मंगलवार, 26 मई 2009

हिंसा व क्रूरता के खेल में बेजु़बान खिलौने ये आदिवासी बच्चे

बस्तर से लेकर सरगुजा तक छत्तीसगढ़ में आदिवासी बच्चों का बाज़ार लगा है. इस बाजार में लड़के भी हैं और लड़कियां भी. ये हथियार उठाकर मोर्चा लेने के लिए भी राज़ी हैं और भारी मशीनों में दबकर जान गंवाने के लिए भी. इन बच्चों की मांग नक्सलियों को भी है और पुलिस को भी. दिल्ली, पंजाब, हरियाणा में है और कर्नाटक, गोवा, तमिलनाडु में भी. ये आदिवासी उनके बच्चे हैं जो पीढ़ियों से अपने महुआ-तेंदू का जंगल और अपनी संस्कृति को बचाने के लिए अपने प्राणों की आहुति देता आ रहा है. उनकी लड़ाई मुगलों, मराठा शासकों से हुई, वे अंग्रेजों से भी लड़े, लेकिन अब शायद ये थक चुके हैं इनके बच्चे लड़ाई शुरू करने से पहले ही हार चुके हैं. दशकों से नहीं देखा गया आदिवासियों को अपना ठिकाना छोड़ते. जिस जंगल को वे स्वर्ग समझते रहे हैं, विकास की नई परिभाषा, उपद्रव व अतिक्रमण के नये तेवरों के चलते वह उन्हें डराने लगा है. बस थोड़ा बरगलाने, झांसा देने की जरूरत है फिर स्वभाव से साहसी और शरीर से मजबूत लेकिन मासूम और हताश इन आदिवासी लड़के-लड़कियों को कोई भी अपना शिकार बना लेता है. सभ्य समाज के खिलाड़ियों के लिए ये इतने खरे खिलौने हैं कि निर्ममता की सारी हदें पार करने के बाद भी वे चीखते-चिल्लाते नहीं. कभी इनकी पीड़ा में किसी कोने से आवाज उठती भी है तो वह अनसुनी कर दी जाती है.
आंध्रप्रदेश में बीते 6 अप्रैल को 14 साल के मुकेश की मौत उसके सिर पर बोरिंग मशीन की एक राड गिरने से हो गई. वह उन दर्जन भर बच्चों में शामिल था जो धनतुलसी गांव के नरेन्द्र और गंगदेव नाम के दलालों के साथ कांकेर के पीढा़पाल छात्रावास से अपने मां-बाप को. बताए बगैर 6 माह पहले अचानक भाग निकले थे. उन्हें अच्छी नौकरी व नियमित तनख्वाह का झांसा दिया गया, लेकिन वहां उन्हें बोर खुदाई करने वाले काम में झोंका. वहां दिन रात ट्रकों के साथ रहना पड़ता और लगातार कई-कई दिनों तक भारी भरकर औजारों से काम करना होता था. मुकेश की मौत से घबराकर साथ गया सन्तू भागकर किसी तरह पीढ़ापाल लौटा. उसके आने पर पता चला तुलतुली, मर्रापी आदि गांवों से लापता सारे बच्चे इन्हीं दलालों के साथ गये थे और वहां बोरिंग चलाने वाले एक ठेकेदार के चंगुल में हैं. कांकेर कलेक्टर शहला निगार ने अब बाकी बच्चों को लाने के लिए एक टीम तैयार की है और दोनों दलालों के ख़िलाफ रिपोर्ट दर्ज कर उनकी तलाश की जा रही है.
सरगुजा जिले के प्रेमनगर के 5 नाबालिगों को लखनपुर का बशीर खान काम दिलाने नोएडा उत्तरप्रदेश ले गया और उन्हें एक गन्ना उत्पादक के पास बेचकर आ गया. इनमें से एक अशोक किसी तरह वहां से भागकर अपने गांव साल्ही पहुंचा. उसने बताया कि फार्म हाऊस का मालिक कहता था कि हमें बशीर ने एकमुश्त रकम लेकर उसके पास छोड़ा है. अशोक ने बताया कि उनसे दिन-रात काम कराया जा रहा था और भोजन भी समय पर नहीं मिलता था. मजदूरी की तो बात ही नहीं थी. प्रेमनगर पुलिस ने दलाल बशीर खान के ख़िलाफ अपराध कायम किया है. अशोक के साथ बाकी बच्चों को छुड़ाने के लिए एक टीम नोएडा रवाना की गई है.
