर्पण कराने जैसा मामला नहीं है, जिनकी संख्या दो चार सौ हो. ढाई हजार से ज्यादा लोगों के हथियार सौंपने के बाद भी छत्तीसगढ़ में नक्सली देश के सबसे ज्यादा ताकतवर उग्रवादी समूह हैं. बस्तर में आदिवासियों के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि उनको सरकार की तरफ से कोई भी अनुदान, कृपा, राशि, अनाज, स्वास्थ्य, शिक्षा की सुविधा ग्रहण करना मुश्किल है. ऐसा कर लेने पर वे नक्सलियों के निशाने पर आ जाते हैं. इन्हें किसी भी पुनर्वास पैकेज का लाभ दिलाने के पहले उन्हें नक्सलियों के प्रकोप से बचाना जरूरी है. सरकार बस्तर के युवकों को विशेष पुलिस अधिकारी बनाती है- लेकिन ये पुलिस अधिकारी गांव जाते हैं तो नक्सली इनके शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर लाश सड़क पर फेंक रहे हैं. यही हाल पुलिस के मुखबिरों का हो रहा है. जन-अदालतों में इनका गला रेता जा रहा है.ये सब किसी न किसी रूप में सरकारी मदद पाते रहे हैं पर ये सब नक्सलवाद खत्म करने में असफल रहे हैं. बस्तर में सबसे बड़ी समस्या सरकारी मशीनरी के पहुंचने और उसकी विश्वसनीयता कायम करने की है.
मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह स्वीकार करते हैं कि नक्सली ठेकेदार और अफसरों से 300 करोड़ रूपये सालाना वसूली कर रहे हैं. जाहिर है कि 300 करोड़ वे नक्सलियों को देते हैं तो 600 करोड़ खुद भी अंदर कर रहे होंगे. मान लेना चाहिए कि इतना सब कुछ वे अपना घर बेचकर नहीं करते होंगे. सरकारी खजाने से इतना गोलमाल. फिर क्या अफसर और ठेकेदार इतनी मनमानी करें और हमारे शरीफ राजनीतिज्ञ खामोश बैठे रहेंगे? इसका जवाब हमारे हारे हुए नेता जवाब दें और उनसे पहले वे नेता जवाब दें जो बार-बार नक्सलियों के गढ़ से चुनाव जीतकर आ जाते हैं. नक्सलियों के खिलाफ लड़ाई में काफी पेंच हैं.
इस ताजा पुनर्वास पैकेज से एक रास्ता और खुल गया है, कुछ नकली नक्सली तैयार होंगे. कुछ असली हथियार जमा होंगे और समस्या अपनी जगह पर बनी रहेगी. कुछ ईमानदार पुलिस अफसर जो नक्सलियों के ख़िलाफ मुहिम चला रहे होंगे इस पैकेज के बाद शायद अब जंगलों में भटकने के बजाय शांत होकर बैठ जाएं. इस उम्मीद के साथ कि अब कुछ बड़े-बड़े हथियार लेकर कुछ खूंखार नक्सली उनके थाने तक खुद ही पहुंच जाएंगे और उन्हें किसी दिन स्वतंत्रता दिवस समारोह में सम्मानित किया जाएगा.

गुरुवार, १३ अगस्त २००९

फिर फांसी पर लटका बेकसूर चरणदास चोर

छत्तीसगढ़ी रंगमंच की अनमोल धरोहर- पद्मविभूषण हबीब तनवीर का चरणदास चोर इन दिनों कटघरे में है. बीते 5 दशकों से दुनिया भर में हजारों मंचनों के जरिये राज्य की लोककला, सामाजिक
स्थिति व संस्कृति को पहचान दिलाने वाली इस कालजयी कृति को जिस तरह सरकार और रंगकर्म के झंडाबरदारों ने मिलकर विवादों के घेरे में ला दिया है, उससे निकट भविष्य में इस नाटक को हबीब की कर्मभूमि छत्तीसगढ़ में निर्विध्न खेला जाना मुश्किल हो गया है.इस विवाद के बीच किसी ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि न तो छत्तीसगढ़ सरकार ने चरणदास चोर किताब को प्रतिबंधित किया है और न ही नाटक को. विरोध-प्रदर्शन और उस पर सरकार की चुप्पी ने मामले को अनावश्यक रुप से उलझा दिया है.
बखेड़ा तब शुरू हुआ जब सतनामी समाज के एक धर्मगुरू बालदास ने मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह से मुलाकात कर वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित हबीब तनवीर की किताब चरणदास चोर पर प्रतिबंध लगाने की मांग की. स्कूली बच्चों में किताबों पर रूचि जगाने के लिए छत्तीसगढ़ में हर साल पुस्तक वाचन सप्ताह मनाया जाता है, इनमें सामूहिक रूप से किताबें पढ़ी जाती हैं. वाणी प्रकाशन की यह किताब भी उन पढ़ी जाने वाली पुस्तकों की सूची में शामिल थी. गुरू बालदास ने शिकायत की थी कि इस किताब में बताया गया है कि सतनामी पंथ की स्थापना से पहले बाबा घासीदास डकैत थे. यह बात आधारहीन है और इससे गुरू घासीदास व समाज का अपमान हो रहा है. आनन-फानन में शिक्षा संचालनालय ने इस किताब को पुस्तक वाचन से हटाने का निर्देश दे दिया और यह भी चेतावनी दी कि यदि किसी स्कूल में किताब को पढ़ते हुए पाया गया तो जिम्मेदार शिक्षक पर कार्रवाई की जाएगी.
राज्य में सतनामी समाज अनुसूचित जाति में शामिल है. अरसे से यह तबका सामाजिक शोषण का शिकार रहा है, लेकिन प्रदेश की राजनीति में इनका काफी महत्व है. दोनों प्रमुख राजनैतिक दल कांग्रेस और भाजपा इनके वोट अपने पास समेटने के लिए तमाम उपाय करते हैं. सतनामी समाज के नेताओं व गुरूओं को राजनेता साधने में लगे होते हैं. गुरू बालदास सतनामी का समाज में काफी प्रभाव है. वे तब खासे चर्चित हुए जब पिछले साल जुलाई माह में बिलासपुर जिले के बोड़सरा में एक निजी स्वामित्व की भूमि- बाजपेयी बाड़ा पर उन्होंने समाज का हक जताया और कहा कि यह उनके गुरू अघनदास की कर्मभूमि है. इसे हासिल करने के लिए सतनामी समाज के हजारों लोग एक मेले में इकट्ठे हुए. भीड़ के हिंसक हो जाने के बाद पुलिस ने गुरू बालदास समेत दर्जनों लोगों को गिरफ्तार किया. इसके बाद विधानसभा में इस मुद्दे पर लगातार हंगामा हुआ. कांग्रेस गुरू बालदास की रिहाई मांगती रही, जबकि सरकार अपने बचाव में लगी थी. कांग्रेस के सभी गुटों के नेता गुरू बालदास के पक्ष में हो गए. कुछ दिन बाद ही राज्य में चुनाव होने वाले थे. सतनामी समाज की नाराज़गी भाजपा के लिए नुकसानदेह हो सकती है. राज्य सरकार ने घोषणा कि बोड़सरा बाड़ा को अधिग्रहित किया जाएगा और वहां एक स्मारक बनाया जाएगा. राजनैतिक विश्लेषकों ने माना कि सरकार ने यह फैसला अपनी पार्टी के संभावित नुकसान को ध्यान में रखते हुए लिया. बाद में राज्य सरकार के इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई और अधिग्रहण की घोषणा पर अभी तक आगे की कार्रवाई नहीं की जा सकी है. लेकिन इस मामले ने मीडिया और समाज में गुरू बालदास को चर्चित तो कर ही दिया.
पुस्तक वाचन सप्ताह में किताब को पढ़ने से रोकने के लिए राज्य सरकार की तरफ से जारी आदेश में गुरू बालदास के इस प्रभाव का ही असर दिखाई दे रहा है. बोड़सरा आंदोलन में संयम का अभाव था, वहीं इस मुद्दे पर गुरू बालदास संयमित रहे. उन्होंने विरोध दर्ज कराने का शांतिपूर्ण व लोकतांत्रिक तरीका अपनाया, परन्तु राज्य सरकार ने फैसला घबराहट में ले लिया. सतनामी समाज में बाबा घासीदास पर आस्था व्यक्त करने के लिए पंथी नृत्य का चलन है. बाबा घासीदास सत्य के पुजारी थे. चरणदास चोर नाटक का नायक भी सत्य निष्ठा की शपथ लेता है. पंथी नृत्य तथा नर्तक दल के प्रमुख पद्मश्री स्व. देवदास बंजारे को चरणदास चोर में शामिल नृत्य से अन्तर्राष्ट्रीय पहचान मिली. हबीब तनवीर का प्रत्येक सृजन छत्तीसगढ़ के शोषितों, दलितों व आदिवासियों की विषमताओं का आईना और समृध्द लोक व शिल्प कलाओं का प्रतिबिम्ब है. उनका अपना जीवन, उनके कलाकार और उनका रंगकर्म सामाजिक सौहार्द्र को बढ़ाने और गरीबों, पिछड़ों को महत्व दिलाने के लिए समर्पित रहा.
दरअसल, चरणदास चोर नाटक के किसी भी अंश में सतनामी समाज के ख़िलाफ कोई टिप्पणी ही नहीं है. विवाद वाणी प्रकाशन की किताब की भूमिका को लेकर है. भूमिका का एकाध वाक्य विवादास्पद कहा जा सकता हैं, जिस पर सतनामी समाज का विरोध भी जायज है. गुरू बालदास का दावा है कि उन्होंने सन् 2004 में ही वाणी प्रकाशन की किताब में शामिल भूमिका के उस अंश को लेकर आपत्ति दर्ज करा दी थी. संभवतः उस समय दर्ज कराए गये उनके विरोध को नौकरशाहों व सरकार ने महत्व इसलिए नहीं दिया कि वे गुरू बालदास के प्रभावों से परिचित नहीं थे, इसलिये उस समय उनका ज्ञापन किसी फाइल में धूल खाने के लिए छोड़ दिया गया होगा. वाणी प्रकाशन की भूमिका को या कम से कम उस अंश को हटा दिये जाने के बाद भी चरणदास चोर नाटक कहीं प्रभावित नहीं होता. इस बार जब पुस्तक वाचन सप्ताह के लिए उसी किताब को फिर छपवा कर मंगा लिए गये. 2004 में जो हिस्सा छपा था, 2009 में भी वह यथावत आ गया है. मतलब यह कि जो किताबें पढ़ने के लिए बच्चों को दी जा रही है, उस पर खुद अफसर नज़र नहीं डालते. यदि यहां पर गलती हो भी गई तो उसे पुस्तक वाचन में प्रतिबंधित करने के दौरान फिर दोहरा दिया गया. शिक्षा विभाग किताब पर प्रतिबंध लगाने के बजाय विवादित वाक्य को न पढ़ने का आदेश जारी कर सकती थी. बच्चों को किताबें देने से पहले इसको विलोपित भी किया जा सकता था. पर पूरी की पूरी किताब को प्रतिबंधित करने और यह स्पष्ट नहीं करने से कि नाटक को लेकर किसी को कोई आपत्ति नहीं है, मामला उलझ गया.
नतीजा यह निकला है कि सरकारी आदेश के बाद चरणदास चोर नाटक ही कटघरे में दिखाई देने लगा है. स्कूल शिक्षा मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने प्रतिबंध लगने वाले दिन ही बयान दिया था कि किताब से विवादित हिस्से को हटाया जाएगा उसके बाद पठन-पाठन के लिए भेजा जाएगा. लेकिन फोकस केवल यही बात हुई है कि सरकार ने चरणदास चोर पर पाबंदी लगा दी है. देशभर में बुध्दिजीवी, रंगकर्मी और साहित्यकार सरकार के फैसले की आलोचना इसी आधार पर कर रहे हैं. छत्तीसगढ़ में तो कुछ अति उत्साही कला प्रेमियों ने तख़्तियां लेकर संस्कृति विभाग के सामने प्रदर्शन भी कर डाला.
अफसोसजनक है कि इन सब गतिविधियों से सरकार अभी तक आंख मूंदे बैठी हुई है. हबीब तनवीर की प्रतिष्ठा और उनकी कृति को इससे कितनी क्षति पहुंच रही है इसका वह अनुमान भी नहीं लगाना चाहती. यह रवैया पुस्तक को वाचन से हटाए जाने से भी ज्यादा खतरनाक है. राज्य सरकार के पास ऐसे संवेदनशील मामलों से निपटने के लिए अनुभवी अफसरों की कमी दिखाई दे रही है. राज्य को तत्काल साफ करना चाहिए कि नाटक में कोई आपत्तिजनक बात नहीं है और न ही उसने इसके प्रदर्शन पर कोई पाबंदी लगाई है. इस चुप्पी के चलते एक गुट नाटक के पक्ष में खडा़ हो रहा है जबकि दूसरे गुट में इस नाटक के ख़िलाफ भीतर ही भीतर आक्रोश पनपने का खतरा दिखाई दे रहा है.पूरे नाटक का कोई छोटा सा भी हिस्सा विवाद के घेरे में नहीं है फिर भी ताजा हालात यह है कि राजधानी से लेकर गांव-देहात तक जिस चरणदास चोर के मंचन ने कला के रसिकों को तृप्त किया है, उसका मंचन होने पर विरोध में झंडे-डंडे निकल सकते हैं और जिस सामाजिक मेल-मिलाप के लिए हबीब तनवीर और उनकी टीम ने अपना सर्वस्व होम किया, उसी को क्षति पहुंचेगी. नाटक के पात्र चरणदास चोर ने अपने वचन और सच की लड़ाई लड़ी और फांसी पर चढ़ना मंजूर किया था. एक बार फिर यह बेकसूर नाटक उसी फंदे पर चढ़ता नज़र आ रहा है.

