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बुधवार, 27 जनवरी 2010

प्रेस क्लब का बैन का फैसला सही

छत्तीसगढ़ की मीडिया को दलाल कहने वाले मानवाधिकारवादियों को नक्सलियों का हमदर्द मानते हुए रायपुर प्रेस-क्लब ने ऐसे किसी संस्था और व्यक्ति को अपने यहां नहीं बुलाने का निर्णय लिया है. बैन के इस फैसले में कोई बुराई नहीं दिखती. महानगरों के पत्रकार लगातार छत्तीसगढ़ की मीडिया पर दलाली के आरोप लगाते रहे हैं. वे यह भी कहते हैं कि ये कुछ नहीं लिखने-यानि सच छिपाने के पैसे लेते हैं. बुध्दिजीवियों व सामाजिक कार्यकर्ताओं के एक वर्ग पर नक्सलियों का समर्थक होने का आरोप इसलिए लग रहा है कि ठीक
ऐसे समय पर जब बस्तर से हिंसा खत्म करने की अब तक की सबसे बड़ी मुहिम चल रही है, वे पुलिस और सरकार पर, आदिवासियों के दमन और अत्याचार को लेकर अभियान की दिशा को रैलियों, सत्याग्रह के बहाने से मोड़ने की कोशिश में हैं.
बीते 22 जनवरी को दो नौजवानों का गला रेतकर नक्सलियों ने सड़क पर फेंक दिया, ये एसपीओ में बनना चाहते थे-क्या इसकी इतनी क्रूर सज़ा मुकर्रर की जाएगी. इनमें एक तो 11वीं कक्षा में पढ़ने वाला छात्र था. तालिबानियों व इनमें क्या फ़र्क है? मुझे समझाएं कि क्या नक्सली उनसे कम दहशत फैला रहे हैं? तालिबानी ड्रग्स बेचकर पैसे बनाते हैं. ये बस्तर में गांजे की खेती करा रहे हैं.
पुलिस व सुरक्षा बल के अभियान में कई ख़ामियां हो सकती हैं, पर इसके मूल में नक्सली हिंसा ही हैं. यदि सचमुच मानवाधिकारवादी- गांधीवादी आदिवासियों का हित चाहते हैं तो पहले नक्सलियों को समझाएं, उन्हें बातचीत के लिए बिठाएं. यह कई बार देखा गया है कि वे बस्तर के जंगलों में वहां तक पहुंच सकते हैं, जहां प्रशासन अब तक नहीं पहुंच पाया.
बस्तर के टूर पर आने वाले मानवाधिकारवादियों को अपनी क्षमता, सम्पर्कों का इस्तेमाल कर छत्तीसगढ़ की भलाई और यहां की शांति के लिए सरकार से सहयोग करना चाहिए. जल, जंगल, जमीन से जुड़ी उनकी आशंकाओं और इन्हें नष्ट करने के विरोध में सभी प्रकृति-पर्यावरण प्रेमी, छत्तीसगढ़ की बोली, संस्कृति, सभ्यता, आदिवासियों की अपनी जीवन शैली का संरक्षण करने की मंशा रखने वाले- एक साथ हैं. बस्तर की जमीन से आदिवासियों को बेदखल कर इसे मल्टीनेशनल्स को सौंपने जैसी आशंकाओं से भी सब चिंतित हैं. लेकिन इससे निपटने का ठेका बंदूक से प्रत्येक विरोध को ठिकाने लगाने वाले नक्सलियों को नहीं सौंपा जा सकता, क्या लोकतंत्र और संविधान पर भरोसा रखने वाले मर गए हैं?
बस्तर में भरपूर हरियाली होते हुए भी, छत्तीसगढ़ियों के लिए पीड़ा व अभावों का बंजर है. दूसरी तरफ यह दुनिया भर के लिए एक मनोरंजन और कौतूहल का इलाका है. क्या मानवाधिकारवादी सामाजिक कार्यकर्ता इसलिए इसी के पीछे पड़े हैं? छत्तीसगढ़ में ही आदिवासी बाहुल्य सरगुजा, जशपुर, रायगढ़ जाएं. वहां ग्रामीणों को बेदखल करने की समस्या कुछ कम नहीं है. बस्तर को नक्सलियों से खाली कराने के बाद तो अज्ञात भविष्य में कार्पोरेट को सौंपा जाएगा, जैसी उनकी आशंका है, पर इन तीनों इलाकों में अभी-इसी वक्त यही सब हो रहा है. मानवाधिकारवादियों के मापदंड में सटीक बैठने वाला दमन, इतना ही अत्याचार वहां आदिवासियों के साथ हो रहा है. ये सामाजिक कार्यकर्ता अपनी व्यस्तता की धुरी उधर क्यों नहीं मोड़ लेते. क्या इनको आशंका है कि वहां काम करने पर इन्हें राष्ट्रीय अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया में सुर्खियां नहीं मिल पाएगी.
