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गुरुवार, 2 दिसंबर 2010

सिकलसेल पर पत्रकार संजय दीक्षित की किताब का डा.कलाम ने किया विमोचन

कैंसर से भी ज्यादा खतरनाक है सिकलसेल

दुनिया में पत्रकारिता की भूमिका कभी पायलट की रही है तो कभी फालोगार्ड की। अनेक अवसरों पर यह देखा गया है कि पत्रकारिता ने जिस अंधेरे रास्तों पर दीये का प्रकाश बिखेरा है, वह बाद में जाकर प्रकाश स्तंभ बन गया। रायपुर के पत्रकार संजय दीक्षित की कुछ पहल ऐसी ही है। उन्होंने सिकल सेल जैसी लाइलाज बीमारी पर शोध किया है। उक्त बातें संजय दीक्षित की सिकल सेल पर लिखी गई किताब के विमोचन पर वक्ताओं ने कही।
रायपुर मेडिकल कालेज में सिकल सेल पर आयोजित अंतराष्ट्रीय सम्मेलन में पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. कलाम ने दीक्षित की शोध पुस्तक का विमोचन किया।  इस मौके पर मुख्यमंत्री रमन सिंह भी मौजूद थे. 2006 में राष्ट्रपति डॉ. कलाम के हाथों ही श्री दीक्षित को स्व.चंदूलाल चंद्राकर स्मृति पत्रकारिता फेलोशिप मिली थी। ओर इसी के तहत पत्रकारीय दृष्टिकोण से यह शोध पुस्तक लिखी गई है। सिकल सेल पर हिन्दी में लिखी गई संभवत: यह पहली पुस्तक होगी।

पुस्तक में श्री दीक्षित ने बताया है कि सिकल सेल को केंसर से भी ज्यादा खतरनाक बताया है। शुरूआती स्टेज में अगर कैंसर पकड़ में आ गया तो उसका इलाज है। मगर सिकल सेल का अब तक कोई निदान नहीं ढूंढा जा सका है। छत्तीसगढ़ में 30 लाख से अधिक लोग इस बीमारी से ग्रस्त है, इस बीमारी से राज्य की ग्रामीण अर्थव्यक्स्था पर भी बुरा असर पड़ा है। दीक्षित का कहना है कि सिकल सेल पहली ऐसी बीमारी होगी, जिससे एक साथ कई अंग प्रभावित होते हैं।
उन्होंने बताया कि सिकल सेल ग्रस्त छह राज्यों से घिरे होने की वजह से छत्तीसगढ़ में यह बीमारी मौत का तांडव मचा रही है। आलम यह है कि सिकल प्रभावित 7 फीसदी बच्चे तो छह महीने के अंदर काल के ग्रास बन जाते है। सिकल रोगी अगर 50 वर्ष जी गए तो आश्चर्य माना जाता है। सूबे में पिछड़ी जातियों की आबादी 50 फीसदी के करीब हैं और सबसे अधिक पिछड़े वर्ग के लोग ही सिकल सेल से प्रभावित हैं। इनमें से कुर्मी, साहू जैसी जातियों में तो 22 प्रतिशत तक लोग सिकल सेल की चपेट में हैं। सिकल सेल से सबसे अधिक वे ही प्रभावित हैं। बच्चों की थादी में बाधा आने की आशंका से लोग इस अनुवांशिक बीमारी के बारे में बताना नहीं चाहते और इस बीमारी के लगातार फैलने की वजह भी यही है।
शादी के बाद संतान उत्पति की प्रक्रिया में यह बीमारी फैलती जाती है। दो सिकल सेल रोगी की अगर शादी हो गई तो उनकी संतान भी सिकल रोगी होगी। इसलिए शादी के पहले अगर सिकल कुंडली मिला ली जाए तो 70 फीसदी तक बीमारी को कंट्रोल किया जा सकता है। मगर इसके लिए सामाजिक संगठनों की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। क्योंकि जनजागृति ही सिकल सेल का एकमात्र उपाय है और सामाजिक संगठनों को साथ लिए बगैर जनजागृति संभव नही है।
गौतरलब है कि संजय दीक्षित 17 साल से पत्रकारिता में हैं और दैनिक भास्कर, देशबंधु, जनसत्ता, जैसे कई अखबारों में अपनी सेवाएं दे चुके हैं; वर्तमान में वे दैनिक हिन्दुस्तान के संवाददाता के तौर पर काम कर रहे हैं।

मंगलवार, 17 अगस्त 2010

लेह में दबी लाशों की चीत्कार, सुनो सरकार!


राज्य की सत्तारूढ़ भाजपा सरकार को लेह में आई भीषण प्राकृतिक आपदा में मारे गए मजदूरों ने आईना दिखा दिया है. इस हादसे ने छत्तीसगढ़ के दर्जनों परिवारों को बेसहारा कर दिया. मरने वालों का सही आंकड़ा नहीं मिल रहा है. बच गए मजदूरों की मानें तो इनकी संख्या 200 से ज्यादा हो सकती है. लेह में करीब 600 मजदूर काम कर रहे थे. दो खेप में इनमें से 110 लोग लौट पाए हैं. जो आए हैं वे बता रहे हैं कि उनके साथ गए 60-70 साथी लापता हैं. हो सकता है ये बादल फटने के बाद वहीं मिट्टी में दब गए हों.

काम की तलाश में देशभर में भटकने वाले छत्तीसगढ़िया मजदूरों, जिनमें ज्यादातर दलित वर्ग से हैं- की संख्या सरकारी आंकड़ों के मुताबिक केवल 20 हजार है, लेकिन स्वतंत्र सर्वेक्षणों के अनुसार इनकी वास्तविक संख्या 3 से 5 लाख है. इनमें से सैकड़ों मजदूर तो दुबारा लौटते ही नहीं और वहीं बस जाते हैं. ज्यादातर मजदूर खतरनाक उद्योगों में विषम परिस्थितियों के बीच काम करते हैं. श्रम विभाग के अधिकारी, कर्मचारी, जीआरपी और पुलिस की पलायन कराने वाले दलालों के साथ साठगांठ होती है. इनका आर्थिक शोषण तो होता ही है, शारीरिक उत्पीड़न भी होता है. इनके काम के घंटे तय नहीं होते, रहने के लिए कच्ची ईंट या मिट्टी की कुटिया ही होती हैं. शौचालय, स्नानघर नहीं मिलते न ही स्वास्थ्य की सुविधा होती. लौटने वाले मजदूर अपने साथ श्वास और दूसरी कई तरह की बीमारियां लेकर आते हैं, यहां तक कि यौन रोग भी. जो दलाल इन्हें झांसे में रखकर ले जाते हैं, वे मजदूरी यहां बहुत बढ़ाकर बताते हैं और वहां कम कर देते हैं. ऐसे मजदूर यदि भागना चाहते हैं तो उन्हें लठैतों के दम पर बंधक बना लिया जाता है. हर साल 10-12 बार ऐसे मजदूरों को छुड़ाने पुलिस व श्रम विभाग के प्रतिनिधि यूपी, गोवा, जम्मू, आदि जाते हैं. उन्हें बंधक बनाने वालों और ले जाने वालों के ख़िलाफ 19.02.1976 के बंधित श्रम प्रथा उन्मूलन अधिनियम के तहत कार्रवाई होनी चाहिए, जिसमें 3 साल तक की सज़ा और 25 हजार रूपये के जुर्माने का प्रावधान है.पर बंधकों को छुड़ाकर लाने के बाद सरकार उन पर कोई कार्रवाई नहीं करती. आज तक किसी दलाल या ठेकेदार पर कानून का शिकंजा नहीं कसा गया. गरीबों का यह शर्मनाक पहलू है कि उन्हें धान का कटोरा कहा जाने वाला यह राज्य साल भर की रोजी मुहैया नहीं करा पाता. बीते चुनाव में अनेक लोक लुभावन वादों के बीच भाजपा ने अपने घोषणा-पत्र में यह भी कहा था कि राज्य को पूरी तरह पलायन मुक्त किया जाएगा. लेकिन लेह में दब चुकी लाशों ने सरकार के इस दावे की पोल खोलकर रख दी.
लेह हादसे के बाद प्रशासन के पास अजीबो-गरीब स्थिति थी. पता चला कि वहां बादल फटने से छत्तीसगढ़ के मजदूर हताहत हुए हैं. उसके नुमाइंदे गांव-गांव जाकर पलायन करने वालों और उनमें से लेह जाने वालों का नाम खोजने लगे. बड़ी तादात में पलायन होने की सच्चाई को नकारने वाली सरकार के पास इसका जवाब नहीं कि उसके पास पूरा आंकड़ा पहले से क्यों नहीं? दूसरी बार सरकार बनाने के बाद मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने कहा था कि पंचायत स्तर से ही मजदूरों के बाहर जाने का रिकार्ड रखेंगे, उनकी इस घोषणा पर अमल नहीं हुआ. ज्यादातर मजदूर जुलाई में पलायन करते हैं और अक्टूबर के आसपास लौट जाते हैं. कोई रिकार्ड अब तक बनना शुरू नहीं हुआ. सरकार की नीयत साफ होती तो इससे पता चलता कि वे किस दलाल के जरिये गए और यदि नहीं लौटे तो उन्हें क्या बंधक बना लिया? जिस जगह पर व जिन परिस्थितियों में वे काम कर रहे हैं वह उनके लिए सुरक्षित है भी या नहीं और सबसे बड़ी बात इन्हें पलायन से मुक्ति दिलाने के लिए स्थानीय स्तर पर उनके पास खेती से बच जाने वाले खाली दिनों में क्या उपाय किए गये कि उन्हें अपना गांव-घर छोड़ने से रोक लेते. पता लग जाता कि मनरेगा जैसे उपाय उन्हें रोकने में सफल क्यों नहीं हुए.
एक दशक पहले जब छत्तीसगढ़ मध्यप्रदेश का हिस्सा होता था तब भी मजदूर कमाने खाने जाते थे. तब इसके पीछे इलाके का पिछड़ापन और गरीबी बड़ा कारण माना जाता रहा, लेकिन अब हमारी सरकार तो सीना फुला कर कहती है कि इन दस सालों में एक आदमी के पीछे आय 136 फीसदी तक बढ़ गई है. यह पंजाब, महाराष्ट्र, दिल्ली जैसे राज्यों से भी ज्यादा है. सरकार दो रूपये और एक रूपये में राज्य की आधी आबादी, लगभग 37 लाख परिवारों को चावल बांटने का जश्न मना रही है. सिंचाई के लिए मुफ़्त बिजली, 3 फीसदी ब्याज पर खेती व पशुपालन के लिए कर्ज़ जैसी अनेक योजनाएं चलाकर वह वाहवाही लूट रही है. अब तो सरकार को ही जवाब देना चाहिए कि उसकी नेक नीयत में सुराख कहां हैं.
कुछ कारण तो साफ दिख जाएंगे. राज्य बनने के बाद बजट के बढ़े आकार, (दस सालों में करीब 10 गुना इस साल का बजट 23 हजार करोड़ रूपया) का फायदा जिन्हें मिला, उनके होटल, मोटल, लाकर, शापिंग माल, काम्पलेक्स, टावर्स, एम्यूजमेन्ट पार्क और फार्म हाऊस भी देखे जा सकते हैं. इनकी बढ़ी आय को गरीबों की आय के साथ जोड़ देने के चलते सरकारी सर्वेक्षणों में राज्य के लोगों की आमदनी बढ़ी दिखाई दे रही है. जबकि हक़ीकत यह है कि इन धनिकों ने राज्य बनने के बाद हजारों एकड़ खेती की जमीन खरीद ली. फार्म हाऊस अब खेती के नहीं काली कमाई छिपाने और विलास के काम आते हैं. हाल में रायपुर के नवधनाड्यों के यहां पड़े छापों से साफ हो गया कि राज्य बनने के बाद कौन फला फूला. सेल्समेन बनकर कुछ साल पहले छत्तीसगढ़ में ठिकाना तलाशने वाले लोग अब अरबपति हैं व सत्ता की राजनीति कर रहे हैं. गरीबों का परिवार तो बढा़ लेकिन जमीन बढ़े हुए परिवार में बंट जाने तथा उद्योग व्यापार के लिए हड़प लेने के बाद सिमटती गई. मनरेगा के काम ठेकेदार और सरपंच मिल कर कर रहे हैं. मजदूर बस फर्जी मस्टर रोल में दिखते हैं. नौकरशाहों, ठेकेदारों और राजनीतिज्ञों में ऐसी साठगांठ हो तो छत्तीसगढ़ को पलायन और गरीबी से छुटकारा आखिर कौन दिला पाएगा?
कुछ साल पहले पुंछ में छत्तीसगढ़ के आधा दर्जन मजदूर आतंकवादियों की गोली का शिकार हो गए थे. अब लेह में उन पर बादल फट पड़ा. वे ऐसे जोखिम भरे जगहों पर आगे भी मिलेंगे और हादसे का शिकार होते पाए जाएंगे. लेह के बाद तो थोथी बयानबाजी बंद हो जानी चाहिए. एक मंत्री जी जांजगीर गए, संवेदना के कुछ शब्द मजदूरों से कह भी गए, पर उससे क्या होना है. अब पलायन रोकने के लिए कोई ठोस और ईमानदार कोशिश होनी चाहिए.

