मंगलवार, 8 अप्रैल 2008

सुरूज के सुर का सानी नहीं

0 राजेश अग्रवाल
(दैनिक भास्कर रायपुर में दिनांक 27 मार्च 2008 को प्रकाशित)

भरथरी गायिकी में उनकी कोई सानी नहीं. जब वह ' घोड़ा रोवय घोड़सार मां' पंक्तियों से गाना शुरू करती हैं तो हजारों की भीड़ में आखिरी छोर पर बैठा श्रोता तक सुध-बुध खो बैठता है. आज 57 साल की उम्र में भी यदि सुरूजबाई खाण्डे की बुलंद आवाज बरकरार है तो इसलिए कि वह छत्तीसगढ़ में पसीना बहाने वाले कर्मठ मजदूर के घर से है, उसका पालन-पोषण किसी ऐसे परिवेश में नहीं हुआ जहां गायिकी के हुनर को सिर माथे पर लेकर रियाज़ करने के लिए कोई सहूलियत दी जाए. 7-8 की उम्र में ही वे हाड़-तोड़ मेहनत करना सीख गईं. मां-बाप जब दूसरे के खेतों और ईंट-भट्ठों में मजदूरी के लिए जाते तो उसे भी अपने साथ ले जाते थे ताकि बड़ी हो और ससुराल जाए तो दो जून रोटी के लिए ताने न सुनना पड़े. दादा मोहरदास किसानों की फसल कटने के बाद चिकारा लेकर गांवों में निकलते थे, घूम-घूमकर लोगों को भरथरी सुनाते थे. चबूतरों, बैठकों में भी गाते थे, फिर जो मिलता, वह मजदूरी के अलावा होती थी. नन्हीं सुरूजबाई दादा के साथ शाम को ढिबरी की रोशनी में बैठी सुर मिलाने लगती थी, यही उनका स्कूल था. दादा सुरूजबाई को भी अपने साथ घुमाने लगे और साथ में वह भी गाने लगी.
10-11 साल की उम्र में शादी के बाद वह पौंसरी-सरगांव से ससुराल कछार-रतनपुर आ गई. 4 बच्चे हुए, दवा-पानी के अभाव में सब असमय परलोक सिधार गए. रोजी मजदूरी की तलाश में पति लखन के साथ बिलासपुर पहुंच गई. यह अच्छी बात थी कि पति भी गाने-बजाने का शौक रखते थे, लेकिन दोनों के पास इसे पूरा करने का मौका नहीं था. दोनों रोज माल-धक्का जाते, बड़ी-बड़ी नमक और गेंहूं की बोरियां, तेल के पीपे उठाते और ठेले खींचते थे. शाम अपने घर पहुंचकर जब थकावट दूर करने का मन होता तो पूरे आलाप में सुरूजबाई गाना शुरू कर देती- घोड़ा रोवय...,
मोहल्ले के लोग परेशान थे, लोग उसे 'पगली' कहने लगे. बिलासपुर में कुदुदण्ड, घसियापारा (राजेन्द्र नगर) ने कई जाने माने गायक पैदा किये हैं. इनमें से जवाहर बघेल उस वक्त रेडियो पर बजने वाले - दामाद बाबू दुलरू, बेन्दरा के मारे नई बांचय कोला बारी आदि गीतों से खासे चर्चित हो चुके थे, उन्होंने माना यह पगली नहीं है, बल्कि इसके भीतर गायकी कूट-कूट कर भरी है जिसे वह किसी भी तरीके से बिखेरना चाहती है. वे मंचों में सुरूजबाई को मौका देने लगे. इक्का दुक्का लोक कलाकार ही अपनी हुनर को आजीविका बना पाते हैं. सुरूजबाई की भी मूलभूत जरूरतें गाने से पूरी नहीं होनी थी, नहीं हो रही थी. जब गाने का मौका मिलता चली जाती, बाकी दिन माल-धक्के में ही धक्के खाते गुजरते थे.
सन् 1985 का विधानसभा चुनाव आया. नेताओं में लोक कलाकारों का प्रचार के इस्तेमाल करने का प्रयोग चल रहा था. सुरूजबाई कहती है- यादव भैया (पूर्व मंत्री बीआर यादव) ने उन्हें कांग्रेस के प्रचार के लिए कहा. सौदा अच्छा लगा- उसे माह भर तक गाने के लिए पैसा मिलेगा और माल-धक्का में बोरियां नहीं उठानी पडे़गी. गफ्फार भाई ने नई साड़ियां खरीद कर दी. पति-पत्नी अपने एक दो साजिंदों के साथ रिक्शे पर घूम-घूम कर कांग्रेस का प्रचार करने लगे, जबरदस्त क्रेज रहा. उसे आसपास के इलाकों में भी प्रचार के लिए बुलाया गया. कैसेट भी तैयार हो गया. बीआर यादव चुनाव जीत गए. वादे के मुताबिक उन्होंने सिफारिश की और कलाकारों के कोटे से सुरूजबाई को एसईसीएल में नौकरी मिल गई. अनपढ़ थी, सो भृत्य की नौकरी मिली और वहां लोगों को पानी पिलाने का काम सौंपा गया. एक अनूठी आवाज की मालकिन, यहां नौकरानी का काम करने लगी, क्योंकि यह पहले से बेहतर था. अफसर, बाबू और आगंतुकों में ज्यादातर लोग उन्हें नहीं पहचानते थे, जो जानते थे उनमें से कुछ गदगद हो जाते -कुछ क्षोभ से भर जाते. लेकिन सुरूजबाई ने इससे भी मुश्किल दिन देखे थे, इसलिये उसे मलाल नहीं था.
तब से लेकर आज तक वह यहां पानी पिलाने का ही काम कर रही है. 2 साल पहले एक फर्क आया कि एसईसीएल ने उसके पदनाम के आगे भृत्य शब्द हटा दिया और उसे सांस्कृतिक सलाहकार पद से नवाज दिया गया. उसे टूटी-फूटी ही सही- एक टेबल कुर्सी दे दी गई. लेकिन अभी भी कोई उसे आवाज लगाकर कह देता है- सुरूज बाई, चल पानी पिला.., तो वह ना नहीं कह पाती. मौजूदा सीएमडी बीके सिन्हा और एमडी आरएस सिंह को वे 'कला-प्रेमी' बताते हुए कहती हैं कि कम से कम अब सांस्कृतिक कार्यक्रमों की तैयारी पर होने वाली बैठकों में उसे बुलाया जाता है और राय मांगी जाती है, पहले इतनी भी पूछ नहीं थी.