मेधा पाटकर व संदीप पांडेय जी को दंतेवाड़ा में अंडे, पत्थरों से स्वागत के बाद थोड़ी हक़ीकत समझ में आई. रायपुर में पत्रकारों के बीच उन्हें कबूल करना पड़ा कि वे नक्सल समर्थक नहीं है, उनकी हिंसा के ख़िलाफ हैं. लेकिन बदनियती देखिये, उन्होंने साथ में यह भी जोड़ दिया कि सरकार प्रायोजित हिंसा ज्यादा खतरनाक है. मौजूदा सरकार के किसी प्रवक्ता से मत पूछिये, भरोसा न हो तो मीडिया से भी नहीं पूछें, छत्तीसगढ़ की चिंता करने वाले दूसरे लोगों से, तटस्थ लोगों से भी पूछ लें-क्या सरकार वहां हिंसा को प्रायोजित कर रही है? नक्सली- खंदक, एम्बुस, बारूदी सुरंग लगाकर बैठे हैं. कई बार फोर्स को पता होता है, कई बार नहीं होता. वहां जवान मारे जाते हैं. एसपी विनोद चौबे और उनके 30 साथियों की मौत पर किसी मानवाधिकारवादी ने अफसोस जताया? इसी तरह के रवैये ने उनकी नीयत पर सवाल खड़े होते रहे हैं. दर्जनों बार साप्ताहिक बाज़ारों में तैनात पुलिस अफसरों व सिपाहियों को नक्सलियों ने अचानक पहुंच कर गोलियों से भून डाला, उनके गर्दन काट दिए. क्या किसी मानवाधिकार समर्थक ने सोचा कि उनका भी परिवार, बीवी बच्चे हैं. क्या इन मरने वालों की सिर्फ यही गलती है कि वे इसी व्यवस्था, जिसकी अकर्मण्यता और नाकामी से, ज़ाहिर है, सब त्रस्त भी हैं- के हिस्से हैं. सरकारी हिंसा यदि है भी, यह तो नक्सलियों की क्रिया की ही प्रतिक्रिया है. जिनमें ग़लतियां तो स्वाभाविक हैं.
क्या हम पुलिस और सरकार को अदालतों में, राष्ट्रीय अन्तर्राष्टीय मंचों पर इसलिए घसीटते हैं कि वे इस व्यवस्था के अंग हैं और सबको उत्तर देने के लिए प्रतिबध्द हैं? एक ऐसे भयावह दृश्य की कल्पना की जाए, जिसमें पुलिस और यही मशीनरी नक्सलियों को किसी भी कीमत पर ख़त्म करने की ठान ले. इस बात की तहकीकात करने में वक्त ख़राब न करे कि सामने खड़ा व्यक्ति निर्दोष आदिवासी है या दुर्दांत नक्सली. फोर्स पर किसी भी को अपने अभियान, योजना, कार्रवाईयों के लिए जवाब देने की जिम्मेदारी भी न रहे, बताएं तब क्या होगा? हर दिन, हर वक्त फोर्स को आप कटघरे में लाकर खड़ा करते हैं, जिसके चलते जान जोखिम में डालकर, फूंक-फूंक कर उन्हें कदम उठाना पड़ता है, सफाई देनी पड़ती है. नक्सली तो छिपकर हमला करने वाले लोग हैं जिनके पास पावर विदाऊट रिसपांसबिलिटी है. वे जो करें- किसी को जवाब देने के लिए बाध्य नहीं. मानवाधिकारवादी बताएं कि क्या उन्हें खत्म कर डालने की जरूरत नहीं?
दिल्ली से लेकर चेन्नई में गृह मंत्री के गांव तक पुलिस अत्याचार के ख़िलाफ तमाम प्रदर्शन व साइकल रैलियां निकालने वाले इन मानवाधिकार समर्थकों की ताक़त बहुत ज्यादा है. इसीलिए इनसे उम्मीद भी अधिक है. वे जरा समझ लें कि सरकार की नीयत पर भरोसा नहीं होने के बावजूद, बस्तर में भयंकर भ्रष्टाचार और लूट के बाद भी- सबसे पहली जरूरत नक्सलियों को खदेड़ने की है. दिल्ली, मुम्बई, हैदराबाद, अहमदाबाद में बैठे लोग इसे समझ सकें, यह छत्तीसगढ़ की चिंता करने वालों की अपेक्षा है.