बुधवार, 27 जनवरी 2010

प्रेस क्लब का बैन का फैसला सही

छत्तीसगढ़ की मीडिया को दलाल कहने वाले मानवाधिकारवादियों को नक्सलियों का हमदर्द मानते हुए रायपुर प्रेस-क्लब ने ऐसे किसी संस्था और व्यक्ति को अपने यहां नहीं बुलाने का निर्णय लिया है. बैन के इस फैसले में कोई बुराई नहीं दिखती. महानगरों के पत्रकार लगातार छत्तीसगढ़ की मीडिया पर दलाली के आरोप लगाते रहे हैं. वे यह भी कहते हैं कि ये कुछ नहीं लिखने-यानि सच छिपाने के पैसे लेते हैं. बुध्दिजीवियों व सामाजिक कार्यकर्ताओं के एक वर्ग पर नक्सलियों का समर्थक होने का आरोप इसलिए लग रहा है कि ठीक
ऐसे समय पर जब बस्तर से हिंसा खत्म करने की अब तक की सबसे बड़ी मुहिम चल रही है, वे पुलिस और सरकार पर, आदिवासियों के दमन और अत्याचार को लेकर अभियान की दिशा को रैलियों, सत्याग्रह के बहाने से मोड़ने की कोशिश में हैं.
बीते 22 जनवरी को दो नौजवानों का गला रेतकर नक्सलियों ने सड़क पर फेंक दिया, ये एसपीओ में बनना चाहते थे-क्या इसकी इतनी क्रूर सज़ा मुकर्रर की जाएगी. इनमें एक तो 11वीं कक्षा में पढ़ने वाला छात्र था. तालिबानियों व इनमें क्या फ़र्क है? मुझे समझाएं कि क्या नक्सली उनसे कम दहशत फैला रहे हैं? तालिबानी ड्रग्स बेचकर पैसे बनाते हैं. ये बस्तर में गांजे की खेती करा रहे हैं.
पुलिस व सुरक्षा बल के अभियान में कई ख़ामियां हो सकती हैं, पर इसके मूल में नक्सली हिंसा ही हैं. यदि सचमुच मानवाधिकारवादी- गांधीवादी आदिवासियों का हित चाहते हैं तो पहले नक्सलियों को समझाएं, उन्हें बातचीत के लिए बिठाएं. यह कई बार देखा गया है कि वे बस्तर के जंगलों में वहां तक पहुंच सकते हैं, जहां प्रशासन अब तक नहीं पहुंच पाया.
बस्तर के टूर पर आने वाले मानवाधिकारवादियों को अपनी क्षमता, सम्पर्कों का इस्तेमाल कर छत्तीसगढ़ की भलाई और यहां की शांति के लिए सरकार से सहयोग करना चाहिए. जल, जंगल, जमीन से जुड़ी उनकी आशंकाओं और इन्हें नष्ट करने के विरोध में सभी प्रकृति-पर्यावरण प्रेमी, छत्तीसगढ़ की बोली, संस्कृति, सभ्यता, आदिवासियों की अपनी जीवन शैली का संरक्षण करने की मंशा रखने वाले- एक साथ हैं. बस्तर की जमीन से आदिवासियों को बेदखल कर इसे मल्टीनेशनल्स को सौंपने जैसी आशंकाओं से भी सब चिंतित हैं. लेकिन इससे निपटने का ठेका बंदूक से प्रत्येक विरोध को ठिकाने लगाने वाले नक्सलियों को नहीं सौंपा जा सकता, क्या लोकतंत्र और संविधान पर भरोसा रखने वाले मर गए हैं?
बस्तर में भरपूर हरियाली होते हुए भी, छत्तीसगढ़ियों के लिए पीड़ा व अभावों का बंजर है. दूसरी तरफ यह दुनिया भर के लिए एक मनोरंजन और कौतूहल का इलाका है. क्या मानवाधिकारवादी सामाजिक कार्यकर्ता इसलिए इसी के पीछे पड़े हैं? छत्तीसगढ़ में ही आदिवासी बाहुल्य सरगुजा, जशपुर, रायगढ़ जाएं. वहां ग्रामीणों को बेदखल करने की समस्या कुछ कम नहीं है. बस्तर को नक्सलियों से खाली कराने के बाद तो अज्ञात भविष्य में कार्पोरेट को सौंपा जाएगा, जैसी उनकी आशंका है, पर इन तीनों इलाकों में अभी-इसी वक्त यही सब हो रहा है. मानवाधिकारवादियों के मापदंड में सटीक बैठने वाला दमन, इतना ही अत्याचार वहां आदिवासियों के साथ हो रहा है. ये सामाजिक कार्यकर्ता अपनी व्यस्तता की धुरी उधर क्यों नहीं मोड़ लेते. क्या इनको आशंका है कि वहां काम करने पर इन्हें राष्ट्रीय अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया में सुर्खियां नहीं मिल पाएगी.
मेधा पाटकर व संदीप पांडेय जी को दंतेवाड़ा में अंडे, पत्थरों से स्वागत के बाद थोड़ी हक़ीकत समझ में आई. रायपुर में पत्रकारों के बीच उन्हें कबूल करना पड़ा कि वे नक्सल समर्थक नहीं है, उनकी हिंसा के ख़िलाफ हैं. लेकिन बदनियती देखिये, उन्होंने साथ में यह भी जोड़ दिया कि सरकार प्रायोजित हिंसा ज्यादा खतरनाक है. मौजूदा सरकार के किसी प्रवक्ता से मत पूछिये, भरोसा न हो तो मीडिया से भी नहीं पूछें, छत्तीसगढ़ की चिंता करने वाले दूसरे लोगों से, तटस्थ लोगों से भी पूछ लें-क्या सरकार वहां हिंसा को प्रायोजित कर रही है? नक्सली- खंदक, एम्बुस, बारूदी सुरंग लगाकर बैठे हैं. कई बार फोर्स को पता होता है, कई बार नहीं होता. वहां जवान मारे जाते हैं. एसपी विनोद चौबे और उनके 30 साथियों की मौत पर किसी मानवाधिकारवादी ने अफसोस जताया? इसी तरह के रवैये ने उनकी नीयत पर सवाल खड़े होते रहे हैं. दर्जनों बार साप्ताहिक बाज़ारों में तैनात पुलिस अफसरों व सिपाहियों को नक्सलियों ने अचानक पहुंच कर गोलियों से भून डाला, उनके गर्दन काट दिए. क्या किसी मानवाधिकार समर्थक ने सोचा कि उनका भी परिवार, बीवी बच्चे हैं. क्या इन मरने वालों की सिर्फ यही गलती है कि वे इसी व्यवस्था, जिसकी अकर्मण्यता और नाकामी से, ज़ाहिर है, सब त्रस्त भी हैं- के हिस्से हैं. सरकारी हिंसा यदि है भी, यह तो नक्सलियों की क्रिया की ही प्रतिक्रिया है. जिनमें ग़लतियां तो स्वाभाविक हैं.
क्या हम पुलिस और सरकार को अदालतों में, राष्ट्रीय अन्तर्राष्टीय मंचों पर इसलिए घसीटते हैं कि वे इस व्यवस्था के अंग हैं और सबको उत्तर देने के लिए प्रतिबध्द हैं? एक ऐसे भयावह दृश्य की कल्पना की जाए, जिसमें पुलिस और यही मशीनरी नक्सलियों को किसी भी कीमत पर ख़त्म करने की ठान ले. इस बात की तहकीकात करने में वक्त ख़राब न करे कि सामने खड़ा व्यक्ति निर्दोष आदिवासी है या दुर्दांत नक्सली. फोर्स पर किसी भी को अपने अभियान, योजना, कार्रवाईयों के लिए जवाब देने की जिम्मेदारी भी न रहे, बताएं तब क्या होगा? हर दिन, हर वक्त फोर्स को आप कटघरे में लाकर खड़ा करते हैं, जिसके चलते जान जोखिम में डालकर, फूंक-फूंक कर उन्हें कदम उठाना पड़ता है, सफाई देनी पड़ती है. नक्सली तो छिपकर हमला करने वाले लोग हैं जिनके पास पावर विदाऊट रिसपांसबिलिटी है. वे जो करें- किसी को जवाब देने के लिए बाध्य नहीं. मानवाधिकारवादी बताएं कि क्या उन्हें खत्म कर डालने की जरूरत नहीं?
दिल्ली से लेकर चेन्नई में गृह मंत्री के गांव तक पुलिस अत्याचार के ख़िलाफ तमाम प्रदर्शन व साइकल रैलियां निकालने वाले इन मानवाधिकार समर्थकों की ताक़त बहुत ज्यादा है. इसीलिए इनसे उम्मीद भी अधिक है. वे जरा समझ लें कि सरकार की नीयत पर भरोसा नहीं होने के बावजूद, बस्तर में भयंकर भ्रष्टाचार और लूट के बाद भी- सबसे पहली जरूरत नक्सलियों को खदेड़ने की है. दिल्ली, मुम्बई, हैदराबाद, अहमदाबाद में बैठे लोग इसे समझ सकें, यह छत्तीसगढ़ की चिंता करने वालों की अपेक्षा है.
छत्तीसगढ़ की मीडिया पर आरोप मढ़ना तो आसान है, लेकिन यही मीडिया कोल ब्लाक के आबंटन में धांधली, जन सुनवाईयों में की जाने वाली जबरदस्ती, सत्तारूढ़ भाजपा के विधायक की प्रदूषण के ख़िलाफ आवाज़, धान-चावल घोटाले, स्वास्थ्य, राशन कार्ड, बिजली घोटाले को लगातार उठा रहा है. छत्तीसगढ़ का मीडिया दलाल या सरकार का अंधानुकरण करने वाला नहीं है. बस्तर के सिंगारम में हुई हत्याओं के ख़िलाफ यहीं के अख़बारों ने पहले पन्ने पर बड़ी-बड़ी ख़बरें छापी, जिसे लेकर मानवाधिकार कार्यकर्ता भी अदालत गए. मानवाधिकार की बात करने वाले अपनी सोच का दायरा बढ़ाएं. जब बस्तर से नक्सलियों का सफाया हो जाएगा, तभी हम शिक्षकों को स्कूल जाने के लिए बाध्य कर सकेंगे. अपनी जड़ से कटकर कर सलवा जुड़ूम कैम्पों में शरण लेने वाले आदिवासियों को उनके गांव भेज सकेंगे. स्वास्थ्य, पानी, सड़क की सुविधाएं पहुंचाने के लिए सरकार पर दबाव डाल सकेंगे, क्योंकि तब हमें वहां मौजूद रहने और अधिक पारदर्शी आंदोलन करने का मौका मिलेगा. रही बस्तर के आदिवासियों को बेदखल करने और वहां की बहुमूल्य सम्पदा को लुटाने की साजिश से आप चिंतित हैं, तो आइये आप आज ही छत्तीसगढ़ के दूसरे इलाकों में जहां आदिवासी समान प्रकार की समस्या से जूझ रहे हैं और नक्सलियों की वहां पकड़ भी नहीं है-पहुंचकर सरकार व बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के ख़िलाफ मोर्चा खोल लें.
रायपुर प्रेस क्लब के फैसले की आलोचना करने वाले मानवाधिकारवादी बंधुओं से एक और सवाल. आप तो राष्ट्रीय अन्तर्राष्ट्रीय अंग्रेजी अख़बारों में छाए हुए हैं, वे बहुत गंभीरता से आपकी बात सुनते हैं. दिल्ली की सरकार और अन्तर्राष्ट्रीय मंच भी उन्हें पूरा-पूरा सच मानकर पढ़ता है. फिर रायपुर प्रेस क्लब के विरोध को लेकर आप चिंतित क्यों रहें? रायपुर प्रेस क्लब कोई सरकारी संस्था नहीं है. कोई खास समूह तय नहीं कर सकता कि उनकी किसके प्रति जवाबदेही है. लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि वे सच के साथ और अत्याचार के ख़िलाफ नहीं है. यह तो रिपोर्टरों का एक संगठन है. आपके पास भी एक संगठित राष्ट्रीय स्तर के मीडिया रिपोर्टर्स है. आपको लगता है कि अदालतें और सरकार इनकी आवाज़ ज्यादा ठीक तरह से सुनती समझती है.एक सवाल यह भी है कि अगर भ्रष्टाचार सिर से ऊपर चला गया है, न्याय में देरी हो रही है, सरकारी अमला मुफ़्तखोर हो गया है तो हमें मौजूदा व्यवस्था सुधारने की कोशिश करने की बजाय क्या नक्सलियों की सत्ता को स्वीकार कर लेना चाहिए?

शनिवार, 12 दिसंबर 2009

खेत-बाड़ी रौंदने के लिए सिर फुटौव्वल

सरगुजा जिले के मुड़गांव में तीर-धनुष से लैस आदिवासियों ने चमचमाती जीपों में सवार होकर पहुंचे दो दर्जन लठैतों को घेर लिया
और उन्हें करीब 18 घंटे तक बंधक बना कर रखा. बाद में पुलिस के गांव वालों को समझाया और उनके चंगुल से उन्हें छुड़ाया. पर इसके बाद ग्रामीणों पर बलवा और मारपीट का मुकदमा दर्ज कर लिया गया. मुड़गांव के ग्रामीणों का आरोप है कि यहां के सरपंच के भाई नारायण सिंह की इफको वालों से मिलीभगत है. उसने एक फर्जी ग्राम-सभा करा ली और बिना गांव वालों की मंजूरी के ही तय किया कि इफको को जमीन देनी हैं. गांव के लोग अपनी खेत-बाड़ी छोड़ना नहीं चाहते, क्योंकि वह उनकी उपजाऊ जमीन है और पुरखों से वहां खेती करते हुए आ रहे हैं. दरअसल, इफको को सरगुजा इलाके में एक कोल ब्लाक आबंटित हुआ है और यहीं पर उसे पावर प्लांट भी लगाना है. हालांकि इफको के प्रोजेक्ट मैनेजर यूपी सिंह का कहना है कि अधिकांश ग्रामीणों ने जमीन छोड़ने की सहमति दी है और ज्यादातर ने मुआवजा भी ले लिया है. लेकिन सच्चाई यही है कि जिन ग्रामीणों के नाम चेक काट दिये गए हैं वे इससे वाकिफ ही नहीं.
घने जंगलों, प्राकृतिक और वन्य सम्पदा से भरपूर सरगुजा और कोरबा के बीच 5 कोल ब्लाक आबंटित किए गये हैं. प्रेमनगर में इफको तो सरगुजा व कोरबा के बीच राज्य सरकार का पावर प्लांट लगाया जाना है. उदयपुर में अदानी ग्रुप गुजरात का प्लांट लगने जा रहा है. इन प्लांटों से करीब 100 गांव बेदखल होने जा रहे हैं. अकेले इफको को 750 हेक्टेयर जमीन चाहिए. राज्य सरकार व दूसरी बिजली कम्पनियों को भी 3300 हेक्टेयर जमीन की जरूरत है. एक एनजीओ ने सर्वेक्षण के बाद निष्कर्ष निकाला है कि इन परियोजनाओं से कटने वाले पेड़ो की संख्या 1.5 करोड़ से ज्यादा होगी. इतने पेड़ों के कटने के बाद यहां कोयला खदानों व बिजली परियोजनाओं से जबरदस्त प्रदूषण भी फैलेगा. उदयपुर, प्रेमनगर के ग्रामीणों को अपना भविष्य अंधेरे में दिखाई दे रहा है, गोन्डवाना गणतंत्र पार्टी ग्रामीणों के साथ खड़ी है. इसके राष्ट्रीय अध्यक्ष हीरासिंह मरकाम कहते हैं कि इफको को यदि जमीन चाहिए तो पहले वास्तविक ग्राम-सभा बुलाकर ग्रामीणों की सहमति ले. वे क्या मुआवजा देंगे और पुनर्वास तथा राहत के लिए क्या करने वाले हैं. दरअसल, यही वह बिन्दु है जहां से उद्योगपतियों व ग्रामीणों के बीच सहमति नहीं बन पाती.
बीते 4-5 सालों से जमीन हथियाने के लिए फर्जी ग्राम सभाएं करना, ग्राम के प्रमुखों का अपहरण कर उनसे बलात् सहमति लेना, पुलिस में झूठे मुकदमे दर्ज कर जेल भिजवा देना, लाठी चार्ज करा देना-यही सब चल रहा है. बस्तर में टाटा व एस्सार की बड़ी स्टील परियोजनाएं इतने सालों में आकार नहीं ले पाई है. मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह कहते हैं कि लोहड़ीगुड़ा व आसपास के प्रभावित गांवों के 80 फीसदी किसान अपनी जमीन छोड़ने के लिए तैयार हैं, लेकिन 20 फीसदी लोगों को तथाकथित स्वयंसेवी संगठनों ने बरगला दिया है और परियोजना शुरू ही नहीं हो पा रही है. टाटा की परियोजना में 19 हजार करोड़ रूपये खर्च होने जा रहे हैं. एस्सार करीब 70 अरब रूपये खर्च करने जा रही है.
कोन्टा के पूर्व विधायक व आदिवासी महासभा के मनीष कुंजाम कहते हैं कि बस्तर में जनजातियों को नक्सलियों का समर्थन है, जिसके चलते वे लौह अयस्क के खदानों में काम बंद करा सकते हैं. टाटा-एस्सार जैसी कम्पनियों के लिए रास्ता खोलने के लिए आदिवासी अपने जंगल और जमीन से बेदखल किये जा रहे हैं. इसे रोकने में नक्सली मददगार साबित हो रहे हैं. इसलिए आसानी से आदिवासियों की सहानुभूति नक्सलियों के साथ हो गई है. टाटा को यहां करीब 5000 एकड़ जमीन चाहिए, जिसमें 1700 परिवारों को विस्थापित होना पड़ेगा. एस्सार को 1500 एकड़ भूमि की ज़रूरत है और इससे 500 परिवार बेदखल होंगे. दोनों ही परियोजनाओं में विरोध इतना जबरदस्त है और नक्सली उपद्रव की आशंका है कि 5 साल से दोनों ही कम्पनियां काम शुरू नहीं कर पा रही हैं.
नक्सल प्रभावित इलाकों में यदि यह मान भी लिया जाए कि नक्सलियों के प्रभाव के चलते अधिग्रहण खटाई में पड़ा है तो फिर प्रदेश के दूसरे इलाकों में हो रहे विरोध को क्या माना जाए.
राज्य के उद्योग विभाग के अधिकारियों का ही मानना है कि प्रदेश की लम्बित परियोजनाओं के लिए सरकार को करीब 30000 एकड़ जमीन की जरूरत है, लेकिन इनमें से केवल 5 फीसदी का ही अधिग्रहण किया जा सका है. अधिग्रहण की यह बाधा बिलासपुर, रायगढ़, जांजगीर, कोरबा जैसे इलाकों में हैं, जहां पर नक्सलियों का प्रभाव नहीं है बल्कि सरकारी नीति और उद्योगपतियों के रवैये के लिए ख़िलाफ ग्रामीण खुद सामने आकर संघर्ष कर रहे हैं. छत्तीसगढ़ में किसानों की जमीन को मिट्टी के मोल ही खरीदने का प्रावधान है और जो वादे पुनर्वास व राहत के लिए किये जाते हैं वे दशकों बीत जाने के बाद भी पूरे नहीं किए जाते.
भू-अर्जन अधिनियम के अनुसार बंजर जमीन के लिए केवल 50 हजार रूपये, एक फसली जमीन के लिए 75 हजार रूपये व दो फसल वाली भूमि के लिए 1 लाख रूपये का मुआवजा देना तय किया गया है. लेकिन बाजार दर वास्तव में इससे कई गुना ज्यादा है. फिर बेघर और भूमिहीन होने के बाद केवल खेती जानने वाले किसान कहां भटकेंगे, यह सवाल भी उनको खाया जाता है.
लोहड़ीगुड़ा में 3 साल पहले ग्राम सभा आयोजित कर ग्रामीणों की सहमति लेने की कोशिश की गई थी. ग्रामीण ठीक मुआवजे के अलावा टाटा व एस्सार की परियोजनाओं में अपना शेयर भी चाहते थे. जब ग्रामीणों को राजी करने में जिला प्रशासन नाकाम रहा तो पुलिस बल की मौजूदगी में 150 से ज्यादा लोगों के ख़िलाफ मुकदमा दर्ज कर और प्रभावित गांवों में धारा 144 लागू कर ग्राम सभा कराई गई और इस तरह से अधिग्रहण किया गया आसपास के 10 गावों में जमीन का. इसे साबित की गई ग्रामीणों की सहमति. श्री कुंजाम का तो कहना है कि 7 करोड़ रूपयों से ज्यादा का मुआवजा फर्जी लोगों को बांट दिया गया है, जिसकी सीबीआई जांच कराई जानी चाहिए. ग्रामीणों ने इसे धोखाधड़ी मानते हुए पुलिस में रिपोर्ट भी दर्ज करा दी है. जगदलपुर कलेक्टर एमएस परस्ते इसके उलट कहते हैं कि मुआवजा बांटने के लिए पंचायत स्तर पर ही समिति बनाई गई है और गांव के प्रतिनिधियों ने ही हितग्राहियों की पहचान की है.
रायपुर से 20 किलोमीटर दूर बन रही नई राजधानी में जमीन गंवाने वाले किसान आज अपने आपको ठगा महसूस कर रहे हैं. उन्हें 5 लाख रूपये की दर पर मुआवजा दिया गया है. लेकिन अब इन रूपयों को लिए वे दूसरी जमीन तलाश कर रहे हैं तो उनके चेहरे से हवाईयां उड़ रही है. राजधानी की वृहद परियोजना के कारण 50 किलोमीटर के दायरे तक उन्हें खेती के लायक जमीन ही नहीं मिल रही है. अब एकड़ या डिसमिल में नहीं बल्कि वर्गफीट के दर से जमीन का सौदा हो रहा है. अब किसान आंदोलन कर रहे हैं कि उन्हें 50 लाख रूपये से लेकर एक करोड़ रूपये तक का मुआवजा मिले, लेकिन सरकार कहती है कि मुआवजा दिया जा चुका है अब कोई बात नहीं होगी. रायगढ़ शहर से बमुश्किल 7 किलोमीटर दूर वीसा स्टील को स्टील व पावर प्लांट लगाने के लिए 146 एकड़ जमीन ग्रामीणों की सहमति के बगैर ही हस्तांतरित कर दी गई और शहर की सीमा से जुड़ते जा रहे इस गांव के लोगों को मुआवजा केवल 80 हजार रूपये दिया गया. किसान बदकिस्मत रहे कि इस मामले को लेकर वे अदालतों तक भी चले गए लेकिन मुकदमा हार गए. सरकार ने उन्हें इस जगह पर करीब 1000 एकड़ जमीन उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया है.
छत्तीसगढ़ का कोई जिला- ब्लाक अछूता नहीं है, जहां ग्रामीण सरकारी मदद से हथियाए जा रहे खेत व झोपड़ी के ख़िलाफ सड़क पर न उतर रहे हों. हालांकि अब राज्य सरकार ने नई उद्योग नीति बनाई है, जिसमें जमीन का मुआवजा 10 लाख रूपये तक देने का प्रावधान किया गया है. यह भी कहा गया है कि अब उद्योगपति किसानों से सीधे जमीन खरीदेंगे, सरकार इसमें कम से कम हस्तक्षेप करेगी. ग्रामीण अब भी उद्योगों, उद्योगपतियों व सरकार की नीयत पर संदेह से घिरे हुए हैं.कांग्रेस नेता भूपेश बघेल की मानें तो सरकार ने नई उद्योग नीति अदालतों में चल रहे मामलों से बचाव के लिए ही बनाई है.