अब जब रिटायरमेन्ट में 2-3 साल बचे हैं, सुरूजबाई बहुत रूआंसी नजर आती है. उसे शिकायतें खूब है, पर वह जानती है कि वह लाचार है, पढ़ी-लिखी नहीं है कुछ नहीं कर पाएगी. उसके सबसे यादगार क्षण हैं जब उसने रूस में भारत महोत्सव के कार्यक्रम दिए. लेकिन वहां से आने के बाद जैसे आसमान से लाकर फिर धरती पर ही पटक दिया गया, फिर वहीं पानी पिलाने के लिए तैनात. सुरूजबाई के साथ रूस गए दूसरे कई कलाकार आज ठोकरें खा रहे हैं. कोई रिक्शा चला रहा है, कोई सब्जी बेच रहा है. सुरूजबाई कहती है कि इन सब साथियों के बीच मेरी स्थिति कुछ अच्छी है क्योंकि मैं गुजर-बसर के लायक नौकरी पा गई. ताकत होती तो आज इन कलाकारों को लेकर भरथरी के अलावा भी अपने आल्हा, सुआगीत, भड़ौनी और बिहाव गीत को लेकर नई पीढ़ी तैयार करती. लेकिन यहां मुझे ऐसा कोई काम ही नहीं दिया जाता. कहीं भरथरी सुनाने जाना हो तो भी छुट्टी मिल नहीं पाती.
सुरूजबाई कहती है कि-" कई बड़े नेता भी तो मेरी तरह अनपढ़ होते हैं, उनकी मदद के लिए तो लोग पीए देते हैं, अब मुझे यहां अंग्रेजी में सर्कुलर भेजकर बताया जाता है कि बैठक है- उस बैठक में मैं अपनी क्या बात रखूं और मेरी क्या सुनी जाएगी. इस बीच मैं थोड़ा हिन्दी समझने लगी और अपना दस्तखत भी करने लगी हूं, राजभाषा हफ्ता मनाने के बावजूद मेरे पास कोई चिट्ठी हिन्दी में नहीं आती. बूढ़ी हो रही हूं, सब मुझे कलाकार मानते हैं. इतना बड़ा दफ्तर है, सब्जियां लाने तक के लिए अफसरों के घर गाड़ियां दौड़ती हैं पर मुझे पैदल ही घर से आफिस तक आना पड़ता है."
सुरूजबाई, क्या आपको नहीं लगता कि छत्तीसगढ़ के अनेक कलाकारों को बड़े-बड़े अवार्ड मिले, आपको नहीं मिलना चाहिए? पूछे जाने पर वह हाल में मिले देवी मध्यप्रदेश सरकार के देवी अहिल्या अवार्ड सहित अनेक सम्मानों के बारे में अपने तरीके से बताने लगती हैं.
पद्मश्री भी तो एक सम्मान है, जिसका आप जैसे बड़े कलाकारों को दिया ही जाना चाहिए?
सुरूजबाई फिर से उदास हो जाती हैं. कहती हैं- "अब मेरी सिफारिश कौन करे. बिलासपुर में मैं अकेले पड़ जाती हूं. रायपुर, भिलाई में कलाकारों के बीच एकता है वे एक दूसरे के हित का बराबर ख्याल रखते हैं. बीएसपी और एसईसीएल में बड़ा फर्क है. मेरी सिफारिश कैसे की जानी है, कौन करेगा मुझे नहीं मालूम, पर अफसरों को तो पता है. मुझे कलाकार कोटे से नौकरी मिली है तो कला से जुड़ा कोई काम क्यों नहीं सौंपा जाता."
सुरूजबाई को शिकायत है कि कुछ कलाकार मंचों में वाहवाही लेने के लिए भरथरी के मूल स्वरूप से छेड़छाड़ कर रहे हैं. शराब पीकर मंच पर चढ़ जाते हैं और कला को बदनाम कर रहे हैं. फिर भी उन्हें भरोसा है कि उसके भीतर भरथरी सालों जिंदा रहेगा, एसईसीएल से रिटायर हो जाने के बाद भी. नए कलाकारों में भी बड़ा लगन है. वह भिलाई के पास एक गांव से अपने पास आने वाली वंदना की तारीफ भी करती हैं.
भरथरी और सुरूजबाई
छत्तीसगढ़ के पारम्परिक लोकगीतों में भरथरी और सुरूजबाई एक दूसरे की पहचान हैं. सुरूजबाई की विशिष्ट शैली को पकड़ पाना या उसकी नकल कर पाना किसी दूसरे कलाकार के वश में नहीं है. उन्होंने भरथरी, चंदैनी और ढोला-मारू के किस्से को अपनी गायिकी में ढ़ालकर देश-विदेश में ख्याति दिलाई.
भरथरी बुंदेलखण्ड की पृष्ठभूमि पर आधारित एक ऐतिहासिक लोक कथा है, जिसे पूरे उत्तरभारत में अलग-अलग तरीके से गाया जाता है. सार यह है कि उज्जैन के राजा भृतहरि एक बार शिकार करने जंगल गए. वहां उन्होंने एक काले हिरण का शिकार किया. मान्यता थी कि एक काला हिरण 6 आगर, 6 कोरी यानि 126 हिरणियों का पति होता है. मरते वक्त हिरण ने राजा को श्राप दिया कि जाओ जैसा बर्ताव तुमने मेरे साथ किया है वैसा ही तुम्हारे साथ भी होगा. राजा भरथरी ऋषि गोरखनाथ के शिष्य बने. गोरखनाथ ने उन्हें एक फल खाने को दिया और कहा कि इससे उनका यौवन चिर-स्थायी होगा. राजा अपनी एक रानी पिंगला के प्रेम में पागल थे. उन्होंने फल खुद खाने के बजाय रानी को दे दिया. लेकिन रानी को एक सैनिक से प्रेम था. उसने फल सैनिक को खाने के लिए दे दिया. सैनिक को एक वेश्या से प्रेम था, उसने भी फल खुद न खाकर उसे दे दिया. वेश्या को फल मिला, तब उसने सोचा कि मैं तो पापिन हूं, मेरी आयु लम्बी हो, इससे क्या फायदा, वह सोचती है इस राज्य की रक्षा करने वाले राजा की आयु लम्बी होनी चाहिए. वह फल लेकर राजा भरथरी के पास पहुंच जाती है. राजा यह देखकर चकित रह जाता है. जब उसे पूरी बात मालूम होती है तो उसका मन विषाद से भर उठता है. राज-पाट से उसका मोहभंग हो गया और सबकुछ छोड़कर गोदरिया बनकर जंगलों की ओर निकल पड़ा.