छत्तीसगढ़ की मीडिया पर आरोप मढ़ना तो आसान है, लेकिन यही मीडिया कोल ब्लाक के आबंटन में धांधली, जन सुनवाईयों में की जाने वाली जबरदस्ती, सत्तारूढ़ भाजपा के विधायक की प्रदूषण के ख़िलाफ आवाज़, धान-चावल घोटाले, स्वास्थ्य, राशन कार्ड, बिजली घोटाले को लगातार उठा रहा है. छत्तीसगढ़ का मीडिया दलाल या सरकार का अंधानुकरण करने वाला नहीं है. बस्तर के सिंगारम में हुई हत्याओं के ख़िलाफ यहीं के अख़बारों ने पहले पन्ने पर बड़ी-बड़ी ख़बरें छापी, जिसे लेकर मानवाधिकार कार्यकर्ता भी अदालत गए. मानवाधिकार की बात करने वाले अपनी सोच का दायरा बढ़ाएं. जब बस्तर से नक्सलियों का सफाया हो जाएगा, तभी हम शिक्षकों को स्कूल जाने के लिए बाध्य कर सकेंगे. अपनी जड़ से कटकर कर सलवा जुड़ूम कैम्पों में शरण लेने वाले आदिवासियों को उनके गांव भेज सकेंगे. स्वास्थ्य, पानी, सड़क की सुविधाएं पहुंचाने के लिए सरकार पर दबाव डाल सकेंगे, क्योंकि तब हमें वहां मौजूद रहने और अधिक पारदर्शी आंदोलन करने का मौका मिलेगा. रही बस्तर के आदिवासियों को बेदखल करने और वहां की बहुमूल्य सम्पदा को लुटाने की साजिश से आप चिंतित हैं, तो आइये आप आज ही छत्तीसगढ़ के दूसरे इलाकों में जहां आदिवासी समान प्रकार की समस्या से जूझ रहे हैं और नक्सलियों की वहां पकड़ भी नहीं है-पहुंचकर सरकार व बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के ख़िलाफ मोर्चा खोल लें.
रायपुर प्रेस क्लब के फैसले की आलोचना करने वाले मानवाधिकारवादी बंधुओं से एक और सवाल. आप तो राष्ट्रीय अन्तर्राष्ट्रीय अंग्रेजी अख़बारों में छाए हुए हैं, वे बहुत गंभीरता से आपकी बात सुनते हैं. दिल्ली की सरकार और अन्तर्राष्ट्रीय मंच भी उन्हें पूरा-पूरा सच मानकर पढ़ता है. फिर रायपुर प्रेस क्लब के विरोध को लेकर आप चिंतित क्यों रहें? रायपुर प्रेस क्लब कोई सरकारी संस्था नहीं है. कोई खास समूह तय नहीं कर सकता कि उनकी किसके प्रति जवाबदेही है. लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि वे सच के साथ और अत्याचार के ख़िलाफ नहीं है. यह तो रिपोर्टरों का एक संगठन है. आपके पास भी एक संगठित राष्ट्रीय स्तर के मीडिया रिपोर्टर्स है. आपको लगता है कि अदालतें और सरकार इनकी आवाज़ ज्यादा ठीक तरह से सुनती समझती है.एक सवाल यह भी है कि अगर भ्रष्टाचार सिर से ऊपर चला गया है, न्याय में देरी हो रही है, सरकारी अमला मुफ़्तखोर हो गया है तो हमें मौजूदा व्यवस्था सुधारने की कोशिश करने की बजाय क्या नक्सलियों की सत्ता को स्वीकार कर लेना चाहिए?

बुधवार, 9 सितंबर 2009

नक्सल से निपटने फिजूल की पंचायत

आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों के लिए केन्द्रीय गृह मंत्री पी.चिदम्बरम् के नये पुनर्वास पैकेज से उत्साहित होने की कोई वजह नहीं दिखती. यह छत्तीसगढ़ सरकार की पिछले 10 साल से चल रही पुनर्वास नीति का ही विस्तार है, जो बुरी तरह से असफल रही है. भरोसे व सुरक्षा के अभाव में छत्तीसगढ़ में केवल गिनती के नक्सलियों ने हथियार डाले, जबकि इससे कई गुना ज्यादा नये लोग बीते सालों में संघम और दलम् में शामिल हो चुके हैं. केन्द्रीय गृह मंत्री से तो उम्मीद की जा रही थी कि राजनांदगांव के पुलिस अधीक्षक विनोद चौबे के मारे जाने के बाद बस्तर से नक्सलियों को खदेड़ने के लिए वे आर्थिक, राजनैतिक व रणनीतिक मोर्चे पर किसी ठोस रणनीति की घोषणा करते, लेकिन ताज़ा घोषणा किसी पुरानी फाइल पर चढ़ाई गई एक नई नोटशीट से ज्यादा कुछ नहीं है.