छत्तीसगढ़ का छत कहे जाने वाले मैनपाट की पहाड़ियों में बसे गांवों से भी नाबालिग लड़के उठाकर ले जाए जा रहे हैं. नर्मदापुर, सतानादर, पैगर आदि गांवों के बीसियों बच्चों का बीते कई सालों से पता नहीं. इनमें से कुछ घरेलू नौकर बना गये तो कुछ को उत्तर प्रदेश के कालीन उद्योग में खपाया गया है. 6 माह पहले भी 9 बच्चों को दलालों ने फांसकर मिर्जापुर के एक ईंट भट्ठे में पहुंचा दिया. नर्मदापुर पुलिस इनमें से 7 को वहां से छुड़ाकर ला चुकी है, लेकिन दो बच्चे गुड़्डू और चीतम वहां नहीं मिले. 10-12 साल के इन बच्चों के बारे में अब तक कुछ पता नहीं चला. ईंट भट्ठा मालिक ने साफ इंकार कर दिया कि ये दोनों वहां काम करते थे.
23 सितम्बर 08 को रायपुर रेलवे स्टेशन पर दो दर्जन आदिवासी बच्चों को बहदवास हालत में देखकर वहीं मौजूद कुछ स्थानीय युवकों के कान खड़े हुए. मालूम हुआ कि सब अबूझमाड़ इलाके से यहां तक पहुंचे थे. सरकार और उसकी विकास योजनाएं तो वहां तक पहुंच नहीं पाई लेकिन दलाल पहुंच गये. दलाल सम्पतलाल स्टेशन पर ही दबोच लिया गया. इन बच्चों को चैन्नई के कपड़ा कारखाने में काम दिलाने झांसा दिया गया था. उन्हें सफर करते 12 घंटे बीत चुके थे और 24 घंटे का रास्ता बाकी था लेकिन दलाल ने उन्हें खाने-पीने को कुछ नहीं दिया. सम्पत के इस रवैये से भूखे-प्यासे कुछ बच्चों का माथा ठनका और वे धमतरी से ही दलाल का साथ छोड़कर वापस गांव भाग गये. दलाल वहां से 36 बच्चों को लेकर निकला था. एक दो को छोड़ बाकी सब की उम्र 16 साल से नीचे थी. बच्चों ने बताया कि उन्हें सम्पत ने एक कपड़ा फैक्ट्री में 2500 रूपये माह की नौकरी दिलाने का वादा किया है. बच्चे अगले दिन पुलिस व श्रम विभाग की मदद से गांव लौटा दिये गए.
बीते 17 मार्च को नक्सलियों ने एक 9वीं कक्षा के छात्र सूरज की गोलियों से भूनकर हत्या कर दी. कांकेर जिले के कोयलीबेड़ा का यह बालक परीक्षा देने के लिए घर से निकला कि रास्ते में नक्सलियों ने उन्हें घेरा. बच्चों से दुश्मनी! तथ्य यह है कि कुछ माह पहले सूरज के पिता की हत्या भी नक्सलियों ने पुलिस की मुखबिरी करने के संदेह में कर दी थी. क्या बच्चे भी पुलिस के लिए मुखबिरी कर रहे हैं?
बीबीसी न्यूज चैनल के कुछ पत्रकार पिछले साल दिल्ली से बस्तर पहुंचे. दंतेवाड़ा के भांसी थाने में उन्हें जब 21 साल के दिलीप ने बताया कि वह पिछले 7 साल से नक्सलियों से लोहा ले रहा है, तो सुनकर वे दंग रह गये. 