संगीत से सेहत का राग मिलाने की अनूठी पहल


संस्कारधानी कहे जाने वाले बिलासपुर से हाल ही में संगीत और सेहत की जुगलबंदी शुरू की गई है. यह पहल पुलिस महानिरीक्षक राजीव श्रीवास्तव ने की. अब यहां अनेकसंगीत विशेषज्ञों और संगीत से अनुराग रखने वालों की एक टीम तैयार हो गई है, जो पूरे छत्तीसगढ़ में काम करेगी. समिति के गठन के ही दिन विश्व के शीर्षस्थ गिटार वादकों में से एक येल यूनिवर्सिटी से संगीत के स्नातक जेफरी क्रिंगर की अनूठी प्रस्तुति ने श्रोताओं को रसविभोर कर दिया.
संगीत अथवा ध्वनि के माध्यम से उपचार की पध्दति नई नहीं है. संगीत की शक्ति से हर भारतीय परिचित है. सुर सम्राट तानसेन ने जब सम्राट अकबर के दरबार में दीपक राग सुनाया तो संगीत के संप्रेषण से दीयों से लौ जल उठे. उनके राग मेघ मल्हार से वर्षा हो जाती थी. बाद में तानसेन अस्वस्थ हुए, तब भी उनकी बहनों ने राग मल्हार सुनाकर ही उन्हें ठीक किया. आधुनिक शोधों के बाद अब यह मान्यता बन चुकी है कि म्यूजिक थेरैपी आत्म विकास और आत्मावलोकन का उत्कृष्ट साधन है. यह न केवल शारीरिक विकारों को नियंत्रित करता है बल्कि व्यक्ति की सामाजिक गतिविधियों को सही दिशा दे सकता है. संगीत का प्रयोग कर किसी भी व्यक्ति की कार्यदक्षता और क्षमता बढ़ाई जा सकती है
एलोपैथी चिकित्सक डा. अनिल पाटिल पिछले 15 सालों से मुम्बई के समीप दादर में म्यजिक थेरैपी से मरीजों का उपचार कर रहे हैं. वे भारत के पहले म्यूजिक थेरैपिस्ट होने का दावा भी करते हैं. रोगियों की जरूरत के अनुसार वे खुद संगीत संयोजन करते हैं, गीतों की रचना करते हैं और अलग-अलग रोगियों की प्रवृति और आवश्यकता के अनुसार उन पर प्रयोग करते हैं. डा. पाटिल का कहना है कि अम्लता, मधुमेह, रक्तचाप और ह्रदय के मरीजों में म्यूजिक थेरैपी से बेहतर परिणाम सामने आए हैं. बच्चों के बेहतर विकास के लिए यह काफी कारगर है. यहां तक कि प्रसव के दौरान होने वाली पीड़ा भी म्यूजिक थेरैपी से कम की जा सकती है. डा. पाटिल ने उपचार की इस पध्दति की सफलता से उत्साहित होकर मुम्बई के समीप ही लोनावाला में एक आश्रम भी बना लिया है, जहां मरीजों का बेहतर सुविधाओं के साथ इलाज किया जाता है.
पर यह संगीत उपचार के लिए किस तरह काम करता है?
बिलासपुर में गठित छत्तीसगढ़ म्यूजिक थेरैपी एसोसिएशन के अध्यक्ष मनीष दत्त का कहना है कि पृथ्वी समेत सृष्टि की प्रत्येक संरचना में किसी न किसी प्रकार का कम्पन है. वस्तुओं के भार, प्रकृति व गुरूत्वाकर्षण के प्रभाव से कम्पन की यह गति भिन्न हो सकती है. मष्तिष्क, नेत्र, ह्रदय, नाड़ी ही नहीं चलते बल्कि हमारे शरीर की संरचना कुछ ऐसी है कि इसके प्रत्येक भाग में अलग-अलग आवृत्ति और तीव्रता के कम्पन होते हैं. निरोगी काया में इन कम्पनों की गति कम या अधिक हो जाती है, म्यूजिक थेरैपी के जरिए रोगियों के इन कम्पनों को नियंत्रित किया जाता है तथा निश्चित गति दे दी जाती है. थेरैपिस्ट, रोगियों के लिए अनुकूल संगीत की रचना करते हैं अथवा रचे गए उपयुक्त संगीत की खुराक उन्हें ठीक दवाओं की तरह ही देते हैं. संगीत का कानों से होकर मष्तिष्क, नेत्र और ह्रदय पर पड़ने वाले प्रभाव हम देखते और महसूस करते हैं. इसी तरह शरीर के बाकी अंगों पर भी इसका प्रभाव पड़ता है, वह भले ही हमें प्रत्यक्ष तौर पर महसूस न होता हो. व्याधि से मुक्त करने के लिए इसी सिध्दांत से काम किया जाता है.
महर्षि महेश योगी ने अपने हालैंड स्थित विश्वविद्यालय तथा उसकी दिल्ली शाखा में म्यूजिक थेरेपी पर शोध कराया और यहां प्रयोग करके दिखाया कि एक विशेष प्रकार का संगीत सुनने के दौरान गायें ज्यादा दूध देने लगती हैं. जर्मनी के तानाशाह एडोल्फ हिटलर (1889-1945), 6 माह से सो नहीं पा रहे थे, उन्हें नींद में लाने के लिए तमाम दवाओं का इस्तेमाल किया गया, लाभ नहीं हुआ. तब उस वक्त के प्रख्यात भारतीय संगीतज्ञ ओंकार नाथ ठाकुर की मदद ली गई. उन्होंने अपने संगीत का जादू इस तरह चलाया कि हिटलर को नींद आ गई.
हालांकि श्री दत्त का मानना है कि म्यूजिक थेरैपी इतनी सरल उपचार पध्दति नहीं है. चिकित्सा के क्षेत्र में काम करने वाले दूसरे प्रवीण लोगों की तरह ही इसके चिकित्सकों को पर्याप्त समर्पण भाव व गंभीरता से काम करने से ही रोगियों के उपचार में सफलता मिल सकती है. एक ही तरह का संगीत दो समान विकार वाले रोगियों के लिए कारगर हो यह भी जरूरी नहीं है. प्रत्येक रोगी के लिए उसके शरीर, मष्तिष्क और उसके मनोभावों के अनुसार ही संगीत का चयन करना आवश्यक है.
बहरहाल, अंग्रेजी दवाओं व खर्चीले प्रचलित उपचार पध्दतियों के बीच म्यूजिक थेरैपी रोगियों के लिए आशा की किरण है, जिसने छत्तीसगढ़ में भी दस्तक दे दी है.छत्तीसगढ़ म्यूजिक थेरैपी एसोसिएशन के मुख्य संगीत प्रशिक्षक उस्ताद आरिफ तनवीर का कहना है कि आधुनिक भारत के इतिहास में पांचवे दशक में प्रख्यात संगीत साधक कटनी के घनश्याम दास की किताब संगीत विज्ञान म्यूजिक थेरैपी पर ही केन्द्रित है. हालांकि संगीत के कोर्स में विश्वविद्यालयों ने इसे नहीं लिया है पर अनेक संगीत शिक्षण संस्थानों में यह किताब उपलब्ध है.
बिलासपुर में बनाई गई छत्तीसगढ़ स्तरीय समिति के संस्थापक पुलिस महानिरीक्षक श्री श्रीवास्तव हैं. जिन्हें खेल, संगीत के अलावा अनेक सामाजिक गतिविधियों में हमेशा आगे देखा जाता है. इसके अध्यक्ष संगीत के क्षेत्र में पिछले 50 सालों से सक्रिय मनीष दत्त हैं. मुख्य संगीत प्रशिक्षक आरिफ तनवीर हैं. समिति में राम प्रताप सिंह विमल, डा. योगेश जैन, डा. अलका रहालकर, विवेक जोगलेकर आदि भी शामिल किये गए हैं जो अपने-अपने क्षेत्रों में खासी महारत रखते हैं. छत्तीसगढ़ के हर जिले में इसकी इकाईयां गठित करने की योजना बनाई गई है. एसोसियेशन ने संगीत चिकित्सा के माध्यम से आम लोगों के अलावा पुलिस और सुरक्षा के काम में लगे जवानों का भी उपचार करने की योजना बनाई है.