देश के नक्सल प्रभावित इलाकों में सबसे खतरनाक स्थिति छत्तीसगढ़ की है. बस्तर संभाग के जगदलपुर, नारायणपुर, कांकेर, दंतेवाड़ा, बीजापुर, बलरामपुर और इससे लगे जिलों राजनांदगांव, धमतरी में नक्सली तमाम मुठभेड़ों के बाद अचानक आ धमकते हैं. ये बारूदी सुरंग बिछाकर हमला करते हैं और अपना बिना कोई नुकसान उठाए एक साथ दर्जनों जवानों को मार गिराते हैं. बीते जुलाई माह में जब राजनांदगांव के पुलिस अधीक्षक विनोद चौबे समेत 30 से ज्यादा जवानों को 3 किलोमीटर लम्बा एम्बुस लगाकर नक्सलियों ने मार डाला, तो उनकी बढ़ी हुई ताकत ने देश के प्रधानमंत्री और गृह मंत्री तक को चिंता में डाल दिया. विपक्ष ने छत्तीसगढ़ सरकार की नाक में दम कर डाला. पूरे राज्य में शोक व सन्नाटा था. लग रहा था कि तीन दशक पुरानी इस समस्या से छुटकारा पाने जल्द ही कोई निर्णायक कार्रवाई शुरू होगी. लेकिन हुआ क्या? नक्सलियों ने अभी भी सुरक्षा बलों को चकमा देकर घेरना और पुलिस के मुख़बिरों तथा विशेष पुलिस अधिकारी बनाए गए आदिवासी युवकों को गोलियों से उड़ाना, उनका गला रेतना जारी रखा है. मदनवाड़ा मुठभेड़ में चौबे की मौत के बाद से केन्द्रीय बलों व राज्य पुलिस के बीच टकराव व मतभेद बढ़े हैं. इनके बीच सुलह कराने के लिए मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह को भी पंचायत बुलानी पड़ी. विषम परिस्थितियों के चलते जवानों ने मोर्चे पर जाने से इंकार किया, इनमें से 13 जवानों की मनाही को उनकी कायरता समझी गई और उन्हें नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया. दो बड़ी जन-अदालतें लगाकर नक्सलियों ने पुलिस के 4 मुखबिरों की गला रेतकर हत्या कर दी. पुलिस फोर्स उन गांवों तक मामले की जांच करने के लिए नहीं पहुंचने की हिम्मत नहीं जुटा पाई. खुद ग्रामीण उनकी लाशें लेकर थाने तक पहुंचे तब जांच की खानापूर्ति की गई. उस हर जगह पर नक्सली हमले कर रहे हैं जहां नये टावर लगाए जा रहे हैं, नई सड़कें बनाई जा रही है, नई चौकियों के लिए ईंट पत्थर भेजे जा रहे हैं और उन लोगों की हत्या की जा रही है जो इन कामों में मजदूरी कर रहे हैं. जवानों को बस में बिठाने वाले चालकों को मार डालने की धमकी दी जा रही है. नक्सलियों ने पुलिस को घेरने के लिए एक ही परिवार के 7 लोगों को जिंदा जलाने की घटना होने की एक फर्जी सूचना भी थाने तक भेजी, लेकिन पुलिस अपनी सतर्कता से उनके जाल में फंसने से बच गई. ये सब वे घटनाएं हैं जो 13 जुलाई 2009 को मदनवाड़ा हमले के बाद राजधानी तक पहुंची. बहुत सी ख़बरें तो दण्डकारण्य के बीहड़ों से बाहर निकल भी नहीं पातीं.