शनिवार, २७ जून २००९

आत्महत्याएं आईना नहीं किसानों की बदहाली का

तिल-तिल कर मरने वालों की सुध लेना ज़्यादा जरूरी
छत्तीसगढ़ में किसान आत्महत्याओं को केवल कर्ज़ नहीं चुका पाने का नतीजा मान लेना हमें एक ऐसे झूठ को आधार देना होगा, जो देर-सबेर धराशायी हो जाएगा और इसकी आड़ में वे नौकरशाह और राजनीतिज्ञ साफ बच निकलेंगे जो इनकी बदहाली के लिए जिम्मेदार हैं.
पिछले दो सालों से केन्द्रीय अपराध अन्वेषण ब्यूरो का वह आंकड़ा काफी चर्चा में है, जिसमें किसानों की आत्महत्या की दर छत्तीसगढ़ में महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश और कर्नाटक की ही तरह बताई गई है. रिपोर्ट कहती है कि साल में छत्तीसगढ़ के करीब 1500 किसान खुदकुशी कर रहे हैं. यानि औसतन हर दिन 4 से 5 किसान. ब्यूरो रिकार्ड के आधार पर कहा जा रहा है कि ये आत्महत्याएं किसान कर्ज नहीं चुका पाने के कारण करते हैं. कोई शक नहीं है कि ऐसे रिपोर्ट्स में छत्तीसगढ़ की विषमताओं पर चिंता है. लेकिन यदि हम यह स्थापित नहीं कर पाए कि किसानों की खुदकुशी कर्ज नहीं चुका पाने या खेती में जबरदस्त नुकसान होने के कारण हुई तो छत्तीसगढ़ की सरकार अपना पीठ थपथपाएगी कि देखो हमारे किसानों की हालत इतनी ख़राब नहीं है कि उन्हें मरना पड़े. छत्तीसगढ़ सरकार अपनी तारीफ में यह भी कहेगी कि हम देश भर में सबसे ज्यादा कीमत पर धान खरीदते हैं, किसानों को ब्याज मुक्त कर्ज़ दिलाते हैं, सिंचाई पम्पों को मुफ़्त बिजली देते हैं, एक-दो रूपये किलो में चावल देते हैं, किसान यहां आत्महत्या करेगा तो क्यों?
इन मौतों को राज्य के 33.5 लाख किसान परिवारों की बदहाली का आईना मान लेना भूल होगी. जिस पुलिस जांच के आधार पर हम इतने किसानों की आत्महत्या की बात कर रहे हैं, वही जांच यह भी कहती है कि ज्यादातर मौतें बीमारी से तंग आकर, पारिवारिक कलह, ख़राब दिमागी हालत, शराब की लत आदि से हुई. छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में एक जनवरी 2008 से 31 जुलाई 2008 के बीच 400 ऐसे लोगों ने खुदकुशी की, जिनका पेशा कृषि था. गांव में इंजीनियर, प्रोफेसर, साइंटिस्ट होते नहीं, किसान ही होते हैं. राज्य में खेती पर निर्भर लोगों की तादात 83 फीसदी है. इसलिये कोई स्वाभाविक मौत मरे या दुर्घटना में उनमें से ज्यादातर का पेशा किसानी ही दर्ज है. हरेक अपराध में खानापूर्ति करते वक्त मरने वाले का पेशा भी पुलिस लिखती है. गांव की साधारण जरूरतों को पूरा करने के लिए इनमें से कई लोग बैलगाड़ी किराये पर देने, किराना सामान की बिक्री करने, पंचर की दुकान चलाने, साप्ताहिक बाजार में जाकर सब्जियां बेचने, कपड़े सिलने, बिजली सुधारने, रेडियो ट्रांजिस्टर सुधारने जैसा काम भी करते हैं लेकिन उन्हें कहते किसान ही हैं.
छत्तीसगढ़ में किसानों की आत्महत्या को मजबूती से स्थापित करने के पक्ष में कहा जा सकता है कि पारिवारिक कलह, दिमागी हालत का बिगड़ना, शराब का आदी हो जाना भी खेती में नुकसान की वजह से और कर्ज़ लेने के कारण है. लेकिन कलह, दिमागी हालत और लत का केवल गरीबी से रिश्ता है नहीं. यह शहरों में और अमीर परिवारों में होने वाले हादसों की तरह है. अपवादस्वरूप एक या दो मामले ही अभी तक सामने आए हैं जिनमें किसान का बीज ख़राब हुआ और कर्ज़ से लद गया, तब उसने खुदकुशी कर ली. आत्महत्या की परिस्थितियां बेरोजगारी, प्रेम प्रसंगों, खेती से मिली आय को फिजूलखर्ची में उड़ा देने के चलते भी हैं.
दरअसल, छत्तीसगढ़ के किसान अलग मिजाज के हैं. उन्हें महाराष्ट्र, पंजाब की तरह कपास, दलहन आदि की व्यावसायिक खेती करनी नहीं आती. तीन चौथाई किसान- लघु व सीमान्त श्रेणी के हैं, जिनके पास 4 एकड़ से कम खेत हैं. वे साल में केवल एक बार धान की फसल लेते हैं. फसल-चक्र परिवर्तन के लिए राज्य बनने के बाद ही सरकारों ने कोशिशें की लेकिन किसान समझदार निकले. उन्होंने प्रयोग करने के बजाय पारम्परिक खेती पर ही भरोसा किया. सरकारी योजनाओं में उलझने के बजाय इन्हें खुद के सामर्थ्य पर भरोसा है. भले मुनाफा कम मिले लेकिन वे कर्ज उतना ही लेंगे, जितना फसल बर्बाद होने पर भी मजदूरी करके चुका सकें. सोसाइटियों में बहुत से कर्ज़ हैं पर वे डिफाल्टर हो जाने पर भी परवाह नहीं करते,देर-सबेर चुका देने या सरकार से माफी मिल जाने की उम्मीद लेकर खेती या मजदूरी करते रहते हैं. हो सकता है इसके लिए वे कुछ साल या कुछ महीनों के लिए दूसरे प्रदेशों में कमाने-खाने चले जाएं, हालांकि यह विवशता और कलंक ही है. किसान धान की जगह किसी दूसरी फसल पर हाथ आजमाने के बारे में नहीं सोचते. 3 फीसदी ब्याज दर सहकारी बैंकों में चल रहा है, फिर भी पिछले साल केवल 600 करोड़ रूपये बांटे जा सके. अब सरकार ने चुनावी घोषणा को पूरा करते हुए खेती के लिए बिना ब्याज कर्ज देने की योजना शुरू कर दी है, तब भी मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह की मानें तो यह आंकड़ा केवल 800 करोड़ तक पहुंच पाएगा. राज्य में करीब 48 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि है, जिनमें से सब्जी की खेती को भी जोड़ लिया जाए जिनमें गन्ना,फल आदि शामिल हैं, कुल रकबा 3 फीसदी से भी कम लगभग 1.5 लाख हेक्टेयर में दूसरी फसलें ली जाती हैं. धान जोखिम से परे खेती है. इसे बोने के लिए ज्यादातर खुद का श्रम किसान इस्तेमाल करते हैं. सामर्थ्य के अनुसार खाद बीज का इंतजाम कर लेता है. धान मुनाफा नहीं देता तो खास नुकसान भी नहीं होता. इन किसानों के पास ऐसे व्यवस्थित खेत नहीं है कि उन्नत बीज, असरकारी मंहगे खाद व सिंचाई सुविधा के साथ खेती करें. पारम्परिक खेती से उन्हें थोड़ा मिलता है, पर वह उन्हें फांसी पर लटकने की नौबत तक नहीं पहुंचना पड़ता. वे न मरै न मौटावै की स्थिति में हैं. यानि वह समृध्द भी नहीं है लेकिन मरने के कगार पर भी नहीं पहुंचा है. समृध्द नहीं हुए तो सरकार की नीतियां जिम्मेदार हैं, उनके लिए सिंचाई, बीज, खेतों को सुधारने व मिट्टी के उपचार का प्रबंध नहीं किया गया और किसान मरने से बच रहे हैं तो अपने सीमित साधन से असीमित श्रम करते हुए.
दरअसल, छत्तीसगढ़ के किसानों की दुर्दशा पर आत्महत्या के आंकड़ों को किनारे रखकर बात होनी चाहिए. जब तक ऐसा नहीं होगा उर्वरा व खनिज सम्पदा से भरपूर अमीर धरती के किसान गरीब क्यों हैं, इस सवाल का हल नहीं तलाशा जा सकेगा. देश में कृषि भूमि का औसत सिंचित रकबा 42 फीसदी है, लेकिन छत्तीसगढ़ के सरकारी आंकड़ों में यह 30 प्रतिशत है. हालांकि वास्तविक सिंचित रकबा इससे भी कम 17 से 19 फीसदी ही है. कुल मिलाकर यहां सिंचित भूमि राष्ट्रीय औसत से काफी कम है. राष्ट्रीय औसत 24 क्विंटल प्रति हेक्टेयर के मुकाबले छत्तीसगढ़ में धान उत्पादन का औसत केवल 13 क्विंटल है. सरगुजा और बस्तर जैसे आदिवासी इलाकों में तो यह केवल 5-6 क्विंटल है. शायद यही वजह है कि राज्य के 42 फीसदी परिवार गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन करते हैं. उन्हें सरकार सस्ता चावल मुहैया करा रही है.