शनिवार, 14 नवंबर 2009

दसवें साल में हाशिये पर जाते आदिवासी, ठगे जाते किसान

लगभग 9 साल पहले जब मध्यप्रदेश से छत्तीसगढ़ को अलग बांटा गया तो उसके पीछे मंशा यही थी कि प्रचुर नैसर्गिंक संसाधनों से भरपूर इस आदिवासी बाहुल्य पिछड़े राज्य को विकास के मामले में किसी भेदभाव का शिकार होने से बचाया जाए. अब जबकि बीते एक नवंबर को यह राज्य अपने दसवें साल की ओर कदम बढ़ा चुका है तो साथ बने दो अन्य राज्यों झारखंड और उत्तराखंड के मुकाबले तेजी से आगे बढ़ता हुआ दिखाई तो देता है लेकिन विकास का मतलब एक बड़ी आबादी को आज भी नहीं समझाया जा सका है. राज्य की तरक्की के लिए बड़े फैसले लिए जा रहे हैं, लेकिन राजनैतिक स्थिरता के बावजूद इच्छाशक्ति की कमी, लापरवाह विपक्ष और बेलगाम नौकरशाही ने इसके पहिए जाम कर रखे हैं. भारी भरकम बजट वाले इस राज्य में- राजमद में डूबे लोग ज़मीनी चुनौती का खुद सामना करने के बजाय फोर्स को आगे कर रहे हैं और नक्सलियों के हाथ शहरी इलाकों के गर्दन तक पहुंच रहे हैं.
झारखंड और उत्तराखंड के लिए जिस तरह हिंसक संघर्ष हुए, छत्तीसगढ़ में वह देखने को नहीं मिला. इसकी वजह यह नहीं थी कि छत्तीसगढ़ की जरूरत को यहां के लोगों ने कम करके आंका. कारण बस इतना था कि यहां के लोग शांतिप्रिय है. छत्तीसगढ़ियों की बोली बहुत मीठी है और रहन-सहन सादा. कई दशक पहले पं. सुन्दरलाल शर्मा व खूबचंद बघेल जैसों ने गांधीवादी तरीके से अलग राज्य की मांग शुरू कर दी थी. इसी का असर था कि सर्वदलीय पृथक छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण मंच की अगुवाई में यहां के लोगों ने दो दशक के शांतिपूर्ण आंदोलनों के ही जरिये अपनी मांग मनवा ली. छत्तीसगढ़ की सबसे बड़ी खूबी है यहां के 44 फीसदी हिस्से का जंगलों से ढ़का होना, जहां पर 32 प्रतिशत आदिवासियों का निवास है. विकास की धुरी में यही तबका केन्द्र बिन्दु होना चाहिए था. न केवल इसलिए कि वे जनसंख्या के लिहाज से संसाधनों का सबसे ज्यादा इस्तेमाल करने का अधिकार रखते हैं बल्कि इसलिए भी कि वे ही राज्य के मूल निवासी माने जाते हैं. 18 वीं शताब्दी के हलबा आंदोलन से लेकर मुगल, मराठा व ब्रिटिश सरकारों के ख़िलाफ आदिवासियों ने जमकर लोहा लिया और यहां की प्रचुर खनिज, वन सम्पदा को बचाये रखने, अपनी मौलिक जीवन शैली, रहन-सहन व संस्कृति को संभाले रखने के लिए उन्होंने पूरे साहस के साथ खून बहाया.
सन् 2000 में राज्य बना तो छत्तीसगढ़ का बजट 5700 करोड़ रूपये था, जो आज 9 साल बाद बढ़कर 23 हजार करोड़ रूपये तक पहुंच चुका है, लेकिन 66 लाख की आबादी वाले आदिवासी समुदाय का हाल जस का तस है. वे कुपोषण के शिकार हैं, शासकीय योजनाओं की रकम उन तक पहुंचने से पहले ही हड़प ली जाती है. स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क, रोजगार जैसी आधारभूत आवश्यकताओं के लिए उन्हें तरसना पड़ रहा है. इस असंतोष को भुनाया है हिंसा पर भरोसा रखने वाले माओवादियों ने. सरकार कहती है कि 44 हजार वर्गकिलोमीटर में फैले बस्तर इलाके का विकास इन्होंने रोक रखा है, जबकि माओवादी आदिवासियों को यह विश्वास दिलाने में एक हद तक सफल दिखाई देते हैं कि सरकार बेशकीमती खनिज और वन सम्पदा को लूटना चाहती है. पुलिस व केन्द्रीय बलों को लगातार नक्सली छका रहे हैं. यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि इनकी समानान्तर सरकारें चल रही हैं. वे बस्तर के बहुमूल्य संसाधनों को अपने हाथों में लेकर अपनी शर्तों पर इस्तेमाल करने की हद तक प्रभाव रखते हैं. सरकार के पास रिपोर्ट है कि यहां प्रवेश करने वाले व्यापारियों और ठेकेदारों से नक्सली सालाना 300 करोड़ रूपये की फिरौती वसूल रहे हैं. अर्धसैनिक बलों-पुलिस के अलावा नक्सलियों से लोहा लेने के लिए बतौर एसपीओ (विशेष पुलिस अधिकारी) आदिवासी युवकों को भी झोंक दिया गया है. बीते 2 सालों में 700 से ज्यादा नागरिक व पुलिस कर्मी इन मुठभेड़ों में मारे जा चुके हैं. इनमें एक पुलिस अधीक्षक व करीब दर्जन भर अधिकारी स्तर के जवान शामिल हैं. कांग्रेस व भाजपा के कई नेता शामिल हैं. भाजपा सांसद बलिराम कश्यप के एक बेटे की हत्या तो हाल ही में हुई. कांग्रेस नेता महेन्द्र कर्मा के भतीजे की भी हत्या हो चुकी है.
नक्सलियों से जूझने के लिए सन् 2005 में शुरू किये गए सलवा जुड़ूम आंदोलन को सरकार का साथ मिला, लेकिन इसके बाद नक्सली और आक्रामक हो गए. सलवा जुड़ूमियों पर भी हत्या, लूटपाट और बलात्कार के आरोप लगे. बस्तर इलाके के 600 से ज्यादा गांव खाली हो गए. इनकी आबादी करीब 3 लाख बताई जाती है. इनमें से 60 हजार लोग सरकार के बनाए गये राहत शिविरों में रहते हैं, लेकिन बाकी आदिवासी कहां गये इसकी कोई ख़बर नहीं. बड़ी संख्या में इन्होंने आंध्रप्रदेश व उड़ीसा की ओर भी पलायन किया, लेकिन उन्हें वहां से भी खदेड़ा जाता है. इन पलायन करने वालों के खेत-खलिहान उजड़ गए, बच्चों का स्कूल व पेट भर खाना छूट गया.
छत्तीसगढ़ राज्य जिन लोगों की खुशहाली की कामना करते हुए बनाया गया था, आज वे हताश और भयभीत हैं. इन दिनों बस्तर में बड़ी तादात में केन्द्रीय बलों के जवान तैनात किये जा रहे हैं. सरकार ने बस्तर में निर्णायक लड़ाई लड़ने का इरादा बना लिया है. सुरक्षा बलों व नक्सलियों के बीच संभावित बड़े संघर्ष की ख़बरों से भयभीत आदिवासी फिर पलायन करने जा रहे हैं. केन्द्रीय गृह मंत्री पी. चिदम्बरम् और मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह के इस आश्वासन के बावजूद भय का वातावरण गहराता जा रहा है कि आम लोगों को इस आपरेशन को लेकर कोई चिंता नहीं करनी चाहिए.
रायपुर, बिलासपुर की सड़कों पर चलें और तेजी से बढ़ती नई कालोनियों और इंडस्ट्रीयल इलाकों को देखें तो राज्य की भाजपा सरकार के इस दावे में काफी दम दिखाई देता है कि प्रदेश तेजी से विकास कर रहा है. मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह यह बताते हुए नहीं अघाते हैं कि उनकी सरकार ने राज्य के औद्योगिक विकास के लिए 1.25 लाख करोड़ रूपये का एमओयू किया है. लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि लोगों ने इनके जरिये अपना जीवन स्तर ऊपर उठते हुए नहीं देखा. रायगढ़, कोरबा, रायपुर जैसी जगहों पर तेजी से स्पंज आयरन और बिजली परियोजनाएं शुरू हुईं. लेकिन आम लोगों ने पाया तो केवल अपनी पुश्तैनी खेती से बेदखली की पीड़ा और बेशुमार प्रदूषण. राज्य के किसी न किसी छोर में विस्थापन और प्रदूषण के खिलाफ अक्सर आंदोलन चलते रहते हैं. समस्या इतनी गंभीर है कि रायपुर में प्रदूषण को लेकर राज्यपाल ईएसएल नरसिम्हन खुद बार-बार दखल दे रहे हैं. सत्ता पक्ष के ही एक विधायक देवजी पटेल ने तो अपनी ही सरकार के ख़िलाफ मोर्चा खोल रखा है.
राज्य बनने के तत्काल बाद यहां चुनाव नहीं हुए. मध्यप्रदेश से टूटकर बनी 90 सीटों में से बहुमत कांग्रेस का था, लिहाजा अजीत जोगी के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बनी. 3 साल बाद हुए चुनाव में वे अपने ख़िलाफ जातिवाद को बढ़ावा देने व सरकारी आतंक के आरोपों का जवाब नहीं दे पाये और इन्हीं को मुद्दा बनाकर भाजपा ने कांग्रेस को शिकस्त दी. भाजपा ने पहले कार्यकाल में औद्योगिकीकरण व बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के साथ समझौतों को खूब प्रोत्साहन दिया. लेकिन जब पांच साल बाद 2008 में चुनाव हुए तो परिस्थितियां बदल चुकी थी. प्राकृतिक संसाधनों के इस्तेमाल करने की योजना से राज्य के राजस्व में तो इजाफा हुआ, लेकिन आम लोगों को इसका कोई फायदा नहीं हुआ. अधिकांश योजनाएं उन इलाकों की हैं, जहां नक्सलियों के चलते काम शुरू नहीं किए जा सके. जमीनों के अधिग्रहण के ख़िलाफ न केवल बस्तर के आदिवासी बल्कि मैदानी इलाकों में भी किसान उठ खड़े हुए. इसका नतीजा यह रहा कि विधानसभा में सरकार ने पिछले साल एक ब्योरा पेश किया, जिसमें बताया गया कि तब तक किए गये 16 एमओयू में से केवल एक पर काम शुरू किया जा सका है.
भाजपा के रणनीतिकारों को समझ में आ गया कि 83 फीसद खेती पर निर्भर छत्तीसगढ़ियों के बीच धान और चावल की ही सबसे ज्यादा अहमियत है. राजनीति इसी पर शुरू हुई. इसके बाद आकार लिया 3 रूपये किलो चावल की योजना ने. नवम्बर 2008 के विधानसभा चुनाव के 8 माह पहले यह योजना लागू की गई और इसे इतनी ज्यादा लोकप्रियता मिली कि विपक्ष हक्का-बक्का रह गया. कांग्रेस ने 101 घोटालों की फेहरिस्त जारी की. इनमें के कई मामलों को उन्होंने लोक आयोग को भी सौंपा लेकिन सारे मुद्दे बेअसर रहे. भाजपा ने केन्द्र सरकार की गरीबी रेखा सूची में शामिल 18 लाख लोगों की सूची से पृथक एक अलग सर्वेक्षण कराया और राज्य के 30 लाख परिवारों को गरीबों की सूची में जोड़ दिया. इसके अलावा 7 लाख परिवारों को अति-गरीब माना गया. चुनावी घोषणा पत्र में चावल योजना का विस्तार किया गया. अब यहां के 30 लाख परिवारों को चावल कुछ कम कर 7 किलो गेंहूं भी दिया जा रहा है. चावल का मूल्य गरीबों के लिए 2 रूपये किया गया, अति-गरीबों को तो यह एक ही रूपये में दिया जा रहा है. यह विडम्बना ही कही जाए कि दो करोड़ 8 लाख की आबादी वाले इस राज्य में सरकारी आंकड़ों के ही अनुसार 66 लाख से ज्यादा गरीब निवास करते हैं. केन्द्र सरकार की योजना का खाका तैयार होने से पहले ही राज्य सरकार ने अपने बजट से ही राज्य में भोजन का अधिकार योजना लागू करने की घोषणा कर दी है. नमक का पैकेट मुफ़्त दिया जा रहा है.
किसानों को चुनावी साल में धान पर प्रति क्विंटल 270 रूपये का बोनस दिया गया. पर 2009 की खरीफ फसल आने पर किसान अपने को ठगा सा महसूस कर रहा है क्योंकि इस साल यह बोनस देने से सरकार ने मना कर दिया है. न केवल विधानसभा चुनाव में बल्कि लोकसभा में धान चावल का असर रहा. विधानसभा में भाजपा ने अपनी पुरानी स्थिति बरकरार रखते हुए 50 सीटें हासिल की, जबकि लोकसभा की 11 में से 10 सीटें उसकी झोली में आ गिरीं.
राज्य की रमन सरकार को अपनी पार्टी की ओर से कोई चुनौती नहीं है. गाहे-बगाहे विरोध के स्वर उठते हैं लेकिन मुख्यमंत्री को इनसे निपटने का पर्याप्त अनुभव हासिल हो चुका है. केन्द्रीय नेतृत्व विशेषकर राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह से मुख्यमंत्री के मधुर सम्बन्ध हैं. इसलिए जब दूसरी पारी में भी मुख्यमंत्री के तौर पर उनके अलावा कोई नाम नहीं उभरा. इस लिहाज से देखा जाए तो सन् 2000 में बने तीन राज्यों में छत्तीसगढ़ में सबसे ज्यादा राजनैतिक स्थिरता है. झारखंड में अब तक 9 बार मुख्यमंत्री तथा उत्तराखंड में 5 मुख्यमंत्री बदले जा चुके हैं, जबकि छत्तीसगढ़ में दो ही मुख्यमंत्री हुए और दूसरी बार चुने जाने के बाद डा. सिंह अपना कार्यकाल सफलता पूर्वक लगभग एक साल पूरा करने जा रहे हैं.
यदि राजनैतिक अस्थिरता विकास में बाधा मानी जाती है, तो अधिक स्थिरता सरकार को निश्चिन्त भी कर देती है. छत्तीसगढ़ में यह दिखाई देता है. सबसे ज्यादा राहत नौकरशाहों में दिखाई देता है. धान खरीदी, सार्वजनिक वितरण प्रणाली, प्रधानमंत्री सड़क योजना, उर्जा विभाग, ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना में आये दिन भ्रष्टाचार के मामले सामने आते हैं. बड़े बजट वाला राज्य है, लिहाजा घोटाले की राशि भी करोड़ों में होती है. विधानसभा में जांच और कार्रवाईयों का भरोसा दिलाए जाने के बाद ऐसे दर्जनों मामलों पर कोई कार्रवाई नहीं करते हुए राज्य सरका ने यह संदेश दे दिया है कि वे इन्हें बचाने में उन्हें कोई शर्म महसूस नहीं होती.
इन 9 सालों में राज्य की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि वह बिजली के मामले में आत्मनिर्भर हो गया है. राज्य बनने के बाद जहां केवल 1300 मेगावाट बिजली छत्तीसगढ़ में उपलब्ध थी वहीं अब 2100 मेगावाट है, जिसे अगले साल तक बढ़ाकर 2600 मेगावाट तक पहुंचाने का लक्ष्य है. राज्य ने करीब 4000 करोड़ रूपये बिजली बेचकर कमाये. प्रदूषण और पानी की समस्या के बावजूद राज्य सरकार ने इस दिशा में काफी आगे जाने का विचार किया है. अगले एक दशक में निजी व सार्वजनिक क्षेत्रों की मदद से इस दिशा में 44000 करोड़ रूपये के निवेश की योजना बनाई गई है.
प्रदेश में राज्य बनने के समय 100 वर्ग किमी के दायरे में 17 किलोमीटर ही सड़कें थी, जिसे अब 20 किलोमीटर तक पहुंचाया जा चुका है. खाद्य विभाग के बाद सबसे ज्यादा बजट 2100 करोड़ रूपये का पीडब्ल्यूडी के लिए ही रखा गया है. राज्य में इतने अधिक इंजीनियरिंग कालेज खोले जा चुके हैं कि पीईटी दिलाने वाले सारे छात्रों को जगह मिल जा रही है. तेजी से नये औद्योगिक संयंत्र खुलने के बाद भी यहां के इंजीनियरों को रोजगार की तलाश में बाहर भटकना पड़ता है. 4 नये मेडिकल कालेज खुलने के बाद भी राज्य में करीब 3500 डाक्टरों की कमी है. इनमें से भी अधिकांश शहरों में जमे हुए हैं. ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं का बुरा हाल है. यहां कुपोषण की दर राष्ट्रीय औसत से ज्यादा है. राज्य की औसत साक्षरता 64 प्रतिशत से अधिक है लेकिन आदिवासी इलाकों में यह 50 फीसदी तक ही सिमटी हुई है. स्कूली शिक्षा का बजट 9 सालों में 345 करोड़ से बढ़कर 2555 करोड़ हो गया पर हजारों स्कूल अभी भी शिक्षक विहीन हैं और स्कूल भवन जर्जर हैं. राज्य सरकार कहती है कि राज्य बनने के बाद अब 13 लाख हेक्टेयर के बजाय 17 लाख हेक्टेयर में सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है. लेकिन इन्हीं आंकड़ों एक सच यह भी है कि कुल खेती के रकबे का केवल 30 प्रतिशत हिस्सा सिंचित है. खेती के जानकार तो कहते हैं कि वास्तविक सिंचित रकबा 16-17 फीसद ही है. सरगुजा-बस्तर जैसे इलाके में सिंचाई सुविधा केवल 3 और 6 प्रतिशत किसानों को उपलब्ध है. इस बार 20 फीसदी वर्षा कम होने के कारण राज्य की 146 में से 66 तहसीलों में भयंकर सूखा पड़ा हुआ है. कई तहसीलों को सूखाग्रस्त होने के बावजूद उसे सरकार ने अपनी राहत योजना में शामिल करने से मना कर दिया है.
छत्तीसगढ़ में वे सब साधन मौजूद हैं जिनकी बदौलत इसे एक विकसित राज्य बनाया जा सकता है. अकेले देवभोग की धरती पर ऊंचे दर्जे का इतना हीरा दबा है कि इससे होने वाली अकेली आय ही इसे कर-मुक्त राज्य बना सकता है. मध्यप्रदेश से अलग होने के बाद विकास के लिए आबंटन बढ़ा, राज्य का राजस्व बढ़ा लेकिन राज्य की आम जनता की आकांक्षाओं को सस्ता चावल देने तक ही सिमटाकर राज्य के प्रचुर संसाधनों के इस्तेमाल के मामले में नौकरशाह और राजनेता मनमाने फैसले ले रहे हैं. उन्हें विरोधों की परवाह इसलिए भी नहीं है कि ये विरोध उनके ख़िलाफ वोट में नहीं बदलेंगे. गरीबों के हिस्से में सस्ता चावल आया है और सम्पन्न राज्य के राजस्व की शक्ति को सत्ता से जुड़े लोग अपना हक समझकर इस्तेमाल कर रहे हैं.
-राजेश अग्रवाल