अब सर्चिंग आपरेशनों में काफी सतर्कता बरती जा रही है. सीआरपीएफ जवान तलाशी मानदंडों का कड़ाई से पालन कर रहे हैं. उन्होंने गश्त के लिए 4 किलोमीटर से ज्यादा दूर नहीं जाने का फैसला किया है. मतलब यह कि हालिया दिनों में नक्सली बस्तर के अंदरूनी इलाकों में अपना तेजी से अपना पैर पसारने में लगे हुए हैं. धमतरी और राजनांदगांव में बड़ी वारदातें कर उन्होंने नये क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति का सबूत तो दे ही दिया है. यह वह दौर है जब नक्सलियों के सफाये के लिए ठोस काम बस्तर में होने चाहिए थे, क्योंकि एक आला अफसर को जान से हाथ धोना पड़ा, और मौके का फायदा उठाकर पूरे बस्तर में नक्सली अपनी दहशत कायम करने में सफल दिखाई दे रहे हैं.
दरअसल, जब-जब नक्सली हमला नहीं होता, सरकार और सुरक्षा बलों को यह भ्रम हो जाता है कि वे कमजोर पड़ गए हैं और ग्रामीण अब सरकार के पुनर्वास पैकेज की तरफ आकर्षित होकर सामने आएंगे. जबकि बड़ी वारदातें कर नक्सलियों का खामोश दिखना, दबाव बढ़ने पर वार्ता का प्रस्ताव रख देना, मुठभेड़ में मात खाने की आशंका होने पर पीछे हटना, यह सब उनकी रणनीति का हिस्सा है. बस्तर में हालात खराब है और जरूरत जमीनी कार्रवाई की है. साथ ही जरूरत है बस्तर के लोगों का भरोसा जीतने के लिए उनके बीच सरकार के पहुंचने का, उनका विश्वास जीतने का. इनके बगैर तो नक्सलियों के ख़िलाफ लड़ाई ही नहीं लड़ी जा सकेगी. लेकिन उल्टे दूरी बनाई जा रही है और केन्द्र सरकार को सूझ गया कि वह पुनर्वास योजना घोषित करे, जो न केवल भ्रमित करने वाला है, ध्यान बंटाने वाला और वक्त बर्बाद करने वाला है बल्कि बस्तर में काम करने वाले चुनिंदा परिश्रमी अधिकारियों को इस धोखे में रखने वाला है कि नक्सलियों को अब पकड़ने की जरूरत नहीं वे खुद उनके पास आएंगे. राहत पैकेज लागू करना सरकार की उदारता का परिचय देता है, या फैसले को दिल्ली से ही बैठकर निपटाने का रास्ता दिखा रहा है? क्या पुनर्वास की गारंटी उन्हें मिल जाना मुख्य धारा में लौटने वाले लोगों को सुरक्षा की गारंटी भी दिलाएगा?
अब जरा ध्यान दिया जाए कि केन्द्र सरकार के राहत पैकेज में क्या है. आत्मसमर्पण करने वाले हर नक्सली को व्यावसायिक प्रशिक्षण तथा तीन वर्ष तक प्रति माह दो हजार रूपये दिए जाएंगे. इसके अलावा नक्सली के आत्मसमर्पण करते ही डेढ लाख की राशि उसके नाम से बैंक में सावधि जमा खाते में रख दी जायेगी, जिसे वह तीन वर्ष बाद निकाल सकेगा. गृह मंत्रालय द्वारा जारी दिशानिर्देशों के अनुसार यदि कोई नक्सली आत्मसमर्पण करते समय हथियार भी सौंपता है तो उसे अलग से प्रोत्साहन राशि दी जाएगी. जनरल परपज मशीनगन आरपीजीयूएमजी या स्निफर राइफल सौंपने पर 25 हजार रूपये तथा ए के श्रृंखला की किसी भी राइफल के लिए 15 हजार रू दिए जायेंगे. पिस्तौल या रिवाल्वर या बारूदी सुरंग के लिए 3 हजार रूपये दिये जायेंगे. जमीन से हवा पर मार करने वाली मिसाइलें सौंपने पर 20 हजार रू. तथा किसी भी तरह के कारतूस के लिए तीन रपये प्रति कारतूस दिये जायेंगे. एक सेटेलाइट फोन के लिए 10 हजार रू. तथा कम दूरी तक काम करने वाले वायरलेस सेट के लिए एक हजार रूपए और लंबी दूरी के सेट के लिए 5 हजार रू. दिये जायेंगे. कुछ अन्य हथियारों के लिए भी राशि तय की गई है.