आत्महत्या, झगड़ों व दुर्घटनाओं की प्रमुख वजह शराब
आत्महत्याओं के मामले में समाज कल्याण मंत्री लता उसेंडी का वक्तव्य ज्यादा महत्वपूर्ण है. वे मानती हैं कि छत्तीसगढ़ के गांवों में अधिकांश कमाऊ परिवार के लोग नशे की आदत के कारण अपनी आमदनी का ज्यादातर हिस्सा नशे पर खर्च कर देते हैं इससे वे अपने परिवार को पौष्टिक भोजन नहीं दे पाते, जिसके चलते बच्चे कुपोषण का शिकार होते हैं. सुश्री उसेंडी की चिंता गलत नहीं है, देश में सर्वाधिक 54 फीसदी कुपोषित बच्चे छत्तीसगढ़ में ही है, यह केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय का आंकड़ा कहता है. छत्तीसगढ़ बेवरेज कार्पोरेशन की सालाना रिपोर्ट में पिछले साल मार्च में बताया गया है कि देश में शराब की खपत पंजाब और हरियाणा के बाद सबसे अधिक छत्तीसगढ़ में है. इन परिवारों में मुखिया की आत्महत्या को किसान की आत्महत्या मानना तो ठीक नहीं होगा. छत्तीसगढ़ के अखबारों में हर रोज दो चार ख़बरे होती हैं, जिनमें लोग शराब के नशे में अपने ही सगे सम्बन्धियों पर हमले कर देते हैं. सड़क दुर्घटनाओं के ज्यादातर मामले छत्तीसगढ़ में शराब पीकर गाड़ी चलाने के कारण हो रहे हैं. यदि पारिवारिक कलह और बीमारी से भी कोई आत्महत्या हो रही है तो उसके जड़ में शराबखोरी मिल जाएगी.
भविष्य में खेती के चलते फांसी पर चढ़ेंगे किसान
रायपुर जिले में इस बार पिछले साल के मुकाबले इस साल 20 हजार एकड़ कम जमीन पर खेती हो रही है. नई राजधानी की योजना, नये उद्योग व कालोनियों के कारण यह परिस्थिति बनी है. राज्य के किसानों ने अभी तक उन्नत खेती पर ध्यान न दिया हो, लेकिन अब खेती की जमीन घट रही है और अपनी जमीन छीने जाने पर सरकार के ख़िलाफ आवाज़ उठा रहे हैं, उससे साफ है कि वे भविष्य में कम जमीन में ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए उन्नत खेती की ओर बढ़ेंगे. फिर वे मजबूरन धान बोना छोड़ेगे और कम जमीन में पंजाब महाराष्ट्र की तरह ज्यादा मुनाफा पाने बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की बीज खरीदेंगे और फसल तैयार कर उन्हें बेचने के लिए बड़ा कर्ज लेंगे. छत्तीसगढ़ सरकार ने एक लाख करोड़ एमओयू कर रखा है. यहां जिन्दल, टाटा-एस्सार जैसी दर्जनों कम्पनियां मंडरा रही हैं जो किसानों को निगलने के लिए उतारू हैं. रायगढ़ से लेकर बस्तर तक किसानों की जमीन बलात् जन सुनवाई कर हड़पी जा रही है. उपजाऊ खेतों पर चिमनियां रोपी जा रही हैं. आसार दिखते हैं कि भविष्य में ये सब आत्महत्याओं, हत्याओं के कारण बनेंगे. मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह हाल ही में वित्त आयोग के साथ हुई बैठक में छत्तीसगढ़ में ज्यादा जंगल होने को अभिशाप बता चुके हैं. उनका कहना है कि यहां के संसाधनों का इस्तेमाल कर गरीबों को बांटने में पर्यावरण व वन मंत्रालय रोड़ा लगा देता है क्योंकि यहां का 44 फीसदी हिस्सा जंगलों से घिरा है. मुखिया के इस बयान से अनुमान लगा सकते है कि भविष्य का छत्तीसगढ़ कैसा होगा. सरकार अभी तक नहीं बता पाई कि दर्जनों पावर प्लांट, स्पंज आयरन फैक्ट्रियों व खदानों के आवंटन से आम आदमी और बेरोजगार युवकों को क्या फायदा हुआ. उन्हीं की पार्टी के विधायक देवजी भाई पटेल राजधानी से लगे सिलतरा में स्पंज आयरन फैक्ट्रियों के चलते बढ़े प्रदूषण के खिलाफ हज़ारों किसानों के साथ आंदोलन चलाकर जरूर बता रहे हैं कि यहां के खेतों की मिट्टी और नदी तालाब का पानी कितना बर्बाद हो गया.
किसानों की भूमि से जुड़ी और समस्याएं
छत्तीसगढ़ में सर्वाधिक हत्याएं राजस्व मामलों को लेकर होती है, यह पुलिस के एक आला अधिकारी का कहना है. लेकिन अब आत्महत्याओं का दौर भी शुरू हो गया है. बीते 21 मई को बैंकुंठपुर थाने के छेलिया ग्राम में 10 साल के एक बच्चे की हत्या पत्थर मार-मार कर कर दी गई. 22 मई को इसी थाने में एक और बुजुर्ग की उसके ही रिश्तेदारों ने हत्या कर दी. उसके पिता के साथ आरोपी का जमीन विवाद चल रहा था. रायपुर के पास सिमगा में पुलिस ने माता, पिता और सगे भाई की हत्या के आरोप में बेटे समेत 22 लोगों को पुलिस ने अप्रैल माह में गिरफ्तार किया. जांजगीर जिले में दो परिवारों के बीच हुए विवाद में 4 लोगों की हत्या इसी साल हो गई. छत्तीसगढ़ के किसान जमीन के छोटे-छोटे टुकड़ों के लिए लड़ रहे हैं क्योंकि अब उनके बीच पुरखों की जमीन का बंटवारा होता जा रहा है और खेती से उनकी आय सीमित होती जा रही है. जांजगीर जिले के सरहर ग्राम में एक बुजुर्ग किसान फूलसाय की जमीन सरकार ने सड़क बनाने के लिए अधिग्रहित की थी, उसे मुआवजा सालों नहीं मिला. जगह-जगह फरियाद कर निराश हो जाने के बाद वह बीते 13 मई को आत्महत्या करने के इरादे से कलेक्टोरेट पहुंच गया. अफसरों ने उन्हें मनाया, आश्वासन दिया कि एक हफ्ते में मुआवजा मिल जायेगा. लेकिन पखवाड़े भर के इंतजार के बाद भी मुआवजा नहीं मिला. 30 मई को उस बुजुर्ग किसान के प्राण पखेरू उड़ गए. मुआवजा तो नहीं मिला-मौत मिल गई. दरअसल वह अपनी सांस की बीमारी का इलाज कराने के लिए मुआवजे की राशि हर हालत पाना चाहता था. हाल ही में राज्य में सुरेश यादव के मामले ने भी तूल पकड़ा. राजधानी से केवल 20 किलोमीटर दूर सिंगारभाठा ग्राम के सुरेश की आत्महत्या ने किसानों को लेकर सरकार की संवेदनहीनता और भ्रष्ट राजस्व अमले की करतूत को उजागर कर दिया. कांग्रेस ने इसे लेकर पैदल मार्च किया और भाजपा सरकार को कटघरे में खड़ा किया. दबाव में आई सरकार ने उसके परिवार को मुआवजा दिया. सुरेश की 9 साल पहले खरीदी गई जमीन तहसीलदार और पटवारियों ने रिश्वत लेने के बाद भी उसके नाम नहीं चढ़ाई. पूरे प्रदेश में राजस्व अमले का यही हाल है. ई-गवर्नेंस के लिए अपनी पीठ थपथपा रही सरकार का यह हाल है. कृषि मंत्री चंद्रशेखर साहू कहते हैं कि सरकार अब पूरे प्रदेश में राजस्व दस्तावेजों को सुधारने के लिए अभियान चलाएगी. आदिवासी इलाकों में स्थिति और बदतर है. रायपुर जिले में जहां सिंचाई का प्रतिशत 46 फीसदी है वहीं रायगढ़ जिले में केवल 7 फीसदी, सरगुजा और बस्तर के सारे जिले केवल 3 फीसदी सिंचित हैं. रायगढ़-जशपुर से टमाटर की खेती खत्म हो चुकी है, कभी यहां फूड प्रोसेसिंग प्लांट लगाने की बात की जाती थी लेकिन अब इसकी कोई गुंजाइश नहीं बची है. नक्सल प्रभावित बीजापुर जिले में माओवादी हिंसा व सलवा जुड़ूम अभियान से सबसे ज्यादा नुकसान खेती को हुआ. जिले के 738 गांवों के 28 हजार से ज्यादा किसान अपना घर बार खेत छोड़कर पलायन कर चुके हैं. वे या तो सरकारी कैम्पों में हैं अथवा सीमावर्ती राज्यों में चले गए हैं. नक्सली हिंसा के चलते 30 हजार हेक्टेयर से अधिक भूमि बंजर में तब्दील हो रही है.
छत्तीसगढ़ के किसानों की दुर्दशा आत्महत्या करने वाले किसानों के घर में झांकने से जितना नहीं मिलेगा, उससे ज्यादा कहीं गांवों, खेतों. जंगलों और सरकारी फाइलों में भटकने से मिलने वाला है. अलग-अलग कारणों से की गई आत्महत्याओं को अलग रखें और जिंदा रहकर तिल तिल मर रहे किसानों की सुध लेने सरकार को मजबूर किया जाए.