शनिवार, 27 जून 2009

आत्महत्याएं आईना नहीं किसानों की बदहाली का

तिल-तिल कर मरने वालों की सुध लेना ज़्यादा जरूरी
छत्तीसगढ़ में किसान आत्महत्याओं को केवल कर्ज़ नहीं चुका पाने का नतीजा मान लेना हमें एक ऐसे झूठ को आधार देना होगा, जो देर-सबेर धराशायी हो जाएगा और इसकी आड़ में वे नौकरशाह और राजनीतिज्ञ साफ बच निकलेंगे जो इनकी बदहाली के लिए जिम्मेदार हैं.
पिछले दो सालों से केन्द्रीय अपराध अन्वेषण ब्यूरो का वह आंकड़ा काफी चर्चा में है, जिसमें किसानों की आत्महत्या की दर छत्तीसगढ़ में महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश और कर्नाटक की ही तरह बताई गई है. रिपोर्ट कहती है कि साल में छत्तीसगढ़ के करीब 1500 किसान खुदकुशी कर रहे हैं. यानि औसतन हर दिन 4 से 5 किसान. ब्यूरो रिकार्ड के आधार पर कहा जा रहा है कि ये आत्महत्याएं किसान कर्ज नहीं चुका पाने के कारण करते हैं. कोई शक नहीं है कि ऐसे रिपोर्ट्स में छत्तीसगढ़ की विषमताओं पर चिंता है. लेकिन यदि हम यह स्थापित नहीं कर पाए कि किसानों की खुदकुशी कर्ज नहीं चुका पाने या खेती में जबरदस्त नुकसान होने के कारण हुई तो छत्तीसगढ़ की सरकार अपना पीठ थपथपाएगी कि देखो हमारे किसानों की हालत इतनी ख़राब नहीं है कि उन्हें मरना पड़े. छत्तीसगढ़ सरकार अपनी तारीफ में यह भी कहेगी कि हम देश भर में सबसे ज्यादा कीमत पर धान खरीदते हैं, किसानों को ब्याज मुक्त कर्ज़ दिलाते हैं, सिंचाई पम्पों को मुफ़्त बिजली देते हैं, एक-दो रूपये किलो में चावल देते हैं, किसान यहां आत्महत्या करेगा तो क्यों?
इन मौतों को राज्य के 33.5 लाख किसान परिवारों की बदहाली का आईना मान लेना भूल होगी. जिस पुलिस जांच के आधार पर हम इतने किसानों की आत्महत्या की बात कर रहे हैं, वही जांच यह भी कहती है कि ज्यादातर मौतें बीमारी से तंग आकर, पारिवारिक कलह, ख़राब दिमागी हालत, शराब की लत आदि से हुई. छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में एक जनवरी 2008 से 31 जुलाई 2008 के बीच 400 ऐसे लोगों ने खुदकुशी की, जिनका पेशा कृषि था. गांव में इंजीनियर, प्रोफेसर, साइंटिस्ट होते नहीं, किसान ही होते हैं. राज्य में खेती पर निर्भर लोगों की तादात 83 फीसदी है. इसलिये कोई स्वाभाविक मौत मरे या दुर्घटना में उनमें से ज्यादातर का पेशा किसानी ही दर्ज है. हरेक अपराध में खानापूर्ति करते वक्त मरने वाले का पेशा भी पुलिस लिखती है. गांव की साधारण जरूरतों को पूरा करने के लिए इनमें से कई लोग बैलगाड़ी किराये पर देने, किराना सामान की बिक्री करने, पंचर की दुकान चलाने, साप्ताहिक बाजार में जाकर सब्जियां बेचने, कपड़े सिलने, बिजली सुधारने, रेडियो ट्रांजिस्टर सुधारने जैसा काम भी करते हैं लेकिन उन्हें कहते किसान ही हैं.
छत्तीसगढ़ में किसानों की आत्महत्या को मजबूती से स्थापित करने के पक्ष में कहा जा सकता है कि पारिवारिक कलह, दिमागी हालत का बिगड़ना, शराब का आदी हो जाना भी खेती में नुकसान की वजह से और कर्ज़ लेने के कारण है. लेकिन कलह, दिमागी हालत और लत का केवल गरीबी से रिश्ता है नहीं. यह शहरों में और अमीर परिवारों में होने वाले हादसों की तरह है. अपवादस्वरूप एक या दो मामले ही अभी तक सामने आए हैं जिनमें किसान का बीज ख़राब हुआ और कर्ज़ से लद गया, तब उसने खुदकुशी कर ली. आत्महत्या की परिस्थितियां बेरोजगारी, प्रेम प्रसंगों, खेती से मिली आय को फिजूलखर्ची में उड़ा देने के चलते भी हैं.
दरअसल, छत्तीसगढ़ के किसान अलग मिजाज के हैं. उन्हें महाराष्ट्र, पंजाब की तरह कपास, दलहन आदि की व्यावसायिक खेती करनी नहीं आती. तीन चौथाई किसान- लघु व सीमान्त श्रेणी के हैं, जिनके पास 4 एकड़ से कम खेत हैं. वे साल में केवल एक बार धान की फसल लेते हैं. फसल-चक्र परिवर्तन के लिए राज्य बनने के बाद ही सरकारों ने कोशिशें की लेकिन किसान समझदार निकले. उन्होंने प्रयोग करने के बजाय पारम्परिक खेती पर ही भरोसा किया. सरकारी योजनाओं में उलझने के बजाय इन्हें खुद के सामर्थ्य पर भरोसा है. भले मुनाफा कम मिले लेकिन वे कर्ज उतना ही लेंगे, जितना फसल बर्बाद होने पर भी मजदूरी करके चुका सकें. सोसाइटियों में बहुत से कर्ज़ हैं पर वे डिफाल्टर हो जाने पर भी परवाह नहीं करते,देर-सबेर चुका देने या सरकार से माफी मिल जाने की उम्मीद लेकर खेती या मजदूरी करते रहते हैं. हो सकता है इसके लिए वे कुछ साल या कुछ महीनों के लिए दूसरे प्रदेशों में कमाने-खाने चले जाएं, हालांकि यह विवशता और कलंक ही है. किसान धान की जगह किसी दूसरी फसल पर हाथ आजमाने के बारे में नहीं सोचते. 3 फीसदी ब्याज दर सहकारी बैंकों में चल रहा है, फिर भी पिछले साल केवल 600 करोड़ रूपये बांटे जा सके. अब सरकार ने चुनावी घोषणा को पूरा करते हुए खेती के लिए बिना ब्याज कर्ज देने की योजना शुरू कर दी है, तब भी मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह की मानें तो यह आंकड़ा केवल 800 करोड़ तक पहुंच पाएगा. राज्य में करीब 48 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि है, जिनमें से सब्जी की खेती को भी जोड़ लिया जाए जिनमें गन्ना,फल आदि शामिल हैं, कुल रकबा 3 फीसदी से भी कम लगभग 1.5 लाख हेक्टेयर में दूसरी फसलें ली जाती हैं. धान जोखिम से परे खेती है. इसे बोने के लिए ज्यादातर खुद का श्रम किसान इस्तेमाल करते हैं. सामर्थ्य के अनुसार खाद बीज का इंतजाम कर लेता है. धान मुनाफा नहीं देता तो खास नुकसान भी नहीं होता. इन किसानों के पास ऐसे व्यवस्थित खेत नहीं है कि उन्नत बीज, असरकारी मंहगे खाद व सिंचाई सुविधा के साथ खेती करें. पारम्परिक खेती से उन्हें थोड़ा मिलता है, पर वह उन्हें फांसी पर लटकने की नौबत तक नहीं पहुंचना पड़ता. वे न मरै न मौटावै की स्थिति में हैं. यानि वह समृध्द भी नहीं है लेकिन मरने के कगार पर भी नहीं पहुंचा है. समृध्द नहीं हुए तो सरकार की नीतियां जिम्मेदार हैं, उनके लिए सिंचाई, बीज, खेतों को सुधारने व मिट्टी के उपचार का प्रबंध नहीं किया गया और किसान मरने से बच रहे हैं तो अपने सीमित साधन से असीमित श्रम करते हुए.
दरअसल, छत्तीसगढ़ के किसानों की दुर्दशा पर आत्महत्या के आंकड़ों को किनारे रखकर बात होनी चाहिए. जब तक ऐसा नहीं होगा उर्वरा व खनिज सम्पदा से भरपूर अमीर धरती के किसान गरीब क्यों हैं, इस सवाल का हल नहीं तलाशा जा सकेगा. देश में कृषि भूमि का औसत सिंचित रकबा 42 फीसदी है, लेकिन छत्तीसगढ़ के सरकारी आंकड़ों में यह 30 प्रतिशत है. हालांकि वास्तविक सिंचित रकबा इससे भी कम 17 से 19 फीसदी ही है. कुल मिलाकर यहां सिंचित भूमि राष्ट्रीय औसत से काफी कम है. राष्ट्रीय औसत 24 क्विंटल प्रति हेक्टेयर के मुकाबले छत्तीसगढ़ में धान उत्पादन का औसत केवल 13 क्विंटल है. सरगुजा और बस्तर जैसे आदिवासी इलाकों में तो यह केवल 5-6 क्विंटल है. शायद यही वजह है कि राज्य के 42 फीसदी परिवार गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन करते हैं. उन्हें सरकार सस्ता चावल मुहैया करा रही है.
आत्महत्या, झगड़ों व दुर्घटनाओं की प्रमुख वजह शराब
आत्महत्याओं के मामले में समाज कल्याण मंत्री लता उसेंडी का वक्तव्य ज्यादा महत्वपूर्ण है. वे मानती हैं कि छत्तीसगढ़ के गांवों में अधिकांश कमाऊ परिवार के लोग नशे की आदत के कारण अपनी आमदनी का ज्यादातर हिस्सा नशे पर खर्च कर देते हैं इससे वे अपने परिवार को पौष्टिक भोजन नहीं दे पाते, जिसके चलते बच्चे कुपोषण का शिकार होते हैं. सुश्री उसेंडी की चिंता गलत नहीं है, देश में सर्वाधिक 54 फीसदी कुपोषित बच्चे छत्तीसगढ़ में ही है, यह केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय का आंकड़ा कहता है. छत्तीसगढ़ बेवरेज कार्पोरेशन की सालाना रिपोर्ट में पिछले साल मार्च में बताया गया है कि देश में शराब की खपत पंजाब और हरियाणा के बाद सबसे अधिक छत्तीसगढ़ में है. इन परिवारों में मुखिया की आत्महत्या को किसान की आत्महत्या मानना तो ठीक नहीं होगा. छत्तीसगढ़ के अखबारों में हर रोज दो चार ख़बरे होती हैं, जिनमें लोग शराब के नशे में अपने ही सगे सम्बन्धियों पर हमले कर देते हैं. सड़क दुर्घटनाओं के ज्यादातर मामले छत्तीसगढ़ में शराब पीकर गाड़ी चलाने के कारण हो रहे हैं. यदि पारिवारिक कलह और बीमारी से भी कोई आत्महत्या हो रही है तो उसके जड़ में शराबखोरी मिल जाएगी.
भविष्य में खेती के चलते फांसी पर चढ़ेंगे किसान
रायपुर जिले में इस बार पिछले साल के मुकाबले इस साल 20 हजार एकड़ कम जमीन पर खेती हो रही है. नई राजधानी की योजना, नये उद्योग व कालोनियों के कारण यह परिस्थिति बनी है. राज्य के किसानों ने अभी तक उन्नत खेती पर ध्यान न दिया हो, लेकिन अब खेती की जमीन घट रही है और अपनी जमीन छीने जाने पर सरकार के ख़िलाफ आवाज़ उठा रहे हैं, उससे साफ है कि वे भविष्य में कम जमीन में ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए उन्नत खेती की ओर बढ़ेंगे. फिर वे मजबूरन धान बोना छोड़ेगे और कम जमीन में पंजाब महाराष्ट्र की तरह ज्यादा मुनाफा पाने बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की बीज खरीदेंगे और फसल तैयार कर उन्हें बेचने के लिए बड़ा कर्ज लेंगे. छत्तीसगढ़ सरकार ने एक लाख करोड़ एमओयू कर रखा है. यहां जिन्दल, टाटा-एस्सार जैसी दर्जनों कम्पनियां मंडरा रही हैं जो किसानों को निगलने के लिए उतारू हैं. रायगढ़ से लेकर बस्तर तक किसानों की जमीन बलात् जन सुनवाई कर हड़पी जा रही है. उपजाऊ खेतों पर चिमनियां रोपी जा रही हैं. आसार दिखते हैं कि भविष्य में ये सब आत्महत्याओं, हत्याओं के कारण बनेंगे. मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह हाल ही में वित्त आयोग के साथ हुई बैठक में छत्तीसगढ़ में ज्यादा जंगल होने को अभिशाप बता चुके हैं. उनका कहना है कि यहां के संसाधनों का इस्तेमाल कर गरीबों को बांटने में पर्यावरण व वन मंत्रालय रोड़ा लगा देता है क्योंकि यहां का 44 फीसदी हिस्सा जंगलों से घिरा है. मुखिया के इस बयान से अनुमान लगा सकते है कि भविष्य का छत्तीसगढ़ कैसा होगा. सरकार अभी तक नहीं बता पाई कि दर्जनों पावर प्लांट, स्पंज आयरन फैक्ट्रियों व खदानों के आवंटन से आम आदमी और बेरोजगार युवकों को क्या फायदा हुआ. उन्हीं की पार्टी के विधायक देवजी भाई पटेल राजधानी से लगे सिलतरा में स्पंज आयरन फैक्ट्रियों के चलते बढ़े प्रदूषण के खिलाफ हज़ारों किसानों के साथ आंदोलन चलाकर जरूर बता रहे हैं कि यहां के खेतों की मिट्टी और नदी तालाब का पानी कितना बर्बाद हो गया.
किसानों की भूमि से जुड़ी और समस्याएं
छत्तीसगढ़ में सर्वाधिक हत्याएं राजस्व मामलों को लेकर होती है, यह पुलिस के एक आला अधिकारी का कहना है. लेकिन अब आत्महत्याओं का दौर भी शुरू हो गया है. बीते 21 मई को बैंकुंठपुर थाने के छेलिया ग्राम में 10 साल के एक बच्चे की हत्या पत्थर मार-मार कर कर दी गई. 22 मई को इसी थाने में एक और बुजुर्ग की उसके ही रिश्तेदारों ने हत्या कर दी. उसके पिता के साथ आरोपी का जमीन विवाद चल रहा था. रायपुर के पास सिमगा में पुलिस ने माता, पिता और सगे भाई की हत्या के आरोप में बेटे समेत 22 लोगों को पुलिस ने अप्रैल माह में गिरफ्तार किया. जांजगीर जिले में दो परिवारों के बीच हुए विवाद में 4 लोगों की हत्या इसी साल हो गई. छत्तीसगढ़ के किसान जमीन के छोटे-छोटे टुकड़ों के लिए लड़ रहे हैं क्योंकि अब उनके बीच पुरखों की जमीन का बंटवारा होता जा रहा है और खेती से उनकी आय सीमित होती जा रही है. जांजगीर जिले के सरहर ग्राम में एक बुजुर्ग किसान फूलसाय की जमीन सरकार ने सड़क बनाने के लिए अधिग्रहित की थी, उसे मुआवजा सालों नहीं मिला. जगह-जगह फरियाद कर निराश हो जाने के बाद वह बीते 13 मई को आत्महत्या करने के इरादे से कलेक्टोरेट पहुंच गया. अफसरों ने उन्हें मनाया, आश्वासन दिया कि एक हफ्ते में मुआवजा मिल जायेगा. लेकिन पखवाड़े भर के इंतजार के बाद भी मुआवजा नहीं मिला. 30 मई को उस बुजुर्ग किसान के प्राण पखेरू उड़ गए. मुआवजा तो नहीं मिला-मौत मिल गई. दरअसल वह अपनी सांस की बीमारी का इलाज कराने के लिए मुआवजे की राशि हर हालत पाना चाहता था. हाल ही में राज्य में सुरेश यादव के मामले ने भी तूल पकड़ा. राजधानी से केवल 20 किलोमीटर दूर सिंगारभाठा ग्राम के सुरेश की आत्महत्या ने किसानों को लेकर सरकार की संवेदनहीनता और भ्रष्ट राजस्व अमले की करतूत को उजागर कर दिया. कांग्रेस ने इसे लेकर पैदल मार्च किया और भाजपा सरकार को कटघरे में खड़ा किया. दबाव में आई सरकार ने उसके परिवार को मुआवजा दिया. सुरेश की 9 साल पहले खरीदी गई जमीन तहसीलदार और पटवारियों ने रिश्वत लेने के बाद भी उसके नाम नहीं चढ़ाई. पूरे प्रदेश में राजस्व अमले का यही हाल है. ई-गवर्नेंस के लिए अपनी पीठ थपथपा रही सरकार का यह हाल है. कृषि मंत्री चंद्रशेखर साहू कहते हैं कि सरकार अब पूरे प्रदेश में राजस्व दस्तावेजों को सुधारने के लिए अभियान चलाएगी. आदिवासी इलाकों में स्थिति और बदतर है. रायपुर जिले में जहां सिंचाई का प्रतिशत 46 फीसदी है वहीं रायगढ़ जिले में केवल 7 फीसदी, सरगुजा और बस्तर के सारे जिले केवल 3 फीसदी सिंचित हैं. रायगढ़-जशपुर से टमाटर की खेती खत्म हो चुकी है, कभी यहां फूड प्रोसेसिंग प्लांट लगाने की बात की जाती थी लेकिन अब इसकी कोई गुंजाइश नहीं बची है. नक्सल प्रभावित बीजापुर जिले में माओवादी हिंसा व सलवा जुड़ूम अभियान से सबसे ज्यादा नुकसान खेती को हुआ. जिले के 738 गांवों के 28 हजार से ज्यादा किसान अपना घर बार खेत छोड़कर पलायन कर चुके हैं. वे या तो सरकारी कैम्पों में हैं अथवा सीमावर्ती राज्यों में चले गए हैं. नक्सली हिंसा के चलते 30 हजार हेक्टेयर से अधिक भूमि बंजर में तब्दील हो रही है.
छत्तीसगढ़ के किसानों की दुर्दशा आत्महत्या करने वाले किसानों के घर में झांकने से जितना नहीं मिलेगा, उससे ज्यादा कहीं गांवों, खेतों. जंगलों और सरकारी फाइलों में भटकने से मिलने वाला है. अलग-अलग कारणों से की गई आत्महत्याओं को अलग रखें और जिंदा रहकर तिल तिल मर रहे किसानों की सुध लेने सरकार को मजबूर किया जाए.