केन्द्र सरकार की ओर से घोषित यह पैकेज छत्तीसगढ़ में सन् 2000 से लागू पुनर्वास पैकेज का ही विस्तारित स्वरूप है. छत्तीसगढ़ में भी समर्पण करने वाले नक्सलियों के प्रति कम उदारता नहीं रही है. पहले ही छत्तीसगढ़ में समर्पण करने वाले नक्सलियों के अपराधिक मामले समाप्त कर दिये जाते हैं. एमएलजी जैसे घातक हथियार के साथ समर्पण करने वालों को 3 लाख रूपये दिए जाते हैं, एके 47 के साथ समर्पण करने वालों को दो लाख, एसएलआर के साथ समर्पण करने वालों को एक लाख, थ्री नाट थ्री लाने वालों को 75 हजार तथा बंदूक के साथ समर्पण करने वालों को 50 हजार रूपये नगद दिए जाते हैं. राज्य सरकार ने कृषि भूमि देने तथा सरकारी नौकरी में प्राथमिकता देने की व्यवस्था भी कर रखी है. केन्द्र सरकार की नीति में अतिरिक्त आकर्षण यह है कि इसमें नक्सलियों को व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया जाएगा और प्रतिमाह दो हजार रूपये भी दिए जाएंगे. इसके अलावा उनके नाम पर डेढ़ लाख रूपये की एफ डी कराई जाएगी, जिसे वे अच्छे चालचलन के बाद बाद 3 साल के बाद निकाल सकेंगे.
आशय यह है कि सरकार की ओर से आर्थिक प्रलोभन न तो अनोखा है, न ही ऐसा पहली बार किया गया है. यदि गृह मंत्रालय के अधिकारियों ने चिदम्बरम् को अंधेरे में रखा होगा कि इसका दूरगामी असर पड़ने वाला है तो वे जरा छत्तीसगढ़ में लागू पिछले 10 साल के पुनर्वास पैकेज का ही आंकड़ा देख लें. अब तक 140 शातिर नक्सलियों ने ही आत्मसमर्पण किया है. और करीब 2400 ऐसे आदिवासियों ने समर्पण किया है, जिन्हें नक्सली अपने साथ बहला- फुसलाकर ले गए थे और संघम-दलम इत्यादि में उन्हें शामिल कर लिया था. बस्तर में ही छोटे बड़े दलों और उनके समर्थकों की मानें तो इनकी संख्या 35 हजार के आसपास है. यह चम्बल के डाकुओं से समर्पण कराने जैसा मामला नहीं है, जिनकी संख्या दो चार सौ हो. ढाई हजार से ज्यादा लोगों के हथियार सौंपने के बाद भी छत्तीसगढ़ में नक्सली देश के सबसे ज्यादा ताकतवर उग्रवादी समूह हैं. बस्तर में आदिवासियों के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि उनको सरकार की तरफ से कोई भी अनुदान, कृपा, राशि, अनाज, स्वास्थ्य, शिक्षा की सुविधा ग्रहण करना मुश्किल है. ऐसा कर लेने पर वे नक्सलियों के निशाने पर आ जाते हैं. इन्हें किसी भी पुनर्वास पैकेज का लाभ दिलाने के पहले उन्हें नक्सलियों के प्रकोप से बचाना जरूरी है. सरकार बस्तर के युवकों को विशेष पुलिस अधिकारी बनाती है- लेकिन ये पुलिस अधिकारी गांव जाते हैं तो नक्सली इनके शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर लाश सड़क पर फेंक रहे हैं. यही हाल पुलिस के मुखबिरों का हो रहा है. जन-अदालतों में इनका गला रेता जा रहा है.ये सब किसी न किसी रूप में सरकारी मदद पाते रहे हैं पर ये सब नक्सलवाद खत्म करने में असफल रहे हैं. बस्तर में सबसे बड़ी समस्या सरकारी मशीनरी के पहुंचने और उसकी विश्वसनीयता कायम करने की है.
मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह स्वीकार करते हैं कि नक्सली ठेकेदार और अफसरों से 300 करोड़ रूपये सालाना वसूली कर रहे हैं. जाहिर है कि 300 करोड़ वे नक्सलियों को देते हैं तो 600 करोड़ खुद भी अंदर कर रहे होंगे. मान लेना चाहिए कि इतना सब कुछ वे अपना घर बेचकर नहीं करते होंगे. सरकारी खजाने से इतना गोलमाल. फिर क्या अफसर और ठेकेदार इतनी मनमानी करें और हमारे शरीफ राजनीतिज्ञ खामोश बैठे रहेंगे? इसका जवाब हमारे हारे हुए नेता जवाब दें और उनसे पहले वे नेता जवाब दें जो बार-बार नक्सलियों के गढ़ से चुनाव जीतकर आ जाते हैं. नक्सलियों के खिलाफ लड़ाई में काफी पेंच हैं.