शुक्रवार, २६ जून २००९

आदिवासी लड़कियों के साथ रोज एक शाइनी

मुम्बई पुलिस जब पिछले हफ़्ते छत्तीसगढ़ के जशपुर पहुंची तो यह ख़बर फैल गई कि फिल्म स्टार शाइनी आहूजा ने जिससे बलात्कार किया है वह इसी इलाके की एक लड़की है. हालांकि हड़बड़ाई स्थानीय पुलिस ने बाद में साफ किया कि जिस लड़की के सिलसिले में पुलिस यहां पहुंची थी वह शाइनी का शिकार तो नहीं थी पर वह भी शोषण की ही शिकार थी. वह मुम्बई के किसी दूसरे पाश कालोनी की कोठी में बंधक बनाकर रखी गई थी.
छत्तीसगढ़ की नाबालिग लड़कियों को महानगरों में घरेलू नौकरानी का काम देने के झांसे से ले जाने के बाद उन्हें अंधेरी कोठरी में ढ़केल देने का खेल सालों से चल रहा है लेकिन शाइनी आहूजा प्रकरण के दौरान जशपुर में फैली दहशत से इस सवाल की ओर फिर सबका ध्यान चला गया है. अगर जशपुर, सरगुजा और कोरबा के गांवों में आप जाएं तो आपको इन इलाकों से गायब आदिवासी लड़कियों के साथ शाइनी के अनेक किस्से मिल जाएंगे. स्वयंसेवी संस्थाओं, पुलिस और सरकार की तमाम कोशिशों के बाद भी लड़कियों को बहला-फुसलाकर भगाए जाने का सिलसिला थम नहीं रहा है. इनमें से ज्यादातर नाबालिग हैं. इनको झांसे में लेने वाले कुछ तो पेशेवर दलाल हैं तो कुछ उनके अपने ही रिश्तेदार जो दिल्ली, मुम्बई की चंकाचौंध में रम गए हैं.
इसे संयोग ही कहा जाएगा कि जिस समय शाइनी आहूजा प्रकरण चर्चा में था, उसी समय लड़कियों की मंडी के कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ के जशपुर में मुंबई पुलिस का एक दल बंधक बनाई गई लड़की को छोड़ने के लिए आया हुआ था. कुछ उत्साही पत्रकारों ने अपनी कल्पना शक्ति का सहारा लिया और छत्तीसगढ़ के अख़बारों में 19 जून को सुर्खियां रही कि मुम्बई के फिल्म स्टार शाइनी आहूजा ने जिस लड़की से बलात्कार किया, वह छत्तीसगढ के जशपुर जिसे के अंतर्गत आने वाले डूमरटोली गांव की रहने वाली है. जैसा कि जशपुर के पुलिस अधीक्षक अक़बर राम कोर्राम बताते हैं- “ शाइनी आहूजा प्रकरण के बाद मुम्बई से पुलिस की एक टीम यहां आई थी, लेकिन इसका शाइनी प्रकरण से कोई सम्बन्ध नहीं है. वह एक लड़की को मुम्बई से यहां छोड़ने पहुंची थी, जो पिछले 9 मार्च से गायब थी. इस लड़की का नाम गायत्री है और वह अपनी एक सहेली अनीमा के बहकावे में आकर मुम्बई चली गई थी.” अनीमा के कुछ परिचितों के ज़रिये गायत्री का पता चला और उसे डूमरटोली लाकर उनके परिजनों को सौंप दिया गया.
हज़ारों शिकार
लड़कियों को ट्रैफेकिंग से बचाने और उन्हें सीमित साधनों के बीच दिल्ली, मुम्बई, गोवा जैसे महानगरों से छुड़ाकर लाने वाली जशपुर की सामाजिक कार्यकर्ता एस्थेर खेस का कहना है कि शाइनी प्रकरण के बीच मुम्बई की पुलिस का जशपुर पहुंचने से यह फिर साफ़ हो गया है कि वहां बड़ी तादात में घरेलू नौकरानियों के रूप में काम करने वाली लड़कियां छत्तीसगढ़ से गई हुई हैं. सुश्री खेस कहती हैं कि शाइनी ने जिस लड़की को शिकार बनाया वह गायत्री तो नहीं है, लेकिन हमारे पास दर्जनों ऐसे मामले हैं जिनमें जशपुर की लड़कियों को घरेलू काम कराने के बहाने से न केवल देश के भीतर बल्कि कुवैत और जापान तक ले जाए गए और लड़कियों का हर तरह से शोषण किया गया.दिल्ली और गोवा जा पहुंची कई लड़कियों का सालों से पता नहीं है और उनके मां-बाप दलालों के दिए फोन नम्बर और पतों पर सम्पर्क नहीं कर पा रहे हैं, क्योंकि इनमें से ज़्यादातर फर्ज़ी हैं. लड़कियों को ले जाने के बाद प्लेसमेंट एंजेंसियों के दफ्तरों में फिर कोठियों में इन लड़कियों को चौबिसों घंटे क़ैद रखा जाता है. जब घर में पुरूष सदस्य अकेले होते है तब उनके साथ बलात्कार होता है.
इनको ठीक से भोजन, कपड़ा तक नहीं मिलता, इन्हें कोई छुट्टी नहीं मिलती. इनका वेतन दलालों के पास जमा कराया जाता है. लड़कियों को अपने घर लौटने का रास्ता पता नहीं होता इसलिये वे सारा ज़ुल्म चुपचाप सहती हैं. सुश्री खेस का यह भी कहना है कि दिल्ली में 150 से ज्यादा प्लेसमेंट एजेंसियां काम कर रही हैं जो झारखंड, पश्चिम बंगाल और उत्तर छत्तीसगढ़ से लड़कियों को बुलाते हैं. इनके एजेंट का काम इन लड़कियों के वे रिश्तेदार करते हैं, जो कई साल पहले से ही इन महानगरों में काम कर रहे होते हैं.
नया ट्रैफेकिंग कानून
छत्तीसगढ़ महिला आयोग की अध्यक्ष विभा राव, राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष गिरिजा व्यास के इस बयान से सहमत हैं कि गरीब नाबालिग लड़कियों को शोषण का शिकार होने से बचाया जाए. श्रीमती राव को उम्मीद है कि अब देशभर में घरेलू नौकरानियों की सुरक्षा को लेकर नई बहस छिड़ेगी. उनका कहना है कि इस समस्या से छत्तीसगढ़ सर्वाधिक प्रभावित राज्यों में से एक है, इसलिए वे चाहती हैं कि ट्रैफेकिंग को लेकर भी मौजूदा कानूनों की समीक्षा की जाए और इसे रोकने के लिए प्रावधान कड़े किए जाएं. श्रीमती राव ने शाइनी आहूजा प्रकरण में छ्त्तीसगढ़ की लड़की के शिकार होने की अफवाह के बाद जशपुर कलेक्टर और एस पी को पत्र लिखकर पूरे मामले का प्रतिवेदन देने के लिए भी कहा है.
घरेलू नौकरानियों की सुरक्षा व ट्रैफेंकिंग रोकने के ख़िलाफ एक कानून पिछली सरकार में ही बन जाना था. तत्कालीन केन्द्रीय महिला बाल विकास मंत्री रेणुका चौधरी ने जून 2007 तक इस कानून का ख़ाका तैयार करने के लिए देशभर में सक्रिय महिला संगठनों से सुझाव मांगा था. लेकिन प्रस्ताव भेजने के बाद क्या हुआ यह किसी को नहीं मालूम. ट्रैफेंकिंग के ख़िलाफ ही काम कर रहीं कुनकुरी की अधिवक्ता सिस्टर सेवती पन्ना का कहना है कि नये कानून पर उनसे भी सुझाव मंगाए गए थे. प्रस्तावित कानून में महानगरों से छुड़ा कर लाई जाने वाली लड़कियों के पुनर्वास के लिए भी पुख़्ता उपाय सुझाए थे, क्योंकि देखा गया है कि महानगरों में रहकर लौटने वाली लड़कियां गांवों में व्यस्त न होने के चलते विचलित रहती हैं. वे यहां दुबारा घुल-मिल नहीं पाती और दुबारा महानगरों की तरफ भागने का रास्ता तलाश करती हैं.
बहरहाल, शाइनी आहूजा प्रकरण ने फिर छत्तीसगढ़, झारखंड, पश्चिम बंगाल से तस्करी कर महानगरों में ले जाई जा रही लड़कियों की दुर्दशा पर सोचने के लिए विवश किया है. शायद, गरीब व आदिवासी परिवारों के माथे पर लगे कलंक को धोने
के लिए सरकार कोई ठोस प्रयास इसके बाद करे और उन लड़कियों की सुरक्षा तथा सम्मान के लिए कारगर पहल हो.
लड़कियों की मंडी बन गया पढ़ा लिखा कुनकुरी