मंगलवार, 9 जून 2009

अबूझमाड़ को बूझना इतना आसान भी नहीं

नक्सलियों से सीधी लड़ाई के लिए सरकार ने तीन दशक से बंद अबूझमाड़ का मोर्चा खोल दिया है. वस्त्रविहीन व कंदमूल खाकर जीने वाले आदिम गोंड़ जाति के बीच अब आम लोगों का सीधा सम्पर्क हो सकेगा. इससे उनकी जीवन शैली और संस्कृति पर ख़तरे तो दिखाई दे रहे हैं, लेकिन सरकार को अपने इस फैसले के पीछे नक्सली हिंसा की आग से झुलस रहे बस्तर में शांति की नई बयार बहने की उम्मीद भी दिखाई दे रही है.
वैसे तो लोगदेश में कहीं भी आने-जाने के लिए आज़ाद हैं लेकिन बस्तर का अबूझमाड़ दुर्गम पहाड़ियों और घने जंगलों से घिरा एक ऐसा गलियारा है जहां पिछले 3 दशकों से आम लोगों को जाने की मनाही थी. अबूझमाड़ में आम लोगों के प्रवेश पर तत्कालीन मध्यप्रदेश सरकार ने रोक तब लगाई गई थी, जब 80 के दशक में बीबीसी के कुछ पत्रकारों ने यहां पहुंचकर गोंड़ महिलाओं की अर्धनग्न तस्वीरें खींचीं और उनके विदेशी अख़बारों में छप जाने से हंगामा मचा. बस्तर संभाग के तीन जिलों दंतेवाड़ा, नारायणपुर व बीजापुर के 4000 वर्गकिलोमीटर के दायरे में फैले 237 गांवों के 26 हज़ार आदिवासी अपनी ही विशिष्ट आदिम संस्कृति में जीते हैं. वे जानवरों का शिकार करते हैं, कंदमूल खाते हैं और पेड़ों की छाल पहनते हैं. हालांकि बीते दो दशकों से वे हाट-बाज़ारों में जाकर बिना सिले हुए कपड़े भी पहनने लग गए हैं. जिलाधीश से अनुमति लेकर नारायणपुर स्थित रामकृष्ण मिशन ने यहां शिक्षा व स्वास्थ्य की दिशा में भी कुछ काम किया है. लेकिन अबूझमाड़ का ज्यादातर हिस्सा बीते 3 दशकों से अबूझ पहेली है. यहां के आदिवासी जंगल, नदी, पहाड़ के बीच ही जीवन बिताते हैं. ज्यादातर हिस्सों में सरकार की कोई योजना नहीं पहुंच पाई है. न इन्हें सरकारी राशन मिलता है न पेंशन. न इन गांवों में सड़कें है और न ही बिजली. अबूझमाड़ के सघन वनों के शुरूआती कुछ गांवों में तो समय-समय पर सरकार के नुमाइंदो व सुरक्षा बलों ने प्रवेश किया है पर अधिकतर हिस्से अभी भी रहस्यमयी बने हुए हैं. सन् 2001 में छत्तीसगढ़ राज्य का गठन होने के बाद अबूझमाड़ के सर्वेक्षण के लिए कई प्रयास हुए हैं. गांवों की संख्या तो सेटेलाइट के चित्रों से निर्धारित की गई है पर इन गांवों तक सरकार भी नहीं पहुंच पाई है. सन् 2005 में प्रदेश की भाजपा सरकार ने एक निजी संस्था को इस क्षेत्र के सर्वेक्षण की जिम्मेदारी दी थी लेकिन नक्सलियों ने उन्हें घुसने नहीं दिया. बस्तर के सांसद बलिराम कश्यप की अध्यक्षता में भी एक बार समिति बनाई गई लेकिन यह समिति भी अबूझमाड़ को बूझने में सफल नहीं हो पाई. परिणामस्वरूप यह अबूझ इलाका हिंसक नक्सलियों के लिए स्वर्ग बना हुआ है. पीडब्ल्यूजी की रीजनल इकाई ने तो 1980 में बकायदा इसे अपना मुख्यालय घोषित कर दिया था. नक्सली इन इलाकों में छिपकर अपनी योजनाएं तैयार करते हैं और यहां से निकलकर पूरे बस्तर में तांडव मचाते हैं. बीते कुछ सालों में नक्सलियों ने सुरक्षा बलों व नेताओं पर हमले तेज किए हैं. नक्सलियों की बढ़ती ताक़त को वैसे तो सरकार उनकी हताशा का नाम देती है, लेकिन सच्चाई यही है कि उनसे मुकाबला करने में सरकार के पसीने छूट रहे हैं. नक्सलियों के विरोध के लिए आदिवासियों के बीच चलाया जा रहा सलवा जुड़ूम आंदोलन भी कारगर साबित नहीं हो रहा है. भारी संख्या में सुरक्षा बलों की तैनाती भी उनको रोक पाने में कारगर नहीं है. हाल के दिनों में नक्सलियों ने धमतरी और राजनांदगांव जिले के नये इलाकों में सुरक्षा बल के जवानों व मतदान कर्मियों की सामूहिक हत्याएं की है. कई सलवा जुड़ूमियों व कांग्रेस-भाजपा नेताओं को उन्होंने मार डाला है. इन घटनाओं से सरकार की जबरदस्त किरकिरी हो रही है. छत्तीसगढ़ के गृह मंत्री ननकीराम कंवर को तो कहना पड़ा है कि यदि दो साल के भीतर नक्सली समस्या का अंत नहीं हुआ तो वे अपने पद से इस्तीफा दे देंगे. विरोधी दल कांग्रेस ने इस बयान पर कहा है कि यह बात मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह को कहनी चाहिए, क्योंकि प्रदेश के मुखिया होने के नाते पहली जवाबदारी उनकी ही बनती है.
राजनैतिक दलों के अतिरिक्त सरकार पर औद्योगिक घरानों की ओर से भी दबाव है. टाटा और एस्सार जैसी बड़ी कम्पनियों को बस्तर के बहुमूल्य खनिजों के उत्खनन और इस्पात संयंत्र लगाने के लिए हजारों एकड़ जमीन दी गई है, लेकिन नक्सलियों के हमले उन्हें काम नहीं करने दे रहे हैं. मुख्यमंत्री कहते हैं कि पूरी दुनिया जब 21वीं सदी में पहुंच गई है तो नक्सली बस्तर के आदिवासियों को उनके मूलभूत अधिकारों से वंचित कर उन्हें 19वीं सदी में रखना चाहते हैं. नक्सली कहते हैं कि जंगल, पानी, जमीन सब उन आदिवासियों का है जो यहां रहते हैं. चंद पूंजीपतियों के फायदे के लिए आदिवासियों को उजाड़ने की साजिश वे नहीं चलने देंगे. नक्सलियों ने बस्तर में हस्तक्षेप के ख़िलाफ मुख्यमंत्री सहित यहां के कई मंत्री, नेताओं के नाम मौत का फरमान जारी कर रखा है.
बस्तर विकास प्राधिकरण की इसी हफ़्ते मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह की अध्यक्षता में हुई बैठक में अबूझमाड़ को आम लोगों के लिए खोलने का निर्णय लिया गया. सरकार अब नक्सलियों को उनके सुरक्षित ठिकाने पर घुसकर घेरना चाहती है. अभी तक सरकार के नहीं पहुंचने के चलते शायद अबूझमाड़ के आदिवासी नक्सलियों को ही सरकार मानते रहे हों लेकिन अब उन्हें एक दूसरी सरकार का भी सामना करना पड़ेगा. अबूझमाड़ के दरवाजे खोल दिए जाने के बाद भी सरकारी अमले व सुरक्षा बलों को दुरूह भौगोलिक संरचना के चलते इसे भेद पाना आसान नहीं है. वैसे भी उनके लिए कभी इस इलाके में जाने के लिए मनाही तो रही नहीं है. कुछ सालों के बाद मालूम हो सकेगा कि अबूझमाड़िया जन-जीवन में बाकी दुनिया की दख़ल का क्या असर पड़ेगा, फिलहाल, सरकार ने नक्सलियों से निपटने के लिए एक और दांव खेल दिया है.

मंगलवार, 26 मई 2009

हिंसा व क्रूरता के खेल में बेजु़बान खिलौने ये आदिवासी बच्चे

बस्तर से लेकर सरगुजा तक छत्तीसगढ़ में आदिवासी बच्चों का बाज़ार लगा है. इस बाजार में लड़के भी हैं और लड़कियां भी. ये हथियार उठाकर मोर्चा लेने के लिए भी राज़ी हैं और भारी मशीनों में दबकर जान गंवाने के लिए भी. इन बच्चों की मांग नक्सलियों को भी है और पुलिस को भी. दिल्ली, पंजाब, हरियाणा में है और कर्नाटक, गोवा, तमिलनाडु में भी. ये आदिवासी उनके बच्चे हैं जो पीढ़ियों से अपने महुआ-तेंदू का जंगल और अपनी संस्कृति को बचाने के लिए अपने प्राणों की आहुति देता आ रहा है. उनकी लड़ाई मुगलों, मराठा शासकों से हुई, वे अंग्रेजों से भी लड़े, लेकिन अब शायद ये थक चुके हैं इनके बच्चे लड़ाई शुरू करने से पहले ही हार चुके हैं. दशकों से नहीं देखा गया आदिवासियों को अपना ठिकाना छोड़ते. जिस जंगल को वे स्वर्ग समझते रहे हैं, विकास की नई परिभाषा, उपद्रव व अतिक्रमण के नये तेवरों के चलते वह उन्हें डराने लगा है. बस थोड़ा बरगलाने, झांसा देने की जरूरत है फिर स्वभाव से साहसी और शरीर से मजबूत लेकिन मासूम और हताश इन आदिवासी लड़के-लड़कियों को कोई भी अपना शिकार बना लेता है. सभ्य समाज के खिलाड़ियों के लिए ये इतने खरे खिलौने हैं कि निर्ममता की सारी हदें पार करने के बाद भी वे चीखते-चिल्लाते नहीं. कभी इनकी पीड़ा में किसी कोने से आवाज उठती भी है तो वह अनसुनी कर दी जाती है.
आंध्रप्रदेश में बीते 6 अप्रैल को 14 साल के मुकेश की मौत उसके सिर पर बोरिंग मशीन की एक राड गिरने से हो गई. वह उन दर्जन भर बच्चों में शामिल था जो धनतुलसी गांव के नरेन्द्र और गंगदेव नाम के दलालों के साथ कांकेर के पीढा़पाल छात्रावास से अपने मां-बाप को. बताए बगैर 6 माह पहले अचानक भाग निकले थे. उन्हें अच्छी नौकरी व नियमित तनख्वाह का झांसा दिया गया, लेकिन वहां उन्हें बोर खुदाई करने वाले काम में झोंका. वहां दिन रात ट्रकों के साथ रहना पड़ता और लगातार कई-कई दिनों तक भारी भरकर औजारों से काम करना होता था. मुकेश की मौत से घबराकर साथ गया सन्तू भागकर किसी तरह पीढ़ापाल लौटा. उसके आने पर पता चला तुलतुली, मर्रापी आदि गांवों से लापता सारे बच्चे इन्हीं दलालों के साथ गये थे और वहां बोरिंग चलाने वाले एक ठेकेदार के चंगुल में हैं. कांकेर कलेक्टर शहला निगार ने अब बाकी बच्चों को लाने के लिए एक टीम तैयार की है और दोनों दलालों के ख़िलाफ रिपोर्ट दर्ज कर उनकी तलाश की जा रही है.
सरगुजा जिले के प्रेमनगर के 5 नाबालिगों को लखनपुर का बशीर खान काम दिलाने नोएडा उत्तरप्रदेश ले गया और उन्हें एक गन्ना उत्पादक के पास बेचकर आ गया. इनमें से एक अशोक किसी तरह वहां से भागकर अपने गांव साल्ही पहुंचा. उसने बताया कि फार्म हाऊस का मालिक कहता था कि हमें बशीर ने एकमुश्त रकम लेकर उसके पास छोड़ा है. अशोक ने बताया कि उनसे दिन-रात काम कराया जा रहा था और भोजन भी समय पर नहीं मिलता था. मजदूरी की तो बात ही नहीं थी. प्रेमनगर पुलिस ने दलाल बशीर खान के ख़िलाफ अपराध कायम किया है. अशोक के साथ बाकी बच्चों को छुड़ाने के लिए एक टीम नोएडा रवाना की गई है.
छत्तीसगढ़ का छत कहे जाने वाले मैनपाट की पहाड़ियों में बसे गांवों से भी नाबालिग लड़के उठाकर ले जाए जा रहे हैं. नर्मदापुर, सतानादर, पैगर आदि गांवों के बीसियों बच्चों का बीते कई सालों से पता नहीं. इनमें से कुछ घरेलू नौकर बना गये तो कुछ को उत्तर प्रदेश के कालीन उद्योग में खपाया गया है. 6 माह पहले भी 9 बच्चों को दलालों ने फांसकर मिर्जापुर के एक ईंट भट्ठे में पहुंचा दिया. नर्मदापुर पुलिस इनमें से 7 को वहां से छुड़ाकर ला चुकी है, लेकिन दो बच्चे गुड़्डू और चीतम वहां नहीं मिले. 10-12 साल के इन बच्चों के बारे में अब तक कुछ पता नहीं चला. ईंट भट्ठा मालिक ने साफ इंकार कर दिया कि ये दोनों वहां काम करते थे.
23 सितम्बर 08 को रायपुर रेलवे स्टेशन पर दो दर्जन आदिवासी बच्चों को बहदवास हालत में देखकर वहीं मौजूद कुछ स्थानीय युवकों के कान खड़े हुए. मालूम हुआ कि सब अबूझमाड़ इलाके से यहां तक पहुंचे थे. सरकार और उसकी विकास योजनाएं तो वहां तक पहुंच नहीं पाई लेकिन दलाल पहुंच गये. दलाल सम्पतलाल स्टेशन पर ही दबोच लिया गया. इन बच्चों को चैन्नई के कपड़ा कारखाने में काम दिलाने झांसा दिया गया था. उन्हें सफर करते 12 घंटे बीत चुके थे और 24 घंटे का रास्ता बाकी था लेकिन दलाल ने उन्हें खाने-पीने को कुछ नहीं दिया. सम्पत के इस रवैये से भूखे-प्यासे कुछ बच्चों का माथा ठनका और वे धमतरी से ही दलाल का साथ छोड़कर वापस गांव भाग गये. दलाल वहां से 36 बच्चों को लेकर निकला था. एक दो को छोड़ बाकी सब की उम्र 16 साल से नीचे थी. बच्चों ने बताया कि उन्हें सम्पत ने एक कपड़ा फैक्ट्री में 2500 रूपये माह की नौकरी दिलाने का वादा किया है. बच्चे अगले दिन पुलिस व श्रम विभाग की मदद से गांव लौटा दिये गए.
बीते 17 मार्च को नक्सलियों ने एक 9वीं कक्षा के छात्र सूरज की गोलियों से भूनकर हत्या कर दी. कांकेर जिले के कोयलीबेड़ा का यह बालक परीक्षा देने के लिए घर से निकला कि रास्ते में नक्सलियों ने उन्हें घेरा. बच्चों से दुश्मनी! तथ्य यह है कि कुछ माह पहले सूरज के पिता की हत्या भी नक्सलियों ने पुलिस की मुखबिरी करने के संदेह में कर दी थी. क्या बच्चे भी पुलिस के लिए मुखबिरी कर रहे हैं?
बीबीसी न्यूज चैनल के कुछ पत्रकार पिछले साल दिल्ली से बस्तर पहुंचे. दंतेवाड़ा के भांसी थाने में उन्हें जब 21 साल के दिलीप ने बताया कि वह पिछले 7 साल से नक्सलियों से लोहा ले रहा है, तो सुनकर वे दंग रह गये. 14 साल की उम्र में ही वह पुलिस में भर्ती कर लिया गया था. दिलीप कहता है कि जब वह 5वीं पढ़ता था तो नक्सली उसे उठाकर ले गए और वह उनके जन-जागरण जत्थे में नाचने गाने लगा. बाद में उसने पाया कि नक्सली पैसे लेकर हत्याएं करते हैं और आदिवासी लड़कियों से बलात्कार करते हैं. उसे उनसे घृणा हो गई और खुद को पुलिस में सरेंडर कर दिया. पुलिस ने उसे बाल आरक्षक की नौकरी दे दी और 14 साल की उम्र से ही दिलीप देश के सबसे बड़े आंतरिक युध्द में एक सिपाही है. छत्तीसगढ़ पुलिस में बाल आरक्षक सिर्फ वे बनाए जाते हैं, जिनके अभिभावक की पुलिस विभाग में रहते हुए असमय मौत हो जाए, लेकिन पुलिस ने आत्मसमर्पण करने वाले बच्चे को ही हथियार थमा दिया.
बस्तर में नक्सलियों और पुलिस फोर्स द्वारा बच्चों का हिंसक गतिविधियों के लिए हो रहे इस्तेमाल को लेकर ह्मूमन राइट्स वाच ने राजधानी रायपुर में बीते साल सितम्बर में 58 पृष्ठों की एक विस्तृत रिपोर्ट जारी की. इसमें बताया गया था कि बड़ी संख्या में नक्सलियों से निपटने के लिए पुलिस ने आदिवासी नाबालिगों को विशेष पुलिस अधिकारी (एसपीओ) बनाकर हथियार सौंपा है. पुलिस अधिकारियों ने इसके जवाब में कहा कि ऐसा जानबूझकर नहीं किया गया है. कुछ एक नाबालिग थे, पर इसकी वजह सिर्फ ये है कि उनकी जन्मतिथि से सम्बन्धित दस्तावेज हासिल नहीं हुए. जैसे ही पता चला, उन्हें हटा दिया गया. इनकी संख्या पुलिस के मुताबिक करीब 150 थी. लेकिन 'वाच' का दावा है कि अब भी बड़ी संख्या में एसपीओ के रूप में नाबालिग काम कर रहे हैं और सशस्त्र नक्सलियों से लोहा लेने के लिए उन्हें मोर्चे पर भेजा जा रहा है. सर्चिंग आपरेशनों में उन्हें सामने रखा जा रहा है. नाबालिग एसपीओ की सही संख्या को लेकर तो 'वाच' ने कोई दावा नहीं किया लेकिन यह बताया गया कि नक्सलियों के साथ मुठभेड़ में मारे गए अनेक एसपीओ नाबालिग थे, यह प्रत्यक्षदर्शियों ने स्वीकार किया है.
बच्चे सीखते हैं बारूदी सुरंग बिछाना
दूसरी तरफ नक्सली भी हिंसा व जोखिम भरे काम में बच्चों को पिछले एक दशक से झोंक रहे हैं. इन्हें न केवल खुफिया जानकारी इकट्ठा करने के लिए तैनात करते हैं बल्कि भूमिगत सुरंग बिछाने और बारूद बनाने का प्रशिक्षण दिया जाता है. नक्सलियों ने बाल संघम का गठन भी कर रखा है, जिसमें 6 से लेकर 12 साल के बच्चे शामिल किये गये हैं. 12 साल से ज्यादा उम्र के बच्चों को राइफल चलाने की ट्रेनिंग दी जाती है. कई बच्चे नुक्कड़ नाटकों में रखे गए हैं, बाद में उन्हें हथियार थमा दिया जाता है. नक्सली बच्चों को अपने दस्ते में शामिल करने के लिए तमाम हथकंडों का इस्तेमाल करते हैं. पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी ने बीते साल 2 सितम्बर से 8 सितम्बर तक नक्सली सप्ताह मनाया. इस दौरान उन्होंने जगह-जगह बैठकें ली थी और परचे चस्पा किए . परचों में उन्होंने हर घर से एक सदस्य को जनवादी संघर्ष में शामिल होने की अपील की. जाहिर है यह अपील नये लड़कों के लिए ही थी. इसी साल 8 जनवरी को सिंगावरम मुठभेड़ में 17 लोगों की मौत हुई, जिनके बारे में पुलिस का कहना है कि ये नक्सली हैं. इनमें 3 की उम्र 16 साल से कम थी. इसी साल जनवरी में पत्रकारों से बात करते हुए छत्तीसगढ़ के डीजीपी विश्वरंजन ने कहा कि नक्सली बडी़ संख्या में बच्चों की भर्ती कर रहे हैं. इनमें लड़कियां भी हैं. उन्होंने बताया कि नक्सलियों की अलग-अलग शाखाओं में शामिल लोगों की संख्या 45 हजार है, जिनमें एक तिहाई लड़कियां हैं और ज्यादातर नाबालिग रहते ही दस्ते में शामिल किए गये.
बस्तर में नक्सली हिंसा और उसके बाद शुरू हुए सलवा जुड़ूम आंदोलन के बाद करीब 500 गांव उजड़ चुके हैं. इसका सबसे बुरा प्रभाव आदिवासी बच्चों की शिक्षा पर पड़ा है. सलवा जुड़ूम के बाद बने कुछ कैम्पों में तो पढ़ाई हो रही है पर बड़ी संख्या में स्कूलों, छात्रावासों को नक्सलियों ने ढ़हा दिया है. सरकारी आंकड़े ही बताते हैं कि इन गांवों की आबादी लगभग 3 लाख थी. लेकिन कैम्पों में रहने वालों की संख्या 60 हजार से अधिक नहीं है. अनेक आंध्रप्रदेश के सीमावर्ती गांवों में चले गए. इनके बच्चों के लिए शिक्षा तो दूर की बात है, पेट भरने का साधन भी नहीं है. इन सबके चलते बच्चों का हिंसक और जोखिम से भरे कामों में इस्तेमाल आसान हो गया है.
व्यथा सरगुजा-जशपुर की
दिल्ली, मुम्बई की पाश कालोनियों में जशपुर, बगीचा, कुनकुरी की लड़कियों को झाड़ू-पोछा लगाते देखा जा सकता है. अधिकांश उरांव आदिवासी हैं, जो इसाई धर्म अपना चुके हैं. राज्य महिला आयोग के अनुसार जशपुर व सरगुजा जिले से काम की तलाश में बाहर जाने वाली लड़कियों की संख्या 19000 है. रायपुर के एनजीओ 'फोरम फार फैक्ट फाइंडिंग डाक्यूमेन्टेशन एण्ड एडवोकेसी' के सुभाष महापात्र के अनुसार 7021 लड़कियां ऐसी हैं, जिन्हें छत्तीसगढ़ से बाहर ले जाकर या तो बेच दिया गया या वे बंधक बनाई ली गईं. कुनकुरी में ग्रामीण विकास केन्द्र की सिस्टर सेवती पन्ना, एस्थेर खेस इत्यादि ने कुनकुरी व आसपास के गांवों में घूमकर 3000 से अधिक बच्चों की सूची तैयार की है, जिन्हें दलाल बहला-फुसलाकर दिल्ली, गोवा, मुम्बई आदि ले गए. इनमें 90 फीसदी लड़कियों की उम्र 16 साल से कम है. कुछ तो स्कूल जाने के लिए घर से निकलीं और बस्ते को खेत में फेंक दिया, फिर दलालों के साथ दिल्ली निकल गईं. ये अमीरों की कोठियों में 24 घंटे रहती हैं और सुबह से देर रात तक काम करती हैं. इन्हें ठीक तरह से न कपड़े मिलते न खाना. इनसे मारपीट की जाती है और शारीरिक शोषण भी किया जाता है. कई लड़कियां यहां गर्भवती होकर लौटीं और अनेक आईं गंभीर बीमारियों को साथ लेकर. कुछ लड़कियों की दिल्ली में ही मौत हो गई और परिजनों को इसका पता ही नहीं चला. सिस्टर्स के पास जानकारी है कि इनमें से 12 लड़कियां विदेशों में भी भेज दी गई. दिल्ली में करीब 150 प्लेसमेन्ट एजेंसियां सक्रिय हैं, जिनके एजेंट अक्सर सरगुजा, कुनकुरी इलाकों में घूमते दिखाई देते हैं. दिल्ली ले जाकर इनके नाम बदल दिये जाते हैं ताकि जब मां-बाप या पुलिस उन्हें ढूंढने के लिए पहुंचे तो उनका पता-ठिकाना ही न मिले.
सभ्य समाज का नकारात्मक हस्तक्षेप
दक्षिण बस्तर से लेकर उत्तर सरगुजा तक के आदिवासी बच्चों के साथ क्रूरतापूर्ण बर्ताव के पीछे बनी परिस्थितियां अलग-अलग हैं लेकिन सब जगह वजह एक ही है कि जंगलों में अपनी खास जीवन शैली के आदी आदिवासियों के विकास के नाम पर सभ्य माने जाने वाले समाज ने उनकी मंशा के ख़िलाफ हस्तक्षेप किया है. छत्तीसगढ़ में पलायन दशकों से होता रहा है. जांजगीर, धमतरी, बिलासपुर जिलों के अनुसूचित जाति व पिछड़े वर्ग के लोग हर साल फसल काटने के बाद परिवार लेकर उत्तर भारत के विभिन्न राज्यों के ईंट भट्ठों में काम करने निकलते हैं और बारिश शुरू होते ही लौट आते हैं. शहरी वातावरण से ये घुले मिले हैं. वहां जाकर ये ज्यादा कमाते हैं और घर बनाने, बच्चों का ब्याह रचाने के लिए पैसे लाते हैं. इनका भी वहां शोषण होता है. तय मजदूरी से कम दी जाती है. काम के घंटे तय नहीं होते और रहने खाने का इंतजाम ख़राब होता है. महिलाएं हवस का शिकार होती हैं. पुरूषों को बंधक बना लिया जाता है. छत्तीसगढ़ के लिए यह कलंक ही है. राज्य सरकार सस्ते चावल की योजना को पलायन रोकने का एक जरिया मानती है. इस चुनाव में भाजपा ने छत्तीसगढ़ को पलायन मुक्त राज्य बनाने का वादा किया था. लेकिन हिंसा और क्रूरता के शिकार बच्चों के लिए सरकार की कोई चुनावी घोषणा नहीं है. शायद सरकार समझती है कि बस्तर, रायगढ़ और सरगुजा के आदिवासियों का भला यहां मौजूद खनिज सम्पदाओं व पानी के दोहन से ही होगा. नक्सल हिंसा इससे खत्म होगी, बेरोजगारी खत्म होगी तो बस्तर के बच्चे हथियार उठाने व राज्य से बाहर जाकर मशीनों के नीचे दबने के लिए विवश नहीं होंगे. नक्सली इसका विरोध करते हैं. दोनों ही पक्षों का दावा है कि उनकी सोच ही आदिवासियों का भला करेगी और इसके चलते बस्तर में हिंसक संघर्ष जारी है. इस संघर्ष में जो बच्चे शामिल हो रहे हैं वे बे-मौत मारे जा रहे हैं और जो बस्तर से भाग रहे हैं वे भी मर रहे हैं. प्रेमनगर, मैनपाट इलाकों से जोखिम का काम लेने के लिए जिन बच्चों को राज्य के बाहर बेचा जा रहा है, उन इलाकों में बाक्साइट का उत्खनन हो रहा है, नये पावर प्लांट लगाए जा रहे हैं. जशपुर-सरगुजा इलाके में मिशनरियों ने सेवा और शिक्षा के प्रसार के साथ इसाई धर्म का भी विस्तार किया. आदिवासियों ने इनसे रहन सहन का नया तरीका सीखा. दो दशक पहले कुनकुरी के उरांव आदिवासी खूब पढ़ाकू थे. यह देश का सबसे ज्यादा प्रशासनिक अधिकारी देने वाला इलाका था. लेकिन यहां बचे आदिवासी पढ़ लिख कर बेरोजगार हो गये हैं. खेती टुकड़ों में बंट गई है. उद्योग धंधे हैं नहीं. इसाई कल्चर अपनाने लेने के बाद अच्छा खाना और पहनावा चाहते हैं. उनके बीच भयंकर द्वन्द मचा है. इनमें से सैकड़ों लड़कियों ने जोखिम जान लेने के बाद भी महानगरों में जाकर काम तलाशना ठीक समझा. फिलहाल तो नाबालिग आदिवासियों के इस त्रासदी से निकल बचने की कोई सूरत दिखाई नहीं देती है. शायद आने वाले दिनों में सरकार व जागरूक समुदाय मिलकर कोई रास्ता निकाले.