14 साल की उम्र में ही वह पुलिस में भर्ती कर लिया गया था. दिलीप कहता है कि जब वह 5वीं पढ़ता था तो नक्सली उसे उठाकर ले गए और वह उनके जन-जागरण जत्थे में नाचने गाने लगा. बाद में उसने पाया कि नक्सली पैसे लेकर हत्याएं करते हैं और आदिवासी लड़कियों से बलात्कार करते हैं. उसे उनसे घृणा हो गई और खुद को पुलिस में सरेंडर कर दिया. पुलिस ने उसे बाल आरक्षक की नौकरी दे दी और 14 साल की उम्र से ही दिलीप देश के सबसे बड़े आंतरिक युध्द में एक सिपाही है. छत्तीसगढ़ पुलिस में बाल आरक्षक सिर्फ वे बनाए जाते हैं, जिनके अभिभावक की पुलिस विभाग में रहते हुए असमय मौत हो जाए, लेकिन पुलिस ने आत्मसमर्पण करने वाले बच्चे को ही हथियार थमा दिया.
बस्तर में नक्सलियों और पुलिस फोर्स द्वारा बच्चों का हिंसक गतिविधियों के लिए हो रहे इस्तेमाल को लेकर ह्मूमन राइट्स वाच ने राजधानी रायपुर में बीते साल सितम्बर में 58 पृष्ठों की एक विस्तृत रिपोर्ट जारी की. इसमें बताया गया था कि बड़ी संख्या में नक्सलियों से निपटने के लिए पुलिस ने आदिवासी नाबालिगों को विशेष पुलिस अधिकारी (एसपीओ) बनाकर हथियार सौंपा है. पुलिस अधिकारियों ने इसके जवाब में कहा कि ऐसा जानबूझकर नहीं किया गया है. कुछ एक नाबालिग थे, पर इसकी वजह सिर्फ ये है कि उनकी जन्मतिथि से सम्बन्धित दस्तावेज हासिल नहीं हुए. जैसे ही पता चला, उन्हें हटा दिया गया. इनकी संख्या पुलिस के मुताबिक करीब 150 थी. लेकिन 'वाच' का दावा है कि अब भी बड़ी संख्या में एसपीओ के रूप में नाबालिग काम कर रहे हैं और सशस्त्र नक्सलियों से लोहा लेने के लिए उन्हें मोर्चे पर भेजा जा रहा है. सर्चिंग आपरेशनों में उन्हें सामने रखा जा रहा है. नाबालिग एसपीओ की सही संख्या को लेकर तो 'वाच' ने कोई दावा नहीं किया लेकिन यह बताया गया कि नक्सलियों के साथ मुठभेड़ में मारे गए अनेक एसपीओ नाबालिग थे, यह प्रत्यक्षदर्शियों ने स्वीकार किया है.
बच्चे सीखते हैं बारूदी सुरंग बिछाना
दूसरी तरफ नक्सली भी हिंसा व जोखिम भरे काम में बच्चों को पिछले एक दशक से झोंक रहे हैं. इन्हें न केवल खुफिया जानकारी इकट्ठा करने के लिए तैनात करते हैं बल्कि भूमिगत सुरंग बिछाने और बारूद बनाने का प्रशिक्षण दिया जाता है. नक्सलियों ने बाल संघम का गठन भी कर रखा है, जिसमें 6 से लेकर 12 साल के बच्चे शामिल किये गये हैं. 12 साल से ज्यादा उम्र के बच्चों को राइफल चलाने की ट्रेनिंग दी जाती है. कई बच्चे नुक्कड़ नाटकों में रखे गए हैं, बाद में उन्हें हथियार थमा दिया जाता है. नक्सली बच्चों को अपने दस्ते में शामिल करने के लिए तमाम हथकंडों का इस्तेमाल करते हैं. पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी ने बीते साल 2 सितम्बर से 8 सितम्बर तक नक्सली सप्ताह मनाया. इस दौरान उन्होंने जगह-जगह बैठकें ली थी और परचे चस्पा किए . परचों में उन्होंने हर घर से एक सदस्य को जनवादी संघर्ष में शामिल होने की अपील की. जाहिर है यह अपील नये लड़कों के लिए ही थी. इसी साल 8 जनवरी को सिंगावरम मुठभेड़ में 17 लोगों की मौत हुई, जिनके बारे में पुलिस का कहना है कि ये नक्सली हैं. इनमें 3 की उम्र 16 साल से कम थी. इसी साल जनवरी में पत्रकारों से बात करते हुए छत्तीसगढ़ के डीजीपी विश्वरंजन ने कहा कि नक्सली बडी़ संख्या में बच्चों की भर्ती कर रहे हैं. इनमें लड़कियां भी हैं. उन्होंने बताया कि नक्सलियों की अलग-अलग शाखाओं में शामिल लोगों की संख्या 45 हजार है, जिनमें एक तिहाई लड़कियां हैं और ज्यादातर नाबालिग रहते ही दस्ते में शामिल किए गये.