रविवार, 9 दिसंबर 2007

छत्तीसगढ के हर आंगन का लोकपर्व राऊतनाच

हाल में बिलासपुर में राऊत नाच महोत्सव सम्पन्न हुआ। राऊत नाच छत्तीसगढ़ का संभवतः सबसे वृहद सामूहिक नृत्य है।
जैसा कि देश के अधिकांश भागों में है, राज्य के यादव भी परम्परागत रूप से गाय-भैंस पालने और दूध बेचने के व्यवसाय से जुड़े हैं। धान की फसल जब घरों में पहुंचने लगती है और गायों को कटी हुई फसल से भरपूर चारा मिलने लगता है। यह ठंड के मौसम की शुरूआत भी होती है। गायें न केवल भरपूर दूध देने लगती हैं बल्कि वे हष्ट पुष्ट भी हो जाती हैं। जिन घरों के गायों को यादव चराते हैं, वहां से यादवों को उपहार भी मिलता है। देवउठनी एकादशी से शुरू होने वाले इस पर्व में सजे धजे राऊत (यादव) अन्नपूर्णा गायों, बैलों को भी खूब सजाते हैं, इस सजावट में उनके गले में बांधा जाने वाला पट्टा- सुहई महत्वपूर्ण है, जो एक रंगीन धागे से बनी चौड़ी पट्टी होती है। उन्हें घंटी भी बांधी जाती है, सिर को भी सजाया जाता है।
संभवतः राऊत नाच का उद्गगम धान की फसल आने से ही जुड़ा हुआ है।

धान की कोठियों को धान भरने के पहले गोबर से लीपा-पोता जाता है। कोठियों की सजावट तब तक अधूरी मानी जाती है, जब तक पूर्णिमा की रात्रि में आकर तेज स्वर में समृध्दि की कामना करने वाला लोकगीत गाते हुए यादव गोबर और धान के मिश्रण वाला थाप उस कोठी पर नहीं लगा जाता। इस थाप को सुखधना कहते हैं। गाय-बैलों ने परिश्रम कर भरपूर फसल उगाकर किसान को समृध्द किया और इन गाय-बैलों की देखभाल राऊत ने की, फिर इस राऊत का थाप पड़े बगैर कोठी फलेगी-फूलेगी कैसे और धान भरने का शुभ कार्य कैसे पूरा होगा?
राऊत देखता है कि किसान साल भर की मेहनत से उगे फसल को लेकर आनंदित है। चारों ओर व्यस्तता होती है। खेत में धान की कटाई चल रही होती है। किसान माई-पिल्ला (बाल-बच्चों के साथ) धान समेटने में लगा होता है। छोटे बच्चों के लिए भी काम बंटा हुआ है। वे सीला बीनते हैं- सीला यानि धान की जो बालियां (करपा) बटोरते हुए बोझा बांधने के दौरान छूट जाती हैं। एक-एक बाली बच्चे बीनते हैं, या तो उसे घर लाकर इकट्ठा करेंगे या फिर तुरंत ही मींज कर रख लेंगे। यह हिस्सा बच्चे का ही होता है। वे चाहें तो इसे बेचकर अपनी पसंद की चीजें खाई, खिलौने आदि तुरंत खरीद लेते हैं या फिर ज्यादा पसंद की चीज खरीदने के लिए साप्ताहिक बाजार का इंतजार करते हैं।

देवउठनी एकादशी के बाद पड़ने वाले साप्ताहिक बाजार के लिए राऊत तैयारी करते हैं। वे खूब सजते धजते हैं। सिर पर पागा (पगड़ी) पहनते हैं, जो एक पूरी रंगीन अथवा सफेद धोती होती है, जिसे बांधकर उसके ऊपर रंगीन कागज लपेटा जाता है। रंगीन कागज नहीं है तो गेंदे की माला भी चलेगी। पसंद और उपलब्धता की बात है। पूरा चेहरा अभ्रक जैसी चीज से पुता होता है। यह वास्तव में होता है- रामरस। नाम राम पर है लेकिन है यह कृष्ण की कर्मभूमि वृंदावन की मिट्टी, वे कृष्ण जो यादवों के ईष्टदेव हैं। दुकानों में इसे खासतौर पर राऊतों की जरूरत को देखते हुए मंगाया जाता है। माथा बिंदिया या फिर तिलक से सजाया जाता है। इसके बाद कमीज, प्रायः यह पूरे बांह की होती है। चटक रंग की होनी चाहिए। उसके ऊपर जैकेट जैसी चीज, जिसे सुरखा कहा जाता है। गले में कौड़ियों से बनी माला, कलाई में भी इसी तरह की माला और कमर में भी कौड़ियों की ही पेटी। नीचे चुस्त पहनी गई धोती, जूते मोजे और घुंघरू। एक हाथ में सजी हुई मजबूत लाठी, दूसरे हाथ में ढाल, छत्तीसगढ़ी में लाठी को लऊठी और ढाल को फरी कहते हैं। लाठी आक्रमण के लिए और ढाल बचाव के लिए, क्योंकि नृत्य के दौरान लाठियों का बड़ा महत्व है। फिर यादव लाठियों के बगैर घर से निकलते ही नहीं। यह इनका शस्त्र है। शस्त्र चालन का अद्भुत शौर्य प्रदर्शन नृत्य समारोह के दौरान दिखाई देता है। कई बार सिर भी फूट जाते हैं। पूरा घर यादव बच्चे बूढ़ों के श्रृंगार का सामान जुटाने और उन्हें संवारने में मशगूल होता है क्योंकि ये बाज़ार बिहाने के लिये यानि बाज़ार को जीतने के लिए निकलने वाले हैं।