शनिवार, 7 मार्च 2009

छत्तीसगढ़िया क्यों नहीं बोलता छत्तीसगढ़ी?

विधानसभा के बीते सत्र में अध्यक्ष धरमलाल कौशिक ने विधायकों को छूट दी कि वे छत्तीसगढ़ी में सवाल करें, मंत्री उनका जवाब भी छत्तीसगढ़ी में देंगे. लेकिन हैरानी हुई कि तकरीबन 20 दिन चले इस सत्र में हजार से ज्यादा सवालों के बीच छत्तीसगढ़ी गायब थी. तीसरी विधानसभा के पहले सत्र में 90 में से केवल 10 विधायकों ने छत्तीसगढ़ी में शपथ ली. यह आईना है, छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़ी की हैसियत का. जिस तरह ज्यादा पढ़े-लिखे हिन्दी भाषाभाषी हिन्दी जानते हुए भी आपस में अंग्रेजी में बात करके खुद को ज्यादा सभ्य साबित करने की कोशिश करते हैं कमोबेश यही हाल छत्तीसगढ़ियों का है. छत्तीसगढ़ में इन दिनों नारा चल निकला है, छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया! लेकिन सबसे बढ़िया छत्तिसगढ़िया वे हैं, जो हिन्दी या अंग्रेजी बोलते हैं.
विधानसभा चुनाव से ठीक पहले बीते साल विधानसभा ने सर्वसम्मति से इसे हिन्दी के साथ राजभाषा के रूप में स्वीकार किया. राज्य बनने के बाद यह सुविधा है कि स्थानीय महत्व के मुद्दों पर हमें अधिक संघर्ष की जरूरत नहीं पड़ रही. छत्तीसगढ़ी से प्रेम रखने वालों का यह सौभाग्य है कि इसे राजभाषा का दर्जा दिलाने के लिए सड़क पर उतरकर लाठी गोलियां नहीं खानी पड़ी. सरकार ने छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग का भी गठन किया, जो इस समय छत्तीसगढ़ी का एक मान्य व्याकरण, शब्दकोष इत्यादि तैयार कर रहा है.
बीते 21 फरवरी को यूनेस्को ने अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाया. इस मौके पर जारी एक रिपोर्ट में आशंका जाहिर की गई कि सन् 2050 के आते-आते दुनिया से 90 फीसदी भाषाएं खत्म हो जाएंगी. विश्व की 6000 भाषाओं में से 3000 का अस्तित्व खतरे में है. पिछली 3 पीढ़ियों में 200 भाषाएं खत्म हो चुकीं, 538 खत्म होने के कगार पर हैं, 632 असुरक्षित हैं और 607 भाषाएं जल्द असुरक्षित हो जाएंगी. हमें आशा है कि 41 साल बाद खत्म भाषाओं की सूची में छत्तीसगढ़ी नहीं होगी. रिपोर्ट कहती है कि युवा अपनी स्थानीय मूल भाषा सीखें और उसे व्यवहार में लाएं. पर देखा गया है कि वे अपने कैरियर को ध्यान में रखते हुए शक्तिशाली भाषाओं को सीखना चाहते हैं. रिपोर्ट कहती है कि अधिक से अधिक भाषाएं जानना हमेशा अच्छा है, लेकिन हम पर अपनी भाषा को संरक्षित करने का दायित्व है. भाषाओं के साथ उसकी परम्पराएं और सभ्यताएं पनपती और फलती-फूलती है, जिसे बचाना बड़ी चुनौती है.
राजभाषा के लिए संघर्ष करने वालों की सदैव चिंता रही है कि बोलचाल में छत्तीसगढ़ी इस्तेमाल की जाए, लेकिन यह नहीं हो पा रहा है. पिछले दिनों हिन्दी और आंचलिक बोलियों के आपसी सम्बन्धों पर रायपुर में एक सेमिनार था. छत्तीसगढ़ के विद्वानों के अलावा राहुल देव, विश्वनाथ सचदेव, प्रो. अमरनाथ आदि यहां पहुंचे. उनके विचारों में भिन्नताओं के बावजूद एक स्वर उभरा कि भाषाएं वे ही पनप सकती हैं, जो उन्हें रोजगार के मौके दें. जरा सोचें, छत्तीसगढ़ी को हम इस मापदण्ड पर कहां खड़ा हैं? सड़क, बिल्डिंग का ठेकेदार छत्तीसगढ़ चाहे थोड़े दिन पहले ही आया हो, घर में अपने प्रदेश की बोली बोलता हो, पर जब मजदूर, गरीब, खेतिहर से काम लेता है तो छत्तीसगढ़ी सीखता है. वही ठेकेदार जब अफसरों के पास बिल ले जाएगा तो छत्तीसगढ़ी बोलने पर उसे उपेक्षित होने का भय बना रहेगा.
राजभाषा पर छत्तीसगढ़ विधानसभा में बिल पेश किया गया तो मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने कहा कि छत्तीसगढ़ी बहुत मीठी बोली है और राज्य के लोगों के आपसी संवाद का सर्वश्रेष्ठ माध्यम है. पर सरकार नहीं बता पायेगी कि विधानसभा में अनुवादकों की व्यवस्था करने के बाद भी इस मीठी बोली में सवाल क्यों नहीं किए. विपक्ष से रविन्द्र चौबे ने बिल पेश करने के दौरान सवाल उठाया कि छत्तीसगढ़ी को अकेले अधिकारिक भाषा के रूप में क्यों नहीं रखा जा रहा है, इसे हिन्दी के साथ क्यों जोड़ा गया. कुछ नेता ज़मीनी सच्चाई जानते हुए भी ऐसा कह देते हैं. जाने अनजाने उन्होंने राष्ट्रभाषा हिन्दी की ख़िलाफत कर दी. छत्तीसगढ़ी के साथ छत्तीसगढ़ियों का भावनात्मक लगाव है, भले इसे वे बोलचाल से गायब कर रहे हों. राजनेता यह बात जानते हैं. चुनाव के वक्त जहां निर्णायक गरीब मतदाताओं की भीड़ हो, सभी दल छत्तीसगढ़ी में बात करते दिखेंगे. मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह में भी छत्तीसगढ़ी बोलकर भीड़ को लुभा लेने की क्षमता विकसित हुई है. पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी, पूर्व सांसद पवन दीवान आदि पारंगत हैं ही.
पता नहीं क्यों छत्तीसगढ़ी बोला जाना छत्तीसगढ़ियों के लिए ही कौतूहल बना हुआ है. हमारे कंठ पर तो इसे सदैव सहज बसना चाहिए. इसके कुछ कारण दिखते हैं. एक नवंबर 2000 के पहले तक छत्तीसगढ़ मध्यप्रदेश का हिस्सा रहा, जहां छत्तीसगढ़ी के अलावा बुंदेलखंडी, मालवी, बघेली और अवधी भी बोली जाती थी. प्रशासनिक कामकाज हिन्दी में होते थे. मध्यप्रदेश का हिस्सा होने के कारण राजनैतिक, प्रशासनिक सामंजस्य व पाठ्य पुस्तकों को एकरूप हिन्दी के माध्यम से ही बनाया जा सका. अवसरों में भागीदारी के लिए छत्तीसगढ़ियों को जरूरी था कि वे मध्यप्रदेश के निवासी के रूप में जाने जाएं. छत्तीसगढ़ बनने के 8 साल बाद अब छत्तीसगढ़ी को राजभाषा का दर्जा मिला है. इस बीच पूरी दुनिया में बहुत तेजी से अनेक परिवर्तन हुए हैं. पिछले कुछ दशकों के भीतर समाज में बाजार का प्रभाव बढ़ा है, सांस्कृतिक मूल्यों को बचाने की चिंता करने वाले लोग घटे हैं. तकनीकी शिक्षा, जिसके प्रति युवा पीढ़ी का रूझान है वे ज्यादातर अंग्रेजी अथवा हिन्दी में हैं. राज्य में औद्योगिक, व्यापारिक गतिविधियां बढ़ी हैं, जिनमें निवेश करने वाले लोग देश-विदेश के विभिन्न हिस्सों से पहुंचे हैं. हाल के मंदी के असर को छोड़ दें तो लोगों का उपभोक्ता वस्तुओं की तरफ लगाव बढ़ा है. सार्वजनिक मंचों, विद्यालयों में राज्य की संस्कृति से सम्बन्धित गतिविधियों को केबल टीवी के कार्यक्रमों ने दबोच रखा है. शासकीय संरक्षण में होने वाले सांस्कृतिक आयोजन जिनसे राज्य की विशेषताओं को उभारने का अवसर मिल सकता है, सीमित हैं तथा आम लोगों की पहुंच से दूर हैं.नई पीढ़ी, जिनके हाथों में कल का छत्तीसगढ़ है गिल्ली डंडा या कबड्डी पसंद नहीं करते, उसे क्रिकेट पसंद है. अमरसा या ठेठरी खुरमी उसे नहीं भाता, वे चाऊमिन और नूडल्स के शौकीन हैं. वे चंदैनी, पंडवानी, ददरिया, गम्मत से दूर हैं, अब गांव-गांव, डिस्को पाप राक डांस काम्पीटिशन हो रहे हैं. उन्हें लगता है कि ऐसा करके वे दूसरों से बराबरी कर पाएंगे. ऐसे में अपनी बोली के प्रति भी उनमें मोह नहीं जागा. अमीर धरती के गरीब लोगों के इस छत्तीसगढ़ में यह धारणा बनी कि जो निर्धन है, छत्तीसगढ़ी भाषा, कलाएं, सभ्यता उसकी है.
छत्तीसगढ़ के मैदानी इलाकों में इस परिवर्तन की बयार तेजी से फैली. बस्तर, सरगुजा, जशपुर इलाकों में औद्योगिक व अधोसंरचनाओं का विकास धीमा रहा है. इसलिये छत्तीसगढ़ी पर संकट राज्य की दूसरी भाषाओं, बोलियों के मुकाबले ज्यादा है. छत्तीसगढ़ी को राजभाषा बनाने के बाद जरूरी होगा कि इसे प्राथमिक स्कूलों के पाठ्यक्रमों में शामिल करें. वरना कुछ दिनों के बाद जो बच्चे स्कूल पहुंचेंगे वे चिरई, रद्दा, कुरथा, कुरिया जैसे सरल शब्दों का मतलब भी नहीं जानेंगे. छत्तीसगढ़ी में ज्यादा से ज्यादा प्रशासनिक कामकाज हों, इसकी पहल राजनेताओं को करनी होगी फिर अफसर इसे खुद-ब-खुद अपने पर लागू कर लेंगे. छत्तीसगढ़ी साहित्य और अन्य लोक विधाओं में निरन्तरता होनी चाहिए. नई पीढ़ी का रूझान बढ़ाने के लिए इसमें नये प्रयोग किए जायें और सृजन की गुणवत्ता पर ध्यान तो देना ही होगा. लगता है कि राजभाषा का दर्जा देने के लिए जितना जूझना पड़ा, वह संघर्ष का एक पड़ाव ही था. लक्ष्य अभी हासिल करना है, जिसमें सरकार के साथ समाज को भी जवाबदेह होना होगा.