इस ताजा पुनर्वास पैकेज से एक रास्ता और खुल गया है, कुछ नकली नक्सली तैयार होंगे. कुछ असली हथियार जमा होंगे और समस्या अपनी जगह पर बनी रहेगी. कुछ ईमानदार पुलिस अफसर जो नक्सलियों के ख़िलाफ मुहिम चला रहे होंगे इस पैकेज के बाद शायद अब जंगलों में भटकने के बजाय शांत होकर बैठ जाएं. इस उम्मीद के साथ कि अब कुछ बड़े-बड़े हथियार लेकर कुछ खूंखार नक्सली उनके थाने तक खुद ही पहुंच जाएंगे और उन्हें किसी दिन स्वतंत्रता दिवस समारोह में सम्मानित किया जाएगा.

मंगलवार, 9 जून 2009

अबूझमाड़ को बूझना इतना आसान भी नहीं

नक्सलियों से सीधी लड़ाई के लिए सरकार ने तीन दशक से बंद अबूझमाड़ का मोर्चा खोल दिया है. वस्त्रविहीन व कंदमूल खाकर जीने वाले आदिम गोंड़ जाति के बीच अब आम लोगों का सीधा सम्पर्क हो सकेगा. इससे उनकी जीवन शैली और संस्कृति पर ख़तरे तो दिखाई दे रहे हैं, लेकिन सरकार को अपने इस फैसले के पीछे नक्सली हिंसा की आग से झुलस रहे बस्तर में शांति की नई बयार बहने की उम्मीद भी दिखाई दे रही है.
वैसे तो लोगदेश में कहीं भी आने-जाने के लिए आज़ाद हैं लेकिन बस्तर का अबूझमाड़ दुर्गम पहाड़ियों और घने जंगलों से घिरा एक ऐसा गलियारा है जहां पिछले 3 दशकों से आम लोगों को जाने की मनाही थी. अबूझमाड़ में आम लोगों के प्रवेश पर तत्कालीन मध्यप्रदेश सरकार ने रोक तब लगाई गई थी, जब 80 के दशक में बीबीसी के कुछ पत्रकारों ने यहां पहुंचकर गोंड़ महिलाओं की अर्धनग्न तस्वीरें खींचीं और उनके विदेशी अख़बारों में छप जाने से हंगामा मचा. बस्तर संभाग के तीन जिलों दंतेवाड़ा, नारायणपुर व बीजापुर के 4000 वर्गकिलोमीटर के दायरे में फैले 237 गांवों के 26 हज़ार आदिवासी अपनी ही विशिष्ट आदिम संस्कृति में जीते हैं. वे जानवरों का शिकार करते हैं, कंदमूल खाते हैं और पेड़ों की छाल पहनते हैं. हालांकि बीते दो दशकों से वे हाट-बाज़ारों में जाकर बिना सिले हुए कपड़े भी पहनने लग गए हैं. जिलाधीश से अनुमति लेकर नारायणपुर स्थित रामकृष्ण मिशन ने यहां शिक्षा व स्वास्थ्य की दिशा में भी कुछ काम किया है. लेकिन अबूझमाड़ का ज्यादातर हिस्सा बीते 3 दशकों से अबूझ पहेली है. यहां के आदिवासी जंगल, नदी, पहाड़ के बीच ही जीवन बिताते हैं. ज्यादातर हिस्सों में सरकार की कोई योजना नहीं पहुंच पाई है. न इन्हें सरकारी राशन मिलता है न पेंशन. न इन गांवों में सड़कें है और न ही बिजली. अबूझमाड़ के सघन वनों के शुरूआती कुछ गांवों में तो समय-समय पर सरकार के नुमाइंदो व सुरक्षा बलों ने प्रवेश किया है पर अधिकतर हिस्से अभी भी रहस्यमयी बने हुए हैं. सन् 2001 में छत्तीसगढ़ राज्य का गठन होने के बाद अबूझमाड़ के सर्वेक्षण के लिए कई प्रयास हुए हैं. गांवों की संख्या तो सेटेलाइट के चित्रों से निर्धारित की गई है पर इन गांवों तक सरकार भी नहीं पहुंच पाई है. सन् 2005 में प्रदेश की भाजपा सरकार ने एक निजी संस्था को इस क्षेत्र के सर्वेक्षण की जिम्मेदारी दी थी लेकिन नक्सलियों ने उन्हें घुसने नहीं दिया. बस्तर के सांसद बलिराम कश्यप की अध्यक्षता में भी एक बार समिति बनाई गई लेकिन यह समिति भी अबूझमाड़ को बूझने में सफल नहीं हो पाई. परिणामस्वरूप यह अबूझ इलाका हिंसक नक्सलियों