इसी से जुड़ी एक ख़बर सरोकार पर
गीताश्री की एक रिपोर्ट
और जो हरियाणा में हो रहा है.

मंगलवार, ९ जून २००९

अबूझमाड़ को बूझना इतना आसान भी नहीं

नक्सलियों से सीधी लड़ाई के लिए सरकार ने तीन दशक से बंद अबूझमाड़ का मोर्चा खोल दिया है. वस्त्रविहीन व कंदमूल खाकर जीने वाले आदिम गोंड़ जाति के बीच अब आम लोगों का सीधा सम्पर्क हो सकेगा. इससे उनकी जीवन शैली और संस्कृति पर ख़तरे तो दिखाई दे रहे हैं, लेकिन सरकार को अपने इस फैसले के पीछे नक्सली हिंसा की आग से झुलस रहे बस्तर में शांति की नई बयार बहने की उम्मीद भी दिखाई दे रही है.
वैसे तो लोगदेश में कहीं भी आने-जाने के लिए आज़ाद हैं लेकिन बस्तर का अबूझमाड़ दुर्गम पहाड़ियों और घने जंगलों से घिरा एक ऐसा गलियारा है जहां पिछले 3 दशकों से आम लोगों को जाने की मनाही थी. अबूझमाड़ में आम लोगों के प्रवेश पर तत्कालीन मध्यप्रदेश सरकार ने रोक तब लगाई गई थी, जब 80 के दशक में बीबीसी के कुछ पत्रकारों ने यहां पहुंचकर गोंड़ महिलाओं की अर्धनग्न तस्वीरें खींचीं और उनके विदेशी अख़बारों में छप जाने से हंगामा मचा. बस्तर संभाग के तीन जिलों दंतेवाड़ा, नारायणपुर व बीजापुर के 4000 वर्गकिलोमीटर के दायरे में फैले 237 गांवों के 26 हज़ार आदिवासी अपनी ही विशिष्ट आदिम संस्कृति में जीते हैं. वे जानवरों का शिकार करते हैं, कंदमूल खाते हैं और पेड़ों की छाल पहनते हैं. हालांकि बीते दो दशकों से वे हाट-बाज़ारों में जाकर बिना सिले हुए कपड़े भी पहनने लग गए हैं. जिलाधीश से अनुमति लेकर नारायणपुर स्थित रामकृष्ण मिशन ने यहां शिक्षा व स्वास्थ्य की दिशा में भी कुछ काम किया है. लेकिन अबूझमाड़ का ज्यादातर हिस्सा बीते 3 दशकों से अबूझ पहेली है. यहां के आदिवासी जंगल, नदी, पहाड़ के बीच ही जीवन बिताते हैं. ज्यादातर हिस्सों में सरकार की कोई योजना नहीं पहुंच पाई है. न इन्हें सरकारी राशन मिलता है न पेंशन. न इन गांवों में सड़कें है और न ही बिजली. अबूझमाड़ के सघन वनों के शुरूआती कुछ गांवों में तो समय-समय पर सरकार के नुमाइंदो व सुरक्षा बलों ने प्रवेश किया है पर अधिकतर हिस्से अभी भी रहस्यमयी बने हुए हैं. सन् 2001 में छत्तीसगढ़ राज्य का गठन होने के बाद अबूझमाड़ के सर्वेक्षण के लिए कई प्रयास हुए हैं. गांवों की संख्या तो सेटेलाइट के चित्रों से निर्धारित की गई है पर इन गांवों तक सरकार भी नहीं पहुंच पाई है. सन् 2005 में प्रदेश की भाजपा सरकार ने एक निजी संस्था को इस क्षेत्र के सर्वेक्षण की जिम्मेदारी दी थी लेकिन नक्सलियों ने उन्हें घुसने नहीं दिया. बस्तर के सांसद बलिराम कश्यप की अध्यक्षता में भी एक बार समिति बनाई गई लेकिन यह समिति भी अबूझमाड़ को बूझने में सफल नहीं हो पाई. परिणामस्वरूप यह अबूझ इलाका हिंसक नक्सलियों के लिए स्वर्ग बना हुआ है. पीडब्ल्यूजी की रीजनल इकाई ने तो 1980 में बकायदा इसे अपना मुख्यालय घोषित कर दिया था. नक्सली इन इलाकों में छिपकर अपनी योजनाएं तैयार करते हैं और यहां से निकलकर पूरे बस्तर में तांडव मचाते हैं. बीते कुछ सालों में नक्सलियों ने सुरक्षा बलों व नेताओं पर हमले तेज किए हैं. नक्सलियों की बढ़ती ताक़त को वैसे तो सरकार उनकी हताशा का नाम देती है, लेकिन सच्चाई यही है कि उनसे मुकाबला करने में सरकार के पसीने छूट रहे हैं. नक्सलियों के विरोध के लिए आदिवासियों के बीच चलाया जा रहा सलवा जुड़ूम आंदोलन भी कारगर साबित नहीं हो रहा है. भारी संख्या में सुरक्षा बलों की तैनाती भी उनको रोक पाने में कारगर नहीं है. हाल के दिनों में नक्सलियों ने धमतरी और राजनांदगांव जिले के नये इलाकों में सुरक्षा बल के जवानों व मतदान कर्मियों की सामूहिक हत्याएं की है. कई सलवा जुड़ूमियों व कांग्रेस-भाजपा नेताओं को उन्होंने मार डाला है. इन घटनाओं से सरकार की जबरदस्त किरकिरी हो रही है. छत्तीसगढ़ के गृह मंत्री ननकीराम कंवर को तो कहना पड़ा है कि यदि दो साल के भीतर नक्सली समस्या का अंत नहीं हुआ तो वे अपने पद से इस्तीफा दे देंगे. विरोधी दल कांग्रेस ने इस बयान पर कहा है कि यह बात मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह को कहनी चाहिए, क्योंकि प्रदेश के मुखिया होने के नाते पहली जवाबदारी उनकी ही बनती है.
राजनैतिक दलों के अतिरिक्त सरकार पर औद्योगिक घरानों की ओर से भी दबाव है. टाटा और एस्सार जैसी बड़ी कम्पनियों को बस्तर के बहुमूल्य खनिजों के उत्खनन और इस्पात संयंत्र लगाने के लिए हजारों एकड़ जमीन दी गई है, लेकिन नक्सलियों के हमले उन्हें काम नहीं करने दे रहे हैं. मुख्यमंत्री कहते हैं कि पूरी दुनिया जब 21वीं सदी में पहुंच गई है तो नक्सली बस्तर के आदिवासियों को उनके मूलभूत अधिकारों से वंचित कर उन्हें 19वीं सदी में रखना चाहते हैं. नक्सली कहते हैं कि जंगल, पानी, जमीन सब उन आदिवासियों का है जो यहां रहते हैं. चंद पूंजीपतियों के फायदे के लिए आदिवासियों को उजाड़ने की साजिश वे नहीं चलने देंगे. नक्सलियों ने बस्तर में हस्तक्षेप के ख़िलाफ मुख्यमंत्री सहित यहां के कई मंत्री, नेताओं के नाम मौत का फरमान जारी कर रखा है.
बस्तर विकास प्राधिकरण की इसी हफ़्ते मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह की अध्यक्षता में हुई बैठक में अबूझमाड़ को आम लोगों के लिए खोलने का निर्णय लिया गया. सरकार अब नक्सलियों को उनके सुरक्षित ठिकाने पर घुसकर घेरना चाहती है. अभी तक सरकार के नहीं पहुंचने के चलते शायद अबूझमाड़ के आदिवासी नक्सलियों को ही सरकार मानते रहे हों लेकिन अब उन्हें एक दूसरी सरकार का भी सामना करना पड़ेगा. अबूझमाड़ के दरवाजे खोल दिए जाने के बाद भी सरकारी अमले व सुरक्षा बलों को दुरूह भौगोलिक संरचना के चलते इसे भेद पाना आसान नहीं है. वैसे भी उनके लिए कभी इस इलाके में जाने के लिए मनाही तो रही नहीं है. कुछ सालों के बाद मालूम हो सकेगा कि अबूझमाड़िया जन-जीवन में बाकी दुनिया की दख़ल का क्या असर पड़ेगा, फिलहाल, सरकार ने नक्सलियों से निपटने के लिए एक और दांव खेल दिया है.