राऊत केवल मवेशियों की रखवाली नहीं करते बल्कि उन्हें पूरे गांव का रखवाला माना जाता है। जब कभी किसी घर में कोई विपत्ति आती है, तो परिवार के सदस्यों की तरह, चाहे दिन हो या रात-यादव सबसे पहले पहुंचते हैं, अपनी लाठी लेकर।
ऐसे में छत्तीसगढ़ के दूसरे सबसे बड़े शहर संस्कारधानी और राजधानी नहीं बन पाने के बाद से न्यायधानी के नाम से जाना जाने वाला बिलासपुर देवउठनी एकादशी के बाद पड़ने वाले शनिवार को छोड़कर उसके बाद आने वाले शनिवार को राऊत नाच के हंगामे से गूंज उठता है। सड़कों पर लाठियों की ठक-ठक और घुंघरूओं की छम-छम जिस दिशा से गुजरें बरबस लोगों का ध्यान खींच लेती है। इन टोलियों के साथ होता है बजगरियों का समूह, वाद्यकार, जो छत्तीसगढ़ के पिछड़े समाज में हैं कई सालों से अनुसूचित जाति में शामिल किए जाने की मांग कर रहे हैं, उनका यह परम्परागत व्यवसाय है। कुछ गड़वा अच्छी सरकारी नौकरियों में आ गए हैं पर ज्यादातर की माली हालत दयनीय है। वे आज भी समृध्द समुदाय के आश्रित होते हैं।
शादी ब्याह में बैंड बाजों और डीजे का चलन बढ़ने के बाद परी और गड़वा बाजा बजाने वालों के धंधे पर असर पड़ा है, पर ये गांव के किसी भी उल्लास में अपनी भागीदारी निभाने के लिये पहुंच जाते हैं। इनकी पूछ परख सिर्फ इनके पीछे किए जाने वाले खर्चों की वजह से नहीं की जाती है, वरना ये आज भी उत्सव और शादी ब्याह में उल्लास का असल मजा देते हैं जब इनका ओंगन (वेस्टेज इंजन आयल) से पुता हुआ चमड़े का नगाड़ा जैसा वाद्य गुदड़ुम गुदड़ुम का स्वर निकालता है। इसमें चार चांद लगा देती हैं परियां। ये परियां खूबसूरती में कल की हेमामालिनी और आज की ऐश्वर्या से कम नहीं। ये बहुत गाढ़ा मेकअप करके, बहुत चटकीली सलवार सूट या घाघरा चोली पहनकर गड़वा बाजा की टोली के साथ ही निकलती हैं। ये बहुत अच्छा गाती भी हैं। लेकिन राज़ की बात यह है कि ये युवतियां नहीं युवक हैं। जी हां, महिलाओं का स्वांग धरकर, लिपस्टिक, बिंदिया, पाउडर पोतकर जब निकलते हैं तो लोग भ्रम में पड़ जाते हैं। और इस बात का पता होने के बाद भी केवल मज़ा लेने के लिये युवक इनपर फिकरे कसते हैं, सीटियां बजाते हैं।
आजकल ये बजगरिये कुछ मंहगे हैं। इसलिए नहीं कि इनका मार्केट रेट बढ़ गया है, बल्कि इसलिए कि मंहगाई बढ़ गई है। एक टोली में होते हैं कम से कम दस से पन्द्रह लोग और उनको घूमना है दस बारह दिन तक बाजार बिहाने के लिए, आंगन में हांका के लिए यादव बंधुओं की टोली के साथ। इतने लोगों का रोज का चांवल-दाल और फिर सब उत्साह में भरे हैं, किसान भी, यादव भी, बजगरियों के लिए भी तो यह सीजन है, उनका भी हक बनता है। कुछ बचे तो आने वाले एक दो महीने की रोटी नसीब हो। कई बजगरियों की टोली 20 से 25 हजार तक में तय होती है। बिलासपुर राऊत नाच महोत्सव से पहले, शहर के सबसे पुराने बाजार शनिचरी में इनका जमघट लग जाता है। ठीक अरपा नदी के रपटे के ऊपर। राऊतों के लीडर आते हैं, सौदा पक्का करके उनको उठा ले जाते हैं। ये सब उस शनिवार की दोपहर बाद से शनिचरी बाजार के पास ही स्थित लगभग 100 साल पुराने लाल बहादुर शास्त्री स्कूल के मैदान मे इकट्ठे होने लगते हैं। टोलियों की संख्या एक सौ से उपर होती है। एक टोली में 50 से 200 यादव और हर टोली के पीछे दर्जन भर बजगरिये। शहनाई, गड़वा बाजा, तुरही, बेन्जो और तमाम पारम्परिक और जो उपलब्ध है उन आधुनिक वाद्य यंत्रों के साथ। मजे की बात है कि गड़वा बाजा को नेपथ्य में होना चाहिए मगर यहां ऐसा नहीं होता। गड़वा बाजा ही धुन की लम्बाई तय करता है। गड़वा बाजा थमते ही सारे वाद्य थम जाते हैं। परियां इन धुनों पर थिरकती हैं, और गला खोल के गाती हैं। उनके गायन में रामचरित मानस के दोहे, गीत, जगजीत सिंह की गज़लें और डिस्को कुछ भी हो सकते हैं।