के लिए स्वर्ग बना हुआ है. पीडब्ल्यूजी की रीजनल इकाई ने तो 1980 में बकायदा इसे अपना मुख्यालय घोषित कर दिया था. नक्सली इन इलाकों में छिपकर अपनी योजनाएं तैयार करते हैं और यहां से निकलकर पूरे बस्तर में तांडव मचाते हैं. बीते कुछ सालों में नक्सलियों ने सुरक्षा बलों व नेताओं पर हमले तेज किए हैं. नक्सलियों की बढ़ती ताक़त को वैसे तो सरकार उनकी हताशा का नाम देती है, लेकिन सच्चाई यही है कि उनसे मुकाबला करने में सरकार के पसीने छूट रहे हैं. नक्सलियों के विरोध के लिए आदिवासियों के बीच चलाया जा रहा सलवा जुड़ूम आंदोलन भी कारगर साबित नहीं हो रहा है. भारी संख्या में सुरक्षा बलों की तैनाती भी उनको रोक पाने में कारगर नहीं है. हाल के दिनों में नक्सलियों ने धमतरी और राजनांदगांव जिले के नये इलाकों में सुरक्षा बल के जवानों व मतदान कर्मियों की सामूहिक हत्याएं की है. कई सलवा जुड़ूमियों व कांग्रेस-भाजपा नेताओं को उन्होंने मार डाला है. इन घटनाओं से सरकार की जबरदस्त किरकिरी हो रही है. छत्तीसगढ़ के गृह मंत्री ननकीराम कंवर को तो कहना पड़ा है कि यदि दो साल के भीतर नक्सली समस्या का अंत नहीं हुआ तो वे अपने पद से इस्तीफा दे देंगे. विरोधी दल कांग्रेस ने इस बयान पर कहा है कि यह बात मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह को कहनी चाहिए, क्योंकि प्रदेश के मुखिया होने के नाते पहली जवाबदारी उनकी ही बनती है.
राजनैतिक दलों के अतिरिक्त सरकार पर औद्योगिक घरानों की ओर से भी दबाव है. टाटा और एस्सार जैसी बड़ी कम्पनियों को बस्तर के बहुमूल्य खनिजों के उत्खनन और इस्पात संयंत्र लगाने के लिए हजारों एकड़ जमीन दी गई है, लेकिन नक्सलियों के हमले उन्हें काम नहीं करने दे रहे हैं. मुख्यमंत्री कहते हैं कि पूरी दुनिया जब 21वीं सदी में पहुंच गई है तो नक्सली बस्तर के आदिवासियों को उनके मूलभूत अधिकारों से वंचित कर उन्हें 19वीं सदी में रखना चाहते हैं. नक्सली कहते हैं कि जंगल, पानी, जमीन सब उन आदिवासियों का है जो यहां रहते हैं. चंद पूंजीपतियों के फायदे के लिए आदिवासियों को उजाड़ने की साजिश वे नहीं चलने देंगे. नक्सलियों ने बस्तर में हस्तक्षेप के ख़िलाफ मुख्यमंत्री सहित यहां के कई मंत्री, नेताओं के नाम मौत का फरमान जारी कर रखा है.
बस्तर विकास प्राधिकरण की इसी हफ़्ते मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह की अध्यक्षता में हुई बैठक में अबूझमाड़ को आम लोगों के लिए खोलने का निर्णय लिया गया. सरकार अब नक्सलियों को उनके सुरक्षित ठिकाने पर घुसकर घेरना चाहती है. अभी तक सरकार के नहीं पहुंचने के चलते शायद अबूझमाड़ के आदिवासी नक्सलियों को ही सरकार मानते रहे हों लेकिन अब उन्हें एक दूसरी सरकार का भी सामना करना पड़ेगा. अबूझमाड़ के दरवाजे खोल दिए जाने के बाद भी सरकारी अमले व सुरक्षा बलों को दुरूह भौगोलिक संरचना के चलते इसे भेद पाना आसान नहीं है. वैसे भी उनके लिए कभी इस इलाके में जाने के लिए मनाही तो रही नहीं है. कुछ सालों के बाद मालूम हो सकेगा कि अबूझमाड़िया जन-जीवन में बाकी दुनिया की दख़ल का क्या असर पड़ेगा, फिलहाल, सरकार ने नक्सलियों से निपटने के लिए एक और दांव खेल दिया है.