अब हबीब के प्रयोगों का पीछा करें

हबीब तनवीर के चले जाने के बाद यह सवाल बेचैन करने वाला है कि उनकी प्रयोगधर्मिता और छत्तीसगढ़ की लोक विधाओं को परिष्कृत कर राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर प्रतिष्ठित करने की गति में ठहराव तो नहीं आ जाएगा.
तीजनबाई की पंडवानी की अनोखी भाव-भंगिमाएं, तम्बूरे का अस्त्र-शस्त्रों की तरह इस्तेमालकरना हबीब तनवीर से सीखा. देवदास बंजारे की टीम ने चरणदास चोर नाटक में पंथी नृत्य को अद्भुत शारीरिक कौशल के साथ प्रदर्शित किया तो यह भी हबीब का ही तराशा प्रयोग था. हबीब तनवीर ने रविन्द्रनाथ टैगोर, शेक्सपियर के नाटकों का मंचन किया तो उन्हें छत्तीसगढ़ के लोक धुनों, गीतों में पिरोकर सामने लाया. इसके लिए कलाकार भी उन्होंने वहीं चुने जो आम लोगों के बीच से छत्तीसगढ़ी परिवेश में जीते रहे हैं. हबीब तनवीर ने उन्हें तराशा और हीरा बना दिया. गोविन्दराम निर्मलकर, रामचरण निर्मलकर, दीपक तिवारी आदि कितने ही कलाकार आज अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित हैं, जिन्हें हबीब तनवीर के सानिध्य में देश विदेश के मंचों पर छत्तीसगढ़ी कला, कथा, गीतों को प्रतिष्ठित करने का अवसर मिला. हबीब तनवीर पहले ऐसे समर्पित सम्पूर्ण नाटककार थे, जिन्होंने छत्तीसगढ़ की कला और कलाकारों की ताकत का परिचय न केवल छत्तीसगढ़ियों को कराया बल्कि दुनिया भर में इसका लोहा मनवाया.
शेक्सपियर के रूपान्तरित नाटक कामदेव का अपना-वसंत ऋतु का सपना में पूरी कथा बांस गीत के जरिये आगे बढ़ती है. बांस गीत न हो तो इस नाटक की आत्मा ही न रहे. ऐसा प्रयोग सिर्फ हबीब तनवीर से ही संभव था. उनके रहते उम्मीद सी बंधी रहती थी कि गम्मत, नाचा, पंडवानी, ददरिया, सुआगीत, देवारगीत, बांसगीत आदि पर प्रयोग होते रहेंगे और नये कलाकार गढ़े जाते रहेंगे लेकिन अब उनके जाने से एक खालीपन आ गया है. छत्तीसगढ़ी लोक कला और कलाकारों के लिए काम करने वालों का एक वर्ग सांस्कृतिक आयोजनों में इस समय बुरी तरह से हावी है. इनका काम जत्था निकालना, महोत्सव कराना और सरकारी अनुदान हड़पना रह गया है. कुछ बिचौलिये किस्म के लोगों के पास छत्तीसगढ़ी कला के संरक्षण का भार सौंप दिया गया है. दुर्भाग्य की बात है कि कुछ नेता और नौकरशाह ऐसे कार्यक्रमों में अपना अभिनंदन कराते हैं और इन्हें संरक्षण देते हैं. इन्हीं लोगों ने हबीब तनवीर की लोकप्रियता के शिखर को छूने के बाद उनके छत्तीसगढ़ के नये कलाकारों की तलाश करने और तराशने के काम में बाधा डाली. जब भी वे रायपुर या छत्तीसगढ़ में कोई प्रस्तुति देने आते थे यह आरोप उनके पीछे लग जाता था कि वे राज्य के कलाकारों की ग़रीबी का बेज़ा फायदा उठा रहे हैं और उनका शोषण कर रहे हैं. हबीब तनवीर के नया थियेटर में सारे कलाकार एक जैसे माहौल में रहते, खाते पीते सोते हैं और निरन्तर अभ्यास कर एक मंच पर चढ़ते हैं. हबीब ने तो दर्जनों कलाकारों की आजीविका चलाई और उन्हें प्रतिष्ठा भी दिलाई, लेकिन छत्तीसगढ़ में उनकी सक्रियता कम हो जाने के बाद भी आरोप लगाने वाले रत्ती भर भी उनकी खाली जगह नहीं भर पाए. इन दिनों छत्तीसगढ़ में गहरा सांस्कृतिक संकट छाया हुआ है. बाज़ार फूहड़ बोलों व धुनों से पटा हुआ है. छत्तीसगढ़ी नाटकों का मंचन बंद है. रहस लुप्तप्राय हो रहा है, इसके कलाकार आज भूखों मर रहे हैं. गम्मत की नई पीढ़ी तैयार नहीं हो रही है.
हबीब तनवीर के काम का दायरा व्यापक रहा है. नाटकों में, लोककथाओं में, गीतों में, नृत्यों में, अभिनय में. उनके कामकाज का पीछा कर हम छत्तीसगढ़ की समृध्द संस्कृति को बचा सकते हैं. राज्य के कला प्रेमियों की जिम्मेदारी है कि हबीब तनवीर का युग ख़त्म न होने दें, अभी उनके प्रयोगों को जारी रखने की ज़रूरत है.