आनंद भरपूर आता है। लेकिन इससे भी महत्व का है राऊतों का नाच और उनके दोहे। लाठियां लहराते, उछालते और शौर्य प्रदर्शन करते हुए जब वे निकलते हैं और जब वे जीवन- दर्शन से जुड़े दोहों को हुंकार लगाकर आकाश हिलाने की कोशिश करते हैं तो फिर जबरदस्त माहौल बन जाता है। इन दोहों में भी ज्यादातर लोक जीवन की पीड़ा, सामाजिक समरसता के संदेश और जीवन के गूढ़ रहस्यों पर टिप्पणियां होती है। कबीर, गुरूनानक, तुलसीदास के दोहे और उनके उध्दरणों से तैयार की गई रचनाएं दो पंक्तियों की होती है-एक लाईन जैसे ही मुख्य स्वर की ओर से पूरा होता है-दूसरा यादव लाठियां लहराकर दूसरी लाईन पूरी कर देता है। दूसरी लाइन पूरी होते ही शुरू हो जाता परियों, राऊतों का नाच और गड़वा बाजा टीम का धुन।
इस बार भी आई टोलियों की संख्या 70 से अधिक थी। कोई बस में चढ़कर पहुंचे तो कोई स्पेशल मेटाडोर करके आए, आसपास की कई टीमें तो पैदल ही पहुंच गईं। शाम से लेकर रात दो बजे तक इनका प्रदर्शन होता रहा। भाग लेने वालों की संख्या कभी घट जाती है कभी बढ़ जाती है। लेकिन परम्परा जिंदा है अपनी भरपूर ताकत से। बिना किसी सरकारी सहायता के।
राऊत नाच तो एक ऐसा नृत्य़ है, जिसमें पात्र तो यादव हैं पर इसका आनन्द हर आंगन में उठाया जाता है। यादव आंगन-आंगन पहुंचते हैं। गांव का हर घर इंतजार करता है कि यादव उनके यहां कब आएंगे और गड़वा की धमक के साथ समृध्दि की कामना वाले गीत गाएंगे।
30 साल पुराने हो चुके राऊत नाच महोत्सव के मौजूदा स्वरूप को आकार देने वाले शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र से जुड़े डा. कालीचरण यादव ने बताया कि राऊत नाच तो लोकपर्व है। इसे केवल आयोजकों ने व्यवस्थित करने और उसे गौरव प्रदान करने का प्रयास किया है। कोई भी लोक-नृत्य थमे हुए तालाब का पानी नहीं बल्कि बहता हुआ झरना होता है। राऊत नाच में जो बदलाव आए हैं समय के साथ स्वाभाविक रूप से आता गया है। आयोजकों ने केवल उन्हें एकजुट करने के लिए कोशिश की है और इस नाच की महत्ता के अनुसार उसे मंच दिया है। अब इस महोत्सव में एक लाख रूपयों से अधिक के इनाम हर साल दिये जाते हैं। हर साल दर्जनों शील्ड बांटे जाते हैं। अब पिछले कुछ सालों से प्रतिभावान बच्चों को भी पुरस्कृत किया जाने लगा है।
जब आसपास के गांवों से शनिचरी का बाजार बिहाने के लिए यादवों की टोली आती थी तो रास्ते उबड़ खाबड़ होते थे। कईयों को चोट लग जाती खी। त्योहार के उल्लास में और लाठी संचालन के दौरान इतनी लड़ाई उनके बीच हो जाती थी, कि हर महोत्सव के बाद कहीं न कहीं हत्या आदि की वारदात सुनाई देती थी। यह लड़ाई दो परिवारों के रंजिश में भी बदल जाती थी और तब एक परिवार को मुखिया खोना पड़ता था, तो दूसरे परिवार जेल में होता था। पिछले 15-20 सालों से कम से कम बिलासपुर जिले में इस तरह की कोई घटना नहीं हुई है।
राऊत नाच महोत्सव ने जो दिशा दी, उसके चलते छत्तीसगढ़ के कई अन्य गांवों में भी इस तरह के महोत्सव आयोजित किये जाने लगे हैं। डा. कालीचरण बताते हैं कि देश के जिस भाग में भी दूध का व्यवसाय है राऊत नाच या इससे मिलता जुलता लोक पर्व मनाया जाता है। उत्तर भारत के अनेक राज्यों में यह मनाया जाता है। पर जैसा समृध्द छत्तीसगढ़ का राऊत नाच है, वैसा कोई नहीं।
एक तरफ अनेक लोकनृत्यों पर्वों को छत्तीसगढ़ में ही राजाश्रय दिए जाने के बाद भी बचाया नहीं जा सका है, वहीं राऊत नाच बिना किसी सरकारी मदद के इसे मनाने वाले लोगों के जुनून पर फल-फूल रहा है। अब तो राऊतनाच महोत्सव एक पहचान बन गया है बिलासपुर का। हजारों लोगों की भीड़ इस बार भी लालबहादुर शास्त्री स्कूल प्रांगण में उमड़ी। यह एक ऐसा कार्यक्रम है जहां राजनेता मुख्य अतिथि बनने के लिए लालायित होते हैं। आयोजक कुछ-कुछ इस बात का ख्याल भी रखते हैं। हर साल अतिथि बदलते रहते हैं पर कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हैं पूर्व मंत्री बीआर यादव। वे शुरू से इस आयोजन की रीढ़ रहे हैं।
All photographs are contributed by Aslam, reporter Daily Deshbandhu, Bilaspur.