बस्तर में नक्सली हिंसा और उसके बाद शुरू हुए सलवा जुड़ूम आंदोलन के बाद करीब 500 गांव उजड़ चुके हैं. इसका सबसे बुरा प्रभाव आदिवासी बच्चों की शिक्षा पर पड़ा है. सलवा जुड़ूम के बाद बने कुछ कैम्पों में तो पढ़ाई हो रही है पर बड़ी संख्या में स्कूलों, छात्रावासों को नक्सलियों ने ढ़हा दिया है. सरकारी आंकड़े ही बताते हैं कि इन गांवों की आबादी लगभग 3 लाख थी. लेकिन कैम्पों में रहने वालों की संख्या 60 हजार से अधिक नहीं है. अनेक आंध्रप्रदेश के सीमावर्ती गांवों में चले गए. इनके बच्चों के लिए शिक्षा तो दूर की बात है, पेट भरने का साधन भी नहीं है. इन सबके चलते बच्चों का हिंसक और जोखिम से भरे कामों में इस्तेमाल आसान हो गया है.
व्यथा सरगुजा-जशपुर की
दिल्ली, मुम्बई की पाश कालोनियों में जशपुर, बगीचा, कुनकुरी की लड़कियों को झाड़ू-पोछा लगाते देखा जा सकता है. अधिकांश उरांव आदिवासी हैं, जो इसाई धर्म अपना चुके हैं. राज्य महिला आयोग के अनुसार जशपुर व सरगुजा जिले से काम की तलाश में बाहर जाने वाली लड़कियों की संख्या 19000 है. रायपुर के एनजीओ 'फोरम फार फैक्ट फाइंडिंग डाक्यूमेन्टेशन एण्ड एडवोकेसी' के सुभाष महापात्र के अनुसार 7021 लड़कियां ऐसी हैं, जिन्हें छत्तीसगढ़ से बाहर ले जाकर या तो बेच दिया गया या वे बंधक बनाई ली गईं. कुनकुरी में ग्रामीण विकास केन्द्र की सिस्टर सेवती पन्ना, एस्थेर खेस इत्यादि ने कुनकुरी व आसपास के गांवों में घूमकर 3000 से अधिक बच्चों की सूची तैयार की है, जिन्हें दलाल बहला-फुसलाकर दिल्ली, गोवा, मुम्बई आदि ले गए. इनमें 90 फीसदी लड़कियों की उम्र 16 साल से कम है. कुछ तो स्कूल जाने के लिए घर से निकलीं और बस्ते को खेत में फेंक दिया, फिर दलालों के साथ दिल्ली निकल गईं. ये अमीरों की कोठियों में 24 घंटे रहती हैं और सुबह से देर रात तक काम करती हैं. इन्हें ठीक तरह से न कपड़े मिलते न खाना. इनसे मारपीट की जाती है और शारीरिक शोषण भी किया जाता है. कई लड़कियां यहां गर्भवती होकर लौटीं और अनेक आईं गंभीर बीमारियों को साथ लेकर. कुछ लड़कियों की दिल्ली में ही मौत हो गई और परिजनों को इसका पता ही नहीं चला. सिस्टर्स के पास जानकारी है कि इनमें से 12 लड़कियां विदेशों में भी भेज दी गई. दिल्ली में करीब 150 प्लेसमेन्ट एजेंसियां सक्रिय हैं, जिनके एजेंट अक्सर सरगुजा, कुनकुरी इलाकों में घूमते दिखाई देते हैं. दिल्ली ले जाकर इनके नाम बदल दिये जाते हैं ताकि जब मां-बाप या पुलिस उन्हें ढूंढने के लिए पहुंचे तो उनका पता-ठिकाना ही न मिले.
सभ्य समाज का नकारात्मक हस्तक्षेप