मंगलवार, २६ मई २००९

हिंसा व क्रूरता के खेल में बेजु़बान खिलौने ये आदिवासी बच्चे

बस्तर से लेकर सरगुजा तक छत्तीसगढ़ में आदिवासी बच्चों का बाज़ार लगा है. इस बाजार में लड़के भी हैं और लड़कियां भी. ये हथियार उठाकर मोर्चा लेने के लिए भी राज़ी हैं और भारी मशीनों में दबकर जान गंवाने के लिए भी. इन बच्चों की मांग नक्सलियों को भी है और पुलिस को भी. दिल्ली, पंजाब, हरियाणा में है और कर्नाटक, गोवा, तमिलनाडु में भी. ये आदिवासी उनके बच्चे हैं जो पीढ़ियों से अपने महुआ-तेंदू का जंगल और अपनी संस्कृति को बचाने के लिए अपने प्राणों की आहुति देता आ रहा है. उनकी लड़ाई मुगलों, मराठा शासकों से हुई, वे अंग्रेजों से भी लड़े, लेकिन अब शायद ये थक चुके हैं इनके बच्चे लड़ाई शुरू करने से पहले ही हार चुके हैं. दशकों से नहीं देखा गया आदिवासियों को अपना ठिकाना छोड़ते. जिस जंगल को वे स्वर्ग समझते रहे हैं, विकास की नई परिभाषा, उपद्रव व अतिक्रमण के नये तेवरों के चलते वह उन्हें डराने लगा है. बस थोड़ा बरगलाने, झांसा देने की जरूरत है फिर स्वभाव से साहसी और शरीर से मजबूत लेकिन मासूम और हताश इन आदिवासी लड़के-लड़कियों को कोई भी अपना शिकार बना लेता है. सभ्य समाज के खिलाड़ियों के लिए ये इतने खरे खिलौने हैं कि निर्ममता की सारी हदें पार करने के बाद भी वे चीखते-चिल्लाते नहीं. कभी इनकी पीड़ा में किसी कोने से आवाज उठती भी है तो वह अनसुनी कर दी जाती है.
आंध्रप्रदेश में बीते 6 अप्रैल को 14 साल के मुकेश की मौत उसके सिर पर बोरिंग मशीन की एक राड गिरने से हो गई. वह उन दर्जन भर बच्चों में शामिल था जो धनतुलसी गांव के नरेन्द्र और गंगदेव नाम के दलालों के साथ कांकेर के पीढा़पाल छात्रावास से अपने मां-बाप को. बताए बगैर 6 माह पहले अचानक भाग निकले थे. उन्हें अच्छी नौकरी व नियमित तनख्वाह का झांसा दिया गया, लेकिन वहां उन्हें बोर खुदाई करने वाले काम में झोंका. वहां दिन रात ट्रकों के साथ रहना पड़ता और लगातार कई-कई दिनों तक भारी भरकर औजारों से काम करना होता था. मुकेश की मौत से घबराकर साथ गया सन्तू भागकर किसी तरह पीढ़ापाल लौटा. उसके आने पर पता चला तुलतुली, मर्रापी आदि गांवों से लापता सारे बच्चे इन्हीं दलालों के साथ गये थे और वहां बोरिंग चलाने वाले एक ठेकेदार के चंगुल में हैं. कांकेर कलेक्टर शहला निगार ने अब बाकी बच्चों को लाने के लिए एक टीम तैयार की है और दोनों दलालों के ख़िलाफ रिपोर्ट दर्ज कर उनकी तलाश की जा रही है.
सरगुजा जिले के प्रेमनगर के 5 नाबालिगों को लखनपुर का बशीर खान काम दिलाने नोएडा उत्तरप्रदेश ले गया और उन्हें एक गन्ना उत्पादक के पास बेचकर आ गया. इनमें से एक अशोक किसी तरह वहां से भागकर अपने गांव साल्ही पहुंचा. उसने बताया कि फार्म हाऊस का मालिक कहता था कि हमें बशीर ने एकमुश्त रकम लेकर उसके पास छोड़ा है. अशोक ने बताया कि उनसे दिन-रात काम कराया जा रहा था और भोजन भी समय पर नहीं मिलता था. मजदूरी की तो बात ही नहीं थी. प्रेमनगर पुलिस ने दलाल बशीर खान के ख़िलाफ अपराध कायम किया है. अशोक के साथ बाकी बच्चों को छुड़ाने के लिए एक टीम नोएडा रवाना की गई है.
छत्तीसगढ़ का छत कहे जाने वाले मैनपाट की पहाड़ियों में बसे गांवों से भी नाबालिग लड़के उठाकर ले जाए जा रहे हैं. नर्मदापुर, सतानादर, पैगर आदि गांवों के बीसियों बच्चों का बीते कई सालों से पता नहीं. इनमें से कुछ घरेलू नौकर बना गये तो कुछ को उत्तर प्रदेश के कालीन उद्योग में खपाया गया है. 6 माह पहले भी 9 बच्चों को दलालों ने फांसकर मिर्जापुर के एक ईंट भट्ठे में पहुंचा दिया. नर्मदापुर पुलिस इनमें से 7 को वहां से छुड़ाकर ला चुकी है, लेकिन दो बच्चे गुड़्डू और चीतम वहां नहीं मिले. 10-12 साल के इन बच्चों के बारे में अब तक कुछ पता नहीं चला. ईंट भट्ठा मालिक ने साफ इंकार कर दिया कि ये दोनों वहां काम करते थे.
23 सितम्बर 08 को रायपुर रेलवे स्टेशन पर दो दर्जन आदिवासी बच्चों को बहदवास हालत में देखकर वहीं मौजूद कुछ स्थानीय युवकों के कान खड़े हुए. मालूम हुआ कि सब अबूझमाड़ इलाके से यहां तक पहुंचे थे. सरकार और उसकी विकास योजनाएं तो वहां तक पहुंच नहीं पाई लेकिन दलाल पहुंच गये. दलाल सम्पतलाल स्टेशन पर ही दबोच लिया गया. इन बच्चों को चैन्नई के कपड़ा कारखाने में काम दिलाने झांसा दिया गया था. उन्हें सफर करते 12 घंटे बीत चुके थे और 24 घंटे का रास्ता बाकी था लेकिन दलाल ने उन्हें खाने-पीने को कुछ नहीं दिया. सम्पत के इस रवैये से भूखे-प्यासे कुछ बच्चों का माथा ठनका और वे धमतरी से ही दलाल का साथ छोड़कर वापस गांव भाग गये. दलाल वहां से 36 बच्चों को लेकर निकला था. एक दो को छोड़ बाकी सब की उम्र 16 साल से नीचे थी. बच्चों ने बताया कि उन्हें सम्पत ने एक कपड़ा फैक्ट्री में 2500 रूपये माह की नौकरी दिलाने का वादा किया है. बच्चे अगले दिन पुलिस व श्रम विभाग की मदद से गांव लौटा दिये गए.
बीते 17 मार्च को नक्सलियों ने एक 9वीं कक्षा के छात्र सूरज की गोलियों से भूनकर हत्या कर दी. कांकेर जिले के कोयलीबेड़ा का यह बालक परीक्षा देने के लिए घर से निकला कि रास्ते में नक्सलियों ने उन्हें घेरा. बच्चों से दुश्मनी! तथ्य यह है कि कुछ माह पहले सूरज के पिता की हत्या भी नक्सलियों ने पुलिस की मुखबिरी करने के संदेह में कर दी थी. क्या बच्चे भी पुलिस के लिए मुखबिरी कर रहे हैं?
बीबीसी न्यूज चैनल के कुछ पत्रकार पिछले साल दिल्ली से बस्तर पहुंचे. दंतेवाड़ा के भांसी थाने में उन्हें जब 21 साल के दिलीप ने बताया कि वह पिछले 7 साल से नक्सलियों से लोहा ले रहा है, तो सुनकर वे दंग रह गये. 14 साल की उम्र में ही वह पुलिस में भर्ती कर लिया गया था. दिलीप कहता है कि जब वह 5वीं पढ़ता था तो नक्सली उसे उठाकर ले गए और वह उनके जन-जागरण जत्थे में नाचने गाने लगा. बाद में उसने पाया कि नक्सली पैसे लेकर हत्याएं करते हैं और आदिवासी लड़कियों से बलात्कार करते हैं. उसे उनसे घृणा हो गई और खुद को पुलिस में सरेंडर कर दिया. पुलिस ने उसे बाल आरक्षक की नौकरी दे दी और 14 साल की उम्र से ही दिलीप देश के सबसे बड़े आंतरिक युध्द में एक सिपाही है. छत्तीसगढ़ पुलिस में बाल आरक्षक सिर्फ वे बनाए जाते हैं, जिनके अभिभावक की पुलिस विभाग में रहते हुए असमय मौत हो जाए, लेकिन पुलिस ने आत्मसमर्पण करने वाले बच्चे को ही हथियार थमा दिया.
बस्तर में नक्सलियों और पुलिस फोर्स द्वारा बच्चों का हिंसक गतिविधियों के लिए हो रहे इस्तेमाल को लेकर ह्मूमन राइट्स वाच ने राजधानी रायपुर में बीते साल सितम्बर में 58 पृष्ठों की एक विस्तृत रिपोर्ट जारी की. इसमें बताया गया था कि बड़ी संख्या में नक्सलियों से निपटने के लिए पुलिस ने आदिवासी नाबालिगों को विशेष पुलिस अधिकारी (एसपीओ) बनाकर हथियार सौंपा है. पुलिस अधिकारियों ने इसके जवाब में कहा कि ऐसा जानबूझकर नहीं किया गया है. कुछ एक नाबालिग थे, पर इसकी वजह सिर्फ ये है कि उनकी जन्मतिथि से सम्बन्धित दस्तावेज हासिल नहीं हुए. जैसे ही पता चला, उन्हें हटा दिया गया. इनकी संख्या पुलिस के मुताबिक करीब 150 थी. लेकिन 'वाच' का दावा है कि अब भी बड़ी संख्या में एसपीओ के रूप में नाबालिग काम कर रहे हैं और सशस्त्र नक्सलियों से लोहा लेने के लिए उन्हें मोर्चे पर भेजा जा रहा है. सर्चिंग आपरेशनों में उन्हें सामने रखा जा रहा है. नाबालिग एसपीओ की सही संख्या को लेकर तो 'वाच' ने कोई दावा नहीं किया लेकिन यह बताया गया कि नक्सलियों के साथ मुठभेड़ में मारे गए अनेक एसपीओ नाबालिग थे, यह प्रत्यक्षदर्शियों ने स्वीकार किया है.