गुरुवार, 29 नवंबर 2007

एक प्रेस रिपोर्टर का भगीरथ प्रयास, मासूम को आखिर नई जिन्दगी मिली

देश की एक अरब की आबादी में अब तक केवल 57 ऐसे लोगों की पहचान हो पाई जिनका ब्लड ग्रुप-बाम्बे ब्लड ग्रुप है। ऐसे में एक मासूम बालक के दिल में सुराख का आपरेशन कराने के लिए 3 यूनिट बाम्बे ब्लड की जरूरत पड़ी। गरीब मां बाप अरविन्द के जीने की आशा छोड़ चुके थे। रिपोर्टर असलम ने मीडिया की पहुंच का इस्तेमाल किया और अरविन्द का सफल आपरेशन हो सका।
ऐसी हर खबर जो सनसनी फैलाए, पाठकों की संवेदनाओं को झकझोर दे, किसी भी अखबारनवीस के लिए बड़े काम की होती है। प्रेस रिपोर्टर और प्रेस छायाकार हर दिन किसी अनूठी खबर की तलाश सुबह से शुरू करते देर रात तक तैयार कर लेते हैं।
छप जाने के बाद अगली सुबह फिर किसी नई खबर की खोज शुरू हो जाती है। दैनिक अखबारों में काम करने वाले रिपोर्टरों के पास अपने कोटे की खबरें तैयार कर एक तय समय पर देने का दबाव होता है और वह अपने नाते-रिश्तेदारों के सुख-दुख के लिए भी बहुत कम समय निकाल पाता है। ऊपर से कस्बों में काम करने वाले पत्रकारों की पगार इतनी कम होती है कि अपने परिवार के लिए रोजमर्रा का इंतजाम कर लेने में ही सुख की अनुभूति कर लेता है। उनके भीतर आमतौर पर समाज का पहरेदार होने का भाव अहंकार भी पैदा कर देता है, जो किसी की भलाई करने से उन्हें रोकता है।
ऐसी हालत में अगर कोई रिपोर्टर किसी दलित, गरीब गंभीर ह्रदय रोग से पीड़ित बच्चे के निराश हो चुके माता-पिता के दुख में खुद को शामिल कर लेता है और देशभर में मदद की गुहार लगाकर बालक का जीवन बचाने में सफल हो जाता है तो सुखद अनुभूति होती है।
इस मार्मिक घटना का अंत बहुत सुखद है और जिसके चलते एक 90रूपए की रोजी कमाने वाला बढ़ई अपने गरीब बच्चे के पीछे दो लाख रूपए का इंतजाम कर दुर्लभ आपरेशन करा सका है। सवाल केवल रुपए का नहीं, यहां पर उससे भी बड़ा पहाड़ था बाम्बे ब्लड ग्रुप का प्रबंध करना। इस ग्रुप का खून न केवल हिन्दुस्तान में बल्कि पूरी दुनिया में बहुत कम लोगों में पाया जाता है। हिन्दुस्तान की एक अरब से अधिक की आबादी में अब तक केवल 57 लोगों की पहचान हो पाई है, जिनका ब्लड बाम्बे ग्रुप का है।

बिलासपुर छत्तीसगढ़ के स्लम एरिया में रहने वाले बढ़ई अश्वनी कुमार बघेल के 6 साल के बेटे के बारे में यहां के एक दैनिक अखबार में काम करने वाले रिपोर्टर छायाकार असलम को तब मालूम हुआ जब वह किसी खबर के लिए यहां के अपोलो हास्पीटल में पहुंचा। वहां किसी से बातचीत के दौरान ही पता चला कि एक बालक यहां कल तक भर्ती था, जिसके ह्रदय में सुराख था। डाक्टरों ने उसे इस लिए डिस्चार्ज कर दिया क्योंकि उस बालक का ब्लड ग्रुप बाम्बे है, जो अत्यन्त सीमित है। इस बालक के लिए राज्य सरकार ने संजीवनी राहत कोष से राशि मंजूर की थी, जिसे अपोलो प्रबंधन ने दो दिन का खर्च काटकर वापस भेज दिया, अपनी रिपोर्ट में बिना इस बात का जिक्र किए कि अरविन्द का इलाज नहीं हो पाया है। असलम को लगा कि यह खबर बनती है। उसने बताए पते पर जाकर अरविन्द और उसके माता-पिता की तलाश शुरू की। पहले पन्ने की खबर बनी। छपने के बाद बहुत से पाठकों को मालूम हुआ कि कोई ऐसा ब्लड ग्रुप है, जिसकी उपलब्धता अत्यन्त दुर्लभ है। छपने के बाद असलम इस खबर से अलग नहीं हो पाया। मासूम अरविन्द अपनी बीमारी की गंभीरता से अनजान था, और मोहक मुस्कान लिए खेलता था पर थोड़ी ही देर में हांफने लगता था। गरीब, दलित और मामूली पढ़े लिखे मां-बाप अपने बेटे के बचने की उम्मीद पूरी तरह छोड़ चुके थे। उनकी लाचारी-बेबसी असलम को परेशान कर रही थी।
इस बीच शहर के सारे अखबारों में मासूम अरविन्द की खबर आई।

अपोलो हास्पीटल के डाक्टर भी इसके बाद फिर सक्रिय हुए। असलम के सम्पर्क करने पर उन्होंने कहा कि 4 यूनिट बाम्बे ब्लड यदि उन्हें मिल जाता है तो वे अरविन्द का आपरेशन कर देंगे। असलम ने अरविन्द के लिए रक्त जुटाने के काम को एक मिशन की तरह लिया। उसने खबर छापने के बाद इंटरनेट का सहारा लिया। दर्जनों वेबसाइट्स में उसने तलाश की क्या बाम्बे ब्लड ग्रुप का कोई दानदाता मिलेगा? असलम को इससे खास मदद नहीं मिली। अपोलो हास्पीटल प्रबंधन ने कुछ गंभीर होकर बाम्बे ग्रुप के ब्लड की तलाश की, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। यहां के प्रबंधकों ने बताया कि उन्होंने देशभर के नामी ब्लड बैंकों में पता लगा लिया है, कहीं पर भी इसकी उपलब्धता नहीं है। असलम ने न्यूयार्क में दुनिया के सबसे बड़े माने जाने वाले ब्लड बैंक, न्यूयार्क ब्लड बैंक को भी मेल किया और अरविन्द के लिए बाम्बे ब्लड की मांग की। वहां से जवाब आया कि बेहतर होगा, आप हिन्दुस्तान में ही तलाश करें।
असलम इस पर भी निराश नहीं हुआ। तलाश के दौरान कोरबा के एक युवक का पता चला, जिसका रक्त बाम्बे ग्रुप का था। भगीरथ यादव नाम का यह युवक जन्म से ही दोनों पैरों से अशक्त है। अरविन्द की पीड़ा सुनकर वह तत्काल खून देने के लिए तैयार हो गया। इस तरह एक शुरूआत हो गई। लेकिन अभी भी 3 यूनिट और खून की जरूरत थी। मीडिया से जुड़े असलम ने अपनी ताकत इस तरफ भी लगाई। याहू ग्रुप के अलावा देश भर में रक्तदाताओं के लिए काम करने वालों का वेबसाइट्स में पता लगाना शुरू किया। अनेक लोगों से मेल पर जानकारी शेयर की गई और मेसेन्जर पर चर्चा हुई। इसके चलते जल्द ही अरविन्द का मामला तमाम राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं और इलेक्ट्रानिक मीडिया के माध्यम से देश-विदेश में पहुंच गया। जी न्यूज, सहारा न्यूज, ईटीवी, बीबीसी हिन्दी डाटकाम, इंडिया टुडे आदि में अरविन्द की हालत पर समाचार बने। स्टार न्यूज ने इस पर 3 मई 2007 को लाइव विशेष रिपोर्ट प्रसारित किया। आईबीएन7 ने इस पर 30 मिनट तक अरविन्द की दास्तां दिखाई। जिसका शीर्षक दिया- अंकल मुझे बचा लो। देश भर के लोगों के इन दफ्तरों में फोन आए और लोगों ने असलम तथा अरविन्द के पिता अश्वनी से सम्पर्क शुरू कर दिया।
अपोलो ने हाथ खींचा
भगीरथ यादव ने सबसे पहले एक यूनिट खून दिया। इसके बाद राऊरकेला के एक भले आदमी ने आकर अपोलो में अपना ब्लड दिया और अरविन्द से मिले बगैर ही वापस चला गया। मुम्बई के डोम्बीवेली से एक अपरिचित एमआर ने अपने खर्च पर वहां के किसी ब्लड बैंक से एक यूनिट ब्लड खरीदा और उसे सुरक्षित अपोलो छोड़ गया।

