तीजनबाई की पंडवानी की अनोखी भाव-भंगिमाएं, तम्बूरे का अस्त्र-शस्त्रों की तरह इस्तेमाल

शेक्सपियर के रूपान्तरित नाटक कामदेव का अपना-वसंत ऋतु का सपना में पूरी कथा बांस गीत के जरिये आगे बढ़ती है. बांस गीत न हो तो इस नाटक की आत्मा ही न रहे. ऐसा प्रयोग सिर्फ हबीब तनवीर से ही संभव था. उनके रहते उम्मीद सी बंधी रहती थी कि गम्मत, नाचा, पंडवानी, ददरिया, सुआगीत, देवारगीत, बांसगीत आदि पर प्रयोग होते रहेंगे और नये कलाकार गढ़े जाते रहेंगे लेकिन अब उनके जाने से एक खालीपन आ गया है. छत्तीसगढ़ी लोक कला और कलाकारों के लिए काम करने वालों का एक वर्ग सांस्कृतिक आयोजनों में इस समय बुरी तरह से हावी है. इनका काम जत्था निकालना, महोत्सव कराना और सरकारी अनुदान हड़पना रह गया है. कुछ बिचौलिये किस्म के लोगों के पास छत्तीसगढ़ी कला के संरक्षण का भार सौंप दिया गया है. दुर्भाग्य की बात है कि कुछ नेता और नौकरशाह ऐसे कार्यक्रमों में अपना अभिनंदन कराते हैं और इन्हें संरक्षण देते हैं. इन्हीं लोगों ने हबीब तनवीर की लोकप्रियता के शिखर को छूने के बाद उनके छत्तीसगढ़ के नये कलाकारों की तलाश करने और तराशने के काम में बाधा डाली. जब भी वे रायपुर या छत्तीसगढ़ में कोई प्रस्तुति देने आते थे यह आरोप उनके पीछे लग जाता था कि वे राज्य के कलाकारों की ग़रीबी का बेज़ा फायदा उठा रहे हैं और उनका शोषण कर रहे हैं. हबीब तनवीर के नया थियेटर में सारे कलाकार एक जैसे माहौल में रहते, खाते पीते सोते हैं और निरन्तर अभ्यास कर एक मंच पर चढ़ते हैं. हबीब ने तो दर्जनों कलाकारों की आजीविका चलाई और उन्हें प्रतिष्ठा भी दिलाई, लेकिन छत्तीसगढ़ में उनकी सक्रियता कम हो जाने के बाद भी आरोप लगाने वाले रत्ती भर भी उनकी खाली जगह नहीं भर पाए. इन दिनों छत्तीसगढ़ में गहरा सांस्कृतिक संकट छाया हुआ है. बाज़ार फूहड़ बोलों व धुनों से पटा हुआ है. छत्तीसगढ़ी नाटकों का मंचन बंद है. रहस लुप्तप्राय हो रहा है, इसके कलाकार आज भूखों मर रहे हैं. गम्मत की नई पीढ़ी तैयार नहीं हो रही है.
हबीब तनवीर के काम का दायरा व्यापक रहा है. नाटकों में, लोककथाओं में, गीतों में, नृत्यों में, अभिनय में. उनके कामकाज का पीछा कर हम छत्तीसगढ़ की समृध्द संस्कृति को बचा सकते हैं. राज्य के कला प्रेमियों की जिम्मेदारी है कि हबीब तनवीर का युग ख़त्म न होने दें, अभी उनके प्रयोगों को जारी रखने की ज़रूरत है.
1 टिप्पणी:
आदरणीय हबीब तनबीर जी का नाम लम्बे अर्से से सुनता रहा हूँ, मेरे बचपन के कुछ साथी उनके कार्यक्रम देखने जाते थे किंतु मुझे देखने का मौका नहीं मिला लेकिन मैं उन्हे जानता हूँ और आज भी महसूस करता हूँ, आज इस दुखद सूचना पर मैं अपना एक शेर नमन करता हूँ :
"हम जानते हैं तुम, मर कर न मर सके
हम जीते तो हैं, पर जिंदा नहीं हैं।"
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