दक्षिण बस्तर से लेकर उत्तर सरगुजा तक के आदिवासी बच्चों के साथ क्रूरतापूर्ण बर्ताव के पीछे बनी परिस्थितियां अलग-अलग हैं लेकिन सब जगह वजह एक ही है कि जंगलों में अपनी खास जीवन शैली के आदी आदिवासियों के विकास के नाम पर सभ्य माने जाने वाले समाज ने उनकी मंशा के ख़िलाफ हस्तक्षेप किया है. छत्तीसगढ़ में पलायन दशकों से होता रहा है. जांजगीर, धमतरी, बिलासपुर जिलों के अनुसूचित जाति व पिछड़े वर्ग के लोग हर साल फसल काटने के बाद परिवार लेकर उत्तर भारत के विभिन्न राज्यों के ईंट भट्ठों में काम करने निकलते हैं और बारिश शुरू होते ही लौट आते हैं. शहरी वातावरण से ये घुले मिले हैं. वहां जाकर ये ज्यादा कमाते हैं और घर बनाने, बच्चों का ब्याह रचाने के लिए पैसे लाते हैं. इनका भी वहां शोषण होता है. तय मजदूरी से कम दी जाती है. काम के घंटे तय नहीं होते और रहने खाने का इंतजाम ख़राब होता है. महिलाएं हवस का शिकार होती हैं. पुरूषों को बंधक बना लिया जाता है. छत्तीसगढ़ के लिए यह कलंक ही है. राज्य सरकार सस्ते चावल की योजना को पलायन रोकने का एक जरिया मानती है. इस चुनाव में भाजपा ने छत्तीसगढ़ को पलायन मुक्त राज्य बनाने का वादा किया था. लेकिन हिंसा और क्रूरता के शिकार बच्चों के लिए सरकार की कोई चुनावी घोषणा नहीं है. शायद सरकार समझती है कि बस्तर, रायगढ़ और सरगुजा के आदिवासियों का भला यहां मौजूद खनिज सम्पदाओं व पानी के दोहन से ही होगा. नक्सल हिंसा इससे खत्म होगी, बेरोजगारी खत्म होगी तो बस्तर के बच्चे हथियार उठाने व राज्य से बाहर जाकर मशीनों के नीचे दबने के लिए विवश नहीं होंगे. नक्सली इसका विरोध करते हैं. दोनों ही पक्षों का दावा है कि उनकी सोच ही आदिवासियों का भला करेगी और इसके चलते बस्तर में हिंसक संघर्ष जारी है. इस संघर्ष में जो बच्चे शामिल हो रहे हैं वे बे-मौत मारे जा रहे हैं और जो बस्तर से भाग रहे हैं वे भी मर रहे हैं. प्रेमनगर, मैनपाट इलाकों से जोखिम का काम लेने के लिए जिन बच्चों को राज्य के बाहर बेचा जा रहा है, उन इलाकों में बाक्साइट का उत्खनन हो रहा है, नये पावर प्लांट लगाए जा रहे हैं. जशपुर-सरगुजा इलाके में मिशनरियों ने सेवा और शिक्षा के प्रसार के साथ इसाई धर्म का भी विस्तार किया. आदिवासियों ने इनसे रहन सहन का नया तरीका सीखा. दो दशक पहले कुनकुरी के उरांव आदिवासी खूब पढ़ाकू थे. यह देश का सबसे ज्यादा प्रशासनिक अधिकारी देने वाला इलाका था. लेकिन यहां बचे आदिवासी पढ़ लिख कर बेरोजगार हो गये हैं. खेती टुकड़ों में बंट गई है. उद्योग धंधे हैं नहीं. इसाई कल्चर अपनाने लेने के बाद अच्छा खाना और पहनावा चाहते हैं. उनके बीच भयंकर द्वन्द मचा है. इनमें से सैकड़ों लड़कियों ने जोखिम जान लेने के बाद भी महानगरों में जाकर काम तलाशना ठीक समझा. फिलहाल तो नाबालिग आदिवासियों के इस त्रासदी से निकल बचने की कोई सूरत दिखाई नहीं देती है. शायद आने वाले दिनों में सरकार व जागरूक समुदाय मिलकर कोई रास्ता निकाले.