दूसरी बोलियों का क्या होगा?
राज्य बनने के 8 साल बाद छत्तीसगढ़ी को राजभाषा का दर्जा दिलाने की पहल हुई. पर यहां की दूसरी भाषाओं के संरक्षण की जिम्मेदारी कौन निभाए? अक्सर कहा जाता है कि छत्तीसगढ़ी दो करोड़ लोगों की भाषा है. कुछ इतिहासकार कहते हैं कि दूसरे राज्यों से प्रभावित मिश्रित छत्तीसगढ़ी बोलने वालों को मिलाकर भी इसे बोलने वालों की संख्या 1 करोड़ 15 लाख के आसपास है. तब हमें चिंता करनी चाहिए उन लोगों की जिनकी बोली 2 करोड़ 8 लाख की आबादी वाले छत्तीसगढ़ में रहते हुए भी छत्तीसगढ़ी नहीं है. ये हिन्दी भी ठीक तरह से नहीं समझ पाते. छत्तीसगढ़ी बोली के विकास पर सरकारी पहल अन्य बोलियों की कीमत पर नहीं होनी चाहिए. अकेले गोंडी बोलने वालों की संख्या 20 लाख से अधिक है. उत्तर व दक्षिण बस्तर की गोंड बोलियों में काफी फर्क भी है. यहां भतरी, हलबी, पारजी, दोरली आदि अनेक बोलियां हैं. इसी तरह सरगुजा और जशपुर में मैदानी हिस्से तो छत्तीसगढी से वाकिफ हैं पर कुड़ुक, सादरी, सरगुजिहा, जशपुरिहा आदि बोलने वालों की तादात भी लाखों में हैं. अपनी भाषा, सभ्यता और संस्कृति को अपने पारम्परिक तौर तरीकों से संभाले हुए ये लोग ज्यादा कठिनाई में हैं. प्रशासन इन तक पहुंचता नहीं. वे प्रशासन की भाषा से ही नहीं उसके रवैये से भी अनजान हैं. सिंचाई, सड़क, शिक्षा की सुविधाएं यहां काफी कम है. इन इलाकों में फसल छत्तीसगढ़ के दूसरे हिस्सों से एक तिहाई है और मजदूरी आधी. शोषण-कुपोषण यहां सबसे ज्यादा है. नाबालिग लड़कियों के खरीद फरोख्त हो रही है. ये दुर्गम पहाड़ी इलाके हैं, जहां सरकार पहुंचना भी नहीं चाहती, जबकि राज्य के निर्माण के बाद इनको भी रायपुर, बिलासपुर संभागों की तरह सहूलियतें मिलनी चाहिए थी. विकास व सेवाओं का असंतुलन दूर करने के लिए बजट तो दिए जाते हैं पर निगरानी का अभाव है और यहां के लोगों की राय पर काम नहीं होते. ऐसी स्थिति में राजभाषाओं की सूची में इन बोलियों को चाहे तो न भी जोड़ें, लेकिन प्रशासन इतना सक्षम तो हो कि उनकी भावनाओं में, उन्हीं की बोलियों में उनकी जरूरतों को समझे और उनकी समस्याएं दूर करे.
बस्तर में पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी ने बीते साल 2 दिसम्बर से एक हफ्ते तक अपने संगठन की स्थापना की वर्षगांठ मनाई. इस दौरान उन्होंने जगह-जगह अपनी मांगों के परचे चिपकाए. इनमें छत्तीसगढ़ी को राजभाषा का दर्जा दिए जाने का विरोध भी शामिल था. सन् 2001 में मुख्यमंत्री रहते हुए अजीत जोगी ने जब छत्तीसगढ़ी को राजभाषा का दर्जा देने की घोषणा की तो बस्तर के अख़बारों में नक्सलियों ने बयान भेजकर ऐसा फैसला नहीं लेने की चेतावनी दी. बस्तर के आदिवासियों का भरोसा जीतने व बाकी छत्तीसगढ़ियों से उन्हें अलग बताने के लिए नक्सलियों के पास एक मुद्दा यह भी है. समझा जा सकता है कि भाषा का मामला कितना संवेदनशील है. सब मानते हैं कि नक्सल केवल कानून-व्यवस्था का मसला नहीं है. हम जब बस्तर में शांति की स्थापना व वहां के विकास की बात करते हैं, तो पहले हमें उनकी भाषा को साफ समझने वाला महकमा तैनात करना होगा. तब शायद बराक ओबामा जिन्हें छत्तीसगढ़ी जानने वालों की जरूरत है और यूनेस्को जो भाषाओं के खत्म होने पर चिंतित है, के सामने हम अपने राज्य की बेहतर तस्वीर पेश कर सकेंगे.

बुधवार, 29 अक्टूबर 2008

तटस्थ रहने का अपराध न करे कांग्रेस

घोषणा पत्र सामने आने से पहले ही कांग्रेस ने यह साफ किया है कि सलवा जुड़ूम पर उनकी पार्टी ख़ामोश रहेगी. दो बडे़ नेता महेन्द्र कर्मा और अजीत जोगी इस आंदोलन पर अलग-अलग राय रखते हैं. जोगी मानते हैं कि सलवा जुड़ूम के पीछे भावना तो सही है पर निहत्थे अथवा केवल तीर-कमान लेकर चलने वाले आदिवासियों को घातक बम और एके-47 रखने वालों से मुक़ाबले के लिये आगे नहीं किया जा सकता. दूसरी तरफ श्री कर्मा कहते हैं कि इस आंदोलन को वे इतनी दूर तक साथ दे चुके हैं कि उनका पीछे हटना मुमकिन नहीं है.
दोनों नेताओं की एक बैठक राजधानी में हुई थी, उनमें एक राय नहीं बन सकी. राज्य की कांग्रेस इकाई ने भी मान लिया कि सलवा जुड़ूम पर पार्टी की कोई सर्वसम्मत राय नहीं है. लेकिन प्रमुख विपक्षी दल होने के नाते क्या कांग्रेस की चुप्पी ठीक है? सलवा जुड़ूम और नक्सल समस्या एक दूसरे से गुंथे हुए हैं. भाजपा के प्रमुख राजनैतिक दल व सत्ता में होने की वजह से तथा कांग्रेस के प्रभावशाली नेता महेन्द्र कर्मा के आदिवासियों के एक बड़े वर्ग में असर होने के नाते सलवा जुड़ूम से पड़े नकारात्मक-सकारात्मक प्रभावों का कोई राय जाहिर तो करनी ही होगी. नक्सली हिंसा में मौतें बीते 4 सालों के भीतर 4 गुना बढ़ी. सुरक्षा बलों व स्थानीय आदिवासियों पर हमलों का तेज हुए हैं. खनिज व रेल संसाधनों को क्षति पहुंचाना, 50-60 हजार लोगों का अपने गांवों से बेदख़ल हो जाना और शिविरों में रहना, विशेष जन सुरक्षा अधिनियम के तहत गिरफ्तारियां होना, सैकड़ों आदिवासी परिवारों का आंध्रप्रदेश व दूसरे राज्यों की सीमाओं में शरण लेना, हजारों बच्चों का वहां शिक्षा से वंचित होना, कुपोषण से पीड़ित होना, सुरक्षा बलों व नक्सलियों के ख़िलाफ खड़े लोगों पर अत्याचार के आरोप लगना, उद्योगों के लिये भूमि देने का विरोध और समर्थन, बेदखली के लिये उत्पीड़न जैसे दर्जनों प्रश्न हैं. क्या इनके नेपथ्य में सलवा जुड़ूम क्या कहीं भी नहीं है? आखिरकार, नक्सल समस्या ने पूरे छत्तीसगढ़ पर असर डाला है. वे साधारण मतदाता भी, जो कभी बस्तर नहीं गये इसे लेकर चिंतित हैं और जल्द से जल्द बस्तर, सरगुजा के इलाकों को हिंसा से मुक्त देखना चाहते हैं, भोले-भाले आदिवासियों के लिये अपनी परम्परा, प्रकृति तथा मिट्टी के बीच सहज जीवन-यापन चाहते हैं. ऐसे महत्व के विषय पर कांग्रेस या कोई राजनैतिक दल मौन रहकर मतदाताओं के बीच कैसे जा सकती है? क्या कांग्रेस अपने घोषणा पत्र में नक्सल समस्या पर भी कुछ नहीं बोलेगी? या फिर केवल भाजपा की निंदा करेगी. पर इससे तो कोई बात नहीं बनेगी. आखिर यह तो राज्य की प्रतिष्ठा और छबि का भी प्रश्न बनता है.
सभी दल और नक्सल समस्या से चिंतित लोग मान चुके हैं कि यह मसला केवल कानून का नहीं है बल्कि सामाजिक-आर्थिक भी है. प्रायः सभी राजनैतिक दल मानते हैं कि नक्सल किसी एक राज्य की नहीं बल्कि देश की समस्या है. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इसे देश की सबसे बड़ी आंतरिक चुनौती बता चुके हैं. देश-विदेश के अनेक मानवाधिकार संगठन सलवा जुड़ुम की बंद करने की मांग कर चुके हैं, जन सुरक्षा कानून के तहत गिरफ्तारियों की निंदा कर चुके हैं और उनकी रिहाई के लिये आंदोलन भी कर रहे हैं. यदि उनकी बात ठीक हैं तो कांग्रेस साफ कहे,, नहीं है तो कहे.
दो जिम्मेदार नेताओं में घोर असहमति के कारण राज्य के सबसे जलते सवाल को किनारे कर देने से काम कैसे चलेगा. उन लाखों मतदाताओं का क्या होगा, जो केवल इसी बात पर कांग्रेस को वोट देने या नहीं देने का फैसला करने वाले हैं. राज्य की पार्टी इकाई यदि दोनों नेताओं के बीच सुलह नहीं करा सकती तो केन्द्रीय नेता सोचें और पहल करें. कांग्रेस एक राजनैतिक दल है. दल की एक विचारधारा होती है. कांग्रेस को विचार तो व्यक्त करना ही होगा. क्या सलवा जुड़ूम खत्म कर दिया जाये? या उसके स्वरूप में बदलाव किया जाये या उसका पूरी तरह समर्थन किया जाये, किसी एक लाइन पर तो उसे चलना ही होगा. यह लाइन नक्सल पीड़ितों की आवाज़ पहचानने पर टिकी हुई है, क्या सौ साल पुरानी कांग्रेस जिसने हमेशा आदिवासियों के बीच काम करने का दावा किया है, उनका मन टटोलने में असफल है या उससे मुंह मोड़ना चाहती है. क्या उनका सारा तर्क-वितर्क केवल दो नेताओं के विचार तक सीमित है. किसी के रूठ जाने के डर से, उनके समर्थकों के वोटों का नुकसान उठाने के डर से एक प्रमुख राष्ट्रीय राजनैतिक दल को तटस्थ रहने का अपराध नहीं करना चाहिये. भूख-भय, शोषण, हिंसा के ख़िलाफ बस्तर में लड़ाई अभी जारी है. नक्सल और इससे जुड़े तमाम सवालों पर राजनैतिक दलों की भी भूमिका इतिहास के पन्नों में चुपचाप दर्ज़ होते जा रहे हैं. इसलिये सबको अपनी राय स्पष्ट करनी होगी. आखिर सजग मतदाता भी किसी पार्टी के विचारों को ही ध्यान में रखकर ही अपना मत बनाता है.

सोमवार, 4 अगस्त 2008

जशपुर का अपजश

जशपुर की सैकड़ों बेटियां न जाने किस नर्क में होंगी. एक बार बहकावे में निर्जन के अपने झोपड़े से संसार सागर में उतरी तो देह की किस मंडी में चली गयीं कुछ पता नहीं.
जशपुर जिले का लुड़ेग बीते कुछ दशकों में टमाटर की खूब फसल के कारण प्रसिध्द था. मिट्टी और मौसम अनुकूल होने के कारण यहां के आदिवासियों ने इसे खूब उगाया. कई बार तो ऐसी नौबत आई कि टमाटर खेतों में ही सड़ने के लिए छोड़ दिया जाता था, क्योंकि बाजार तक लेकर जाने में परिवहन का खर्च भी निकल नहीं पाता था. यहां कई बार मांग हुई कि टमाटर पर आधारित उद्योग लगा दिये जाएं जिससे आदिवासी किसानों का जीवन स्तर ऊपर उठ जाएगा. लेकिन इस पिछड़े इलाके के लिए कुछ नहीं सोचा गया.
पिछले कुछ वर्षों से जशपुर और सरगुजा जिले में एक नई तरह की फसल तैयार हो रही है. उसे बाजार भी खूब मिल रहा है. ये फसल हैं इस इलाके के निर्धन आदिवासी उरांव परिवारों की नाबालिग लड़कियां और बाजार बने हुए हैं दिल्ली गोवा जैसे देश के महानगर. इस फसल को खाद-बीज दे रहे हैं उनके अपने निकट सम्बन्धी और बिचौलिये का काम कर रही हैं, दिल्ली में काम कर रही 200 से ज्यादा प्लेसमेन्ट एजेंसियां. लड़कियां टमाटर तो होती नहीं. उनकी धमनियों में रक्त का संचार होता है. मन है, जो पंख लगाकर आकाश में उड़ना चाहता हैं. ह्रदय है जिसमें सुख-दुख मान,अपमान, स्वाभिवान कष्ट और प्रसन्नता महसूस कर सकती हैं. पर सरगुजा और जशपुर इलाके के गांवों में 3 दिन भटकने के बाद महसूस हुआ कि इन सब भावनाओं को व्यक्त करने का अधिकार केवल उनको है, जिनके पेट भरे हों.

इनकी आंखों में आंसू भी आते हैं तो रोककर रखना होगा, बाप को बेटी से बिछुड़ने और बेटी को घर की याद आने पर भी दोनों विवश हैं. पुलिस व प्रशासन की मदद नहीं मिलने की आशंका से अभिभावकों के पैरों में बेड़ियां लग गई हैं और बेटियां तो पता नहीं कहां नजरबंद हैं या घुटन भरी कोठियों में बीमार पड़ गई या मार डाली गई. कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए ऐसी लड़कियों की संख्या सैकड़ों में है, जो एक बार निर्जन जंगल में बनी अपनी झोपड़ी से महानगरों की भूल-भुलैया में अपना भविष्य संवारने का सपना लिए निकल पड़ी और फिर उनका कुछ पता नहीं चला. सीतापुर ब्लाक के बेलगांव की ललिता एक्का पिछले सात साल से दिल्ली के एक मीडिया हाऊस में झाड़ू पोछे का काम कर रही है. 6ठवीं तक पढ़ी 19 साल की ललिता से जब हम मिले तो वह संकोच झिझक उसकी आंखों व हाव-भाव व पहनावे में नहीं थे, जो अक्सर इस गांव की लड़कियों में दिखाई देती है.

जशपुर जिले के दुलदुला थाना के अंतर्गत आने वाले चटकपुर गांव की शशिकांता किण्डो को जुलाई 2006 में गांव की ही अनिता और विमला अच्छी नौकरी दिलाने का आश्वासन देकर ले गये थे. वहां पहुंचने के बाद चिराग, दिल्ली के एक प्लेसमेंट एजेंट राजू अगाथा ने हिमांशु बख्शी के यहां नौकरी दिलाई. वहां मालकिन नमिता ने कुछ दिनों तक तो ठीक रखा पर बाद में उसे घर से निकलने भी नहीं दिया जाता था. जब भी शशिकांता गांव वापस लौटने की जिद करती थी, उसे जल्द ही छोड़ देने का भरोसा दिलाया जाता था. इधर गांव में शशि की मां प्रमिला और पिता विन्सेन्ट लकड़ा परेशान हो रहे थे. जब भी वे अपनी बेटी से फोन पर बात करने की कोशिश करते थे, मकान मालकिन उन्हें बात कराने से कोई न कोई बहाना बना देती थी. परेशान होकर उन्होंने दुलदुला थाने में शिकायत कर दी. मालकिन ने तब शशिकांता को धमकाया और उसकी शादी जबरदस्ती उसी अपार्टमेन्ट में वाचमैन का काम करने वाले रविन्द्र कुमार यादव से करा दी. रविन्द्र उसे अपने कमरे में लेकर रहने लगा.