बच्चे सीखते हैं बारूदी सुरंग बिछाना
दूसरी तरफ नक्सली भी हिंसा व जोखिम भरे काम में बच्चों को पिछले एक दशक से झोंक रहे हैं. इन्हें न केवल खुफिया जानकारी इकट्ठा करने के लिए तैनात करते हैं बल्कि भूमिगत सुरंग बिछाने और बारूद बनाने का प्रशिक्षण दिया जाता है. नक्सलियों ने बाल संघम का गठन भी कर रखा है, जिसमें 6 से लेकर 12 साल के बच्चे शामिल किये गये हैं. 12 साल से ज्यादा उम्र के बच्चों को राइफल चलाने की ट्रेनिंग दी जाती है. कई बच्चे नुक्कड़ नाटकों में रखे गए हैं, बाद में उन्हें हथियार थमा दिया जाता है. नक्सली बच्चों को अपने दस्ते में शामिल करने के लिए तमाम हथकंडों का इस्तेमाल करते हैं. पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी ने बीते साल 2 सितम्बर से 8 सितम्बर तक नक्सली सप्ताह मनाया. इस दौरान उन्होंने जगह-जगह बैठकें ली थी और परचे चस्पा किए . परचों में उन्होंने हर घर से एक सदस्य को जनवादी संघर्ष में शामिल होने की अपील की. जाहिर है यह अपील नये लड़कों के लिए ही थी. इसी साल 8 जनवरी को सिंगावरम मुठभेड़ में 17 लोगों की मौत हुई, जिनके बारे में पुलिस का कहना है कि ये नक्सली हैं. इनमें 3 की उम्र 16 साल से कम थी. इसी साल जनवरी में पत्रकारों से बात करते हुए छत्तीसगढ़ के डीजीपी विश्वरंजन ने कहा कि नक्सली बडी़ संख्या में बच्चों की भर्ती कर रहे हैं. इनमें लड़कियां भी हैं. उन्होंने बताया कि नक्सलियों की अलग-अलग शाखाओं में शामिल लोगों की संख्या 45 हजार है, जिनमें एक तिहाई लड़कियां हैं और ज्यादातर नाबालिग रहते ही दस्ते में शामिल किए गये.
बस्तर में नक्सली हिंसा और उसके बाद शुरू हुए सलवा जुड़ूम आंदोलन के बाद करीब 500 गांव उजड़ चुके हैं. इसका सबसे बुरा प्रभाव आदिवासी बच्चों की शिक्षा पर पड़ा है. सलवा जुड़ूम के बाद बने कुछ कैम्पों में तो पढ़ाई हो रही है पर बड़ी संख्या में स्कूलों, छात्रावासों को नक्सलियों ने ढ़हा दिया है. सरकारी आंकड़े ही बताते हैं कि इन गांवों की आबादी लगभग 3 लाख थी. लेकिन कैम्पों में रहने वालों की संख्या 60 हजार से अधिक नहीं है. अनेक आंध्रप्रदेश के सीमावर्ती गांवों में चले गए. इनके बच्चों के लिए शिक्षा तो दूर की बात है, पेट भरने का साधन भी नहीं है. इन सबके चलते बच्चों का हिंसक और जोखिम से भरे कामों में इस्तेमाल आसान हो गया है.
व्यथा सरगुजा-जशपुर की
दिल्ली, मुम्बई की पाश कालोनियों में जशपुर, बगीचा, कुनकुरी की लड़कियों को झाड़ू-पोछा लगाते देखा जा सकता है. अधिकांश उरांव आदिवासी हैं, जो इसाई धर्म अपना चुके हैं. राज्य महिला आयोग के अनुसार जशपुर व सरगुजा जिले से काम की तलाश में बाहर जाने वाली लड़कियों की संख्या 19000 है. रायपुर के एनजीओ 'फोरम फार फैक्ट फाइंडिंग डाक्यूमेन्टेशन एण्ड एडवोकेसी' के सुभाष महापात्र के अनुसार 7021 लड़कियां ऐसी हैं, जिन्हें छत्तीसगढ़ से बाहर ले जाकर या तो बेच दिया गया या वे बंधक बनाई ली गईं. कुनकुरी में ग्रामीण विकास केन्द्र की सिस्टर सेवती पन्ना, एस्थेर खेस इत्यादि ने कुनकुरी व आसपास के गांवों में घूमकर 3000 से अधिक बच्चों की सूची तैयार की है, जिन्हें दलाल बहला-फुसलाकर दिल्ली, गोवा, मुम्बई आदि ले गए. इनमें 90 फीसदी लड़कियों की उम्र 16 साल से कम है. कुछ तो स्कूल जाने के लिए घर से निकलीं और बस्ते को खेत में फेंक दिया, फिर दलालों के साथ दिल्ली निकल गईं. ये अमीरों की कोठियों में 24 घंटे रहती हैं और सुबह से देर रात तक काम करती हैं. इन्हें ठीक तरह से न कपड़े मिलते न खाना. इनसे मारपीट की जाती है और शारीरिक शोषण भी किया जाता है. कई लड़कियां यहां गर्भवती होकर लौटीं और अनेक आईं गंभीर बीमारियों को साथ लेकर. कुछ लड़कियों की दिल्ली में ही मौत हो गई और परिजनों को इसका पता ही नहीं चला. सिस्टर्स के पास जानकारी है कि इनमें से 12 लड़कियां विदेशों में भी भेज दी गई. दिल्ली में करीब 150 प्लेसमेन्ट एजेंसियां सक्रिय हैं, जिनके एजेंट अक्सर सरगुजा, कुनकुरी इलाकों में घूमते दिखाई देते हैं. दिल्ली ले जाकर इनके नाम बदल दिये जाते हैं ताकि जब मां-बाप या पुलिस उन्हें ढूंढने के लिए पहुंचे तो उनका पता-ठिकाना ही न मिले.
सभ्य समाज का नकारात्मक हस्तक्षेप
दक्षिण बस्तर से लेकर उत्तर सरगुजा तक के आदिवासी बच्चों के साथ क्रूरतापूर्ण बर्ताव के पीछे बनी परिस्थितियां अलग-अलग हैं लेकिन सब जगह वजह एक ही है कि जंगलों में अपनी खास जीवन शैली के आदी आदिवासियों के विकास के नाम पर सभ्य माने जाने वाले समाज ने उनकी मंशा के ख़िलाफ हस्तक्षेप किया है. छत्तीसगढ़ में पलायन दशकों से होता रहा है. जांजगीर, धमतरी, बिलासपुर जिलों के अनुसूचित जाति व पिछड़े वर्ग के लोग हर साल फसल काटने के बाद परिवार लेकर उत्तर भारत के विभिन्न राज्यों के ईंट भट्ठों में काम करने निकलते हैं और बारिश शुरू होते ही लौट आते हैं. शहरी वातावरण से ये घुले मिले हैं. वहां जाकर ये ज्यादा कमाते हैं और घर बनाने, बच्चों का ब्याह रचाने के लिए पैसे लाते हैं. इनका भी वहां शोषण होता है. तय मजदूरी से कम दी जाती है. काम के घंटे तय नहीं होते और रहने खाने का इंतजाम ख़राब होता है. महिलाएं हवस का शिकार होती हैं. पुरूषों को बंधक बना लिया जाता है. छत्तीसगढ़ के लिए यह कलंक ही है. राज्य सरकार सस्ते चावल की योजना को पलायन रोकने का एक जरिया मानती है. इस चुनाव में भाजपा ने छत्तीसगढ़ को पलायन मुक्त राज्य बनाने का वादा किया था. लेकिन हिंसा और क्रूरता के शिकार बच्चों के लिए सरकार की कोई चुनावी घोषणा नहीं है. शायद सरकार समझती है कि बस्तर, रायगढ़ और सरगुजा के आदिवासियों का भला यहां मौजूद खनिज सम्पदाओं व पानी के दोहन से ही होगा. नक्सल हिंसा इससे खत्म होगी, बेरोजगारी खत्म होगी तो बस्तर के बच्चे हथियार उठाने व राज्य से बाहर जाकर मशीनों के नीचे दबने के लिए विवश नहीं होंगे. नक्सली इसका विरोध करते हैं. दोनों ही पक्षों का दावा है कि उनकी सोच ही आदिवासियों का भला करेगी और इसके चलते बस्तर में हिंसक संघर्ष जारी है. इस संघर्ष में जो बच्चे शामिल हो रहे हैं वे बे-मौत मारे जा रहे हैं और जो बस्तर से भाग रहे हैं वे भी मर रहे हैं. प्रेमनगर, मैनपाट इलाकों से जोखिम का काम लेने के लिए जिन बच्चों को राज्य के बाहर बेचा जा रहा है, उन इलाकों में बाक्साइट का उत्खनन हो रहा है, नये पावर प्लांट लगाए जा रहे हैं. जशपुर-सरगुजा इलाके में मिशनरियों ने सेवा और शिक्षा के प्रसार के साथ इसाई धर्म का भी विस्तार किया. आदिवासियों ने इनसे रहन सहन का नया तरीका सीखा. दो दशक पहले कुनकुरी के उरांव आदिवासी खूब पढ़ाकू थे. यह देश का सबसे ज्यादा प्रशासनिक अधिकारी देने वाला इलाका था. लेकिन यहां बचे आदिवासी पढ़ लिख कर बेरोजगार हो गये हैं. खेती टुकड़ों में बंट गई है. उद्योग धंधे हैं नहीं. इसाई कल्चर अपनाने लेने के बाद अच्छा खाना और पहनावा चाहते हैं. उनके बीच भयंकर द्वन्द मचा है. इनमें से सैकड़ों लड़कियों ने जोखिम जान लेने के बाद भी महानगरों में जाकर काम तलाशना ठीक समझा. फिलहाल तो नाबालिग आदिवासियों के इस त्रासदी से निकल बचने की कोई सूरत दिखाई नहीं देती है. शायद आने वाले दिनों में सरकार व जागरूक समुदाय मिलकर कोई रास्ता निकाले.