8 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

बहुत धैर्य के साथ, सुंदर लिखा है आपने. सिलसिला जारी रहे....

सादर आपका
आलोक

दीपक ने कहा…

आपने बहूत संतुलीत और सही लिखा है राजेश जी !!

जिन्हे नक्सली कहा जाता है वो ज्यादातर हत्यारो ,बटमारो की पलटन है और वो नीरिह आदिवासीयो को उपयोग क रहे है !!

मगर प्रशासन की बेपरवाही के चलते लोग शासन पर भरोसा नही करते और इसी का फ़यदा उए हत्यारे उठाते है ! ...आप खुद देखीये इतने जवान शहीद होते है मगर कोई बडा अफ़सर नही मरता क्योकि हेड कांस्टॆबल जैसे लोग सर्च आपरेशन लीड कर रहे है और एस पी डी एस पी जैसे अफ़सर वातानुकुलीत कमरो मे नक्सल्वाद्पर सेमीनार कर रहे है !

आज जो जवान मरे है ...कल उनके परिवार वालो को अपने हक के सरकारी पैसे के लिये रिश्वत देनी पडती है ...यह हमारी शासन और व्यस्था है .....सरकारी स्कुल का शिक्षक खुद अपने बच्चे को प्राईवेट स्कुल मे पढाता है ....सरकरी अस्पताल का उपयोग ना कोई सरकारी अफ़सर करता है ना कोई नेता... यह हम ऐसे भुखे नंगे लोगो के लिये है ।पुलिस थाने ऐसी जगह हो गयी है जहा रिश्वत देते लोगो को जरा भी डर नही लगता बल्की रिश्वत ना देना जहा अपराध हो गया है ...आधे से अधिक कोर्ट मे जजो की नियुक्ती ही नही हो रही है फ़लतः न्याय की व्यस्था पुरी तरह ध्वस्त है...्सरकार के कुछ नेताओ पर खुद नक्सलीयो को चंदे देने के आरोप लग रहे है ... जब ये नेता और अफ़्सरान ही सरकारी आए पर भरोसा नही करते तो जनता इन पर कैसे भरोसा करे और इसी अविश्वास का फ़ायदा ये दरिंदे उठा रहे है !!

काफ़ी दुखद और पीडादयक है यह सब !!

संगीता पुरी ने कहा…

रोचक ढंग से आपने इतनी अच्‍छी रिपोर्ट तैयार की है .. एक ही साथ पूरा पढ लिया .. लेकिन हालात को जानकर मन काफी दुखी हो गया .. लोग इन मासूमों के साथ ऐसा व्‍यवहार कैसे कर पाते हैं .. एक को भी कडी सजा मिल जाए .. तो ऐसे क्रियाकलाप बंद हो जाएं .. सब सरकार की लापरवाही ही मानी जाएगी।

प्रेमचंद गांधी Prem Chand Gandhi ने कहा…

bahut achha, vicharneey aur vicharottejak. badhai. aapki chintaon me main bhi shaamil hun.

Pankaj Mishra ने कहा…

Bahut Khooob rajesh ji ye to bahut he dardnaak katha hai kya kare hum bhi majboor hai prashanana se

somadri ने कहा…

padh kar man vyathit hua, kuch sochne ke mazboor ho gaya .. akhir kab tak? ye silsila jari rahega?

plz visit and grace at http://som-ras.blogspot.com/2009/04/blog-post_13.html

श्याम कोरी 'उदय' ने कहा…

... छत्तीसगढ के वर्तमान हालात पर बहुत ही प्रभावशाली व प्रसंशनीय अभिव्यक्ति है ... इन समस्याओं से जूझने-निपटने की दिशा में कोई सार्थक प्रयास दिखाई नही पड रहे हैं ... ये हालात न जाने कब तक ... !!!!!!!

विजय प्रताप ने कहा…

कैसे कहे अच्छी रिपोर्ट है. हम सभ्य लोग हैं, लेकिन हमारी बर्बरता ने आदिवासी समाज को उत्पीडन के नए नए तरीकों से परिचित कराया है. रिपोर्ट की बुनावट वाकई में काफी संतुलित और सुन्दर है. मैं भी पत्रिका कोटा में हूँ. संपर्क बना रहेगा.