इधर मालकिन से जब शशिकांता से बात कराने कहा जाता था तो उन्होंने कह दिया कि लड़की शादी कर चुकी है और अब उसके पास नहीं है. बहदवास मां अपनी भाई की पत्नी थेलमा के साथ दिल्ली पहुंची. थेलमा 10 साल से दिल्ली में ही रहती थी. रविन्द्र से शशिकांता के बारे में बात की जाती थी तो वह धमकियां देता था, झूठ बोलता था. बाद में उसने यह भी सफाई दी कि वह शशिकांता से शादी करना नहीं चाहता था, उसकी शादी तो पहले ही हो चुकी है और उत्तरप्रदेश के गांव में बीवी बच्चे रहते हैं. यह सब तो शशि की मालकिन के दबाव में उसे करना पड़ा. शशि अपनी जान बचाकर गांव लौट गई है. उनके मां-बाप कहते हैं कि अब किसी सूरत में इसे दिल्ली या और कहीं नहीं भेजेंगे. इकलौती बेटी की शादी यहीं किसी अच्छे लड़के से कर देंगे.

हैरत की बात है कि कई बार छोटी उम्र की लड़कियां मां-बाप या भाईयों से नाराज होकर भी घर छोड़कर भागती हैं तो बहुत दूर निकल जाती हैं और कई साल तक घरों की ओर दुबारा नहीं झांकती. पर जब लगातार प्रता़ड़ित हो जाती हैं और कैद होकर रह जाती हैं तो हर तरह का जोखिम उठाकर गांव वापस भाग आती हैं. लुड़ेग के पास घुरूआम्बा की रमिला टोप्पो के साथ ऐसा ही हुआ. गांव वालों ने बताया कि इस लड़की को गुजरात में किसी घर में नजरबंद कर लिया गया था. उसे घर से निकलने नहीं दिया जाता था और उसके हाथ में कोई पैसा नहीं दिया जाता था. किसी तरह एक सहेली से उसने टिकट के पैसे का प्रबंध किया और जिस कपड़े को पहने हुए थी, उसी में भाग निकली.

दो दिन बाद कुनकुरी पहुंची और 11 किलोमीटर पैदल चलकर रात के 9 बजे घर पहुंची. 6 साल बाद अपनी बेटी को घर पर बहदवास, बीमार हालत में देखकर अनपढ़ मां-बाप की आंखों में आंसू आ गए. वे अपनी बेटी के वापस मिलने की उम्मीद ही खो चुके थे. दूसरी तरफ रमिला जो कहानी बताती है उसके अनुसार वह अपने भाई ने मारपीट की तो नाराज होकर वह भाग गई. गांव से वह सीधे रायगढ़ में मदर टेरेसा अनाथ आश्रम में चली गई और वहां से इंदौर के एक अनाथाश्रम में भेज दिया गया. फिर वहां से सूरत के एक मिशनरी संचालित अनाथाश्रम में रख दिया गया. लगातार वहीं रह रही थी. रमिला की मानें तो इन अनाथाश्रमों में उसे कोई तकलीफ नहीं थी. खाने और कपड़े दिये जाते थे और पढ़ाई कराई जा रही थी. वह अपनी कहानी बताते वक्त कई बार ठिठकती रही तथा बीच-बीच में अपनी ही कई बातों को झुठला रही थी. जब वहां कोई तकलीफ नहीं थी तो भागकर क्यों आना पड़ा, पूछने पर वह कहने लगी कि घर की याद आ रही थी.

इतने सालों तक सम्पर्क क्यों नहीं किया? वह कहती है कि चूंकि उसने सभी जगहों पर खुद को अनाथ बताया था इसलिये किसी से कहते नहीं बना कि वह घर के लोगों को चिट्ठी लिखना चाहती है या उनसे फोन पर बात करना चाहती है. रमिला जब घर से अकेले निकली तो उसकी उम्र 9 साल के करीब थी. 6 साल बाद लौटने के बाद वह जसपुरिया बोली लगभग भूल गई है और अंग्रेजी मिश्रित हिन्दी में बात कर रही है. वह कम्प्यूटर सीखने और पढ़ाई करने की इच्छा रखती है, इसके लिये रायगढ़ या रांची के किसी बड़े स्कूल में दाखिला लेना चाहती है.

जो लौट के घर न आए

अब उनके गरीब मां-बाप इतने साल बाद मिले अपनी बच्ची को बाहर नहीं भेजना चाहते. साथ ही गरीबी के कारण बहुत बड़े स्कूल में बाहर पढ़ाने की हिम्मत भी नहीं जुटा पा रहे हैं. लेकिन रमिला ने उन्हें साफ कह दिया है कि वह गांव में नहीं रहना चाहती. दिल्ली से गये मीडिया के कुछ लोगों ने रमिला को टटोला तो वह तुरंत उनके साथ दिल्ली निकल चलने के लिए तैयार हो गई.

सरगुजा जिले के बतौली गांव की 14 साल की तारिणी घर से तो निकली थी, पड़ोस में सरसों की भाजी छोड़ने के लिये, लेकिन वह निकल गई दिल्ली. पिता भण्डारी और मां मुनारो किन्डो कुछ दिन बाद यह जानकर कुछ राहत महसूस कर सके कि वह अपने मामा की लड़की प्रमिला के साथ निकली है, जो पहले से ही दिल्ली आती जाती रहती है. बतौली ब्लाक मुख्यालय और उसके आसपास के गांवों से प्रमिला की तरह ही कई नजदीकी रिश्तेदारों ने लड़कियों को घरेलू नौकरानी के लिए काम पर पहुंचाया है, जिनमें से तारिणी समेत कम से कम 7 लड़कियों का आज पता नहीं है कि वे कहां हैं.
तारिणी जैसी लड़कियों को बचाने के लिए असल में जब लोगों का जीवन स्तर ऊपर उठेगा तो ही इलाके में कैंसर की तरह फैल चुके मानव-व्यापार पर रोक लगाने में मदद मिलेगी. अभी तो उरांव आदिवासी परिवारों के भाई, पिता के हाथ खाली हैं, बेटियों को पढ़ाई और शादी करने के दिनों में बाहर भेज देना, उन्हें बिल्कुल नहीं भाता, पर असहाय हैं. इनके हाथ में काम हो, कुछ आय बढ़े तो हिम्मत के साथ वे इन लड़कियों को भी रोकेंगे और लड़कियों का भी भरोसा अपने परिवार व समाज पर बढ़ेगा.

बुधवार, 30 जुलाई 2008

सांसद वापस बुलाने का अधिकार क्यों नहीं हो?

-राजेश अग्रवाल
छत्तीसगढ़ में 45 साल पुराना एक कानून बोतल से जिन्न की तरह बाहर निकल कर आ गया है, जो लोकतंत्र पर भरोसा करने वाले हर मतदाता के लिये तो सुखद है पर एक बार चुन लिये जाने के बाद पद का दुरूपयोग करने वाले जनप्रतिनिधियों के लिये खतरे की घंटी है. संसद में विश्वास मत हासिल करने की प्रक्रिया के दौरान पता नहीं कितने ही सांसद अपने मतदाताओं का भरोसा खो बैठे हैं पर उन्हें वापस बुलाने का अधिकार मतदाताओं को नहीं है. इधर छत्तीसगढ़ में 3 नगर पंचायत अध्यक्षों को नाराज जनता ने नहीं बख्शा और नगरपालिक अधिनियम 1961 की धारा 47 का इस्तेमाल करते हुए उन्हें कुर्सी से अलग कर दिया. इस कानून ने ऐसी जागरूकता लाई है कि अब एक चौथे नगर पंचायत अध्यक्ष पर भी शामत आ गई है, उन्हें भी जनता का विश्वास हासिल करना होगा.
दरअसल अविभाजित मध्यप्रदेश में स्थानीय निकायों के लिये बना कानून अलग राज्य बनने के बाद छत्तीसगढ़ में भी उसी तरह लागू हो गया था. इस अधिकार के तहत सबसे पहले धमतरी के नगर पंचायत अध्यक्ष विमल चोपड़ा के खिलाफ लाया गया था, लेकिन वे इसकी कुछ प्रक्रियाओं पर आपत्ति लगाते हुए हाईकोर्ट चले गये थे. उनका मामला अभी लम्बित है. गुण्डरदेही की अध्यक्ष भारती सोनकर भी हाईकोर्ट गई थी. उनके मामले में फैसला आ गया और आवेदन खारिज हो गया. पिछले 15 जून को भारती सोनकर समेत दो अन्य अध्यक्षों कोरेन खलखो, राजपुर और सीताराम गनेकर नवागढ़ के खिलाफ मतदाताओं ने वोट दिया और उन्हें अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ी. सिलसिला चल चुका है और लग रहा है कि वायदाखिलाफी करने वाले, भ्रष्टाचार में लिप्त रहने या अपनी जवाबदेही भूल जाने वाले जनप्रतिनिधियों को ढ़ोते रहने के लिये मतदाता लाचार नहीं रह गये हैं. अब एक और नगर पंचायत कुसमी के अध्यक्ष को अपनी विश्वसनीयता साबित करने के लिये मतदाताओं के बीच जाना होगा. इसके लिये मतदान 26 अगस्त को होगा और मतों की गिनती 28 अगस्त को होगी. इन्हीं दिनों में गुण्डरदेही, राजपुर और नवागढ़ में भी नये अध्यक्षों के लिये चुनाव हो रहे हैं.
छत्तीसगढ़ में प्रत्यक्ष मतदान के जरिये इन अध्यक्षों का चुनाव हुआ था. इसलिये सामान्य सभा में बहुमत खोने के बाद भी इन्हें नहीं हटाया जा सकता. प्रक्रिया के तहत तीन चौथाई पार्षदों ने कलेक्टर के समक्ष अविश्वास प्रस्ताव का आवेदन दिया. इसके बाद 15 जून को मतदान कराया गया. मतपत्र में प्रत्याशियों के नाम नहीं थे, बल्कि एक खाली व दूसरी भरी हुई कुर्सी के चित्र थे. श्रीमती सोनकर के पक्ष में 1389 मत पड़े जबकि खिलाफ में 1977 वोट, श्री गनेकर के पक्ष में 805 वोट पड़े और खिलाफ में 1146, कोरेन खलखो के खिलाफ 813 मतदाता थे, जबकि उनके पक्ष में 740 वोट पड़े.
हालांकि छत्तीसगढ़ में इस कानून का इस्तेमाल पहली बार हुआ है, लेकिन मध्यप्रदेश में सन् 2002 में इसी एक्ट का इस्तेमाल कर अनूपपुर की नगर पालिका अध्यक्ष पावलिका पटेल को हटाया जा चुका है. महाराष्ट्र में भी स्थानीय निकायों के लिये इसी तरह का कानून है पर वहां पर अभी तक कोई उदाहरण इसके इस्तेमाल करने को लेकर मिला नहीं है.
1992 में जब राजीव गांधी सरकार ने 73 वें संविधान संशोधन के जरिये पंचायती राज अधिनियम संसद से पारित कराया तो कई राज्यों ने इसे लागू करने में ना-नुकर की. इसके बाद 1996 में महिलाओं, अनुसूचित जाति जनजाति व पिछड़े वर्ग को अवसर देने के लिए इस अधिनियम में कई बिन्दु और जोड़े गये. अनेक राज्यों ने इसमें संशोधन करके अधिनियम लागू किया. छत्तीसगढ़ ने लगभग सभी महत्वपूर्ण प्रावधान लागू किये. दो से अधिक बच्चे होने पर या घर में शौचालय न होने पर चुनाव लड़ने का अधिकार खो देना, निर्वाचित होने के बाद तीसरा बच्चा पैदा होने पर पद खो देना आदि कुछ कठोर प्रावधान भी इसमें शामिल हैं. नगर निकायों के अध्यक्षों के मुकाबले सरपंचों को मतदाताओं के प्रति ज्यादा जवाबदेह बनाया गया है. पंचों के तीन चौथाई बहुमत के जरिये भी वे हटाये जा सकते हैं और ग्राम सभाओं के माध्यम से भी. मध्यप्रदेश पंचायती राज अधिनियम में 1999 व 2001 में किये गये संशोधनों के अनुसार सरपंचों को ग्राम सभाओं की अनुमति से ही किसी भी प्रकार का व्यय, निर्माण कार्य, चाहे वह पंचायत की बैठक में पारित कोई प्रस्ताव हो या न हो, गरीबी रेखा की सूची, निराश्रितों का पेंशन, आवासहीनों को जमीन का पट्टा सब कुछ तय होगा, जबकि नगर निकायों में पार्षदों की मौजदूगी में होने वाली सामान्य सभा में ही इसका फैसला लिया जा सकता है. ग्राम सभाओं को अपने सरपंच को सीधे बर्खास्त करने का भी अधिकार है. लेकिन इसमें ग्राम सभा के कुल सदस्यों का पांचवा हिस्सा मौजूद रहना चाहिये तथा इनमें भी कम से कम एक तिहाई महिलाएं हों.
छत्तीसगढ़ सरकार ने हाल ही में एक और संशोधन करके आरक्षित सीटों का क्रम जो पहले हर बार बदल जाता है, उसे 10 सालों के लिये स्थायी कर दिया है, इसके चलते अब एक बार चुना गया पंचायत प्रतिनिधि दूसरी बार भी अपनी सीट से लड़ सकेगा. पहले आरक्षण के कारण हर बार स्थिति बदल जाती थी और इस वजह से पंच, सरपंच मतदाताओं की परवाह ही नहीं करते थे. एक और महत्वपूर्ण संशोधन के तहत पंचायतों में 33 की जगह 50 फीसदी सीटें महिलाओं के लिये आरक्षित कर दी गई है.
लब्बोलुआब यह कि नगर निकाय और पंचायतों में जो प्रतिनिधि चुनकर आते हैं वे अपने मतदाताओं के प्रति ज्यादा जवाबदेह हैं. सांसद और विधायकों के लिये इतनी पाबंदी और जवाबदेही नहीं है. नगर निकायों में सीमित इस कानून को संसद और विधानसभा में चुने जाने वाले प्रतिनिधियों पर भी लागू क्या नहीं किया जाना चाहिये? हम संसद में लाये गये विश्वास मत के पक्ष में खड़े हों या विपक्ष में, लेकिन सांसदों के आचरण पर सवाल तो उठे हैं. क्या मतदाताओं को यह अधिकार नहीं मिलना चाहिये कि वे तय कर सकें कि उन्हें अपने सांसद का काम पसंद नहीं आया तो वापस बुला लें.
नगर निकायों व पंचायतों में मतदाताओं को सौंपे गये अधिकार दरअसल कई अर्थों में इन संस्थाओं को नौकरशाहों के कब्जे में रखने का षड़यंत्र है. ज्यादातर पंच-सरपंच पढ़े लिखे नहीं है, अनुसचित जाति जनजाति व महिला वर्ग से आये जनप्रतिनिधियों को पंचायत एक्ट का ही पता नहीं है. केन्द्र से आने वाली राशि का दुरूपयोग जनपदों के सीईओ, पंचायतों के सचिव व पढ़े लिखे उप-सरपंच और उपाध्यक्ष तथा ठेकेदार करते हैं पर कलम इन प्रतिनिधियों की फंसी रह जाती है. ऐसे मामलों में प्रशासनिक अधिकारी इन प्रतिनिधियों को सीधे बर्खास्त करने और उन्हें जेल भिजवा देने का अधिकार भी रखते हैं. जब से आईएएस अधिकारियों को जिला पंचायतों का सचिव बनाया गया है अध्यक्षों की बिल्कुल नहीं सुनी जाती, सदस्यों को तो अपने इलाके में काम मंजूर करने के लिये गिड़गिड़ाना पड़ता है. नगर पंचायतों व नगर पालिकाओं में भी कमोबेश यही स्थिति है. पार्षद अक्सर आयुक्त व सीएमओ के पास नाली बनवाने, मच्छर भगाने व पेयजल उपलब्ध कराने के लिये गुहार लगाते हैं पर ये अधिकारी मंत्री-विधायकों को साध कर रखते हैं और इनकी बात नहीं सुनते. हाल ही में छत्तीसगढ़ के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और कांग्रेस विधायक धनेन्द्र साहू ने आरोप लगाया कि जनप्रतिनिधियों को भाजपा सरकार नौकरशाहों के जरिये धमका रही है. आरंग की महिला सरपंच लता चंद्राकर को हाईकोर्ट से स्थगन मिल गया था, इसके बाद भी उसे बर्खास्त कर दिया गया. बयान राजनैतिक भी हो सकता है लेकिन ऐसे अनेक उदाहरण मिल जायेंगे.
मतदाताओं के फैसले पर कोई ऊंगली नहीं उठा सकता, तीन नगर पंचायतों के अध्यक्ष पार्षदों के बहुमत से खिलाफत करने व मतदाताओं के वोट डालने के बाद पदच्युत किये गये हैं, किन्तु क्या यह संयोग नहीं है कि भारती सोनकर, सीताराम गनेकर और कोरेन खलखो महिला अथवा अनुसूचित जाति से हैं. शायद वे उन तिकड़मों को नहीं जानते थे जिसका राजनैतिक दल इस्तेमाल कर जनता का सामना करने से बचे रह जाते हैं. एक शहर या एक गांव की कमान संभालने वाले जनप्रतिनिधियों के लिये तो कानून कड़े कर दिये गये हैं, पर संसद और विधानसभा में पहुंच कर देश और प्रदेश के लिये नीतियां बनाने वाले सदस्य पांच साल के भीतर एक बार भी मतदाताओं का सामना करने का साहस नहीं जुटा पाते हैं. कोई ऐसा कानून क्यों नहीं बनाया जाता कि सांसद, विधायक भी री-काल के दायरे में लाये जाएं. ऐसा कोई प्रावधान होता तो शायद मध्यप्रदेश के सांसद चन्द्रभान के घर में तोड़फोड़ की नौबत नहीं आती. मतदाता उन्हें वापस बुला लेते. दुनिया के कई देशों में मतदाताओं को यह अधिकार दिया गया है. सोवियत संघ के भीतर आने वाले 36 राज्यों में से 18 में यह कानून सन 1917 से लागू है. जर्मनी में राज्य स्तर तक के निर्वाचित प्रतिनिधि वापस बुलाए जा सकते हैं. कुछ साल पहले केलिफोर्निया में गवर्नर को जनता ने वापस बुला लिया था. लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने पिछले दिनों तिरूअनंतपुरम् की एक सभा में भाषण देते हुए कहा था कि वे जनप्रतिनिधियों को वापस बुलाने के अधिकार के हिमायती हैं. फिर भी लगता नहीं कि पंचायतों को आदर्श बनाने में लगे हमारे देश के नीति नियंता इन उदाहरणों को खुद पर लागू करेंगे.
(यह आलेख http://www.visfot.com/jan_jeevan/democracy_ch_1.html पर भी उपलब्ध है.)