इस तरह से इस विशाल देश में चिन्हित बाम्बे ब्लड ग्रुप के 57 लोगों में से ऐसे 3 लोगों की तलाश हो गई जिन्होंने अपना रक्त अरविन्द के लिए दिया । अपोलो के चिकित्सक डा. संजय जैन 3 यूनिट पर भी अरविन्द का आपरेशन करने के लिए तैयार हो गए। लेकिन आपरेशन की तय तिथि के ठीक एक दिन पहले वे अपना हौसला खो बैठे और यहां की सुविधाओं में कमी का हवाला देते हुए आपरेशन स्थगित कर चैन्नई अपोलो रिफर कर दिया। अरविन्द का पिता निराश हुआ लेकिन उम्मीद तो छोड़ी नहीं जा सकती थी। वह अरविन्द को लेकर चैन्नई गया। वहां के डाक्टरों ने और भी हताश कर दिया। उन्होंने कह दिया कि 3 यूनिट ब्लड से तो कुछ नहीं हो पाएगा, कम से कम 6 यूनिट की जरूरत पडे़गी। यह भी कहा गया कि जो खून अपोलो बिलासपुर के ब्लड बैंक में जमा है, वह अरविन्द के किसी काम नहीं आएगा और उन्हें फ्रेश खून की जरूरत पड़ेगी।
इसके बाद लगातार प्रयास जारी रहे। अनेक लोगों के फोन आते रहे और अपनी ओर से मदद करने की कोशिश करते रहे।
रायगढ़ के सतीश सिंह ठाकुर और टाटानगर, जमशेदपुर के अमिताभ कुमार सिंह ने ब्लड देने की इच्छा जताई और कहा कि वे जहां उनकी जरूरत हो पहुंचने के लिए तैयार हैं। एक टेलीकाम इंडस्ट्री के चीफ मैनेजर बी एस श्रीधर, जो बैंगलोर से ही हैं, अपना रक्त देने के लिए तैयार हो गए। इस बीच अपोलो बिलासपुर में जमा कराया गया दुर्लभ रक्त खराब हो चुका था।
इसी बीच असलम को उसके एक मित्र ने बैंगलोर के एक अस्पताल नारायण ह्रदयालय बैंगलोर का पता दिया और कहा कि वहां पर कम खर्च में अच्छी सुविधाओं के साथ अरविन्द का आपरेशन हो सकता है। उस हास्पीटल ने अच्छा सहयोग दिया। यहां असलम ने अस्पताल के चेयरमैन डा. देवी शेट्ठी से सम्पर्क किया। डाक्टर ने कहा कि वे कम से कम खर्च पर अरविन्द का इलाज करेंगे और बाकी ब्लड की भी व्यवस्था करेंगे। नारायण ह्रदयालय बैंगलोर, वही हास्पीटल है, जहां पाकिस्तानी बच्ची नूर के ह्रदय का आपरेशन हुआ था, जिसकी देशभर में चर्चा थी।
इसके बाद आपरेशन की तय तारीख के 15 दिन पहले 7 अक्टूबर को अरविन्द और उसके परिजन बैंगलोर पहुंच गए। बाद में असलम और दोनों रक्तदाता अमिताभ और सतीश भी वहां पहुंचे। 24 अक्टूबर को डा. सी रेड्डी और डा. संदीप के साथ 4 डाक्टरों की टीम ने अरविन्द का 4 घंटे में सफल ओपन हार्ट सर्जरी की।
अब अरविन्द अपने घर लौट चुका है और हाल ही में उसने अपना आठवां जन्मदिन मनाया।
अरविन्द के साथ सबको हमदर्दी रही। जाने कितने लोगों ने अपनी अपनी भूमिका निभाई। बलौदा कालेज में पढ़ाने वाली शिवकुमारी कुर्रे, नोविनो बैटरी के अधिकारी ए के पौराणिक, राकेश बाटवे, सुनील मित्तल, प्रमोद अग्रवाल, निखिल उपाध्याय, अफजल हुसैन, मीना लुसानी- कुवैत आदि ने अपनी अपनी तरफ से मदद दी। अरविन्द के मामले में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह और राजस्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने विशेष रूचि लेकर संजीवनी कोष से राशि स्वीकृत की, इसके बावजूद की राज्य के अनुमोदित अस्पतालों में नारायण ह्रदयालय का नाम नहीं था। एसईसीएल बिलासपुर ने भी जरूरत के अनुसार आर्थिक सहायता दी।

अरविन्द के मामले में असलम ने दुर्लभ बाम्बे ब्लड समूह की खोज के लिए अब बाम्बे ब्लड हेल्पलाइन रक्तदाताओं के सहयोग से बनाया है और इसमें ज्यादा से ज्यादा लोगों को जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। असलम की संस्था से वह हर कोई जुड़ सकता है। संस्था का उद्देश्य है कि लोगों के रक्त समूह की पहचान के लिए देश भर में अभियान चले और इसमें से खासतौर पर बाम्बे ब्लड ग्रुप वालों की पहचान की जाए। आप अब्दुल असलम से सम्पर्क करना चाहते हैं तो उनका ई-मेल आईडी है bombayblood.bsp@rediffmail.com और aslamimage@rediffmail.com.

बुधवार, 28 नवंबर 2007

सरोकार में आपका स्वागत है।

ब्लाग बनाना काफी दिनों से चाहता था। ख़बरों की दुनिया से जुड़ा होने के कारण जो घटनाएं, वाकये आसपास होते रहते हैं, उन पर इसमें विचारों का आदान-प्रदान होगा। आगे ताजा ख़बरें खासतौर पर छत्तीसगढ़ से जुड़े समाचारों को इसमें शामिल करने की कोशिश होगी। आपकी राय का, मार्गदर्शन का स्वागत है।